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रात को 2-3 बजे नींद क्यों खुल जाती है? विशेषज्ञ बताते हैं कारण और उपाय
Gesundheit
BBC हिंदी19.06.2026Gesundheit6 dk okumaIndia

रात को 2-3 बजे नींद क्यों खुल जाती है? विशेषज्ञ बताते हैं कारण और उपाय

Auf einen Blick

रात में 2-3 बजे नींद खुलना आम है, जिसका कारण शरीर की जैविक घड़ी और कोर्टिसोल हार्मोन का बढ़ना है। विशेषज्ञ बताते हैं कि यह सामान्य है, लेकिन दोबारा सो न पाना चिंता का विषय है। बेहतर नींद के लिए स्क्रीन से दूरी और खान-पान पर ध्यान देना ज़रूरी है।

KI-generierte Zusammenfassung

Warum es wichtig ist

रात में 2-3 बजे नींद टूटना कई लोगों के लिए एक आम समस्या है, जिसे अक्सर तनाव या स्वास्थ्य समस्या का संकेत माना जाता है। यह शरीर की प्राकृतिक जैविक घड़ी और हार्मोनल बदलावों से जुड़ा हो सकता है।

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Author, ओंकार करंबेलकर

पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता

प्रकाशित 31 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 9 मिनट

आपको रात में अच्छी नींद आए लेकिन अचानक देर रात दो-तीन बजे के बीच आपकी नींद टूट जाए? आप फिर से सोने की काफ़ी कोशिश करें लेकिन फिर भी नींद आखों से बहुत दूर हो तो?

कई लोग इसे तनाव की वजह मानते हैं, जबकि कुछ इसे गंभीर स्वास्थ्य समस्या समझते हैं. इस तरह जागना कई अलग-अलग समस्याओं का संकेत हो सकता है.

गहरी नींद, पर्याप्त नींद और तनाव मुक्त रहना न सिर्फ़ हमारे जीवन के लिए बहुत अहम है बल्कि हमारे संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए भी ज़रूरी है.

हमारी नींद एक जैसी अवस्था में नहीं होती है, यह अलग-अलग चरण से गुजरती है, जैसे-हल्की नींद, गहरी नींद, सतर्कता और आरईएम नींद. यह चक्र हर 90 मिनट में बदलता है.

रात के पहले आधे हिस्से में गहरी नींद अधिक आती है, जबकि भोर होते-होते नींद हल्की यानी सतर्कतापूर्ण हो जाती है.

इसलिए, 2 से 3 बजे के बीच शरीर हल्की नींद की अवस्था में होता है और हम छोटी-छोटी बातों से भी जाग सकते हैं.

लेकिन कभी-कभी तनाव, हार्मोनल बदलाव, जीवनशैली या स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण नींद न आने की समस्या बनी रहती है और दोबारा सोने में कठिनाई होती है.

यह समझना ज़रूरी है कि ऐसा क्यों होता है, विशेषज्ञ इसे कैसे देखते हैं और कब यह चिंता का विषय बन जाता है.

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रात को 2-3 बजे नींद क्यों खुल जाती है?

रात के 2 से 3 बजे के बीच जागने के कई कारण होते हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण कारण शरीर की प्राकृतिक 'सर्केडियन रिदम' यानी जैविक घड़ी है.

इस समय शरीर धीरे-धीरे अगले दिन के लिए तैयारी शुरू कर देता है. 'कोर्टिसोल' नामक हार्मोन के बारे में जानना महत्वपूर्ण है. यह हार्मोन हमें जागने में मदद करता है.

यह नींद के दौरान बढ़ता है. सामान्य परिस्थितियों में, यह वृद्धि इतनी धीमी होती है कि हमें इसका पता भी नहीं चलता.

लेकिन अगर लगातार तनाव, चिंता या नींद में खलल बना रहता है, तो कोर्टिसोल का स्तर पहले से ही अधिक हो सकता है.

ऐसे मामलों में, यह प्राकृतिक वृद्धि अचानक 'चेतावनी' संकेत के रूप में काम करती है और नींद में ख़लल डालती है.

महत्वपूर्ण बात यह है कि रात में नींद का टूटना समस्या नहीं है, बल्कि नींद टूटने के बाद दोबारा सो न पाना अधिक परेशानी का कारण है. लगातार सोचना, काम की चिंताएं, या सिर्फ़ 'नींद न आने' की चिंता, ये सभी दोबारा सोने में बाधा बन सकते हैं.

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पनवेल के मनोचिकित्सक डॉक्टर ऋषभ वर्मा कहते हैं, "यह सब आपके शरीर की आंतरिक घड़ी पर निर्भर करता है. अगर आप आमतौर पर रात 10 या 11 बजे सोते हैं, तो सुबह 3.00 बजे का समय आपके शरीर के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है. इस समय तक आप अपनी गहरी नींद का अधिकांश हिस्सा पूरा कर चुके होते हैं."

वह बताते हैं, "रात के लगभग 2 से 3 बजे के बीच, आपका शरीर धीरे-धीरे सुबह के लिए तैयार होने लगता है. आपके शरीर का तापमान सबसे कम हो जाता है, और आपके आंतरिक तंत्र धीरे-धीरे फिर से सक्रिय होने लगते हैं. इस अवस्था में आपकी नींद बहुत हल्की होती है, इसलिए थोड़ी सी भी हलचल, जैसे कि आपके बगल में किसी का हिलना-डुलना, हल्की सी आवाज, या यहां तक कि आपके मन में चल रहे विचार भी आपको आसानी से जगा सकते हैं."

क्या इस तरह जागना सामान्य है?

इस सवाल के जवाब में डॉक्टर वर्मा कहते हैं, "यह बिल्कुल सामान्य है. लाखों साल पहले, रात में थोड़ी देर तक जागते रहने से हमारे पूर्वजों को ख़तरों से सुरक्षित रहने में मदद मिलती थी. वर्तमान नींद संबंधी अध्ययनों के अनुसार, स्वस्थ वयस्क वास्तव में हर रात 2 से 4 बार जागते हैं."

अक्सर, जागने के ये क्षण कुछ ही सेकेंड तक रहते हैं और आप तुरंत वापस सो जाते हैं, इसलिए अगली सुबह आपको याद भी नहीं रहता.

लेकिन जब आप पूरी तरह से जाग रहे होते हैं, आपका दिमाग तेज़ी से चल रहा होता है, और दोबारा सोना नामुमकिन सा लगता है, तब यह एक समस्या बन जाती है.

नींद का चक्र और तालमेल

सर्कैडियन रिदम मस्तिष्क के एक भाग द्वारा नियंत्रित होती है जिसे सुप्राचियास्मैटिक न्यूक्लियस कहा जाता है, जो दिन-रात के चक्र के साथ शरीर के विभिन्न कार्यों के बीच तालमेल बिठाती है.

सुबह-सुबह शरीर जागने की तैयारी शुरू कर देता है. हालांकि कोर्टिसोल का स्तर अभी कम होता है, लेकिन जागने से पहले के घंटों में यह धीरे-धीरे बढ़ने लगता है.

साथ ही, गहरी नींद की मात्रा कम हो जाती है और आरईएम (रैपिड आई मूवमेंट) नींद बढ़ जाती है. आरईएम नींद अपेक्षाकृत हल्की होती है और इसमें मस्तिष्क की गतिविधि अधिक होती है. इसलिए, इस अवस्था के दौरान जागने की संभावना अधिक होती है.

ये नींद के चक्र क्या होते हैं और उनका जागने के समय से क्या संबंध है?

डॉक्टर वर्मा बताते हैं, "हमारी नींद लहरों या 'चक्रों' में होती है, और प्रत्येक चक्र लगभग 90 मिनट लंबा होता है. लेकिन जैसे-जैसे रात बढ़ती है, नींद का प्रकार बदलता जाता है."

पहला आधा भाग (रात 10 बजे से रात 2 बजे तक) का होता है. इस दौरान गहरी नींद आना आम बात है.

इस समय आपका मस्तिष्क बहुत शांत अवस्था में होता है, जिससे आपका जागना बहुत मुश्किल हो जाता है.

दूसरा भाग रात 2 बजे से सुबह 6 बजे तक का होता है. यह हल्की नींद और तेज़ आरईएम का समय होता है. सुबह 3 बजे तक आप लगभग पूरी तरह से हल्की नींद में होते हैं या सपने देखते रहते हैं.

चूंकि सपने देखते समय मस्तिष्क पहले से ही बहुत सक्रिय होता है, इसलिए एक छोटा सा व्यवधान भी आपको पूरी तरह से जगा सकता है.

हार्मोन और मस्तिष्क की क्या भूमिका होती है?

कोर्टिसोल के साथ-साथ, कुछ अन्य हार्मोन भी इसके लिए ज़िम्मेदार होते हैं. हमने इस बारे में मुंबई सेंट्रल स्थित वोकहार्ट हॉस्पिटल्स में कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर प्रशांत मखीजा से समझना चाहा.

हमे पूछा कि कोर्टिसोल के अलावा और कौन से हार्मोन इसके लिए ज़िम्मेदार होते हैं?

डॉक्टर मखीजा बताते हैं, "नींद दरअसल कई हार्मोनों की संयुक्त क्रिया पर निर्भर करती है. मेलाटोनिन, जिसे नींद का हार्मोन कहा जाता है, रात में सबसे अधिक मात्रा में बनता है और भोर होते-होते धीरे-धीरे कम हो जाता है. मेलाटोनिन का स्तर कम होने से नींद की स्थिरता प्रभावित हो सकती है."

अन्य हार्मोनों की भूमिका के बारे में उन्होंने कहा, "कोर्टिसोल एक हार्मोन है जो एड्रिनल ग्रंथियों से बनता है. यह जागने से कुछ घंटे पहले बढ़ना शुरू हो जाता है और शरीर को सतर्क रखने में मदद करता है. एड्रिनालिन और नॉरएड्रिनालिन हार्मोन चिंता, दीर्घकालिक तनाव, पैनिक डिसऑर्डर या तीव्र भावनात्मक स्थितियों में अचानक नींद टूटने का कारण बन सकते हैं."

इसके अलावा, ग्रोथ हार्मोन, इंसुलिन और प्रजनन से संबंधित हार्मोन भी अप्रत्यक्ष रूप से नींद की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं.

सुबह 3 बजे जागने के बाद मेरे दिमाग में इतने सारे विचार क्यों उमड़ने लगते हैं?

इस सवाल के जवाब में वह कहते हैं कि इसके पीछे कई मनोवैज्ञानिक और तंत्रिका संबंधी कारण हैं.

रात में ध्यान भटकाने वाली चीजें कम होती हैं, इसलिए अचानक जागने के बाद, मस्तिष्क का ध्यान अधूरे कामों, वित्तीय समस्याओं, नौकरी के तनाव या व्यक्तिगत चिंताओं पर अधिक केंद्रित होता है.

डॉक्टर मखीजा बताते हैं, "आरईएम नींद के दौरान, मस्तिष्क के भावनात्मक हिस्से अधिक सक्रिय होते हैं, जबकि तर्क और समस्या-समाधान वाले हिस्से अपेक्षाकृत कम सक्रिय होते हैं. इससे चिंता और समस्याएं दिन के मुकाबले अधिक गंभीर लग सकती हैं. यह समस्या चिंता विकार, अवसाद, दीर्घकालिक तनाव या बर्नआउट से पीड़ित लोगों में अधिक आम है."

विशेषज्ञों की सलाहः बेहतर नींद के लिए करें ये 4 काम

1. सोने से 1-2 घंटे पहले सभी स्क्रीन से दूर रहें

सोने से कम से कम एक घंटा पहले अपना फ़ोन, टैबलेट और कंप्यूटर बंद कर दें. इसके बजाय, हल्की रोशनी में कोई किताब पढ़ें या सुकून देने वाला संगीत सुनें, ताकि आपके दिमाग को यह संकेत मिल सके कि दिन ख़त्म हो गया है.

2. अपने खान-पान पर ध्यान दें

सोने से ठीक पहले शराब पीने से बचें और रात को देर से भारी या मीठे खाद्य पदार्थ खाने से भी बचें. अगर भूख लगे तो प्रोटीन और हेल्दी फैट्स से भरपूर हल्का (जैसे कुछ बादाम) खा लें, इससे ब्लड शुगर लेवल स्थिर रहेगा.

अगर आपकी नींद टूट जाए, तो अपना फ़ोन या घड़ी न देखें. अगर सुबह के 3.12 या 3.15 बज रहे हों, तो आप तुरंत हिसाब लगाने लगते हैं कि आपकी कितनी नींद बची है और इससे आपका तनाव बढ़ जाता है.

कुछ शांत और सुकून देने वाला काम करें, जैसे कोई साधारण, उबाऊ पत्रिका पढ़ना या कुछ हल्की सांस लेने की कसरत करना, जब तक कि आंखें बहुत भारी न हो जाएं, तब तक बिस्तर पर वापस न जाएं.

इससे आपके दिमाग को यह सीख मिलेगी कि बिस्तर आराम से सोने की जगह है, चिंता करने की नहीं.

Offene Fragen

  • क्या यह समस्या किसी विशेष आयु वर्ग को अधिक प्रभावित करती है?
  • क्या नींद टूटने के बाद दोबारा सोने में कठिनाई के लिए कोई विशिष्ट उपचार उपलब्ध हैं?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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