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Zurückअज़ीज़न बाई: 1857 की क्रांति की वो नायिका जिसे अंग्रेज़ों ने दी सज़ा-ए-मौत
अज़ीज़न बाई: 1857 की क्रांति की वो नायिका जिसे अंग्रेज़ों ने दी सज़ा-ए-मौत
Politik
BBC हिंदी16.6.2026Politik7 Min. LesezeitIndia

अज़ीज़न बाई: 1857 की क्रांति की वो नायिका जिसे अंग्रेज़ों ने दी सज़ा-ए-मौत

Auf einen Blick

1857 की क्रांति में कानपुर की नृत्यांगना अज़ीज़न बाई ने क्रांतिकारियों का गुप्त रूप से साथ दिया. अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी ने उन्हें मौत की सज़ा दी.

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Author, सैयद मोज़‍िज़ इमाम

पदनाम, बीबीसी ह‍िन्‍दी के ल‍िए

प्रकाशित 6 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 7 मिनट

सितंबर 1853 के लखनऊ की बात है. मशहूर नृत्यांगना ज़ुबैदा एक कार्यक्रम में प्रस्तुति देने के बाद देर रात अपने घर लौट रही थीं.

अपनी बग्‍घी में सवार ज़ुबैदा को अंधेरे रास्‍ते में कि‍सी के कराहने की आवाज़ सुनाई दी. उन्‍होंने कोचवान को बग्‍घी रोकने का इशारा किया. आसपास की तलाशी के बाद उनके सेवकों ने झाड़ियों में छि‍पी एक लड़की को ज़ख़्मी हालत में पाया. ज़ुबैदा उसे लेकर सीधे नृत्‍यांगना उमराव जान के पास आईं. वहां इस लड़की के इलाज का बंदोबस्त किया गया.

उस लड़की का नाम अज़ीज़न रखा गया, हालांकि असली नाम मस्तानी था.

क्योंकि अमीरन, नृत्यांगना उमराव जान का असली नाम था. इससे मिलता जुलता नाम ही रखा गया था.

ये सभी बातें इतिहासकार अमरेश मिश्रा ने बीबीसी हिन्दी को बताई जिन्होंने, 'वॉर ऑफ सिविलाइज़ेशन इंडिया ए डी 1857' लिखी है.

अज़ीज़न बाई की कहानी वेब सिरीज़ 'हीरामंडी' के बिब्बोजान के किरदार से मिलती-जुलती है. हालांकि, हीरामंडी की कहानी अलग है. इसमें बिब्बोजान हीरामंडी की नृत्यांगना हैं लेकिन वे अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ गुपचुप तरीक़े से क्रांतिकारियों का साथ देती हैं.

इस सीरीज़ के निर्देशक संजय लीला भंसाली, उन्हें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की अनाम नायिका बताते हैं.

भंसाली ने टाइम मैगज़ीन को बताया था, "इन महिलाओं को हमेशा मनोरंजनकर्ता के रूप में देखा जाता था और उन्हें हीरे के हार पहने हुए देखा जाता था लेकिन उनकी आंखों में एक कहानी छिपी है."

हालांकि, इस कहानी का नाता वेब सीरीज से नहीं है, बल्कि यह कहानी लखनऊ से शुरू होती है.

इसमें अज़ीज़न बाई का मुख्य किरदार है.

कानपुर की इस अज़ीज़न बाई ने भारत में 1857 की क्रांति में हिस्सा लिया था. बाद में अज़ीज़न बाई को क्रांतिकारियों की मदद करने के जुर्म में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी ने मौत की सज़ा दे दी थी.

कौन थीं अज़ीज़न बाई

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समाप्त

अज़ीज़न बाई के बारे में कई तरह की कहानियां हैं. कुछ इतिहासकारों का मत है कि वे मालवा में जन्मी थीं.

लेकिन 1857 पर किताब लिखने वाले अमरेश मिश्रा ने 'वॉर ऑफ़ सिविलाइज़ेशन इंडिया एडी 1857' में लिखा है कि अज़ीज़न का जन्म लखनऊ के पास हुआ था. ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाहियों ने उनके पिता की हत्या कर दी थी.

अमरेश मिश्रा ने बीबीसी हिन्दी को बताया, "अज़ीज़न के पिता का नाम हुसैन ख़ान था. वे वाजिद अली शाह के कार्यकाल में अफ़सर थे. हुसैन ख़ान ने उन्नाव की एक लड़की से शादी की थी."

अमरेश म‍िश्रा के मुताब‍िक़, "साल 1853 में हुसैन ख़ान की भिड़ंत कानपुर के अंग्रेज़ सिपाहियों से हो गई थी. हुसैन ख़ान अपनी बेटी मस्तानी के साथ जान बचाने के लिए गोमती नदी में कूद जाते हैं. लेकिन इसके बाद अंग्रेज़ सिपाही उनको मार देते हैं.

इस दौरान अज़ीज़न भी ज़ख्मी हो जाती हैं. वहां से गुज़र रही ज़ुबैदा नाम की नृत्यांगना ने अज़ीज़न को बचा लिया, वह उसे उमराव जान के पास ले गईं. उनके संपर्क में आने के बाद अज़ीज़न बाई ने भी नृत्य कला सीख ली."

अमरेश मिश्रा बताते हैं, "तेरह साल की उम्र में अज़ीज़न बाई ने अपना पहला नृत्य पेश किया. उस वक़्त कानपुर के मशहूर सेठ कल्लू राम खत्री ने उनके लिए कानपुर में ही ठिकाना देने का प्रस्ताव किया था."

हालांकि, अमरेश मिश्रा ने बीबीसी हिन्दी से कहा, "उस वक्त की नृत्यायंगनाएं जिन्हें तवायफ़ कहा जाता था, वो सिर्फ कलाकार थी. इनका प्रॉस्टिट्यूशन से सबंध नहीं था."

अमरेश म‍िश्रा के मुताब‍िक़, "अज़ीज़न बाई उसके बाद कानपुर के मूलगंज इलाक़े में आ गईं और उनके ठिकाने का नाम दिया गया लड़की महल".

उस वक्त कानपुर और उसके आसपास तात्या टोपे और पेशवा नाना साहब ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ़ मुह‍िम चला रहे थे. नाना साहब बिठूर के शासक थे, लेकिन अग्रेज़ों की पेंशन नीति से नाराज़ थे.

अमरेश मिश्रा के मुताबिक अज़ीज़न बाई की मुलाक़ात नाना साहब से हुई. अज़ीज़न बाई का दिल भी विद्रोही था.

उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी में काम करने वाले अपने दोस्त शमसुद्दीन के साथ मिलकर महिलाओं की एक टोली बनाई, जिसका नाम 'मस्तानी टोली' रखा. हालाँकि शमसुद्दीन ईस्ट इंडिया कंपनी में थे लेकिन वे नाना साहब के लिए जासूसी का भी काम करते थे.

अमरेश मिश्रा के मुताबिक़, "अज़ीज़न बाई रात में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों का मनोरंजन करती थीं. उस दौरान वे जासूसी का भी काम करती थीं."

इतिहासकार अमरेश मिश्रा ने बताया, "दिन के समय वे सैनिकों की वर्दी पहनकर घोड़े पर सवार होतीं. हाथ में तलवार लेकर युद्धभूमि में पहुंच जातीं. वे घायल सैनिकों की सेवा करतीं, भोजन और गोला-बारूद पहुंचाती थीं."

अमरेश मिश्रा के मुताबिक़, इस दल के बारे में अधिक जानकारी नहीं है लेकिन यह दल सैनिकों की सहायता करता था और गाना गाकर देशभक्ति के लिए प्रेरित करता था.

इसका अंजाम यह हुआ कि जब कानपुर में ईस्ट इंडिया कंपनी ने दोबारा कब्ज़ा किया तो अज़ीज़न बाई को गिरफ़्तार कर लिया गया.

अमरेश मिश्रा ने बताया, "उन्हें जनरल हेनरी हैवलाक के सामने पेश किया गया. जनरल हेनरी हैवलाक ने अज़ीज़न बाई से क्रांतिकारी अज़ीमुल्ला ख़ान का पता बताने के लिए कहा. इसके बदले उन्हें छोड़ देने का भी प्रस्ताव दिया लेकिन अज़ीज़न बाई ने इनकार कर दिया. इसके बाद उन्हें गोली मारने के आदेश दे दिए गए."

अज़ीमुल्ला ख़ान पठान थे और नाना साहब के करीबी सलाहकार थे. वे 1857 की लड़ाई के मुख्य किरदारों में एक थे.

ब्रिटिश लेखक जार्ज ओट्टो ट्रविलियन लार्ड मैकॉले के भतीजे थे. उन्होंने अज़ीज़न बाई के बारे में अपनी किताब 'कानपुर' में लिखा है. उन्होंने अज़ीज़न को "विद्रोह की डेमोइसेल थेरोइन" के रूप में वर्णित किया है.

सर जॉर्ज ट्रेवेलियन ने अज़ीज़न बाई की तुलना फ्रांसीसी क्रांति के दौरान प्रमुख महिला वक्ता और आयोजक ऐन-जोसेफ़ थेरोइन डी मेरिकॉर्ट से की है.

ट्रविलियन लिखते हैं, उस वक्त अज़ीज़न सेकेंड कैवलरी की मशहूर नृत्यांगना थीं. वहाँ वह काफ़ी मशहूर थीं.

कैसे करती थीं जासूसी

एके गांधी ने अपनी किताब 'डांस टू फ़्रीडम-फ़्रॉम घुंघरू टू गनपाउडर' के अध्‍याय-11 में अज़ीज़न बाई के बारे में विस्तार से लिखा है.

एके गांधी के मुताबिक़, अज़ीज़न बाई को अंग्रेज़ अफ़सरों से बहुत सारी जानकारी मिल जाती थी. यह जानकारि‍यां वे भारतीय सिपाहियों तक पहुंचाती थीं.

गांधी के अनुसार, नशे में नृत्य के दौरान अंग्रेज़ अफ़सर अपने सैन्य और प्रशासनिक गतिविधियों की चर्चा करते थे. ये जानकारी सेकेंड कैवलरी के शमसुद्दीन के ज़रिए नाना साहब तक पहुँचती थीं. इस काम के दौरान शमसुद्दीन और अज़ीज़न बाई काफ़ी करीब आ गए थे. शमसुद्दीन ने वचन दिया था कि वे अंग्रेज़ों को मुल्क से बाहर करने के बाद शादी करेंगे.

गांधी के मुताब‍िक़, उस दौरान शमसुद्दीन के घर या फिर सूबेदार टिक्का सिंह के यहाँ बागियों की मुलाक़ातें होती थीं. बाद में नाना साहब ने उन्हें बड़ा ओहदा दिया.

इसके अलावा अज़ीज़न बाई भारतीय बाग़ियों को पैसे से भी मदद करती थीं. वे उनको शरण भी दिया करती थीं.

एके गांधी ने लिखा है, "वीडी सावरकर ने अपनी किताब 'फ़र्स्ट वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस' में अज़ीज़न बाई की भूमिका की सराहना की है."

1857 का कानपुर का संग्राम

साल 1857 के कानपुर विद्रोह की शुरुआत पाँच जून 1857 को हुई थी. इसे नाना साहब ने तात्या टोपे और अज़ीमुल्ला खान के साथ मिलकर नेतृत्व प्रदान किया था. इस दौरान भारतीय सैनिकों ने जनरल ह्यू व्हीलर की ब्रिटिश छावनी को घेर लिया था. इसके बाद सत्तीचौरा घाट और बीबीघर जैसी घटनाएँ इतिहास का हिस्सा बनीं.

पाँच जून 1857 को अंग्रेजों की कैवलरी और इन्फैंट्री के भारतीय सैनिकों ने विद्रोह कर दिया था और शस्त्रागार और ख़जाने पर कब्‍ज़ा कर लिया था.

बिठूर के पेशवा नाना साहब, अंग्रेज़ों की पेंशन नीति से नाराज़ चल रहे थे. कानपुर में उन्होंने ही विद्रोहियों का नेतृत्व किया. 27 जून 1857 को अंग्रेज़ों के आत्मसमर्पण करने के बाद उन्‍हें सुरक्षित इलाहाबाद जाने देने का वादा किया गया था, लेकिन उनके नावों पर सवार होते ही गोलीबारी शुरू हो गई.

इसके बाद जुलाई 1857 में जनरल हैवलॉक और बाद में कॉलिन कैंपबेल के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने कानपुर पर दोबारा कब्‍ज़ा कर लिया और विद्रोही सैनिकों और स्थानीय नागरिकों पर ज़ुल्म ढाए.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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