असम में बाढ़ के दौरान दिखी हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल, मदद के लिए उठे कई हाथ - ग्राउंड रिपोर्ट
Auf einen Blick
असम के शिवसागर में आई भीषण बाढ़ के दौरान हिंदू और मुस्लिम समुदायों ने आपसी मतभेदों को भुलाकर एक-दूसरे की जान बचाई और गुरुद्वारों व मस्जिदों में शरण ली। सांप्रदायिक राजनीति के बावजूद, संकट के समय मानवीय एकता की एक नई मिसाल देखने को मिली है।
KI-generierte Zusammenfassung
Warum es wichtig ist
असम के शिवसागर जिले में जुलाई में आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई, जिससे हजारों लोग विस्थापित हुए। यह क्षेत्र हालिया विधानसभा चुनावों के दौरान सांप्रदायिक तनाव के लिए चर्चा में रहा था।
असम की 67 साल की मनोवारा बेगम शिवसागर गुरुद्वारा साहिब के एक हॉल के कोने में उदास बैठी हुई हैं.
उनके बगल में बैठी अमिया गोगोई उन्हें दिलासा देती दिख रही हैं. इसी गुरुद्वारे में अबुल कासिम और राजू प्रसाद अपने परिवार के साथ रह रहे हैं.
बाढ़ ने इन लोगों का सबकुछ तबाह कर दिया है लेकिन इस गुरुद्वारे की छत के नीचे धर्म और जात से परे अगर कुछ दिखाई दिया था तो वो था एक-दूसरे के प्रति सम्मान और मोहब्बत.
अबुल कासिम कहते हैं, "बाढ़ के पानी में घर डूबने के बाद मैं अपनी पत्नी और बच्चों को लेकर गुरुद्वारे में शरण लेने आ गया. मुझे न तो कोई डर लगा और न ही मेरे मन में कोई और विचार आया. इस मुश्किल समय में यहां हम सब लोग एक-दूसरे का ख्याल रख रहे हैं."
पिछले महीने असम में आई बाढ़ ने शिवसागर ज़िले भारी बर्बादी हुई. अब भले ही बारिश कम हो गई है और कई इलाकों से बाढ़ का पानी उतर गया है. लेकिन दोबारा बसने की जद्दोजहद ने बाढ़ पीड़ितों के सामने कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं.
सैकड़ों ऐसे परिवार हैं, जिन्हें अब पीने का पानी ठीक से नहीं मिल पा रहा.
अबुल के बगल में खड़े राजू प्रसाद कहते हैं, "यहां किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन हिंदू है और कौन मुसलमान. हम यहां गुरुद्वारे में भाई-भाई की तरह मिलकर रह रहे हैं."
शिवसागर शहर से बीबीसी की टीम जैसे-जैसे नेपाली खुटी गांव की तरफ आगे बढ़ी, रास्ते में जितने भी गांव मिले ज्यादातर के घरों में मलबा और कीचड़ भरा हुआ था.
बाढ़ के कारण विस्थापित हुए कई लोग आज भी अपने घर नहीं लौट पा रहे हैं. लेकिन इन मुश्किलों के बीच इलाके में इंसानियत की कई मिसालें भी देखने को मिल रही हैं.
जाति और धर्म से परे लोग एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं. बाढ़ पीड़ित न केवल एक साथ रह रहे हैं बल्कि हिंदुओं के पूजा स्थल में भरे मलबे को मुसलमान साफ कर रहे हैं तो मस्जिदों की सफाई हिंदू युवक करते दिख रहे हैं.
कई इलाकों से लोग मजदूरों को लेकर शिवसागर पहुंच रहे हैं ताकि अनके घरों से कीचड़ और मलबा साफ करवा सके.
यहां काम करने के लिए लाए जा रहे ज़्यादातर मजदूर बंगाली मूल के मुसलमान हैं, जिन्हें बोलचाल की भाषा में 'मियां' कहा जाता है.
महज चार महीने पहले अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान शिवसागर सांप्रदायिक राजनीति के कारण सुर्खियों में था. चुनाव से ठीक पहले शिवसागर ज़िले में 'मियां मुसलमानों' को खदेड़ने और पीटने की कई घटनाएं सामने आई थीं.
कुछ संगठनों ने जिले से मियां लोगों को खदेड़ने के लिए शहर में बड़े-बड़े होर्डिंग लगाए थे. परंतु इस बाढ़ में लोगों ने जिस कदर एक-दूसरे की जान बचाई और मदद की, उसने एक नई मिसाल पेश की है.
शिवसागर गुरुद्वारे की संचालन कमेटी के अध्यक्ष त्रिलोचन सिंह कहते हैं, "हमारे गुरुद्वारे में हर समुदाय के लोग ठहरे हुए हैं. हम जाति या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करते. बाढ़ ने यह दिखा दिया है कि वो किसी मजहब को देखकर तबाही नहीं लाती."
हालांकि शिवसागर शहर में प्रवेश करते ही असमिया भाषा में लिखा होर्डिंग दिख जाता है जिस पर इलाके से "मियां मुसलमानों" को बाहर निकालने और असम को बचाने का नारा लिखा है.
शिवसागर ज़िले के नेपाली खुटी गांव में बाढ़ ने सबसे ज्यादा तबाही मचाई है. इस गांव में प्रवेश करते ही पहला मकान पेशे से सरकारी शिक्षक उत्पल बरुआ का है. बाढ़ में भारी नुकसान झेल चुके बरुआ 19 जुलाई की शाम को याद कर रोने लगते हैं.
वो कहते हैं,"उस दिन पांच मिनट के अंदर पानी कमर तक आ गया था. घर में मेरे बुजुर्ग माता-पिता, पत्नी, छोटा बेटा और बहू थी. हम जब तक घर से निकलते पानी चारों तरफ तेजी से बढ़ गया था. कुछ मिनट बाद लगा कि अब हम में से कोई नहीं बचेगा."
"लेकिन मेरे नए घर पर काम कर रहे राजमिस्त्री नाज़िकुल अली ने समझदारी दिखाई. वह नए घर की छत से पानी में कूदे, कंस्ट्रक्शन के लिए लाए गए बांस इकट्ठा किए और उनकी मदद से सभी को एक-एक करके छत पर चढ़ाया. यह बहुत जोखिम भरा काम था, लेकिन नाज़िकुल ने हमारे परिवार को बचाने के लिए खुद को खतरे में डाला."
उत्पल बरुआ कहते हैं, "जो लोग हिंदू-मुस्लिम की बातें करते हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि संकट के समय एक इंसान ही दूसरे इंसान की मदद के लिए आगे आता है. मैं हिंदू हूं, फिर भी एक मुस्लिम ने ही मेरे परिवार की जान बचाई. नाज़िकुल हमारे लिए ईश्वर तुल्य है."
जब नाज़िकुल से यही सवाल पूछा तो उन्होंने कहा, "हिंदू-मुसलमान के नाम पर कौन क्या बातें करता है, उससे कुछ फर्क नहीं पड़ता. कोई भी इंसान आंखों के सामने किसी आदमी को मरने के लिए नहीं छोड़ सकता. मास्टर जी का परिवार मुसीबत में था, उस समय कौन हिंदू है,कौन मुसलमान है , यह बात कैसे कोई सोच सकता है? आदमी को बचाना है."
बाढ़ में घर डूब जाने के बाद फ़िरोज़ा बेगम और उनका परिवार कई दिनों से हिंदू पड़ोसी के मकान में रह रहा है.
फ़िरोज़ा बेगम कहती हैं,"घर में जब पानी भर गया तो हमारे पास जाने के लिए कोई जगह नहीं बची थी. यह बात जब हमारे पड़ोसी को पता चली तो उन्होंने हमारे परिवार को अपने घर पर रुकने की जगह दी."
बाढ़ वाले दिन मस्जिद की छत पर चढ़कर अपनी जान बचाने वाले गणेश महतो और दीनानाथ भी कुछ ऐसा ही कहते हैं.
19 जुलाई को गणेश महतो और दीनानाथ सोनटक के बाज़ार में सब्जियां और किराने का सामान बेचने गए थे. लेकिन शाम ढलने से पहले बाढ़ का पानी इतनी तेजी से आया कि वो अपना कोई सामान नहीं बचा सके.
गणेश महतो कहते हैं, "पानी तेज़ रफ्तार से बढ़ रहा था और बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा था. पास की मस्जिद के जुनाब ने ख़तरे को देखते हुए कहा कि मस्जिद में चलिए. जब तक हम मस्जिद की तीन मंजिला छत पर गए, सड़क पर पानी 8-10 फीट ऊंचाई तक आ गया था. अगर मस्जिद में नहीं गए होते तो आज जिंदा नहीं होते."
मस्जिद के इमाम रियाजुर रहमान कहते है, "इंसान की जान बचाना फ़र्ज़ है. चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान हो. इसलिए उस रोज जब लोग बाढ़ के पानी में घिर गए तो मैंने उन सभी को मस्जिद में आने के लिए कहा."
करीब साढ़े 13 लाख आबादी वाले शिवसागर ज़िले में जब से बाढ़ आई है, देशभर से लोग मदद के लिए आए हैं. फिर चाहे सिख समुदाय के संगठन हों या जमीयत उलेमा-ए-हिंद.
जो संगठन कुछ महीनों पहले तक मियां मुसलमानों के ख़िलाफ़ थे, वे भी अब एक दूसरे की मदद के लिए ज़मीन पर काम करते दिख रहे हैं.
जातीय संग्रामी सेना के केंद्रीय अध्यक्ष सीटू बरुआ ने बाढ़ के बाद 30 जुलाई को कहा, "बाढ़ हिंदू-मुसलमान नहीं देखती. संकट के इस समय में, जमीयत उलेमा-ए-हिंद समेत कई मुस्लिम संगठन हमारी मदद के लिए आगे आए हैं."
उन्होंने आगे कहा, "यह हिंदू-मुस्लिम या असमिया-गैर असमिया जैसी बातें करने का समय नहीं है. संकट के इस समय में धर्म-जाति से परे हम सबको एक साथ हाथ पकड़कर आगे बढ़ने की ज़रूरत है."
Offene Fragen
- बाढ़ प्रभावितों के पुनर्वास के लिए सरकारी सहायता की स्थिति क्या है?
- क्या सांप्रदायिक संगठनों का रुख दीर्घकालिक रूप से बदलेगा?



