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ट्रंप की नेतन्याहू को वो 'क्रेज़ी' फ़ोन कॉल जिसने ईरान के साथ बातचीत को मुश्किल बना दिया
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BBC हिंदी4.6.2026Politik5 Min. LesezeitIndia

ट्रंप की नेतन्याहू को वो 'क्रेज़ी' फ़ोन कॉल जिसने ईरान के साथ बातचीत को मुश्किल बना दिया

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डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू को 'क्रेज़ी' कहा, जिससे ईरान से बातचीत मुश्किल हो गई। नेतन्याहू ने इसे 'रणनीतिक मतभेद' बताया, पर विशेषज्ञों का मानना है कि यह कॉल व्हाइट हाउस की नाराज़गी दर्शाती है।

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ट्रंप की नेतन्याहू को वो 'क्रेज़ी' फ़ोन कॉल जिसने ईरान के साथ बातचीत को मुश्किल बना दिया

Author, बर्न्ड डेबुसमैन जूनियर

पदनाम, व्हाइट हाउस रिपोर्टर

प्रकाशित 7 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 7 मिनट

डोनाल्ड ट्रंप भी अमेरिका के उन राष्ट्रपतियों की सूची में शामिल हो गए हैं जिनके साथ बिन्यामिन नेतन्याहू के मतभेद खुलकर सामने आए.

रिपोर्टों के मुताबिक़, लेबनान में सैन्य कार्रवाई को लेकर इसराइली प्रधानमंत्री से फोन पर उनकी तीखी बातचीत हुई. दरअसल, इस कार्रवाई ने अमेरिका की ईरान कूटनीति को संकट में डाल दिया है.

लेबनान पर इसराइल के हमलों के जवाब में ईरान ने अमेरिका के साथ बातचीत रोकने की धमकी दी है.

इसे ट्रंप की उस कोशिश के लिए झटका माना जा रहा है, जिसके तहत वह ईरान के साथ जारी एक अलोकप्रिय जंग से बाहर निकलना चाहते हैं.

एक पत्रकार ने ट्रंप से एक्सियोस की उस रिपोर्ट के बारे में पूछा, जिसमें कहा गया था कि उन्होंने सोमवार को फ़ोन पर नेतन्याहू को 'क्रेज़ी' कहा था और उन पर एहसान न मानने का आरोप लगाया था.

ट्रंप ने क्या कहा

बुधवार को प्रसारित पॉड फ़ोर्स वन पॉडकास्ट को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा, "मैंने कहा था. मैं यह नहीं कहूंगा कि मैं ग़ुस्से में था. मैं बस लेबनान के साथ उनकी लगातार लड़ाई को लेकर थोड़ा परेशान था, आप समझ रहे हैं."

ट्रंप ने आगे कहा, "मुझे बीबी (नेतन्याहू) बहुत पसंद हैं. और मैं उनके साथ बहुत अच्छे ढंग से काम करता हूं."

हालांकि, वह ऐसे अकेले अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं है जिनकी इसराइली प्रधानमंत्री से टकराहट हुई हो.

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नेतन्याहू का व्हाइट हाउस के धैर्य की परीक्षा लेने का लंबा इतिहास रहा है और वह ऐसे विवादों के राजनीतिक नतीजे से भी बच निकलते रहे हैं.

ताज़ा रिपोर्ट किया गया टकराव उस समय में सामने आया है जब ट्रंप एक ऐसे समझौते पर विचार कर रहे हैं, जो अमेरिका-ईरान युद्धविराम को बढ़ा सकता है और ईरान के परमाणु कार्यक्रम के भविष्य पर बातचीत का रास्ता खोल सकता है.

वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए बेहद अहम जलमार्ग होर्मुज़ स्ट्रेट का दोबारा खुलना भी दांव पर लगा हुआ है.

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हालांकि नेतन्याहू ने अपने अमेरिकी सहयोगी के साथ तनाव की बातों को हंसकर ख़ारिज कर दिया है.

उन्होंने बुधवार को सीएनबीसी को दिए इंटरव्यू में कहा, "कभी-कभी, जैसे सबसे अच्छे परिवारों में होता है, वैसे ही हमारे बीच कुछ रणनीतिक मतभेद हो जाते हैं. हम हमेशा उन्हें सुलझाने का रास्ता निकाल लेते हैं और हम यह काम अच्छे दोस्तों की तरह करते हैं."

उन्होंने आगे कहा कि दोनों 'सुबह असहमत हो सकते हैं और दोपहर तक सहमत भी हो सकते हैं.'

हालांकि, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि यह फ़ोन कॉल व्हाइट हाउस की नाराज़गी की ओर इशारा करती है, क्योंकि 28 फ़रवरी को ईरान पर शुरू हुए हमले के 100 दिन बाद भी अमेरिका और इसराइल के बीच सैन्य और राजनीतिक लक्ष्यों के सिलसिले में तालमेल को लेकर तनातनी बनी हुई है.

पूर्व राजनयिक और क्राइसिस कम्युनिकेशन एजेंसी 'ग्लोबल सिचुएशन रूम' के प्रेसीडेंट ब्रेट ब्रूएन ने बीबीसी से कहा, "नेतन्याहू का अपना अलग रास्ता अपनाने का लंबा इतिहास रहा है, चाहे अमेरिका से कुछ भी कहा गया हो."

उन्होंने आगे कहा, "ट्रंप ने उनके साथ आगे बढ़ने का फ़ैसला किया और अब वह एक बहुत कठिन सबक सीख रहे हैं कि जब आप ऐसे अप्रत्याशित नेता के साथ जंग में उतरते हैं, जिसका एजेंडा हमेशा आपकी प्राथमिकताओं से मेल नहीं खाता, तब क्या होता है."

कुल मिलाकर नेतन्याहू और ट्रंप इस बात पर सहमत हैं कि अमेरिका का मुख्य लक्ष्य ईरान को परमाणु हथियार बनाने या हासिल करने से रोकना है.

लेकिन लेबनान के मामले में दोनों के हित कुछ हद तक अलग हैं.

इसराइल ने ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह मिलिशिया को निशाना बनाने की कसम खाई है, जबकि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है.

ईरान का कहना है कि किसी भी युद्धविराम में लेबनान को भी शामिल किया जाना चाहिए.

अमेरिका में बढ़ता युद्ध विरोध

यह ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका की जनता का बड़ा हिस्सा लंबे समय इसराइल को दिए जा रहे अमेरिकी समर्थन की आलोचना कर रहा है.

अप्रैल में जारी प्यू रिसर्च के एक पोल में पाया गया कि अब 60 फ़ीसदी अमेरिकी इसराइल को नकारात्मक नज़रिए से देखते हैं. 2023 में हमास के साथ युद्ध शुरू होने से पहले यह आंकड़ा 42 फ़ीसदी था.

कई प्रमुख रूढ़िवादी हस्तियों ने भी सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि उनके मुताबिक़ इसराइल ने ईरान के साथ जंग में जाने के लिए ट्रंप को प्रभावित किया. हालांकि व्हाइट हाउस और नेतन्याहू दोनों इस बात से इनकार करते हैं.

जंग के प्रमुख आलोचकों में जो केंट भी शामिल हैं. उन्होंने मार्च में नेशनल काउंटर टेररिज़्म सेंटर के प्रमुख पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

उनका कहना था, "हमने यह युद्ध इसराइल और उसके शक्तिशाली अमेरिकी लॉबी के दबाव में शुरू किया."

इसराइल समर्थक लॉबिंग समूह अमेरिकन इसराइल पब्लिक अफ़ेयर्स कमेटी ने केंट के इस्तीफ़े पर एक बयान दोबारा साझा किया. इसमें उन पर 'पुराने यहूदी-विरोधी पूर्वाग्रहों' को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया था.

इस राजनीतिक माहौल में कुछ ऑब्ज़र्वर्स का मानना है कि अमेरिका में आलोचकों को शांत करने के लिए ट्रंप के पास नेतन्याहू से मतभेद दिखाने की एक वजह राजनीति भी है.

ब्रुएन ने कहा, "मुझे लगता है कि अब इसराइल और अमेरिका के बीच कुछ दूरी दिखाना राजनीतिक रूप से ज़रूरी हो गया है."

उन्होंने कहा, "चाहे लेबनान हो या ग़ज़ा, नेतन्याहू ने कुछ ऐसे क़दम उठाए हैं जो ट्रंप या रिपब्लिकन पार्टी के लिए भी राजनीतिक रूप से मुश्किल पैदा करते हैं."

अमेरिकी राष्ट्रपतियों के साथ नेतन्याहू के रिश्ते

अमेरिका के दूसरे राष्ट्रपतियों को भी नेतन्याहू से निराशा का सामना करना पड़ा है.

ओस्लो शांति समझौते को लागू करने को लेकर इसराइली प्रधानमंत्री और बिल क्लिंटन के बीच टकराव बहुत चर्चा में रहा था.

बराक ओबामा के साथ उनके रिश्ते और भी मुश्किल रहे, ख़ास तौर पर मार्च 2015 में कांग्रेस में दिए गए उस भाषण के बाद, जो ईरान नीति पर केंद्रित था और जिसकी जानकारी व्हाइट हाउस को पहले से नहीं थी.

जो बाइडन के साथ भी उनके संबंधों में खटास दिखाई दी, जब उन्होंने अमेरिका पर हथियार और गोला-बारूद की सप्लाई रोकने का आरोप लगाया.

व्हाइट हाउस अधिकारियों ने उन टिप्पणियों को 'परेशान करने वाला' और 'बेहद निराशाजनक' बताया था.

वॉशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट में अमेरिका-इसराइल संबंधों के विशेषज्ञ नातान सैक्स ने कहा, "अमेरिकी राष्ट्रपतियों के साथ उनके रिश्ते बेहद तनावपूर्ण रहे हैं."

सैक्स ने आगे कहा, "वह बेहद मुश्किल वार्ताकार हैं. सिर्फ़ इसलिए नहीं कि वह सख़्त हैं, बल्कि इसलिए भी कि वह बहुत ज़्यादा संदेह करते हैं."

ट्रंप इससे पहले भी नेतन्याहू को लेकर अपनी नाराज़गी जता चुके हैं. पिछले साल पत्रकारों के सामने कैमरे पर उन्होंने अपशब्द का इस्तेमाल किया था क्योंकि ईरान पर इसराइली हमलों ने तेहरान के साथ तथाकथित 12 दिन के युद्ध के अंत में हुए एक नाज़ुक युद्धविराम को ख़तरे में डाल दिया था.

हालांकि कुल मिलाकर दोनों के रिश्ते काफ़ी सकारात्मक रहे हैं. नेतन्याहू कई बार ट्रंप को अमेरिका के इतिहास में "इसराइल का सबसे बड़ा दोस्त" बता चुके हैं.

सैक्स ने कहा, "ट्रंप के रूप में उन्हें ऐसा व्यक्ति मिला जो मध्य पूर्व के मामलों को चलाने के पुराने ढांचे को तोड़ने के लिए तैयार था."

उन्होंने कहा, "मैं इसकी संभावना को ख़ारिज नहीं करूंगा. राष्ट्रपति पहले भी कई लोगों के बारे में अपनी राय बदल चुके हैं."

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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