
लखनऊ के अलीगंज इलाके में सोमवार दोपहर एक इमारत में भीषण आग लगने से 15 लोगों की मौत हो गई। मृतकों में ज्यादातर युवा शामिल हैं। परिजनों ने सुरक्षा इंतजामों में लापरवाही का आरोप लगाया है। प्रशासन ने मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की है और मुआवजे की घोषणा की है।
KI-generierte Zusammenfassung
Author, प्रेरणा
पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ से
प्रकाशित 7 घंटे पहले
पढ़ने का समय: 7 मिनट
(नोट: इस रिपोर्ट के कुछ हिस्से आपको विचलित कर सकते हैं)
रात के साढ़े बारह बज रहे हैं. लखनऊ के अलीगंज इलाके में अभी भी लोगों की भीड़ है. चर्चा उस भीषण आग की हो रही है, जिसने सोमवार दोपहर महज़ कुछ घंटों में 15 लोगों की जान ले ली.
जिस इमारत में आग लगी थी, वह अब काले पड़े मलबे में तब्दील हो चुकी है.
पुलिस ने पूरे परिसर को सील कर दिया है और आसपास भारी सुरक्षा बल तैनात है.
लेकिन हादसे की सबसे दर्दनाक तस्वीर इमारत के बाहर नहीं, बल्कि लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी की मॉर्चरी के अंदर और बाहर दिखाई देती है.
एक मां बार-बार अपने 26 वर्षीय बेटे नीलेश का नाम लेकर रो पड़ती है. नीलेश कंप्यूटर ग्राफिक्स का काम करता था और परिवार की उम्मीदों का सहारा था.
बगल में खड़े उसके पिता सदमे से बार-बार लड़खड़ा जाते हैं. परिवार को अभी भी यकीन नहीं हो रहा कि सुबह घर से निकला बेटा अब कभी वापस नहीं लौटेगा.
पिता को फ़ोन करके लगाई जान बचाने की गुहार
मरने वालों में सबसे कम उम्र 19 साल के मोहम्मद शाजान की थी. उनके भाई इज़हार अली बताते हैं कि आग लगने के वक़्त शाज़ान दूसरी मंज़िल पर एनिमेशन की ट्रेनिंग ले रहे थे.
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"उसने फोन करके बताया था कि वह अंदर फंस गया है. जान बचाने के लिए बाथरूम में चला गया था, लेकिन फिर बाहर नहीं निकल सका."
22 वर्षीय अब्दुल रहमान ने महज़ नौ महीने पहले आईटी टेक्नीशियन के तौर पर काम शुरू किया था. उनके दोस्त शादान शेख़ बताते हैं कि रहमान के पिता लकवे के मरीज़ हैं और घर की पूरी ज़िम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर थी. वह परिवार के लिए पर्याप्त मुआवज़े की मांग करते हैं.
प्रभुज्योत सिंह फ़ोन पर अपने बेटे से हुई आख़िरी बात को याद करते हैं. वह कहते हैं, ''दोपहर करीब दो बजे बेटे का फोन आया. उसने कहा, 'पापा, आग लग गई है, मुझे बचा लो, मैं अंदर फंस गया हूं.' हम तुरंत निकले, एम्बुलेंस को भी फोन किया, लेकिन जब तक पहुंचे, तब तक बहुत देर हो चुकी थी."
हादसे में जान गंवाने वाले अधिकांश लोगों की उम्र 19 से 30 साल के बीच है. इनमें तीन महिलाएं भी शामिल हैं. कुछ लोग उत्तर प्रदेश के बाहर पश्चिम बंगाल, हरियाणा और मध्य प्रदेश के रहने वाले थे, जो रोज़गार या प्रशिक्षण के लिए लखनऊ आए थे. 15 मृतकों के इतर घटना में नौ लोग घायल हुए हैं और उनका इलाज़ ट्रॉमा सेंटर में चल रहा है.
इनमें से कुछ लोगों ने जान बचाने के लिए इमारत से निकलने का कोई रास्ता न देखकर बिजली और इंटरनेट के तारों के सहारे नीचे उतरने की कोशिश की. इसी कोशिश में कुछ को गंभीर चोटें आईं.
लापरवाही के आरोप
मृतकों के परिजनों और प्रत्यक्षदर्शियों का आरोप है कि इमारत में सुरक्षा इंतज़ाम बेहद अपर्याप्त थे. एक परिजन का दावा है कि गेमिंग ज़ोन में आने-जाने के लिए केवल एक ही मुख्य गेट था, जो थंब इम्प्रेशन सिस्टम से खुलता था. आग लगने के बाद मशीन ने काम करना बंद कर दिया और कई लोग बाहर निकलने का रास्ता नहीं तलाश पाए.
सवाल ये भी उठाए जा रहे हैं कि क्या इमारत में पर्याप्त अग्नि सुरक्षा इंतज़ाम थे और क्या राहत एवं बचाव कार्य समय रहते शुरू हो गया था?
मृतकों के परिजनों में से कुछ इस हादसे में लापरवाही के भी आरोप लगा रहे हैं. प्रभुज्योत सिंह कहते हैं, "अगर लापरवाही नहीं होती तो इतने लोगों की जान नहीं जाती."
ऐसे आरोप सिर्फ़ परिजनों की तरफ़ से ही नहीं, बल्कि घटनास्थल पर मौजूद कई प्रत्यक्षदर्शियों की तरफ़ से भी लगाए जा रहे हैं.
आग कहां और कैसे लगी?
22 जून को दोपहर क़रीब ढाई बजे लखनऊ के अलीगंज स्थित एक इमारत में आग लगने की सूचना मिली. यह दो मंज़िला इमारत थी. स्थानीय लोगों के मुताबिक़ ग्राउंड फ़्लोर पर पेट शॉप संचालित होती थी, जबकि पहले फ़्लोर पर एक गेमिंग और एनीमेशन ट्रेनिंग सेंटर चलता था. यहां एनीमेशन, गेम कोडिंग जैसी चीज़ें सिखाई जाती थीं और कई लोग काम भी करते थे.
एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि आग पहले निचली मंज़िल पर लगी और फिर देखते-देखते पूरी इमारत इसकी चपेट में आ गई.
घटना के चश्मदीद अनुराग ओझा दावा करते हैं कि आग लगने के क़रीब 40 मिनट बाद फ़ायर ब्रिगेड की टीम घटनास्थल पर पहुंची.
वह कहते हैं, "हमारे पड़ोसी ने भी फ़ोन किया था क्योंकि उनके घर तक आग पहुंचने का ख़तरा था. अगर पांच मिनट भी और देरी होती तो आसपास की दो इमारतें भी जल सकती थीं."
घटना के शुरुआती वीडियो और तस्वीरों में इमारत पूरी तरह आग की लपटों में घिरी दिखाई देती है. हालांकि, इन वीडियो के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि दमकल की टीम मौके पर कब पहुंची.
एक और प्रत्यक्षदर्शी ने भी दावा किया कि फ़ायर ब्रिगेड़ की गाड़ियां आग लगने के क़रीब 40 मिनट बाद पहुंचीं जिसकी वजह से ज़्यादा नुक़सान हो गया.
हमने इस बारे में लखनऊ के चीफ़ फ़ायर ऑफिसर अंकुश मित्तल से बात की.
उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए कहा, "आग से जुड़ी घटना की पहली सूचना हमें दो बजकर 27 मिनट पर मिली. कॉल मिलते ही अगले एक मिनट में हमारी पहली गाड़ी मौके के लिए रवाना हो गई. हमारा रिस्पांस टाइम एक मिनट के भीतर होता है. हमारी गाड़ी दो बजकर 45 मिनट पर अलीगंज के घटनास्थल पर पहुँच गई थी. दूसरी गाड़ी भी 2:28 पर निकली, तीसरी 2:31 और फिर इसके बाद लगातार हमारी गाड़ियां कुछ कुछ मिनट के अंतराल पर घटनास्थल के लिए रवाना होती रहीं. "
एक अन्य प्रत्यक्षदर्शी कहते हैं, "मैं अपने कमरे में था. बाहर से धुएं और जलने की गंध आ रही थी. जब बाहर निकला तो देखा कि इमारत में भीषण आग लगी हुई है. अंदर फंसे लोग खिड़कियों से मदद की गुहार लगा रहे थे. आसपास मौजूद लोगों ने शीशे तोड़कर उन्हें निकालने की कोशिश की, लेकिन आग इतनी तेज़ थी कि कोई मदद नहीं कर पाया."
वहीं, अरविंद नाम के एक अन्य प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि इमारत के निचले हिस्से में पेट शॉप थी. उनके मुताबिक़ वहीं किसी हिस्से में आग लगी थी, जिसके बाद देखते ही देखते आग ऊपर तक फैल गई.
आग लगने की वजह क्या थी, और क्या इमारत में पर्याप्त अग्नि सुरक्षा इंतज़ाम मौजूद थे, इसकी जांच अब प्रशासन और पुलिस कर रही है.
एसआईटी की जांच और कार्रवाई
शॉर्ट वीडियो देखिए
बीती देर रात अलीगंज थाने में चार नामज़द और एक अन्य के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई है. जो चार नामज़द हैं, उनमें वीरेंद्र शुक्ला, तुषांक कृष्ण जायसवाल, रामकृष्ण उपाध्याय और सुरेश कुमार शामिल हैं.
रामकृष्ण उपाध्याय पेट शॉप तो वीरेंद्र शुक्ला आग की चपेट में आई इमारत के मालिक हैं.
इन पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 105, 110, 125 और 3(5) के तहत एफ़आईआर दर्ज की गई है.
आरोप है कि इमारत में फ़ायर सेफ़्टी की कोई व्यवस्था नहीं की गई थी. बिल्डिंग से बाहर निकलने का भी केवल एक ही रास्ता था. वहीं, असुरक्षित तरीके से एसी के बाहर दूसरे बिजली के उपकरण लगे हुए थे.
मुख्यमंत्री के आदेश के बाद मामले की जांच के लिए एक एसआईटी भी गठित की गई है. योगी आदित्यनाथ ने मृतक परिवारों के लिए मुआवज़े की भी घोषणा की है.
घटना में मारे गए बच्चों के परिजनों के लिए राज्य सरकार ने जहां पांच लाख रुपये और गंभीर रूप से घायलों को 50 हज़ार रुपये की सहायता राशि की घोषणा की है.
वहीं, प्रधानमंत्री कार्यालय ने मृत बच्चों के परिजनों को दो लाख और घायलों को 50 हज़ार रुपये की सहायता राशि का एलान किया है.
क्या गिराई जाएगी इमारत?
अपर सचिव अध्यक्ष एलडीएस वीसी प्रथमेश कुमार ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, ''वह एक अवैध इमारत थी क्योंकि आवासीय प्लॉट पर व्यवसायिक इमारत खड़ी कर दी गई थी. हमने अभी नोटिस जारी किया है, जांच के भी आदेश दिए हैं. हम उन अधिकारियों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई करने जा रहे हैं जिन्होंने इस तथ्य की अनदेखी की. एक हफ़्ते बाद हम इमारत को ध्वस्त करने का आदेश जारी करेंगे.''
इसके जवाब में प्रथमेश कुमार ने कहा कि वह हमसे थोड़ी देर बाद इस विषय पर बात करेंगे. इस बातचीत के बाद हमने कई बार उनसे संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया.
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