फ़िल्म 'द वॉयस ऑफ़ हिंद रजब' भारत में रिलीज़: एक बच्ची की दर्दनाक हक़ीक़त
Auf einen Blick
फ़िल्म 'द वॉयस ऑफ़ हिंद रजब' फ़लस्तीनी बच्ची हिंद रजब के उन चंद घंटों पर बनी है जब वह और उनके रिश्तेदार ग़ज़ा से भागते वक़्त हमले का शिकार हो गए थे. फ़िल्म भारत में 'ए' सर्टिफ़िकेट के साथ रिलीज़ हुई है, जिसके बाद विवाद हुआ.
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Warum es wichtig ist
फ़िल्म 'द वॉयस ऑफ़ हिंद रजब' फ़लस्तीनी बच्ची हिंद रजब के उन चंद घंटों पर बनी है जब वह और उनके रिश्तेदार ग़ज़ा से भागते वक़्त हमले का शिकार हो गए थे. फ़िल्म भारत में 'ए' सर्टिफ़िकेट के साथ रिलीज़ हुई है.
आप जानते हैं ग़ज़ा की वो बच्ची मर चुकी है पर यह फ़िल्म उसको बचा लेने की उम्मीद देती है
Author, वंदना
पदनाम, न्यूज़ एडिटर, बीबीसी न्यूज़
प्रकाशित 3 मिनट पहले
पढ़ने का समय: 8 मिनट
"प्लीज़ मुझे यहाँ से निकाल लें, मुझे डर लग रहा हैं, वह मुझ पर गोलियाँ चला रहे हैं."
कार में फँसी अकेली छह साल की बच्ची… कार में सवार उसके सारे रिश्तेदार मारे जा चुके हैं.
गोलीबारी और शवों के बीच छिपी बैठी यह बच्ची मोबाइल फ़ोन पर वॉलन्टियर्स से गुहार लगा रही है. वह सहमी हुई है, पर लड़ रही है.
यूँ तो यह किसी भी काल्पनिक फ़िल्म का सीन हो सकता है. लेकिन जब आप सिनेमाहॉल के अंधेरे में 'द वॉयस ऑफ़ हिंद रजब' फ़िल्म देख रहे होते हैं तो यह एहसास ही सिहरन भर देता है कि यह कल्पना नहीं हक़ीक़त है... कि इस बच्ची की आवाज़ किसी एक्टर की नहीं है.
यह फ़िल्म है 'द वॉयस ऑफ़ हिंद रजब' जो कई महीनों के विवाद के बाद भारत में 'ए' सर्टिफ़िकेट के साथ रिलीज़ हुई है.
शायद हिंद को बचा ले जाएँगे...
'द वॉयस ऑफ़ हिंद रजब' फ़िल्म फ़लस्तीनी बच्ची हिंद रजब के उन चंद घंटों पर बनी है जब वह और उनके रिश्तेदार ग़ज़ा से भागते वक़्त हमले का शिकार हो गए थे. हिंद अकेले कई घंटों तक कार में छिपी रही. कई मीडिया संस्थानों की जाँच के मुताबिक वो संभावित इसराइली गोलीबारी में मारी गई.
फ़िल्म देखते हुए बतौर दर्शक आप पहले से जानते हैं कि हिंद रजब को जनवरी 2024 में ग़ज़ा में हुई गोलीबारी के बाद बचाया नहीं जा सका था.
लेकिन फिर भी जब आप उस बच्ची और फ़ोन पर उसको बचाने की कोशिश कर रहे वॉलन्टियर्स को देख और सुन रहे होते हैं, आपको लगता है कि शायद उसे बचा लिया जाएगा.. शायद आप सब मिलकर उसे बचा लेंगे.
डॉक्यूमेंट्री और असल कलाकारों के बीच झूलती यह फ़िल्म आपके साथ जैसे छल सा करती हुई लगती है.. क्योंकि आपको पता है कि हिंद की मौत हो चुकी है. लेकिन हाथ से फिसलते लम्हों के बीच फ़िल्म पल दर पल उसे बचा सकने का भ्रम और आस दिलाती है.
पर हक़ीक़त यह नहीं है और यही विरोधाभास बतौर दर्शक आपको गहरे तक छू जाता है और तोड़ जाता है. किसी थ्रिलर की तरह आपकी धड़कनें तेज़ होती रहती हैं.
जब हिंद बताती है स्कूल का नाम ए हैप्पी चाइल्डहुड
फ़िल्म में एक तरफ़ हिंद है जो दिखाई नहीं देती सिर्फ़ सुनाई देती है- उसकी असल आवाज़ की फ़ोन रिकॉर्डिंग में उसका ख़ौफ़ और बेबसी आप सुन पाते हैं.
और दूसरी तरफ़ आप रेड क्रेसेंट के असल वॉलन्टियर्स का रोल निभाने वाले एक्टर्स को देख सकते हैं जिन्होंने फ़ोन पर हिंद की मदद की थी.
मिनट दर मिनट वह हिंद से बात करते हैं, उसे दिलासा देते हैं जबकि मौत उसके सामने खड़ी है.
दिलासा दिलाने के लिए राहतकर्मी हिंद से झूठ बोलते हैं कि ख़ून से सने उसके रिश्तेदार अभी कार में आँखें मूंदे सो रहे हैं. लेकिन जंग में जीना सीख चुकी हिंद राहतकर्मियों को निशब्द कर देती है जब वह कहती हैं- नहीं वह मर चुके हैं.
दहशत के इन्हीं लम्हों के बीच मासूमियत के वह चंद पल भी सामने आते हैं जब हिंद ने उन वॉलन्टियर्स को बताया था कि उसके स्कूल का नाम 'ए हैप्पी चाइल्डहुड' है और उसकी क्लास का नाम 'बटरफ्लाई' है.
भारत में रिलीज़ को लेकर विवाद
माना जा रहा था कि मार्च में ऑस्कर समारोह के आसपास यह फ़िल्म भारत में रिलीज़ होगी.
बीबीसी से बातचीत में फ़िल्म के वितरक मनोज नंदवाना ने कहा बताया, "मैंने फ़रवरी में ही सर्टिफ़िकेट के लिए भारतीय सेंसर बोर्ड के समक्ष फ़िल्म सब्मिट कर दी थी. जैसा कि मीडिया में आ चुका है कि सेंसर बोर्ड के एक सदस्य ने मौखिक रूप से हम से कहा कि अगर यह फ़िल्म रिलीज़ हुई तो इससे भारत-इसराइल रिश्ते टूट जाएँगे. लिखित तौर पर तो वह कुछ कह नहीं सकते थे."
"लेकिन अच्छा है कि फ़िल्म अब बिना किसी कट के रिलीज़ कर दी गई है. कोई शब्द बीप वगैरह नहीं किया गया है. इसे एडल्ड सर्टिफ़िकेट मिला है."
मार्च में फ़िल्म न रिलीज़ करने के कथित आरोप पर भारतीय सेंसर बोर्ड से प्रतिक्रिया माँगने पर कोई जवाब नहीं आया.
लेकिन भारत में कई फ़िल्मकारों, कलाकारों और सांसदों ने फ़िल्म न रिलीज़ करने को लेकर विरोध दर्ज कराया था.
वहीं भारत के पूर्व विदेश मंत्री शशि थरूर ने इसे डिसग्रेसफुल कहते हुए लिखा था कि किसी फ़िल्म की स्क्रीनिंग का दूसरे देशों के साथ रिश्तों से कोई रिश्ता नहीं होता और इस तरह फ़िल्मों को बैन करना बंद करना चाहिए.
फ़िल्म की बात करें तो ट्यूनीशिया की निर्देशक कौथर बिन हानिया ने हिंद पर फ़िल्म बनाने का क्यों सोचा.
कौथर बिन हानिया ने बीबीसी से बात करते हुए कहा था, "जब मैंने हिंद रजब की असल ऑडियो रिकॉर्डिंग सुनी थी जिसमें वह बच्ची मदद माँग रही थी, वह आवाज़ मेरा पीछा करती रही. मैंने ख़ुद को बहुत बेबस महसूस किया. मैने यह फ़िल्म इसलिए बनाई क्योंकि ऐसा न करके मैं भी एक तरह से उस घटना में ख़ुद को लिप्त महसूस करती."
ग़ज़ा में हुए इस हमले में न सिर्फ़ हिंद रजब की मौत हुई बल्कि उसकी मदद करने गए एम्बूलेंस क्रू के दो सदस्य भी मारे गए थे.
इसराइल का रुख़
इसराइली डिफ़ेंस फ़ोर्स (आईडीएफ़) ने पहले कहा था कि हमले के वक़्त इसराइली सेना इलाक़े में नहीं थी. लेकिन कुछ स्वतंत्र जाँचों के बाद इस दावे पर सवाल उठाए गए.
बाद में आईडीएफ़ ने कहा कि उसने 'टेरर टार्गेट्स' पर रेड किया था और उस इलाक़े के पास सेना मौजूद नहीं थी जहाँ से हिंद ने इमरजेंसी कॉल किया था.
अक्तूबर 2024 में संयुक्त राष्ट्र कमिशन ने इसराइल पर गज़ा के स्वास्थ्य सेवा सिस्टम पर हमला करने का आरोप लगाया था जिसमें हिंद रजब और उसे बचाने गए राहतकर्मियों का भी ज़िक्र था.
वहीं हिंद की माँ वेसम हमादा के सवाल बरकरार हैं. उन्होंने बेहद भावुक इंटरव्यू में बीबीसी से कहा था, "मैं क़यामत के दिन ईश्वर के सामने उन सभी से सवाल करूंगी, जिन्होंने मेरी आवाज़ सुनी, मदद की गुहार लगा रही मेरी बेटी की आवाज़ सुनी, लेकिन उसे बचाने के लिए कुछ नहीं किया. आप कितनी और मांओं के इस दर्द से गुज़रने का इंतज़ार कर रहे हैं?"
मनोज नंदवाना बताते हैं कि फ़िल्म के प्रीमियर के दौरान हिंद की माँ भी आई थीं लेकिन उनकी हिंद की माँ से बात नहीं हुई.
"जिस माँ ने अपनी बच्ची को खोया हो, जिसके चेहरे पर आप वह दर्द देख पा रहे हों, आप उनसे क्या बात करेंगे. उन्हें लगता रहा कि वह अपनी बच्ची को बचा नहीं पाई. कुछ लोग होंगे जो इसे प्रोपेगैंडा कहेंगे. यह फ़िल्म दिखाती है कि जंग क्या कर सकती है, फिर वह कहीं भी हो."
राजनीति, धर्म , भूगोल के दायरों से परे यह फ़िल्म हिंद रजब पर केंद्रित है और उन इमरजेंसी वॉलन्टियर्स पर जो लड़ रहे थे समय से, ख़ुद से, कभी आपस में… इस उम्मीद में कि हिंद को बचाया जा सके.
और फ़िल्म में जब आख़िरकर आप यक़ीन कर लेते हैं कि कि छह साल की हिंद अब वाकई नहीं है, तभी आख़िरी चंद मिनटों में आप हिंद को सच में स्क्रीन पर देखते हैं- उसकी असल ज़िंदगी में, होम वीडियो से चुराए कुछ दृश्यों में जिसमें वह बीच पर खेल रही है.
असल ज़िंदगी और डॉक्यूमेंट्री के बीच का यह फ़िल्म बनाने का तरीका आपको परेशान करता है, उदास करता है, रुलाता है, झकझोरता है, उद्वेलित करता है या मौन भी - मेरे पास ठीक से कोई शब्द नहीं है.
Offene Fragen
- क्या भारत-इज़राइल संबंध प्रभावित होंगे?
- क्या सेंसर बोर्ड ने लिखित में कोई निर्देश दिया था?

