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Backतृणमूल के 20 कथित बागी सांसद एनसीपीआई में हो रहे हैं विलय? दल-बदल कानून पर छिड़ी बहस
तृणमूल के 20 कथित बागी सांसद एनसीपीआई में हो रहे हैं विलय? दल-बदल कानून पर छिड़ी बहस
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BBC हिंदी16.06.2026Politik7 dk okumaIndia

तृणमूल के 20 कथित बागी सांसद एनसीपीआई में हो रहे हैं विलय? दल-बदल कानून पर छिड़ी बहस

Auf einen Blick

एक अज्ञात राजनीतिक दल, नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ़ इंडिया (एनसीपीआई), तृणमूल कांग्रेस के 20 कथित बागी सांसदों के साथ विलय के दावे के बाद चर्चा में है। यह विलय दल-बदल विरोधी कानून से बचने का प्रयास माना जा रहा है, लेकिन इसके संवैधानिक और कानूनी सवाल खड़े हो गए हैं।

KI-generierte Zusammenfassung

Warum es wichtig ist

एक अज्ञात राजनीतिक दल, नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ़ इंडिया (एनसीपीआई), तृणमूल कांग्रेस के 20 कथित बागी सांसदों के साथ विलय के दावे के बाद चर्चा में है। यह विलय दल-बदल विरोधी कानून से बचने का प्रयास माना जा रहा है।

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एक अज्ञात सा राजनीतिक दल इन दिनों चर्चा के केंद्र में है. इस दल ने विधानसभा या लोकसभा चुनावों में कोई जीत हासिल नहीं की है लेकिन तृणमूल कांग्रेस के कथित 20 बाग़ी सांसदों के साथ आने का दावा करने के बाद अचानक फ़ोकस में आ गया है.

नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ़ इंडिया (एनसीपीआई) ने 2023 में त्रिपुरा के विधानसभा चुनावों में उम्मीदवार उतारे थे लेकिन किसी भी सीट पर जीत हासिल नहीं की थी.

पश्चिम बंगाल स्थित और 20 जनवरी 2023 को मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत इस पार्टी को क़रीब एक लाख रुपए का चंदा मिला है.

अब तृणमूल कांग्रेस के बीस कथित बाग़ी सांसदों ने इस राजनीतिक दल के साथ जुड़ने की घोषणा की है. हालांकि, ये 20 सांसद कौन-कौन है इसकी कोई पुख़्ता सूची अभी सामने नहीं आई है.

काकोली घोष दस्तीदार समेत टीएमसी के कई सांसदों ने खुलकर बाग़ी तेवर ज़रूर अख्तियार किए हैं.

तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा में कुल 28 सांसद हैं. अब दावा किया जा रहा है कि इनमें से 20 सांसद बाग़ी हो गए हैं और एनसीपीआई में विलय कर रहे हैं.

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़, रविवार को टीएमसी के बाग़ी सांसदों ने लोकसभा के अध्यक्ष को जानकारी दी कि वो एनसीपीआई में विलय कर रहे हैं.

विश्लेषक मान रहे हैं कि ये बाग़ी सांसदों ने ये क़दम दल बदल विरोधी क़ानून से बचने के लिए उठाया है.

महीना भर पहले ही आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों ने भी दल बदलने की घोषणा की थी. इस साल ये दूसरी बार है जब दल-बदल क़ानून चर्चा में है.

इस विलय को लेकर कई संवैधानिक और क़ानूनी सवाल भी हैं. सबसे बड़ा और अहम सवाल यही है कि क्या टीएमसी के चुनाव चिह्न और टिकट पर लोकसभा पहुंचे ये सांसद ख़ुद को किसी और पार्टी के साथ जोड़ सकते हैं या नहीं.

बाग़ी सांसदों का ये क़दम कामयाब होगा या नहीं, इसका जवाब सीटों और संख्या के गणित से उस क़ानूनी जवाब पर निर्भर करेगा जिसका अभी सुप्रीम कोर्ट ने भी कोई ठोस जवाब नहीं दिया है.

सवाल यह है कि क्या संसद सदस्यों (या विधायकों) का कोई समूह ख़ुद को अलग करके दूसरे राजनीतिक दल के साथ विलय कर सकता है या नहीं? या इसके लिए जिस राजनीतिक दल से वो निर्वाचित हुए हैं उसका सहमत होना आवश्यक है?

संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य बीबीसी से बात करते हुए कहते हैं, "क़ानून स्पष्ट है, किसी राजनीतिक दल का तो विलय हो सकता है लेकिन निर्वाचित सदस्यों के समूह का नहीं, भले ही उनकी संख्या दो-तिहाई से अधिक हो."

आचार्य कहते हैं, "वे सांसद तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुने गए हैं, इसलिए उन पर दल-बदल विरोधी कानून लागू होता है. वे अपनी मर्जी से किसी भी दूसरी पार्टी में शामिल नहीं हो सकते, अगर वे ऐसा करते हैं, तो उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा,"

हालांकि आचार्य यह भी कहते हैं कि अगर चुनाव आयोग इन बाग़ी सांसदों के दल को ही मूल तृणमूल कांग्रेस घोषित कर देता है तब यह क़ानून लागू नहीं होगा.

आचार्य के मुताबिक़, बाग़ी सांसदों का संख्या में दो-तिहाई से अधिक होना यहां मायने नहीं रखता है.

वे कहते हैं, "इसमें दो-तिहाई संख्या का कोई सवाल ही नहीं उठता. वह तब प्रासंगिक होता है जब एक 'मूल राजनीतिक दल' का दूसरी पार्टी में विलय होता है. इसका मतलब है कि अगर तृणमूल कांग्रेस ख़ुद यह फैसला करती है कि उसे किसी अन्य पार्टी में मिलना है, तभी ये सांसद उसमें शामिल हो सकते हैं. ये सांसद ख़ुद यह दावा नहीं कर सकते कि हम मर्ज हो गए हैं और अब हम दूसरी पार्टी हैं. क़ानून के अनुसार, मूल पार्टी को निर्णय लेना होता है. मुझे लगता है कि टीएमसी नेतृत्व ऐसा नहीं करेगा."

क्या ख़ुद को ही मूल तृणमूल कांग्रेस घोषित कर सकते हैं बाग़ी?

विशेषज्ञों के मुताबिक़, मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में इसकी गुंज़ाइश है.

पीडीटी आचार्य कहते हैं, "बाग़ी सांसद ऐसा कर सकते हैं. वे चुनाव आयोग के समक्ष ये कह सकते हैं कि हम ही असली तृणमूल हैं. यदि चुनाव आयोग उन्हें टीएमसी के रूप में मान्यता दे देता है तब वह इस नई पार्टी में अपना विलय कर सकते हैं. हालांकि, अब इसमें भी एक पेंच है- बाग़ी सांसदों ने चुनाव आयोग के समक्ष पेश होने से पहले ही एनसीपीआई में विलय की घोषणा कर दी है, ऐसे में उनका दावा कमज़ोर हो सकता है."

इस स्थिति में चुनाव आयोग को यह तय करना होगा कि असली तृणमूल कांग्रेस कौन सा गुट है.

आचार्य कहते हैं, "मौजूदा क़ानून के तहत बाग़ी निर्वाचित सदस्यों की संख्या के कोई मायने नहीं है. क़ानून कहता है कि पहले मूल पार्टी का विलय होता है, उसके बाद सदस्य नए दल में शामिल होते हैं."

आचार्य के मुताबिक़, बाग़ी सांसद भले ही ख़ुद के एनसीपीआई में विलय की घोषणा कर रहे हों लेकिन क़ानून की नज़र में फिलहाल वे टीएमसी के सदस्य ही हैं.

आचार्य कहते हैं, "10वीं अनुसूची में साफ लिखा है कि सदस्य की पार्टी वही मानी जाएगी जिसने उन्हें चुनाव में उम्मीदवार के तौर पर खड़ा किया था."

विलय सही ठहराया गया तो इसके मायने क्या हैं?

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक़, यदि इस कथित विलय को मंज़ूरी मिल जाती है तो इसके गंभीर राजनीतिक मायने होंगे.

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं, "इसका पहला और सबसे बड़ा मतलब होगा कि एक और ताक़तवर क्षेत्रीय पार्टी का पतन. हाल के सालों में कई क्षेत्रीय पार्टियां कमज़ोर हुई हैं. महाराष्ट्र में शिवसेना को तोड़ दिया गया. बिहार में जदयू कमज़ोर हो गई है, अब पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस भी इस कतार में आ गई हैं."

अत्री कहते हैं, "नारा दिया गया था कांग्रेस मुक्त भारत का, अब लग रहा है कि देश की राजनीति विपक्ष मुक्त भारत की तरफ़ बढ़ रही है."

अत्री कहते हैं, "पश्चिम बंगाल के इस राजनीतिक घटनाक्रम को विपक्ष मुक्त भारत की दिशा में एक बड़े क़दम के रूप में देखा जाना चाहिए. राजनीति में एक नया मॉडल आया है, क्षेत्रीय क्षत्रपों को ख़त्म करो. अभी ये मॉडल अपने अंजाम तक नहीं पहुंचा है. उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी आगे इसके दायरे में आ सकती है."

हेमंत अत्री कहते हैं कि इस राजनीतिक घटनाक्रम ने चुनाव आयोग और देश की अन्य संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल उठा दिए हैं.

अत्री कहते हैं, "चुनाव आयोग की भूमिका पर अब सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि हर राज्य में नई तकनीक या 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' जैसे शब्दों का सहारा लिया जा रहा है. वे वन नेशन वन इलेक्शन की बात करते हैं, लेकिन असल में इसे वन नेशन वन लीडर की ओर ले जा रहे हैं क्योंकि वे मौजूदा हालात में सत्ता खोना बर्दाश्त नहीं कर सकते."

बाग़ी सांसदों की संख्या पर सवाल उठाते हुए अत्री कहते हैं, "ये भी उल्लेखनीय है कि अभी तक बाग़ी सांसदों की कोई पुख़्ता सूची सामने नहीं आई है, लेकिन हर जगह ये कहा जा रहा है कि बीस सांसद बाग़ी हो गए हैं. ये सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि क्या बीस सांसद बाग़ी हुए या उन्हें बाग़ी होने पर मजबूर किया गया."

क्या है दल बदल विरोधी क़ानून

भारत में दल-बदल विरोधी क़ानून की शुरुआत 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए हुई थी, जब संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई.

इसका उद्देश्य निर्वाचित सांसदों और विधायकों द्वारा बार-बार पार्टी बदलकर सरकारों को अस्थिर करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना था.

1960 और 1970 के दशक में देश की राजनीति में बड़े पैमाने पर दल-बदल देखने को मिला था, जिसके कारण कई राज्य सरकारें गिर गई थीं और "आया राम, गया राम" भारतीय राजनीति का चर्चित मुहावरा बन गया था.

इस क़ानून के तहत यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है या पार्टी के निर्देशों के खिलाफ़ मतदान करता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है.

हालांकि संविधान में एक अपवाद भी रखा गया है, जिसके अनुसार यदि किसी राजनीतिक दल का दूसरे दल में विलय हो जाता है और उस दल के कम-से-कम दो-तिहाई निर्वाचित सदस्य इस विलय का समर्थन करते हैं, तो उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होगा.

लेकिन इसी प्रावधान की व्याख्या को लेकर वर्षों से विवाद रहा है. मुख्य सवाल यह है कि क्या केवल निर्वाचित सांसदों या विधायकों का समूह अपने स्तर पर किसी दूसरे दल में विलय का दावा कर सकता है, या फिर इसके लिए मूल राजनीतिक दल द्वारा औपचारिक रूप से विलय का निर्णय लिया जाना आवश्यक है. यही संवैधानिक प्रश्न अब टीएमसी के कथित बाग़ी सांसदों और एनसीपीआई के मामले के केंद्र में है.

इस क़ानून के तहत किसी सांसद या विधायक को अयोग्य ठहराया जा सकता है अगर वह अपनी मर्ज़ी से अपना राजनीतिक दल छोड़ दे. यदि सदस्य पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करे या मतदान से अनुपस्थित रहे तब भी यह क़ानून लागू हो जाता है. यदि कोई निर्दलीय सदस्य चुनाव जीतने के बाद किसी दल में शामिल हो जाता है तब उस पर भी यह क़ानून लागू होता है.

हालांकि, यदि कोई सांसद या विधायक स्पीकर, डिप्टी स्पीकर, चेयरमैन या डिप्टी चेयरमैन चुना जाता है और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए पार्टी छोड़ता है, तो उसे दल-बदल के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा.

पहले यदि किसी दल के एक-तिहाई सदस्य अलग होते थे तब उन्हें इस क़ानून से सुरक्षा मिलती थी. साल 2003 में संविधान में हुए 91वें संशोधन के बाद ये छूट समाप्त कर दी गई.

Worauf zu achten ist

KI-Ausblick — Möglichkeiten, keine Fakten

  • क्षेत्रीय क्षत्रपों को ख़त्म करने का मॉडल उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी तक फैल सकता है।

    Möglich · Innerhalb von Monaten

Offene Fragen

  • क्या टीएमसी के सांसद खुद को किसी और पार्टी से जोड़ सकते हैं?
  • क्या बाग़ी सांसदों का विलय कामयाब होगा?
  • क्या चुनाव आयोग असली तृणमूल कांग्रेस का फैसला करेगा?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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