प्रश्नपत्र लीक आंदोलन को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ा, सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल 26वें दिन पहुँची
सीजेपी ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग दोहराई, जबकि अरुंधति रॉय, शशि थरूर और कई कलाकारों ने छात्रों के आंदोलन का समर्थन किया।
Auf einen Blick
प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ देशभर में विरोध तेज़ हुआ है। सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल 26वें दिन पहुँची, जबकि कई सार्वजनिक हस्तियों ने छात्रों के आंदोलन के समर्थन में बयान दिए।
KI-generierte Zusammenfassung
Warum es wichtig ist
लेख में कहा गया है कि प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ जंतर-मंतर से शुरू हुआ आंदोलन अब देश के कई हिस्सों में फैल गया है। सीजेपी धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग कर रही है और सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल 26वें दिन पहुँच चुकी है।
प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का आंदोलन अब केवल दिल्ली के जंतर-मंतर तक सीमित नहीं दिख रहा है। 20 जुलाई को ‘चलो संसद’ मार्च में जुटी भीड़ अब भी बनी हुई है और देश के कई हिस्सों में विरोध-प्रदर्शन जारी हैं। सीजेपी की मांग है कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा दें। हालांकि मोदी सरकार की तरफ़ से अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है। दूसरी तरफ़ सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल 26वें दिन पहुँच गई है।
वांगचुक ने केंद्रीय मंत्रियों जे. पी. नड्डा और जितेंद्र सिंह को संबोधित करते हुए एक पत्र जारी किया है। दोनों मंत्री मंगलवार रात गुरुग्राम के मेदांता हॉस्पिटल में उनसे मिलने पहुँचे थे। पत्र में वांगचुक ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े पर ज़ोर दिए बिना कहा कि मंत्रियों ने उन्हें आश्वासन दिया है कि सरकार “प्रश्नपत्र लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को उचित मुआवजा देने” और धर्मेंद्र प्रधान की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए, जिसमें उनके इस्तीफ़े पर विचार भी शामिल हो, संसद में सार्थक चर्चा कराने पर विचार करेगी।
पत्र जारी होने के कुछ ही देर बाद सीजेपी ने कहा कि जब तक सरकार उसकी मांगें नहीं मान लेती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। सीजेपी ने एक बार फिर धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग दोहराई, जबकि उसकी अन्य शर्तें वांगचुक की मांगों से काफ़ी हद तक मिलती-जुलती थीं।
छात्रों के इस आंदोलन पर भारत की कई हस्तियां अब खुलकर बोल रही हैं। अरुंधति रॉय, जानी-मानी लेखिका और बुकर विजेता, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचक रही हैं। उन्होंने द वायर में एक लेख के ज़रिए इस आंदोलन का समर्थन किया है।
अरुंधति रॉय ने कहा, “कई वर्षों बाद पहली बार भारतीय होने पर गर्व और उम्मीद दोनों महसूस हो रहे हैं। ठीक उस समय, जब लगने लगा था कि सारी उम्मीदें ख़त्म हो चुकी हैं। बारिश के बीच आगे बढ़ते युवा कॉकरोच। एक जज और एक तंज़ भरे मज़ाक के अस्वाभाविक गठजोड़ की उपज।”
विपक्षी दलों के अनुसार, 2014 से अब तक ऐसे लगभग 152 पेपर लीक हो चुके हैं। इन घटनाओं ने उन लाखों युवाओं का भविष्य बर्बाद कर दिया, जिन्होंने इन परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों लगाए। कई अभिभावकों ने अपने बच्चों की पढ़ाई और परीक्षा शुल्क जुटाने के लिए अपनी ज़मीन या घर तक बेच दिए। इसे एक नए तरह की वैध उगाही बताया गया है।
अन्ना हज़ारे आंदोलन के उलट, जिसे ह���़्तों तक सैकड़ों कॉर्पोरेट स्वामित्व वाले टीवी चैनलों ने चौबीसों घंटे लगातार कवरेज दी थी, कॉकरोच जनता पार्टी के पास भरोसा करने के लिए सिर्फ़ वह ख़ुद है और इंटरनेट है। अन्ना आंदोलन के उलट, जिसमें आरएसएस ने धीरे-धीरे प्रभाव बना लिया था और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी चुनावी लाभ उठाने के लिए पूरी तैयारी के साथ इंतज़ार कर रही थी, कॉकरोच जनता पार्टी के पीछे ऐसा कोई संगठित विपक्षी दल खड़ा नहीं है जो इस आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए तैयार बैठा हो।
जो स्वतःस्फूर्त जनाक्रोश आज दिखाई दे रहा है, वह तब तक धीरे-धीरे ख़त्म हो जाएगा जब तक उसे वास्तविक राजनीतिक दिशा और संगठन नहीं मिलता। जब तक बड़े लोग और विपक्षी दल अपनी आपसी होड़ और छोटी-छोटी राजनीतिक लड़ाइयों को छोड़कर एकजुटता नहीं दिखाते।
सरकार यह अच्छी तरह जानती है कि ऐसा होना मुश्किल है। इसलिए वह बेपरवाह बनी हुई है, क्योंकि उसे लगता है कि उसे सिर्फ़ इंतज़ार करना है। स्टेट इंतज़ार कर सकता है, लेकिन जनता नहीं।
क्या कॉकरोचों की यह ऊर्जा हमें इस गहरे गड्ढे से बाहर निकाल सकती है? यह आसान नहीं है। भारत में जन आंदोलनों के इतिहास पर एक नज़र डालें तो तस्वीर बहुत उत्साहजनक नहीं दिखती। यह सिकुड़ती आकांक्षाओं और टूटे हुए सपनों का संक्षिप्त इतिहास है।
साठ और सत्तर के दशक में कई आंदोलनों ने, जिनमें नक्सलियों का सशस्त्र विद्रोह भी शामिल था, संपत्ति के पुनर्वितरण और जोतने वाले किसान को ज़मीन देने की मांग उठाई। इन आंदोलनों को कुचल दिया गया।
80 और 90 के दशक में सामाजिक आंदोलनों ने, जिनमें सबसे प्रमुख नर्मदा बचाओ आंदोलन था और बाद में आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में माओवादी आंदोलन, किसानों और आदिवासियों को उनकी ज़मीन से बेदखल किए जाने का विरोध किया। वे केवल यह मांग कर रहे थे कि ग़रीबों के पास जो थोड़ा-बहुत है, वह भी उनसे न छीना जाए। इन आंदोलनों को भी कुचल दिया गया।
2000 के दशक तक आते-आते स्थिति यह हो गई कि लोग राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के लिए ही आभारी होने लगे। यानी न्यूनतम मज़दूरी पर साल में तीन महीने के रोज़गार का अधिकार, जिसकी कुल राशि किसी बड़े शहर के महंगे रेस्तरां में एक अच्छे भोजन की क़ीमत के बराबर बैठती है।
सविता झा, दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास की अध्यापक, ने 22 जुलाई को इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा था। उसी का अंश इस लेख में दिया गया है। उन्होंने अपनी छोटी बेटी से हुई बातचीत का ज़िक्र करते हुए कहा कि असली सवाल यह नहीं है कि मार्च की अगुवाई कौन कर रहा है, बल्कि यह है कि छात्रों की ज़िंदगी क्यों बर्बाद हुई और क्यों ऐसी परीक्षा व्यवस्था बनी ही नहीं जो सुरक्षित, पारदर्शी और जवाबदेह हो। उन्होंने कहा कि जब लोग विरोध के लिए सड़क पर उतरते हैं, तो उनसे संवाद होना चाहिए।
शशि थरूर ने अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में 22 जुलाई को एक लेख लिखा था। उनके अनुसार संवैधानिक लोकतंत्र की असली कसौटी यह नहीं है कि वह क़ानून का पालन कराने के लिए कितनी शक्ति रखता है, बल्कि यह है कि वह असहमति के साथ कितनी विनम्रता से संवाद करता है। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों की चिंताओं का प्रतिबिंब है और आंदोलन को दबाने का तरीक़ा व्यापक राजनीतिक रणनीति की ओर इशारा करता है।
थरूर ने यह भी कहा कि सड़कों पर जो दृश्य दिखाई दिया, वह शासन की नाकामी का प्रतीक था, जबकि संसद के भीतर हुई प्रतिक्रिया ने विधायिका की संस्थागत विफलता उजागर की। विपक्ष ने क़ानून-व्यवस्था की स्थिति, प्रदर्शन कर रहे युवाओं की शिकायतों और कथित अत्यधिक बल प्रयोग पर चर्चा के लिए कार्यवाही स्थगित करने के कई नोटिस दिए, लेकिन उन्हें तुरंत ख़ारिज कर दिया गया।
अभिनेता सलमान ख़ान ने कहा कि आंदोलन बहुत शांतिपूर्ण था और यह देखकर दुख हुआ कि इसे हिंसक मोड़ लेना पड़ा। उन्होंने छात्रों के रुख़ की सराहना करते हुए कहा कि यह मुद्दा छात्रों और शिक्षा व्यवस्था के बीच का है और इसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए।
आलिया भट्ट ने अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर लिखा कि पिछले कुछ दिनों में जो कुछ हुआ है, उसने उनका दिल तोड़ा है, लेकिन छात्रों के साहस और संकल्प ने उम्मीद भी दी है। उन्होंने कहा कि वे उन सपनों, परिवारों की उम्मीदों और संघर्षों को सलाम करती हैं जो इन छात्रों के पीछे खड़े हैं।
अनुपम खेर ने कहा कि छात्रों की आवाज़ सुनी जानी चाहिए और उनकी लड़ाई किसी और के हाथों का औजार नहीं बननी चाहिए। उन्होंने राजनीतिक अवसरवादियों के आंदोलन में घुसने को लेकर सावधान रहने की अपील की और कहा कि लोकतंत्र में सवाल पूछना अधिकार है, लेकिन यह भी ज़िम्मेदारी है कि आवाज़ पर किसी और का क़ब्ज़ा न हो।
नसीरुद्दीन शाह ने कहा कि उन्हें इन बच्चों के साथ हो रहे ज़ुल्म को देखकर ग़ुस्सा आ रहा है। उन्होंने छात्रों से हिम्मत न हारने को कहा और कहा कि बहुत से लोग उनके साथ हैं। बीबीसी के लिए यह सामग्री कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित की गई थी।
Worauf zu achten ist
KI-Ausblick — Möglichkeiten, keine Fakten
सरकार पर धर्मेंद्र प्रधान की जवाबदेही और प्रश्नपत्र लीक पर संसद में चर्चा के लिए दबाव बना रहेगा।
Wahrscheinlich · Innerhalb von Tagen
विरोध-प्रदर्शन देश के कुछ और हिस्सों में जारी रह सकते हैं, लेकिन बिना व्यापक राजनीतिक संगठन के उनकी गति धीमी पड़ सकती है।
Wahrscheinlich · Innerhalb von Wochen
सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल को लेकर सार्वजनिक और राजनीतिक बयानबाज़ी और तेज़ हो सकती है।
Möglich · Innerhalb von Tagen
Offene Fragen
- सरकार छात्रों की मांगों पर औपचारिक रूप से क्या फैसला लेगी?
- क्या धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े पर संसद में वास्तव में चर्चा होगी?
- क्या देशभर के विरोध-प्रदर्शनों का कोई साझा नेतृत्व बनेगा?
- सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल का आगे क्या परिणाम होगा?

