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कॉकरोच जनता पार्टी का प्रोटेस्ट, अन्ना आंदोलन से कितना अलग?
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BBC हिंदीvor 1 StundePolitik5 Min. LesezeitIndia

कॉकरोच जनता पार्टी का प्रोटेस्ट, अन्ना आंदोलन से कितना अलग?

Auf einen Blick

2026 नीट परीक्षा पेपर लीक मामले पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने जंतर-मंतर पर आंदोलन शुरू किया, जिसमें सोनम वांगचुक भी शामिल हुए। यह प्रदर्शन 2011 के अन्ना आंदोलन से अलग है क्योंकि इसमें युवाओं की भागीदारी अधिक है, सरकार का रुख दमनकारी है, और मीडिया कवरेज में 'गोदी मीडिया' बनाम स्वतंत्र मीडिया का विभाजन देखा जा रहा है।

KI-generierte Zusammenfassung

Warum es wichtig ist

2026 नीट परीक्षा पेपर लीक मामले पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने जंतर-मंतर पर आंदोलन शुरू किया, जिसकी तुलना 2011 के अन्ना आंदोलन से की जा रही है।

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दिल्ली का जंतर-मंतर सिर्फ़ एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विरोध की सबसे अहम ज़गहों में से एक रहा है. सालों से यह जगह सत्ता के ख़िलाफ़ उठने वाली आवाज़ों, जन आंदोलनों और बदलाव की मांगों की गवाह रही है.

अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर किसानों, छात्रों और कर्मचारियों के प्रदर्शन तक जंतर-मंतर ने भारतीय लोकतंत्र के कई निर्णायक क्षण देखे हैं.

साल 2026 में नीट परीक्षा पेपर लीक के मामले पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने यहां आंदोलन शुरू किया. 28 जून को वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने यहीं पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी. बड़ी संख्या में छात्र और युवा इस प्रदर्शन का हिस्सा बने.

बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए शासन के दौरान चल रहे इस प्रोटेस्ट की तुलना अब कई राजनीतिक विश्लेषक 2011 के उस अन्ना आंदोलन से कर रहे हैं, जिसने तत्कालीन कांग्रेस सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया था.

दोनों आंदोलनों के मुद्दे अलग हैं, राजनीतिक परिस्थितियां भी अलग हैं, लेकिन सवाल एक जैसा है. क्या यह आंदोलन भी वैसा ही राजनीतिक असर पैदा कर पाएगा जैसा अन्ना आंदोलन ने किया था?

सीजेपी प्रोटेस्ट, अन्ना आंदोलन से कितना अलग?

इन्हीं सवालों पर हमने उन लोगों से बात की, जिन्होंने अन्ना आंदोलन को क़रीब से कवर किया था.

सीजेपी प्रोटेस्ट, अन्ना आंदोलन से कितना अलग है इस पर वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता कहते हैं, "किसी भी आंदोलन के पीछे एक संगठन होता है. जब कॉकरोच जनता पार्टी का गठन इंटरनेट पर हुआ तो ज़्यादातर ने इसे मज़ाक की तरह लिया गया, ख़ासतौर पर सरकार ने. सरकार को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि यह आंदोलन अन्ना आंदोलन से भी बड़ा बन जाएगा."

वह कहते हैं, "यह आंदोलन अन्ना आंदोलन से बड़ा इसलिए भी है क्योंकि यह स्वयं चल रहा है. 20 जुलाई को जितने लोग यहां आए थे, वह भी अपने आप में एक रिकॉर्ड था."

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव कहते हैं, "अन्ना आंदोलन में रिस्क नहीं था, लोग बच्चों को लेकर वहां पर पिकनिक की तरह जाते थे. आज जो लोग आ रहे हैं, वे अपनी प्रोफ़ाइलिंग और नौकरी खोने का बड़ा रिस्क लेकर आ रहे हैं. अन्ना आंदोलन के समय मीडिया सरकार के ख़िलाफ़ दहाड़ता था."

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश केजरीवाल कहते हैं, "उस समय भी लोगों के पास एक इमोशनल ट्रिगर था कि एक बुज़ुर्ग व्यक्ति अनशन पर बैठा है, कहीं कुछ हो न जाए. वही इमोशनल ट्रिगर इस बार भी है."

"अन्ना आंदोलन के समय लोगों में भ्रष्टाचार को लेकर रोष तो था, लेकिन तब लोगों को यह समझ नहीं आ रहा था कि एक कानून के लिए इतना बड़ा आंदोलन खड़ा हो जाएगा."

शरद गुप्ता कहते हैं, "अन्ना आंदोलन काफ़ी संगठित था लेकिन सीजेपी का यह आंदोलन उससे भी बड़ा है और मोदी सरकार के लिए ख़तरे की घंटी है."

सरकार का रुख़ कितना अलग?

शरद गुप्ता कहते हैं, "यहां जो लाठी चार्ज हुआ वैसा अन्ना आंदोलन में कभी नहीं हुआ था. यहां पर सरकार ने शुरू से ही इसे नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की और बाद में लाठी चार्ज किया. यानी सरकार ने दो तरीके अपनाए, पहले इग्नोर किया और फिर दमन."

"अन्ना आंदोलन में ऐसा नहीं था. वहां सरकार ने पहले दिन से ही बातचीत और संपर्क बनाने की कोशिश की थी."

वह आगे कहते हैं, "अन्ना आंदोलन के समय सरकार ने तुरंत प्रतिक्रिया दी थी. कानून बनाने के लिए बातचीत शुरू कर दी गई थी. उस समय मंत्री खुद धरना स्थल पर आकर अरविंद केजरीवाल और अन्ना हज़ारे से बातचीत कर रहे थे."

शरद गुप्ता कहते हैं, "अन्ना आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश नहीं की गई थी, लेकिन यहां पहले दिन से ही आंदोलनकारियों का बैकग्राउंड, फंडिंग और दूसरे सवाल उठाकर उन्हें बदनाम करने की कोशिश की जा रही है."

योगेंद्र यादव कहते हैं, "बच्चों ने शिकायत की सरकार ने सुनी नहीं. उन्होंने सोचा कि जंतर-मंतर पर बैठा दो, 10 मिनट में हवा निकल जाएगी, मीडिया को इशारा कर देंगे कोई रिपोर्ट नहीं करेगा. यह बिल्कुल क्लासिक तानाशाह की चालाकी और अहंकार है."

दोनों आंदोलनों से लोगों के जुड़ाव में कितना अंतर?

साल 2011 में जब अन्ना आंदोलन शुरू हुआ था, तब उसकी सबसे बड़ी ताकत युवा थे, जो तेज़ी से सरकार के ख़िलाफ़ उस आंदोलन से जुड़ रहे थे. सीजेपी के इस प्रोटेस्ट में भी सबसे बड़ी भागीदारी युवाओं की ही है.

हालांकि उस समय सोशल मीडिया का रोल उतना नहीं था, जितना आज है . इस बार सीजेपी के साथ ग्राउंड पर मौजूद युवाओं के अलावा बड़ी संख्या में लोग ऑनलाइन भी प्रोटेस्ट का समर्थन करते हुए दिख रहे हैं.

सीजेपी प्रोटेस्ट से लोगों के जुड़ाव पर वरिष्ठ पत्रकार मुकेश केजरीवाल कहते हैं, "जैसे यहां युवाओं की भीड़ दिखाई दे रही है, वैसा ही माहौल अन्ना आंदोलन में भी था. आज भी युवाओं में वही ऊर्जा दिख रही है, लेकिन इस बार उसका स्केल कहीं ज़्यादा बड़ा है."

वह आगे कहते हैं, "सबसे बड़ा बदलाव महिलाओं की बढ़ी हुई भागीदारी है. यहां युवाओं का जो जोश और जज़्बा है, उसकी अन्ना आंदोलन से सीधी तुलना करना बहुत मुश्किल है."

मुकेश केजरीवाल कहते हैं, "भारत के इतिहास में यह पहला मौका है, जब शिक्षा के मुद्दे पर बिना किसी मज़बूत संगठन के इतनी बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर आए हैं."

अन्ना आंदोलन और सीजेपी प्रोटेस्ट को कवर करने में मीडिया की भूमिका

20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी के 'चलो संसद' मार्च के दौरान जिस तरह दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई की और स्टूडेंट्स पर लाठीचार्ज किया गया उसे लेकर देशभर में रोष देखने को मिला.

इसके अलावा जिस एक और मुद्दे पर लोगों ने नाराज़गी जताई वह था मेनस्ट्रीम मीडिया का इस प्रोटेस्ट को कवर करने का तरीका. यह नाराज़गी सिर्फ़ आम लोगों तक सीमित नहीं रही, बल्कि कई पूर्व और वरिष्ठ पत्रकारों ने भी मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाए.

अन्ना आंदोलन और सीजेपी प्रोटेस्ट की मीडिया कवरेज पर वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता कहते हैं, "उस समय मीडिया ने अन्ना आंदोलन का खुलकर समर्थन किया था. मीडिया 24 घंटे आंदोलन स्थल पर मौजूद रहता था. मीडिया के लोग एक तरह से अन्ना आंदोलन के कार्यकर्ता बन गए थे. टीवी पर 24 घंटे अन्ना आंदोलन के अलावा कुछ और चलता ही नहीं था."

वह कहते हैं, "लेकिन सीजेपी प्रोटेस्ट में ऐसा कुछ नहीं है. मीडिया बैरिकेड के पास जहां पुलिस खड़ी होती है वहां खड़ी दिखाई देती है. मीडिया एम्बेडेड मीडिया बन गया है. वहीं यूट्यूब चैनल वाले लोग जनता के बीच जाकर उनसे बात कर रहे हैं. इसलिए आज दो तरह का मीडिया साफ़ दिखाई देता है एक, जिसे कुछ लोग 'गोदी मीडिया' कहते हैं और दूसरा स्वतंत्र मीडिया."

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव कहते हैं, "सीजेपी प्रोटेस्ट में सरकार ने मीडिया को तो कंट्रोल कर लिया लेकिन ये भूल गए कि आंदोलन अपने आप मीडिया बन जाता है. इन्होंने सोचा सोनम वांगचुक को उठा लो तो आंदोलन बिखर जाएगा, लेकिन हुआ बिलकुल उल्टा. दिल्ली पुलिस से ठुकवा दिया, तो जो असंतोष थोड़ा था वो और बड़ा बन गया."

शरद गुप्ता कहते हैं, "पिछले 15 वर्षों में मीडिया बहुत बदल गया है. पहले मीडिया इतना मजबूर नहीं था. वह स्वतंत्र था और किसी के भी ख़िलाफ़ ख़बर चला सकता था. सवाल सत्ता से पूछे जाते हैं, आंदोलनकारियों से नहीं लेकिन यहां मीडिया सत्ता से सवाल पूछने के बजाय आंदोलनकारियों से सवाल पूछ रहा है."

Offene Fragen

  • क्या यह आंदोलन अन्ना आंदोलन जैसा राजनीतिक असर पैदा कर पाएगा?
  • सरकार का अगला कदम क्या होगा?
  • मीडिया कवरेज का आंदोलन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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