संसद में हंगामा: बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने, एफ़सीआरए बिल पर बढ़ा विवाद
संसद के मकर द्वार के बाहर सत्ता पक्ष और विपक्ष के सांसदों ने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी की। मानसून सत्र में गतिरोध जारी है।
Auf einen Blick
संसद भवन के मकर द्वार के बाहर सत्ता पक्ष और विपक्ष के सांसदों ने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी की। विपक्ष गृह मंत्री अमित शाह से दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर स्पष्टीकरण और राम मंदिर चंदे में गबन पर चर्चा की मांग कर रहा है, जबकि एफ़सीआरए संशोधन विधेयक को लेकर भी तीखा विवाद छिड़ गया है।
KI-generierte Zusammenfassung
Warum es wichtig ist
संसद के मानसून सत्र में विभिन्न मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लगातार गतिरोध बना हुआ है। एफ़सीआरए संशोधन विधेयक और छात्र प्रदर्शन जैसे मुद्दों पर तीखा विरोध देखने को मिल रहा है।
संसद के बाहर और भीतर दोनों जगह बीजेपी-कांग्रेस आमने-सामने हैं. मंगलवार को संसद भवन के मुख्य द्वारों में से एक मकर द्वार के ठीक बाहर एक अजीब सी स्थिति देखने को मिली.
सत्ता पक्ष और विपक्ष के सांसद एक साथ खड़े हैं एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी कर रहे हैं. सुरक्षाकर्मी भी पूरे घटनाक्रम को खड़े होकर देख रहे हैं.
सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियों के सांसदों की भीड़ है और दोनों आपस में एक दूसरे के ख़िलाफ़ नारे लगा रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि कभी भी हाथापाई की स्थिति आ सकती है.
इसका वीडियो क्लिप पोस्ट करते हुए वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने लिखा है कि 1990 के दशक की शुरुआत से संसद की रिपोर्टिंग करते हुए, संसद परिसर में सत्तापक्ष और विपक्षी सांसदों के बीच लगभग हाथापाई जैसी स्थिति की ये तस्वीरें देखकर मैं बेहद निराश हूँ.
राजदीप सरदेसाई ने लिखा है, ''ऐसा तब होता है जब राजनीति ज़रूरत से ज्यादा ध्रुवीकृत और दलगत हो जाती है. सेंट्रल हॉल जो कभी विभिन्न दलों के बीच वास्तविक बातचीत का शानदार मंच हुआ करता था, बंद कर दिया गया है. कोविड के दौर में लिया गया यह बेहद ग़लत फ़ैसला है, जिसे जल्द से जल्द वापस लिया जाना चाहिए.''
राजदीप सरदेसाई ने लिखा है, ''सत्तारूढ़ दल संसद को सिर्फ़ नोटिस बोर्ड की तरह इस्तेमाल करता है जबकि विपक्ष सदन को अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने का एकमात्र मंच मान लेता है. सांसद पूरी बेख़ौफ़ी से एक पाले से दूसरे पाले में चले जाते हैं, सिर्फ़ इसलिए कि वे सत्ता के सही पक्ष में बने रहें. बहुत कम सांसद संसदीय कामकाज़ की कड़ी मेहनत करने के इच्छुक हैं. संसद सिर्फ़ एक-दूसरे पर चिल्लाने के बारे में नहीं है. यह एक-दूसरे से बातचीत करने के बारे में भी है.''
क्या हैं मांगें?
विपक्ष की दो मांगें हैं: गृह मंत्री अमित शाह संसद में आकर दिल्ली में छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कार्रवाई को लेकर स्पष्टीकरण दें और अयोध्या में राम मंदिर के चंदे में गबन के मुद्दे पर चर्चा कराई जाए.
इसके जवाब में सत्तारूढ़ दल के सांसदों ने भी प्रदर्शन किया. उन्होंने राहुल गांधी पर चर्चा से भागने और दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया. उनका कहना था कि झारखंड में, जहाँ कांग्रेस हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार में जूनियर पार्टनर है, पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर लाठीचार्ज किया.
सरकार दिल्ली में छात्रों के ख़िलाफ़ पुलिस की सख़्ती पर बहस और गृह मंत्री अमित शाह के जवाब को लेकर तैयार हो गई है. इसके बावजूद संसद में तीन सप्ताह से अधिक समय से चला आ रहा गतिरोध ख़त्म नहीं हो सका. कांग्रेस की मांग है कि अयोध्या में राम मंदिर के चंदे में चोरी पर होने वाली चर्चा का जवाब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दें.
मॉनसून सत्र के अब सिर्फ़ तीन दिन बचे हैं और संसद में जारी गतिरोध के बीच महिला आरक्षण, परिसीमन और विदेशी एफ़सीआरए से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयकों का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है.
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि अमित शाह विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हैं, बशर्ते सदन की कार्यवाही बिना किसी व्यवधान के चलने दी जाए.
इसके जवाब में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि विपक्ष अमित शाह की राय सुनने में दिलचस्पी नहीं रखता, बल्कि वह सिर्फ़ यह जवाब चाहता है कि पुलिस की कार्रवाई के पीछे कौन था. मॉनसून सत्र आख़िरी सप्ताह में प्रवेश कर चुका है.
कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा ने किरेन रिजिजू की पेशकश पर कहा, ''विपक्ष जो सवाल पूछ रहा है, वह बिल्कुल सीधा है. क्या अमित शाह ने हमारे बच्चों पर गोली चलाने का आदेश दिया था? इसका जवाब सिर्फ़ एक शब्द में चाहिए: हाँ या नहीं.''
''20 जुलाई से अमित शाह के भाषण को तैयार करने में उनके भाषण लेखक को 21 दिन लग गए. इस अच्छी तरह से तैयार किए गए बयान की किसी को परवाह नहीं है. उनके पास आरएसएस की शाखा में पहले से ही एक बंधुआ दर्शक हैं. वह अपना बयान वहाँ दे सकते हैं.''
विपक्ष के सवाल
मंगलवार को प्रियंका गांधी संसद पहुंचीं, उस समय बीजेपी सांसद मुकेश दलाल कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ख़िलाफ़ नारे लगा रहे थे, "शर्म करो, शर्म करो, राहुल गांधी, शर्म करो."
प्रियंका गांधी ने मुस्कुराते हुए, राहुल गांधी के पास से गुज़रते हुए प्रदर्शन कर रहे बीजेपी सांसद से कहा, "राहुल गांधी झारखंड में प्रदर्शन कर रहे छात्रों से पहले ही मिल चुके हैं."
पत्रकारों से बात करते हुए प्रियंका गांधी ने कहा कि विपक्ष ने सरकार के सांसदों को प्रदर्शन करने के लिए मजबूर कर दिया है.
उन्होंने कहा, "यह पहली बार है, जब हमने सरकार के सांसदों को प्रदर्शन करते देखा है. हमने उन्हें इस हद तक ऐसा करने के लिए मजबूर कर दिया है. अब उन्हें सामने आकर बयान देने दीजिए."
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा सांसद शशि थरूर ने संसद में सरकार के रुख़ पर सवाल उठाया है. शशि थरूर ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा है, ''राष्ट्रपति ने संसद में बिना चर्चा के पारित किए गए वंदे मातरम् संशोधन को मंज़ूरी दे दी है. इसके तहत राष्ट्रगान के अलावा किसी भी आधिकारिक समारोह की शुरुआत और समापन पर पूरा राष्ट्रगीत गाना अनिवार्य होगा.''
''मैं दोनों का बहुत सम्मान करता हूँ और राष्ट्रगीत के पहले दो अंतरे (लेकिन बाकी चार नहीं, क्योंकि अब तक उन्हें गाने की ज़रूरत नहीं थी) और पूरा राष्ट्रगान गा सकता हूँ. फिर भी मैं सिर्फ़ एक व्यावहारिक बात की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूँ, जिसे हमारे अति उत्साही लोग नज़रअंदाज करते दिख रहे हैं: मानवीय स्वभाव.
"जन गण मन" के दौरान लोगों को सम्मानपूर्वक खड़े होकर लगभग 52 सेकंड तक अपना ध्यान केंद्रित रखना होता है. वहीं, पूरे राष्ट्रगीत को गाने में 3 मिनट 10 सेकंड लगते हैं. तमिलनाडु ने अभी तय किया है कि दोनों से पहले तमिल में राज्य गीत भी गाया जाएगा, जिसमें दो मिनट और लगेंगे.
क्या हम वास्तव में यह उम्मीद करते हैं कि लोग हर समारोह से पहले और बाद में छह मिनट तक शांत और सम्मानपूर्वक खड़े रहेंगे, यानी कुल मिलाकर 12 अतिरिक्त मिनट?
क्या सम्मान और धैर्य को क़ानून बनाकर लागू किया जा सकता है?
मुझे डर है कि इस बिल का मक़सद राष्ट्रगीत के प्रति अधिक सम्मान पैदा करना पूरा नहीं होगा, बल्कि इसका उलटा ज़रूर हो सकता है.''
एफ़सीआरए बिल को लेकर विवाद
एफ़सीआरए बिल को लेकर भी सरकार और विपक्ष आमने-सामने हैं. इस बिल का मक़सद विदेशी फंडिंग हासिल करने वाले संगठनों की निगरानी को काफ़ी सख़्त करना है. इसमें एक नई शक्तिशाली अथॉरिटी बनाने का प्रस्ताव है, जिसे उन एनजीओ की संपत्तियां जब्त करने और उनका प्रबंधन करने का अधिकार होगा, जिनका लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है. इस बिल का राजनीतिक दलों के अलावा ईसाई संगठनों ने भी कड़ा विरोध किया है.
20 जुलाई से शुरू हुए मॉनसून सत्र में बार-बार सदन की कार्यवाही स्थगित हुई है और लगभग कोई कामकाज़ नहीं हो पाया है. हालांकि, सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा हुई, जिसे संसद के दोनों सदनों ने पारित कर दिया.
विपक्ष के लगातार विरोध के बीच दोनों सदनों में तीन और विधेयक बहुत कम या बिना चर्चा के पारित किए गए, जबकि दो अन्य विधेयक लोकसभा ने पारित किए.
मंगलवार को देश के अलग-अलग हिस्सों से फॉरन कंट्रीब्यूशन (रेग्युलेशन) संशोधन विधेयक, 2026 को वापस लेने की मांग उठी. इनमें तमिलनाडु विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव और मिजोरम की राजधानी में बड़े पैमाने पर हुए विरोध प्रदर्शन भी शामिल हैं.
द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक़ केंद्र सरकार ने अपने सहयोगी दलों और अन्य पार्टियों को जानकारी दी कि वह बुधवार को लोकसभा में एक प्रस्ताव लाएगी, जिसके ज़रिए बिल को संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी के पास भेजा जाएगा.
तमिलनाडु के मंत्री राजमोहन ने विधेयक को मौजूदा स्वरूप में वापस लेने की मांग वाला प्रस्ताव पेश करते हुए कहा कि विधानसभा उन प्रावधानों को लेकर गंभीर रूप से चिंतित है, जिनके तहत एफ़सीआरए रजिस्ट्रेशन की अवधि समाप्त होने, उसका नवीनीकरण न होने या नवीनीकरण से इनकार किए जाने, रजिस्ट्रेशन रद्द होने या रजिस्ट्रेशन वापस लेने की स्थिति में धार्मिक संगठनों की संपत्तियों को सरकार को हस्तांतरित करने, उनका प्रबंधन करने और उन्हें बेचने का प्रावधान है.
प्रस्ताव में कहा गया, "ये प्रावधान धार्मिक संगठनों की स्वायत्तता के ख़िलाफ़ प्रभाव डाल सकते हैं और विशेष रूप से अल्पसंख्यक समुदायों की ओर से संचालित शैक्षणिक एवं सामाजिक कल्याण संस्थानों के कामकाज़ को प्रभावित कर सकते हैं."
Worauf zu achten ist
KI-Ausblick — Möglichkeiten, keine Fakten
बुधवार को लोकसभा में एफ़सीआरए बिल को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजने का प्रस्ताव लाया जाएगा।
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Offene Fragen
- क्या एफ़सीआरए बिल को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा जाएगा?
- क्या संसद के शेष दिनों में गतिरोध समाप्त हो पाएगा?



