भारत खाद्य तेल आयात पर निर्भरता कम करने की कोशिश में
Auf einen Blick
भारत खाद्य तेल आयात पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए संघर्ष कर रहा है, जो देश की विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डाल रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने नागरिकों से खपत कम करने की अपील की है, जबकि देश दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक बना हुआ है।
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Author, जैस्मिन निहलानी
पदनाम, बीबीसी संवाददाता
प्रकाशित 3 मिनट पहले
पढ़ने का समय: 4 मिनट
पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीयों से खाद्य तेल की खपत 10% घटाने की अपील की.
यह अपील पश्चिम एशिया संकट के बीच विदेशी मुद्रा बचाने की व्यापक अपील का हिस्सा थी.
मोदी ने नागरिकों से ईंधन की खपत घटाने, सोना न ख़रीदने और गैर-ज़रूरी विदेश यात्रा सीमित करने को भी कहा था.
भारत ने मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष में खाद्य तेल आयात पर लगभग 19.5 अरब डॉलर ख़र्च किए.
2025/26 में वैश्विक वनस्पति तेल आयात का लगभग पाँचवाँ हिस्सा अकेले भारत का था, जिससे वह दुनिया का सबसे बड़ा आयातक बन गया.
अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) के आँकड़ों के अनुसार यूरोपीय संघ, चीन और अमेरिका इससे काफ़ी पीछे रहे.
लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था.
'लगभग आत्मनिर्भर भारत'
1994-95 में भारत की खाद्य तेल आयात पर निर्भरता सिर्फ़ 5% थी.
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कृषि मंत्रालय के आँकड़े बताते हैं कि 2024-25 तक भारत अपनी खाद्य तेल की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए 56% आयात पर निर्भर था.
2024 में प्रकाशित नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने 1990 के दशक की शुरुआत तक खाद्य तेल उत्पादन में 'लगभग आत्मनिर्भरता' हासिल कर ली थी.
लेकिन 1990 के दशक के मध्य से सस्ते आयात और तेज़ आर्थिक वृद्धि ने माँग बढ़ा दी. प्रति व्यक्ति खाद्य तेल की खपत बढ़ी और घरेलू मांंग पूरी करने के लिए भारत आयात पर लगातार निर्भर होता गया.
चार्ट दिखाता है कि यह आयात-निर्भरता लगातार बढ़ी - 2004-05 में 38% से 2015-16 में 63% तक पहुंच गई थी. फिर 2024-25 में घटकर 56% पर आ गई.
नीति आयोग की रिपोर्ट यह भी कहती है कि खाद्य तेल के लिए आयात पर निर्भरता 'देश की विदेशी मुद्रा पर नकारात्मक असर डाल रही है.'
कौन से तेल होते हैं आयात?
भारत की कुल खेती योग्य ज़मीन का 14.3% हिस्से में तिलहन उगाए जाते हैं. देश अरंडी, कुसुंभ, तिल, रामतिल, मूँगफली और सरसों-राई का बड़ा उत्पादक है.
लेकिन भारत की खाद्य तेल आयात की टोकरी में मुख्य रूप से तीन तेल आते हैं: पाम तेल, सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल.
पाम तेल अकेले खाद्य तेल आयात का 57% है, जबकि सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल की हिस्सेदारी क्रमशः 29% और 14% है.
भारत में खाद्य तेल का उपभोग कैसे बदला
पिछले दो दशकों में भारत की खाद्य तेल खपत का स्वरूप भी काफ़ी बदल गया है.
भारत के सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन के आँकड़ों के अनुसार, 2001-02 में पाम तेल सबसे ज़्यादा खपत वाला खाद्य तेल था, जो कुल खपत का 29% था. 2022-23 तक इसका हिस्सा बढ़कर 37.6% हो गया.
भारत में होटल, रेस्तरां और कैटरिंग पाम तेल के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में हैं.
पैकेज्ड और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों - जैसे स्नैक्स, रेडी-टू-ईट उत्पाद, बेकरी आइटम और मिठाइयों - की बढ़ती माँग के साथ पाम तेल की माँग भी बढ़ी.
इसी अवधि में, कभी भारत में सबसे कम खपत वाले खाद्य तेलों में एक सूरजमुखी के तेल (3.1%) का हिस्सा बढ़कर 2022-23 तक 11.6% हो गया.
लेकिन मूँगफली तेल की खपत 2001-02 में 12% से घटकर 2022-23 में 3% रह गई, जबकि सरसों तेल 17% से घटकर 13.6% पर आ गया.
पैदावार का अंतर
भारत में खाद्यान्न के बाद सबसे ज़्यादा खेती वाले क्षेत्र में तिलहन उगाए जाते हैं. वैश्विक तिलहन क्षेत्र का 15-20% हिस्सा भारत में है. लेकिन उत्पादकता में भारत बड़े उत्पादकों से पीछे है.
नीति आयोग के आँकड़े बताते हैं कि भारत में सबसे ज़्यादा उगाए जाने वाले तिलहन सोयाबीन की पैदावार 2020-2022 में प्रति हेक्टेयर एक टन रही.
इसके मुकाबले, दुनिया के प्रमुख सोयाबीन उत्पादकों में से एक अमेरिका पैदावार प्रति हेक्टेयर 3.4 टन रही.

