विदेश में पढ़ाई का सपना: रुपये की गिरावट और वीज़ा सख़्ती से भारतीय छात्रों की चुनौतियाँ
Auf einen Blick
रुपये की क़ीमत में गिरावट, घटते रोज़गार के अवसर और कड़े वीज़ा नियमों के कारण विदेश में पढ़ाई करने वाले लाखों भारतीय छात्रों को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कई छात्र अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं और कुछ ने अपने प्लान बदल दिए हैं।
KI-generierte Zusammenfassung
Warum es wichtig ist
कई साल तक सोच-विचार और तैयारी करने के बाद भी रुपये की गिरावट और वीज़ा सख़्ती के कारण लाखों भारतीय छात्रों को विदेश में पढ़ाई के अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करना पड़ रहा है। यह स्थिति उन पर वित्तीय और मानसिक दबाव डाल रही है।
कई साल तक सोच-विचार और तैयारी करने के बाद झारखंड की 29 साल की कंटेंट क्रिएटर प्रगति प्रिया ने आख़िरकार इस साल विदेश जाकर पढ़ाई करने का फ़ैसला किया।
सितंबर से वह रोम की एक यूनिवर्सिटी में ग्लोबल इकोनॉमिक अफे़यर्स की पढ़ाई शुरू करेंगी। उन्हें उम्मीद है कि यह डिग्री यूरोप में उनके लिए बेहतर करियर के नए रास्ते खोलेगी।
प्रगति अपने भविष्य को लेकर उत्साहित हैं, लेकिन मन में एक डर भी है। डर इस बात का कि क्या विदेश जाकर पढ़ाई करना सही फ़ैसला है?
पिछले कुछ महीनों में यूरो समेत कई विदेशी मुद्राओं के मुकाबले रुपये की क़ीमत तेज़ी से गिरी है। इसका सीधा असर प्रगति प्रिया और उन जैसे स्टूडेंट्स की जेब पर पड़ा है। उन्होंने अपनी पढ़ाई के लिए जितनी रकम का अनुमान लगाया था और क़र्ज़ लेने का सोचा था, अब वो रकम काफी बढ़ गई है।
बीबीसी से फ़ोन पर बातचीत में प्रगति कहती हैं, "यह सोचकर-सोचकर मैं कई दिनों से सो नहीं पा रही हूं। मैं ऐसा एजुकेशन लोन नहीं लेना चाहती जिसे चुकाते-चुकाते पूरी ज़िंदगी ही निकल जाए।"
यह चिंता सिर्फ़ प्रगति की नहीं है। यह उन लाखों मध्यमवर्गीय भारतीय स्टूडेंट्स की कहानी है जो हर साल बेहतर शिक्षा और भविष्य की उम्मीद में यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया का रुख़ करते हैं।
साल 2025 में 12 लाख से अधिक भारतीय स्टूडेंट्स विदेशों में उच्च शिक्षा हासिल कर रहे थे। इस मामले में भारत ने चीन को भी पीछे छोड़ दिया है।
लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। कमज़ोर होता रुपया, अमेरिका और यूरोप में घटते रोज़गार के अवसर, कड़े होते वीज़ा नियम और इमिग्रेशन पर बढ़ती सख़्ती ने कई स्टूडेंट्स को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या विदेश में पढ़ाई के लिए भारी कर्ज़ लेना वाकई सही फ़ैसला है?
वीज़ा नियमों की सख़्ती का असर
प्रगति बताती हैं, "एक ऐसा समय भी आया, जब मैंने विदेश जाकर पढ़ाई करने के बारे में सोचना छोड़ दिया था, लेकिन मेरे माता-पिता और बहन ने भरोसा दिलाया कि वे हर क़दम पर मेरा साथ देंगे। शायद इसी वजह से मैं यह जोखिम उठा पा रही हूं।"
हालांकि हर स्टूडेंट इतना खुशकिस्मत नहीं होता।
यही वजह है कि आने वाले सितंबर सत्र के लिए कई विश्वविद्यालयों में दाखिले की संख्या घटती हुई दिखाई दे रही है।
हर साल हज़ारों भारतीय स्टूडेंट्स को विदेशी यूनिवर्सिटीज़ में एडमिशन दिलाने में मदद करने वाली कंपनी एडवाइज़ इंटरनेशनल के संस्थापक सुशील सुखवानी कहते हैं, "बाज़ार में साफ़तौर पर सुस्ती के संकेत दिख रहे हैं।"
वे कहते हैं, "पिछले दो सालों में यूके और अमेरिका में भारतीय स्टूडेंट्स के एडमिशन में करीब 20 फ़ीसद की गिरावट आ चुकी है। आने वाले समय में इसमें 10 से 15 फ़ीसद और कमी आ सकती है।"
वीज़ा नियमों की सख़्ती का असर भी साफ़ दिखाई दे रहा है। यूके में 76 फ़ीसद विश्वविद्यालयों ने जनवरी सत्र में भारतीय स्टूडेंट्स की संख्या घटने की बात कही है।
वहीं अमेरिका में फरवरी 2025 से फरवरी 2026 के बीच भारतीय स्टूडेंट्स के एडमिशन में लगभग सात फ़ीसद की कमी दर्ज की गई है।
रुपये की गिरावट ने न सिर्फ़ विदेश जाने की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स की मुश्किलें बढ़ाई हैं, बल्कि उन स्टूडेंट्स पर भी असर डाला है जो पहले से विदेश में पढ़ रहे हैं।
सुशील सुखवानी कहते हैं, "कई स्टूडेंट्स ने अपनी फ़ीस का एक हिस्सा पहले ही जमा कर दिया था, लेकिन अब कमज़ोर होते रुपये के कारण उन्हें आगे की फ़ीस भरने के लिए अतिरिक्त फ़ंड का इंतज़ाम करना पड़ रहा है या फिर अपने पुराने लोन को दोबारा व्यवस्थित करना पड़ रहा है।"
जो स्टूडेंट्स विदेश में नौकरी पाने में सफल रहे हैं, उनकी आमदनी ज़रूर बढ़ी है, लेकिन बहुत से अंतरराष्ट्रीय स्टूडेंट्स के लिए पढ़ाई के बाद अच्छा करियर बना पाना पहले की तुलना में कहीं ज़्यादा मुश्किल हो गया है।
वॉशिंगटन स्थित नॉर्थ अमेरिका एसोसिएशन ऑफ़ इंडियन स्टूडेंट्स के संस्थापक सुधांशु कौशिक कहते हैं, " स्टूडेंट्स यह सोचकर विदेश आते हैं कि उन्हें अपनी पढ़ाई के मुताबिक़ अच्छी नौकरी मिलेगी, लेकिन कई बार उन्हें गिग इकॉनमी यानी अस्थायी कामों तक ही सीमित रहना पड़ता है।"
वह कहते हैं, "पहले ऐसे कामों से पढ़ाई का ख़र्च निकालने में मदद मिलती थी लेकिन अब कई स्टूडेंट्स डिग्री पूरी करने के बाद नौकरी की तरह ही इन्हीं कामों को कर रहे हैं।"
उनका मानना है कि इससे भारतीय उच्च-मध्यम वर्गीय परिवारों की जोखिम उठाने की क्षमता प्रभावित हो रही है। खासकर तब, जब विदेश में पढ़ाई पहले से कहीं ज्यादा महंगी हो चुकी है। हालांकि फिर भी विदेश में पढ़ाई का रोमांच अभी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ है।
नए देशों की ओर बढ़ता फ़ोकस
ग्लोबल स्टूडेंट फ़्लोज़ रिपोर्ट 2026 के अनुसार, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया को अक्सर 'बिग फ़ोर' कहा जाता है और इस 'बिग फ़ोर' में भारतीय स्टूडेंट्स के एडमिशन में 2030 तक हर साल औसतन 0.5 फ़ीसद की गिरावट का अनुमान है।
इसके साथ ही दूसरे देशों की ओर छात्र-छात्राओं का रुझान बढ़ रहा है।
स्टूडेंट अकोमोडेशन प्लेटफॉर्म यूनिवर्सिटी लिविंग के सह-संस्थापक और सीओओ मयंक माहेश्वरी कहते हैं, "जर्मनी, आयरलैंड, इटली और यूरोप के कई अन्य देश भारतीय स्टूडेंट्स को तेज़ी से आकर्षित कर रहे हैं। इसकी वजह कम ट्यूशन फ़ीस, पढ़ाई के बाद काम करने के बेहतर अवसर और मज़बूत रोज़गार बाज़ार है।"
सुशील सुखवानी भी बताते हैं कि स्टूडेंट्स की बढ़ती दिलचस्पी को देखते हुए उनकी कंपनी ने अपना फ़ोकस इन नए देशों की तरफ बढ़ा दिया है।
प्रगति के लिए भी इटली चुनने की सबसे बड़ी वजह ख़र्च था। जहां उनकी ट्यूशन फ़ीस ब्रिटेन के मुकाबले लगभग आधी है।
वहीं अमेरिका उनके लिए विकल्प ही नहीं था, क्योंकि वहां वही डिग्री पूरी करने में दो साल लगते, जबकि रोम में यह कोर्स सिर्फ़ एक साल का है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों के लिए चिंता का विषय है क्योंकि इन देशों ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नाम बनाने के लिए दशकों से कड़ी मेहनत की है।
सुधांशु कौशिक कहते हैं, "कमज़ोर होता रुपया,जॉब मार्केट, एआई का बढ़ता प्रभाव, वीज़ा से जुड़ी परेशानियां और मौजूदा ट्रंप प्रशासन की नीतियों ने मिलकर एक ऐसा संकट पैदा कर दिया है जिसमें किसी का फ़ायदा नहीं है।"
Worauf zu achten ist
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'बिग फ़ोर' (अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया) में भारतीय छात्रों के एडमिशन में 2030 तक हर साल औसतन 0.5 फ़ीसद की गिरावट का अनुमान है।
Wahrscheinlich · Innerhalb von Jahren
यूके और अमेरिका में भारतीय स्टूडेंट्स के एडमिशन में आने वाले समय में 10 से 15 फ़ीसद और कमी आ सकती है।
Wahrscheinlich · Innerhalb von Monaten
Offene Fragen
- क्या विदेशी विश्वविद्यालयों में दाखिले की संख्या में और गिरावट आएगी?
- क्या गंतव्य देशों की सरकारें वीज़ा नियमों में ढील देंगी?
- रुपये की क़ीमत में स्थिरता कब तक आएगी?


