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ईरान ने अमेरिका के 20 सैन्य ठिकानों को पहुंचाया नुकसान: बीबीसी वेरिफ़ाई
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BBC हिंदी3.6.2026Welt5 Min. LesezeitIndia

ईरान ने अमेरिका के 20 सैन्य ठिकानों को पहुंचाया नुकसान: बीबीसी वेरिफ़ाई

Auf einen Blick

बीबीसी वेरिफ़ाई के विश्लेषण के अनुसार, ईरान ने युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका के 20 सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है, जो सार्वजनिक रूप से स्वीकार किए गए दायरे से कहीं अधिक व्यापक थे.

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Author, मर्लिन थॉमस, एलेक्स मरे और मैट मर्फ़ी

पदनाम, बीबीसी वेरिफ़ाई

प्रकाशित 23 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 7 मिनट

ईरान ने युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका के 20 सैन्य ठिकानों को नुक़सान पहुंचाया है. बीबीसी वेरिफ़ाई ने सैटेलाइट तस्वीरों और वीडियो का विश्लेषण किया है. इसके अनुसार, हमले सार्वजनिक रूप से स्वीकार किए गए दायरे से कहीं अधिक व्यापक थे.

फ़रवरी के अंत से ईरान ने मध्य-पूर्व के आठ देशों में स्थित महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है. इन हमलों में अत्याधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों, ईंधन भरने वाले विमानों और रडार प्रणालियों को करोड़ों डॉलर का नुक़सान हुआ है.

ईरान ने पिछले तीन महीनों में ईरान और लेबनान पर हुए अमेरिका-इसराइल के हमलों के जवाब में अमेरिकी ठिकानों और साझा सैन्य सुविधाओं को निशाना बनाया है.

अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन का कहना है कि ऑपरेशन "एपिक फ़्यूरी" शुरू होने के बाद से उसने ईरान में 13,000 से अधिक लक्ष्यों पर हमला किया है.

विश्लेषकों का क्या है कहना?

ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई ने अमेरिकी ठिकानों पर हमलों में अपनी सेना की सफलता को प्रमुखता से पेश करने की कोशिश की है.

मंगलवार को जारी एक बयान में उन्होंने दावा किया कि मध्य-पूर्व अब अमेरिकी सैन्य ठिकानों के लिए "सुरक्षित क्षेत्र" नहीं रहा है.

हालांकि, व्हाइट हाउस लगातार दावा करता रहा है कि ईरान की सैन्य क्षमता लगभग समाप्त हो चुकी है. लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिकी ठिकानों पर हुए नुक़सान से संकेत मिलता है कि ईरान के जवाबी हमले पहले स्वीकार किए गए स्तर से कहीं अधिक सटीक और व्यापक थे.

अमेरिकी रक्षा विभाग के एक अधिकारी ने "ऑपरेशनल सिक्योरिटी कारणों" का हवाला देते हुए बीबीसी वेरिफ़ाई के निष्कर्षों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

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अमेरिका ने सैन्य संघर्ष के सैटेलाइट विश्लेषण को सीमित करने की कोशिश के तहत प्रमुख सैटेलाइट इमेज प्रोवाइडर प्लेनेट से ईरान और मध्य-पूर्व के अधिकांश हिस्सों की नई तस्वीरों पर "अनिश्चितकालीन" रोक लगाने का अनुरोध किया.

कंपनी ने इस फ़ैसले का बचाव करते हुए कहा कि वह नहीं चाहती कि उसकी तस्वीरों का इस्तेमाल "विरोधी तत्वों द्वारा नेटो सहयोगियों, मित्र देशों के सैनिकों और नागरिकों को निशाना बनाने" के लिए किया जाए.

कहां-कहां हुआ नुक़सान

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बीबीसी वेरिफ़ाई ने अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रोवाइडर्स (प्रदाताओं) की सैटेलाइट तस्वीरों और प्लेनेट की पुरानी तस्वीरों का विश्लेषण कर ईरानी हमलों से हुए नुक़सान का आकलन किया है.

प्रभावित ठिकाने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, कुवैत, इराक़, जॉर्डन, बहरीन और ओमान में स्थित हैं. हालांकि, वास्तविक संख्या इससे अधिक भी हो सकती है. कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि प्रभावित ठिकानों की संख्या 28 तक पहुंच सकती है.

नुक़सान पहुंचाए गए प्रमुख सैन्य उपकरणों में यूएई के अल रुवैस और अल सादर एयरबेस तथा जॉर्डन के मुवाफ़्फ़क सल्ती एयरबेस पर तैनात तीन अत्याधुनिक एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणालियां शामिल हैं.

जानकारी के अनुसार, अमेरिका के पास केवल आठ टीएचएएडी (टर्मिनल हाई अल्टिट्यूड एरिया डिफ़ेंस) बैटरियां हैं. ये दुनिया के विभिन्न हिस्सों में तैनात हैं. प्रत्येक बैटरी को तैयार करने में लगभग एक अरब डॉलर की लागत आती है.

हर बैटरी के संचालन के लिए लगभग 100 सैनिकों की ज़रूरत होती है. वहीं, इससे दागे जाने वाले प्रत्येक इंटरसेप्टर मिसाइल की क़ीमत करीब 1.27 करोड़ डॉलर बताई जाती है.

आयरिश रक्षा बलों के पूर्व प्रमुख वाइस एडमिरल मार्क मेलेट ने बीबीसी वेरिफ़ाई से कहा कि ये प्रणालियां "बेहद जटिल" क्षेत्रीय रक्षा नेटवर्क का केंद्र हैं और "इन्हें जल्दी या आसानी से बदला नहीं जा सकता."

विशेषज्ञों द्वारा सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण से यह भी संकेत मिला है कि सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयरबेस पर तैनात अमेरिकी ईंधन भरने वाले और निगरानी विमान ईरानी हमलों में गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं. तस्वीरों में क्षतिग्रस्त विमान और धुएं से भरे गड्ढे दिखाई देते हैं.

एमएआईएआर के एक विश्लेषक ने एक विमान की पहचान ई-3 सेंट्री निगरानी विमान के रूप में की है. अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इसे बदलने में 70 करोड़ डॉलर तक का ख़र्च आ सकता है.

अन्य स्थानों पर ईरानी हमलों ने कुवैत के अली अल सलेम एयरबेस और कैंप आरिफ़जान को भी निशाना बनाया. एमएआईएआर के विश्लेषकों ने सैटेलाइट तस्वीरों में ईंधन भंडारण बंकरों, विमान हैंगरों और सैनिक आवासों को हुए नुक़सान की पहचान की है. संघर्ष के दौरान इन ठिकानों पर कई बार हमले हुए.

कैंप आरिफ़जान में रक्षा ख़ुफ़िया कंपनी जेन्स ने सैटेलाइट संचार उपकरणों को व्यापक नुक़सान पहुंचने की पुष्टि की है.

अमेरिकी ठिकानों को हुए कुल नुक़सान का सटीक आकलन करना कठिन है. हालांकि, मई में पेंटागन ने ऑपरेशन एपिक फ़्यूरी की कुल लागत 29 अरब डॉलर बताई थी. माना जा रहा है कि इस राशि का बड़ा हिस्सा संघर्ष में क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए उपकरणों की मरम्मत और उन्हें हटाने पर ख़र्च होगा. डेमोक्रेट नेताओं का कहना है कि यह अनुमान वास्तविक लागत से कम है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि फ़रवरी से अब तक कम से कम 42 विमान नष्ट या क्षतिग्रस्त हुए हैं. इनमें एफ़-15 और एफ़-35 लड़ाकू विमान, 24 एमक्यू-9 रीपर ड्रोन और एक ए-10 अटैक विमान शामिल हैं.

ईरानी हमले की क्या रही रणनीति

अमेरिकी सेना द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले महंगे सैन्य उपकरणों की तुलना में ईरान ने कथित तौर पर अपने हमलों में सस्ते और आसानी से बदले जा सकने वाले ड्रोन का इस्तेमाल किया.

बीबीसी वेरिफ़ाई से बात करने वाले विशेषज्ञों के अनुसार, युद्ध के दौरान ईरान की रणनीति में बदलाव देखने को मिला. शुरुआत में उसने बड़े पैमाने पर मिसाइल हमले किए, जो मध्य-पूर्व के शहरों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते थे. बाद में उसने अधिक सटीक और लक्षित हमले शुरू कर दिए.

अमेरिका स्थित स्टिम्सन सेंटर की विश्लेषक डॉ. केली ग्रिएको ने कहा, "ईरान के शुरुआती हमले संख्या के बल पर वायु और मिसाइल रक्षा प्रणालियों को निष्क्रिय करने के उद्देश्य से किए गए थे."

उन्होंने कहा, "लेकिन कुछ ही दिनों में ईरान ने छोटी लेकिन अधिक सटीक हमलावर रणनीति अपना ली. इससे वह अपनी बाकी मिसाइलों और ड्रोन को महत्वपूर्ण लक्ष्यों के लिए बचाकर रख सका और ऐसे ठिकानों पर हमला कर सका, जहां मामूली चूक भी भारी नुक़सान पहुंचा सकती थी."

एमएआईएआर के एक विश्लेषक ने बीबीसी वेरिफ़ाई को बताया कि अमेरिकी सेना "शुरुआती चरण में कुछ हद तक लापरवाह दिखाई दी", क्योंकि उसने ईरानी ड्रोन और मिसाइलों की पहुंच से बाहर अपने विमानों को नहीं हटाया.

उनका कहना था कि प्रिंस सुल्तान एयरबेस के मामले में विमान नष्ट होने से पहले भी उस ठिकाने पर हमला हो चुका था.

ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई ने कहा, "इस क्षेत्र के देश और उनकी धरती अब अमेरिकी ठिकानों की ढाल नहीं बनेंगे."

उन्होंने आगे कहा, "अमेरिका के लिए इस क्षेत्र में दखल देने और सैन्य ठिकाने स्थापित करने की कोई सुरक्षित जगह नहीं बचेगी. वह दिन-ब-दिन अपनी पुरानी स्थिति से और दूर होता जाएगा."

उनका यह बयान ऐसे समय आया, जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम को लेकर फिर तनाव बढ़ने लगा था. गुरुवार को ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) ने कहा कि उसने दक्षिणी ईरान पर अमेरिका के नए हमलों के बाद क्षेत्र में स्थित एक अमेरिकी ठिकाने को निशाना बनाया.

डॉ. ग्रिएको ने चेतावनी दी कि यदि अमेरिका-ईरान युद्धविराम टूटता है और लड़ाई फिर शुरू होती है, तो अमेरिकी ठिकानों को पहले से हुए नुक़सान से संकेत मिलता है कि खाड़ी क्षेत्र में मौजूद कई सैन्य सुविधाएं असुरक्षित हो सकती हैं.

(बारबरा मेट्ज़लर और टॉम गोल्ड की अतिरिक्त रिपोर्टिंग)

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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