Eilmeldung
FRIncendie hors norme en Gironde : Phénomène de pyrocumulonimbus sans précédent en FranceFRAttentat à la Marche des fiertés de Berlin : au moins 1 mort et 29 blessésFRIncendie à Lège-Cap-Ferret : Une nuit d'enfer pour les pompiers et les riverainsFRExplosion à la distillerie Montebello à Petit-Bourg : plusieurs blessés et forte émotionFRGuerre en Ukraine : 10 morts dans une attaque russe près de Kiev, des sanctions EU contournéesFRTadej Pogacar domine le Tour de France avec une 5e victoire d'étape à l'Alpe d'HuezFRIncendies en Gironde et Landes : Macron déploie les Armées, 1 000 militaires sur le terrainCRYPTO-FRCorée du Sud : Google Play bloque 29 exchanges de dérivés crypto pour non-conformitéFRIncendies près de Bordeaux : transports perturbés, trafic ferroviaire interrompuFRAffaire Jeffrey Epstein : les connexions du diplomate français Fabrice Aidan examinées par le Quai d’OrsayFRIncendie hors norme en Gironde : Phénomène de pyrocumulonimbus sans précédent en FranceFRAttentat à la Marche des fiertés de Berlin : au moins 1 mort et 29 blessésFRIncendie à Lège-Cap-Ferret : Une nuit d'enfer pour les pompiers et les riverainsFRExplosion à la distillerie Montebello à Petit-Bourg : plusieurs blessés et forte émotionFRGuerre en Ukraine : 10 morts dans une attaque russe près de Kiev, des sanctions EU contournéesFRTadej Pogacar domine le Tour de France avec une 5e victoire d'étape à l'Alpe d'HuezFRIncendies en Gironde et Landes : Macron déploie les Armées, 1 000 militaires sur le terrainCRYPTO-FRCorée du Sud : Google Play bloque 29 exchanges de dérivés crypto pour non-conformitéFRIncendies près de Bordeaux : transports perturbés, trafic ferroviaire interrompuFRAffaire Jeffrey Epstein : les connexions du diplomate français Fabrice Aidan examinées par le Quai d’Orsay
Newsgather
Zurückगोरक्षा के नाम पर ह‍िंसा झेलने के बाद पीड़‍ितों की ज़‍िंदगी में क्‍या-क्या बदल जाता है
गोरक्षा के नाम पर ह‍िंसा झेलने के बाद पीड़‍ितों की ज़‍िंदगी में क्‍या-क्या बदल जाता है
In Entwicklung
BBC हिंदी21.6.2026Crime13 Min. LesezeitIndia

गोरक्षा के नाम पर ह‍िंसा झेलने के बाद पीड़‍ितों की ज़‍िंदगी में क्‍या-क्या बदल जाता है

Auf einen Blick

गोरक्षा के नाम पर हुई ह‍िंसा के पीड़‍ितों को गंभीर शारीरिक, मानसिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. अब्दुल शमीर और नासिर जैसे लोगों के अनुभव बताते हैं कि कैसे मॉब लिंचिंग ने उनकी ज़िंदगी बदल दी है, जिसमें रोज़गार छिनना और भारी मेडिकल बिल शामिल हैं.

KI-generierte Zusammenfassung

Schriftgröße

गोरक्षा के नाम पर ह‍िंसा झेलने के बाद पीड़‍ितों की ज़‍िंदगी में क्‍या-क्या बदल जाता है

Author, शुभांगी म‍िश्रा

पदनाम, बीबीसी संवाददाता

........से, कासरगोड (केरल) और मुंबई (महाराष्ट्र) से

प्रकाशित 6 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 12 मिनट

(चेतावनी: कुछ ब्‍योरे पाठकों को व‍िचल‍ित कर सकते हैं)

"मेरा पैर काम नहीं करता. इसकी उँगलियाँ नहीं हिलतीं. ये अटकी हुई हैं, जैसे मर गई हों. लेकिन मच्छर काटेगा तो मालूम पड़ता है... तो ज़िंदा तो हैं!"

चिलचिलाती धूप और उमस के बीच, अब्दुल शमीर ने अपनी तकलीफ़ कुछ इस तरह बयाँ कीं. 23 अगस्त 2014 की रात उन पर जानलेवा हमला हुआ था. इस हमले में उनके सिर पर गंभीर चोट लगी. इसके बाद उनके शरीर का बायाँ हिस्सा काम नहीं करता है.

उनसे क़रीब 1000 किलोमीटर दूर मुंबई में रह रहे नासिर का आरोप है कि साल 2023 में उन पर एक गोरक्षक दल ने हमला किया था. इसमें उनके दोस्त अफ़ान की मौत हो गई थी.

उनका आरोप है क‍ि मार्च 2026 में वो एक बार फिर गोरक्षक दलों का निशाना बने. इस बार हुए हमले में उनकी बाईं टाँग टूट गई.

ये दोनों व्यक्ति अपने इस हाल के लिए कथ‍ित गोरक्षकों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

सड़कों पर कथ‍ित गोरक्षक दलों द्वारा मांस या मवेशी लाने-ले जाने की वजह से हमलों के श‍िकार ज़्यादातर गरीब तबक़े के लोग होते हैं.

मॉब लिंचिंग यानी भीड़ द्वारा हिंसा के शिकार हुए पीड़ितों को न सिर्फ़ गहरे शारीरिक और मानसिक ज़ख़्म झेलने पड़ते हैं बल्कि ऐसी घटनाएँ उन्हें आर्थिक रूप से भी तोड़ देती हैं. मोटे मेडिकल और लीगल बिल और रोज़गार का छिन जाना, इसकी सबसे बड़ी वजहें हैं.

ये बातें हमें ज़मीनी रिसर्च, एक्सपर्ट्स और नासिर और शमीर जैसे पीड़ितों के अनुभवों से पता चलीं.

मीडिया विश्लेषण के मुताबिक़, प‍िछले कुछ सालों में मॉब लिंचिंग के मामलों में इज़ाफ़ा देखा गया है.

सवाल यह है कि इस भीड़तंत्र में जो पीड़ित ज़िंदा बच जाते हैं, उनके सामने किस तरह की क़ानूनी, मेडिकल और सामाजिक चुनौतियाँ खड़ी हो जाती हैं? हमने शमीर और नासिर से बात करके इसी सवाल का जवाब ढूँढने की कोशिश की.

टूटा हुआ घर

वॉकर के सहारे झुककर धीरे-धीरे चलते शमीर मुस्कुराते हुए नमस्ते कहते हैं. वह केरल के कासरगोड के उप्पला गाँव की एक बस्ती में रहते हैं. इस पूरी बस्‍ती की दीवारें गुलाबी रंग की हैं. वहीं हमारी उनसे मुलाक़ात हुई.

बड़ी भूरी आँखों वाले शमीर अपने ऊपर हुए हमले के बारे में बताते वक्त एक अजीब सी हँसी हँसते हैं. उनकी हँसी में रोष झलकता है जो आमतौर पर आँसुओं में भी नहीं दिखता.

उनका आरोप है कि हमले के वक़्त वह और उनके दो साथी कुछ मवेशी कर्नाटक के उप्पिनांगडी से ला रहे थे. तब कुछ कथ‍ित गोरक्षकों ने उन पर मंगलोर के पंपवेल जंक्शन पर हमला कर दिया.

शमीर का दावा है, "50 आदमी आए और श्री राम सेने की जय बोले. मैं भी 'अल्लाह हू अकबर' बोला. इसके बाद उन लोगों ने मुझे बहुत मारा.''

उनका आरोप है, "मेरी गर्दन में त्रिशूल घुसाया, मुझे उठाया, और मेरा सर सामने एक इलेक्ट्रिक पोस्ट में घुसा दिया… फिर मैं बेहोश हो गया और 5 महीने तक अस्पताल में कोमा की हालत में भर्ती रहा."

उनके इन दावों की बीबीसी स्‍वतंत्र तौर पर पुष्‍ट‍ि नहीं करता.

हालाँक‍ि, एफ़आईआर में शमीर की बताई बातों का विस्तार से ज़िक्र नहीं है. एफ़आईआर के हिसाब से 23 अगस्त की रात के साढ़े 10 बजे शमीर और उनके दो साथियों का कुछ लोगों ने एक कार में पीछा किया.

गाड़ी रोककर उसके शीशे तोड़ दिए. इसके बाद गाली-गलौज की और शमीर और उनके साथी फ़ैयाज़ के ऊपर पत्थर और लाठियों से हमला किया. भारतीय दंड संहिता की धारा 307 (हत्‍या की कोश‍िश) सहित अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया गया.

श्री राम सेने कर्नाटक स्थित एक हिन्‍दू संगठन है. पुलिस एफ़आईआर या कोर्ट डॉक्यूमेंट में इनका कहीं ज़िक्र नहीं है. सुंदरेश नार्गल श्री राम सेने के साउथ डिवीज़न के वर्किंग प्रेसिडेंट हैं. हमने उनसे इस मामले में बात की.

उन्होंने हमें बताया, "हमारी संस्था में गोरक्षक अधिकारी ज़रूर हैं लेकिन हम तस्करों की ख़बर सिर्फ़ पुलिस को करते हैं. मारपीट कभी नहीं करते. साल 2014 के शमीर केस से हमारा कोई लेना-देना नहीं है."

इस घातक हमले में शमीर की जान तो बच गई, लेकिन उनसे उनकी ज़िंदगी मानो ठहर सी गई है.

उनके शरीर का बायाँ हिस्सा अब बिल्कुल काम नहीं करता. वह अपनी बाईं आँख से देख भी नहीं पाते.

वो कासरगोड के उप्पला गाँव में अपनी बीवी और पाँच बच्चों के साथ रहते थे. हमले से पहले शमीर ऑटो ड्राइवर का काम करते थे.

वह ज़्यादातर समय सीधे बैठ भी नहीं पाते. अब वो अपने दिन सोफ़े पर लेटे हुए और लूडो खेलते हुए गुज़ारते हैं.

घर के कामों में कोई योगदान नहीं दे पाते लेकिन व्हाट्सएप के ज़रिए ग्राहकों को अपार्टमेंट या ज़मीन के मालिकों से जोड़ते हैं. इससे उन्‍हें कुछ मामूली आमदनी हो जाती है.

उनकी ख़्वाहिशें अब भी ज़िंदा हैं. वह एआई के ज़रिए अपने वीडियो बनाते हैं. इनमें वह अपने लिए एक अलग ही दुनिया बुनते हैं, जहाँ वह ख़ुद को हँसते, घूमते, नाचते देख पाते हैं.

'सोचा था अपने पोता-पोती के साथ खेलूँगी'

हमले के बाद उनके परिवार की मह‍िलाओं पर घर की ख़ास ज़िम्मेदारी आ गई है. उनकी माँ फ़ातिमा को रिटायरमेंट की उम्र में काम शुरू करना पड़ा. काले बुर्के में फ़ातिमा बड़े आत्मविश्वास के साथ घर से निकलती हैं लेकिन अब उन्हें उम्र का तकाज़ा भी महसूस होने लगा है.

फ़ातिमा हँसकर कहती हैं, "सोचा था बुढ़ापे में घर पर बैठूँगी और अपने पोता-पोती के साथ खेलूँगी… लेकिन अभी चैन नहीं."

घर चलाने के लिए वह पहले स्कूल बस की ड्राइवर बनीं और अब ड्राइविंग इंस्ट्रक्टर का काम करती हैं. दो कमरों वाला यह भूतल का घर फ़ातिमा ने ख़ासतौर पर शमीर के लिए किराए पर लिया है क्योंकि वह सीढ़ियाँ नहीं चढ़ सकते.

शमीर का ख़याल पहले उनकी बीवी ने भी रखा. लेकिन अब वह उनसे तलाक़ लेना चाहती हैं.

अपना नाम न बताने की शर्त पर वो कहती हैं, "वह बहुत गुस्सा हो जाते हैं. अपना सारा फ़्रस्ट्रेशन मुझ पर निकालते थे. मुझे इंसल्ट करते थे. गाली देते थे. मारते नहीं थे, लेकिन हर छोटी-छोटी बात पर चिल्लाते थे."

मेडिकल और लीगल ख़र्चों की वजह से परिवार को आर्थिक तंगी सहनी पड़ी है.

शमीर की माँ ने हमें बताया, "हमारा कर्नाटक में घर था. हमें उसे बेचना पड़ा. अपने घर का सोना भी बेचा. दवा के लिए पैसे ख़र्च करते-करते अब हम पूरे ख़ाली हो गए हैं. कुछ नहीं बचा है."

शमीर के गुनाहगार कौन?

पंपवेल जंक्शन पर शमीर और उनके दो साथियों पर हुए हमले की तफ़्तीश मंगलोर ग्रामीण पुलिस ने की थी. जाँच में 6-7 हमलावरों की बात सामने आई और पाँच के ख़िलाफ़ चार्जशीट दाखिल हुई.

लेकिन अभियोजन पक्ष कोर्ट में आरोपों को पूरी तरह साबित करने में व‍िफल रहा, मुख्य रूप से इसलिए क्योंकि गवाह मुकर गए. इसलिए कोर्ट ने सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया.

केएस शर्मा पाँच में से चार अभ‍ियुक्‍तों के अधिकृत वकील थे.

उन्‍होंने बीबीसी हिंदी को बताया, "अभियोजन पक्ष अदालत में अभियुक्तों को दोषी ठहराने के लिए कोई भी ठोस या पुख़्ता सबूत पेश करने में नाकाम रहा. जो कहानी बनाई गई थी, वह पूरी तरह से झूठी और मनगढ़ंत थी. जब मैंने जाँच अधिकारी और अन्य गवाहों से सवाल-जवाब किए, तो मैं यह साबित करने में सफल रहा कि उनमें से किसी ने भी असल में इन अभियुक्तों को उस व्यक्ति पर हमला करते हुए नहीं देखा था."

शमीर और उनके दो साथियों पर कर्नाटक गोहत्या निवारण अधिनियम (1964) और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत भी केस दर्ज है. कोर्ट रिकॉर्ड्स के अनुसार इस मामले में उनके एक साथी ने अपराध स्वीकार कर लिया है. अदालत में इस मामले की सुनवाई अभी जारी है.

अदालत ने भले ही किसी को दोषी नहीं पाया, लेकिन इस हमले के बाद शमीर का परिवार पूरी तरह टूट गया.

नासिर की घुटन

24 साल के नासिर हुसैन का कहना है कि वह घुट-घुट कर जी रहे हैं. और उनकी घुटन का कारण मुंबई की गर्मी या चॉल की संकरी गलियाँ नहीं हैं, बल्कि इन गलियों से ग़ायब उनके दोस्त अफ़ान के पैरों की आवाज़ है.

नासिर मुंबई के कुर्ला इलाक़े की एक घनी आबादी वाली चॉल में रहते हैं. यहीं हमारी उनसे मुलाक़ात हुई.

यहाँ की गलियाँ इतनी सँकरी हैं कि एक बार में सिर्फ़ एक व्यक्ति ही उनसे होकर गुज़र सकता है. तापमान 35 डिग्री सेल्सियस के पार पहुँचने पर उमस भरी गर्मी में इन गलियों की तंग जगह साँस लेना भी मुश्किल बना देती है.

चॉल के पास एक रेलवे पटरी गुज़रती है. इसके आसपास कई कच्चे घर बने हुए हैं. टीन की छतों के नीचे बने ये घर गर्मियों में भट्ठी जैसे महसूस होते हैं. बच्चे रेलवे ट्रैक पर बेख़ौफ़ खेलते रहते हैं. कभी-कभार गुज़रने वाली ट्रेन भी उन्हें डरा नहीं पाती.

नासिर ने साल 2023 में अपने दोस्त अफ़ान को एक ऐसी घटना में खो दिया, जिसे वह मॉब लिंचिंग का मामला बताते हैं.

मामले में दर्ज एफ़आईआर के मुताब‍िक़, नासिर और अफ़ान 24 जून 2023 को अहमदनगर से एक स्विफ़्ट कार में 450 किलो मांस लेकर मुंबई आ रहे थे, तभी समृद्धि हाईवे पर 10-15 लोगों ने उन्हें रोक लिया. इसके बाद नासिर और अफ़ान पर लाठी-डंडों से हमला किया गया.

उस दृश्य को याद करते हुए नासिर कहते हैं, "हम काला माल (भैंस का मांस) लेकर जा रहे थे. तब कुछ लोगों ने सड़क पर कील फेंकी और गाड़ी रोकी.''

उन्‍होंने आरोप लगाया, ''उन्होंने हम दोनों को मारा, मेरी आँखों के सामने अफ़ान को बहुत बेरहमी से मारा.''

उनके मुताब‍ि‍क़, ''रात में 7:30-8 बजे पुलिस वाले आए और हमें अस्पताल लेकर गए. अस्पताल में मुझे होश आया तो मैंने पूछा अफ़ान कहाँ है, तो उन्होंने बोला कि वह नहीं रहा."

इस वाक्य को याद करते हुए नासिर सर झुकाकर हारे हुए से दिखते हैं.

वो कहते हैं, "अफ़ान मेरे बचपन का दोस्त था. वो मेरा बचपन ही था. ट्यूशन भी हम साथ में पढ़ते थे. बचपन से साथ ही थे… और गया भी तो साथ में ही छोड़ के गया… क्या बोलूँ."

नासिर और अफ़ान के ख़िलाफ़ भी महाराष्ट्र पशु संरक्षण संशोधन अधिनियम (1995) और मोटर वाहन अधिनियम (1988) के तहत मामला दर्ज किया गया है.

हमने महाराष्ट्र के नास‍िक ग्रामीण पुलिस अधीक्षक (एसपी) डीएस स्वामी से इस मामले में मिलकर बात करने की कोशिश की. हम उनसे कार्यालय में बात करने पहुँचे लेक‍िन उन्‍होंने टाल दिया. और बाद में काफ़ी कोश‍िश के बाद भी फ़ोन कॉल, व्हाट्सऐप संदेश और ईमेल का जवाब नहीं म‍िला.

गोरक्षकों का पक्ष

नासिक शहर में प्रवेश करने से पहले एक पशु अस्पताल और गोशाला है. यहाँ स्ट्रे डॉग्स, एक बिल्ली और दर्जनों गायें रखी गई हैं.

यहीं हमारी मुलाकात हेमंत परदेशी से हुई. वह नासिर और अफ़ान के मामले में 14 अभियुक्तों में से एक हैं.

परदेशी का दावा है कि इस गोशाला में मौजूद अधिकांश गायों को उन्होंने राजमार्गों पर दुर्घटनाओं का शिकार होने के बाद बचाया है या फिर कसाइयों से छुड़ाया है.

वह बताते हैं, "मेरे पास एक गोरक्षक का कॉल आया था कि एक टोल नाका है, समृद्धि राजमार्ग पर. यहाँ गोमांस है. हमने 30-40 किलोमीटर दूर गाँव में गोरक्षा टीम को कॉल किया कि ऐसी गाड़ी है और उसमें से खून गिर रहा है.''

उनके मुताब‍िक़, ''उन्होंने वो गाड़ी रोकी और 112 को कॉल किया. रास्ते की जनता ने मारपीट की और उनमें से एक मर गया. मैं मौके पर नहीं था, मैंने सिर्फ़ टीम को ख़बर की थी."

एक और हमला?

इस हमले के बाद नासिर ने ड्राइविंग का काम छोड़ दिया था. उन्होंने पहले एक रिहायशी सोसाइटी में माली का काम किया. फिर पड़ोस के देवनार बूचड़खाने में भेड़ चराने का काम शुरू किया.

लेकिन मामले के तीन साल बाद, उन्होंने रमज़ान के दौरान कुछ पैसे कमाने के लिए फिर से ड्राइविंग का काम शुरू किया. उनका कहना है कि 6 मार्च 2026 को एक बार फिर समृद्धि हाईवे पर चार लोगों ने उन पर हमला किया. इस हमले में उनके हाथ और पैर में चोटें आईं और उनकी टाँग की हड्डी टूट गई.

ऐसे मामलों के बाद नासिर के घर में और पूरे मोहल्ले में डर फैल गया है.

देवनार मंडी के पास इस चॉल में रह रहे जवान लड़के अक्सर मीट ट्रांसपोर्ट का काम करते हैं. यहाँ के ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के भोला शाह ने हमें बताया कि आए दिन उनके ड्राइवर पर हमले होते रहते हैं. उनका दावा है कि बीते सालों में उनके चार ड्राइवर गोरक्षक दलों के हाथों मारे गए हैं.

भोला शाह कहते हैं, "ड्राइवर हर ट्रिप पर सोचकर चलता है कि क्या मैं वापस आ पाऊँगा? सिर्फ़ अल्लाह को मालूम है. गाड़ी चेक करो, अवैध है तो पुलिस को बुलाओ. पुलिस एक्शन लेगी. हम ही जज, हम ही क़ानून, हम ही सब कुछ रोड पर… उस वजह से ड्राइवर बहुत मार खाते हैं. सहमे हुए रहते हैं. हालाँकि, लीगल काम है, लेकिन ड्राइवर के अंदर डर रहता है."

अब नासिर का परिवार मेडिकल खर्चों की वजह से भारी कर्ज़ में है. घर की मह‍िलाओं के ज़ेवर बिक चुके हैं. उनके छोटे भाई ने भी कॉलेज जाना छोड़ दिया है.

लिंचिंग पीड़ितों की मुश्किलें

राजस्थान में पहलू खान, झारखंड के अलीमुद्दीन अंसारी और उत्तर प्रदेश के मोहम्मद अख़लाक़ केस इसके सबसे बड़े और चर्चित उदाहरण हैं.

भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 103 (2) में पहली बार मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) के नए अपराधों को दंडनीय बनाया गया है. एनसीआरबी 2024 के डेटा के हिसाब से भारत में ऐसे 112 मामले दर्ज हुए हैं.

कारवाँ-ए-मोहब्बत एक अभियान है. इसे 2017 में मॉब लिंचिंग के पीड़ितों की मदद के लिए शुरू किया गया था. इस अभियान के तहत मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर कई पीड़ितों और उनके परिवारों से मिले हैं. इस कारण उन्हें ऐसे मामलों और उनसे जुड़े सामाजिक प्रभावों की गहरी समझ है.

हर्ष मंदर का आरोप है कि भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्याओं के ज़रिए कुछ गुट मुस्लिम समुदाय में भय फैलाने का काम करते हैं.

वो कहते हैं, "जब दंगे होते हैं तो पीड़ित का भी एक समुदाय होता है. एक गाँव में 50 लोग होंगे, जो एक-दूसरे में सहारा ढूंढ सकते हैं. लेकिन लिंचिंग में अकेलापन बहुत है. डर बहुत है."

उनका आरोप है कि मॉब लिंचिंग के मामलों में एफ़आईआर भी अकसर काफ़ी कमज़ोर दाख़िल होती है.

वो कहते हैं, "कोर्ट के अंदर बड़ी अजीब स्थिति है, पीड़ित (विक्टिम) डरा-सहमा जाता है और मारने वाले जो लोग हैं, वह आरोपी हैं, लेकिन सीना ताने घुसते हैं.''

उनका दावा है, ''वह मानते हैं कि ये हिन्दू राष्ट्र है. उनके पास कोर्ट और पुलिस का भी समर्थन होता है."

एक दूसरे से सैकड़ों क‍िलोमीटर दूर रहने वाले नास‍िर और शमीर अपने साथ हुए हमले के ज़ख्‍़म के साथ जीने की कोश‍िश में हैं.

साल 2023 में दक्षिण कन्नड़ लीगल सर्विसेज़ ने पत्र जारी कर शमीर के लिए 20,000 रुपये का मुआवज़ा तय किया. वहीं नासिर को डर है कि वह अब कभी ड्राइविंग नहीं कर पाएंगे, क्योंकि उनकी बाईं टाँग टूट गई है.

Verwandte Themen

This article was originally published by BBC हिंदी.

Ähnliche Meldungen

बिहार: पूर्व मंत्री तेज प्रताप यादव को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया
Crime·vor 7 Stunden

बिहार: पूर्व मंत्री तेज प्रताप यादव को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया

बिहार के पूर्व मंत्री तेज प्रताप यादव को नीट पेपर लीक के ख़िलाफ़ बिहार बंद में भाग लेने के बाद गिरफ़्तार किया गया और 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है. राजद नेता तेजस्वी यादव ने सरकार की आलोचना की.

BBC हिंदी
3 Min. Lesezeit
पेपर लीक के मामलों में क्या कार्रवाई हुई?
In Entwicklung·gestern

पेपर लीक के मामलों में क्या कार्रवाई हुई?

पेपर लीक के मामलों में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफ़ा दे दिया है। पिछले कई हफ़्तों से चल रहे व‍िद्यार्थ‍ियों के विरोध प्रदर्शन के बाद यह फ़ैसला आया है।

BBC हिंदी
21 Min. Lesezeit
Mehr zu diesem Themaगोरक्षा