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अमेरिका-ईरान समझौते में पाकिस्तान की बढ़ी अहमियत, क्या भारत के लिए है इसमें कोई सबक?
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अमेरिका-ईरान समझौते में पाकिस्तान की बढ़ी अहमियत, क्या भारत के लिए है इसमें कोई सबक?

Auf einen Blick

अमेरिका-ईरान तनाव के बाद संघर्ष विराम और बातचीत की दिशा में हुई प्रगति ने मध्य पूर्व में स्थिरता की उम्मीद बढ़ाई है. पाकिस्तान की मध्यस्थता से उसकी कूटनीतिक स्थिति मज़बूत हुई है, जो भारत के लिए क्षेत्रीय रणनीति पर पुनर्विचार का संकेत है.

KI-generierte Zusammenfassung

Warum es wichtig ist

अमेरिका-ईरान तनाव के बाद संघर्ष विराम और बातचीत की दिशा में हुई प्रगति ने मध्य पूर्व में स्थिरता की उम्मीद बढ़ा दी है. इस संघर्ष का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर पड़ रहा था.

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अमेरिका-ईरान समझौते में पाकिस्तान की बढ़ी अहमियत, क्या भारत के लिए है इसमें कोई सबक- द लेंस

प्रकाशित 3 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 9 मिनट

पिछले कई महीनों से जारी अमेरिका-ईरान तनाव के बाद दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम और बातचीत की दिशा में हुई प्रगति ने मध्य पूर्व में स्थिरता की उम्मीद बढ़ा दी है.

इस संघर्ष का असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं था, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर भी पड़ रहा था.

ख़ास तौर पर होर्मुज़ स्ट्रेट को लेकर चिंता बढ़ गई थी, क्योंकि दुनिया की ऊर्जा ज़रूरतें पूरी करने में इस मार्ग की अहम भूमिका रही है. अब उसके सामान्य संचालन की संभावना से तेल बाज़ारों में राहत की उम्मीद जगी है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि समझौते के बाद होर्मुज़ स्ट्रेट में समुद्री यातायात जल्द सामान्य होगा.

अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत को आगे बढ़ाने में पाकिस्तान ने भी भूमिका निभाई, जिससे उसकी अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक स्थिति मज़बूत हो सकती है.

यह भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मध्य पूर्व ऊर्जा सुरक्षा, निवेश, प्रवासी भारतीयों और रणनीतिक हितों के लिहाज से बहुत अहम क्षेत्र है.

ऐसे में अगर पाकिस्तान का प्रभाव बढ़ता है तो भारत को अपनी क्षेत्रीय रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है.

भारत अपनी करीब 90 फ़ीसदी तेल और गैस आवश्यकताओं के लिए आयात पर निर्भर है, जिसमें खाड़ी देशों का बड़ा योगदान है.

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ऐसे में क्षेत्रीय तनाव कम होने से भारत को ऊर्जा कीमतों में राहत और आपूर्ति की स्थिरता का फ़ायदा मिल सकता है.

साथ ही, खाड़ी क्षेत्र में काम करने वाले करीब एक करोड़ भारतीयों और समुद्री मार्गों पर काम करने वाले भारतीय नाविकों की सुरक्षा भी बेहतर हो सकती है.

तो ऐसे में कई सवाल उठते हैं.

ईरान, इसराइल, अमेरिका संघर्ष में क्या अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अपने मकसद में कामयाब हुए या ईरान अब भी अपनी परमाणु क्षमता बरकरार रखने में कामयाब हुआ तो वह इसे अपनी रणनीतिक जीत मानेगा?

क्या इस पूरे घटनाक्रम में अब भी अमेरिका इसराइल के साथ है?

प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाक़ात और जी7 की बैठक के दौरान आए बयानों को कैसे समझना चाहिए?

क्या मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बाद पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अब और अहमियत मिलने लगी है?

कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने बीबीसी के साप्ताहिक कार्यक्रम 'द लेंस' में कुछ ख़ास मेहमानों से बात कर इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की.

अमेरिका-ईरान समझौता क्या 'रणनीतिक ठहराव' है

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जब एक संघर्ष चल रहा होता है तो टैक्टिकल तरीके से लोग अलग-अलग चीजें करते हैं ताकि फिर से अपनी ताक़त को बटोरकर, नए सिरे से कुछ नया कर सकें. तो क्या अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष रुका है या सिर्फ एक पॉज़ का बटन दबाया गया है?

इस सवाल के जवाब में 'सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस' के विज़िटिंग सीनियर फेलो कांति बाजपेयी कहते हैं कि शांति की उम्मीद है लेकिन मामला बहुत साफ़ नहीं है.

वह कहते हैं, "मुझे यह लगता है कि यह युद्धक्षेत्र में रणनीतिक ठहराव नहीं है. जंग को काफ़ी समय हो गया है और सभी पक्ष थक गए हैं. इसलिए मुझे लगता है कि शांति की बहुत बड़ी संभावना है."

"अगले 60 दिनों में उन्हें एमओयू को एक औपचारिक समझौते में बदलना है, देखने वाली बात यह है कि ये किस तरह आगे बढ़ता है. सब जानते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप के साथ कुछ भी मामला बिल्कुल सीधे तरीके से नहीं चलता है. इसलिए आगे काफी रोमांच है."

दरअसल इस जंग में शामिल होने की अमेरिका की मुख्य वजह ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना था.

अमेरिका इस बात को बार-बार दोहराता रहा है कि वह ईरान के पास परमाणु क्षमता विकसित होने नहीं देगा.

क्या अमेरिका वह सब हासिल करने में कामयाब रहा जिसके लिए इस संघर्ष में कूदा था?

इस सवाल पर कांति बाजपेयी कहते हैं, "अगले 60 दिनों में दोनों पक्षों के बीच बातचीत होती है और ईरान अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम को बंद करने के लिए राज़ी हो जाता है तो इसे हम अमेरिका और इसराइल के लिए बड़ी जीत मानेंगे."

अमेरिका-ईरान समझौते में पाकिस्तान की भूमिका कितनी अहम?

अमेरिका-ईरान समझौते पर पाकिस्तान की भूमिका पर कांति बाजपेयी कहते हैं, "पाकिस्तान की भूमिका को एक क्षेत्रीय संघर्ष के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए. हालांकि पाकिस्तान की सक्रिय भूमिका से भारत को कुछ हद तक असहजता हुई है, क्योंकि इस पूरे घटनाक्रम में भारत की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित दिखाई दी जबकि पाकिस्तान की भूमिका अधिक प्रमुख रही."

वह आगे कहते हैं, "पिछले पांच-छह महीनों में, ख़ासकर पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद, अमेरिका और खाड़ी क्षेत्र में उसकी भूमिका बढ़ी है. यह भारत के लिए एक छोटा-सा कूटनीतिक झटका माना जा सकता है."

''आगे चलकर पाकिस्तान और अमेरिका के संबंध किस दिशा में जाते हैं और क्षेत्र में पाकिस्तान की भूमिका कितनी बढ़ती है, यह देखने वाली बात होगी. वहीं भारत भी अपनी क्षेत्रीय रणनीति में कुछ समायोजन करता दिखाई दे रहा है.''

उन्होंने ध्यान दिलाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया विदेश यात्रा के दौरान संयुक्त अरब अमीरात में कुछ देर तक रुकना भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है.

''भारत और यूएई के बीच संबंध पहले से ही काफी मज़बूत और गहरे हैं. भारत उन्हें और सशक्त बनाने की दिशा में काम कर रहा है.''

अमेरिका-ईरान जंग में किसकी जीत हुई

फ़ोर्स पत्रिका की एग्ज़िक्यूटिव एडिटर ग़ज़ाला वहाब समझौते की ईरान के लिए बड़ी जीत बताती हैं.

वह कहती हैं, "यह ईरान की बहुत बड़ी जीत है. और इसका बिलकुल अंदाज़ा नहीं था कि ईरान की इतनी बड़ी जीत होगी."

ग़ज़ाला के मुातबिक़ यह दुनिया में सबको नज़र आ रहा है कि ईरान ने कूटनीतिक स्तर और जंग के मैदान, हर जगह जीत हासिल की है. अमेरिका के पास ईरान से लड़ाई लड़ने का अब कोई ऑप्शन नहीं था.

ग़ज़ाला वहाब कहती हैं, "अमेरिका ने हवाई हमला किया, इसके बाद स्पेशल ऑपरेशन करने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे. उसने ज़मीनी कार्रवाई के लिए कई बार धमकी दी थी लेकिन इसमें भी कामयाब नहीं हो सका. और स्ट्रैटिज़िक स्तर पर भी ईरान ने जीत हासिल की है."

"सभी स्तर पर ईरान के सामने अमेरिका के सैन्य विकल्प विफल साबित हुए हैं और अमेरिका अकेला नहीं लड़ रहा था, इस लड़ाई में इसराइल भी उसके साथ था."

हालांकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे ईरान की हार बताते रहे हैं.

शुक्रवार को ट्रुथ सोशल पर पोस्ट कर उन्होंने कहा, "युद्ध ने ईरान को कमज़ोर कर दिया है. अब उसके पास न वायुसेना है, न नौसेना, न वायु रक्षा प्रणाली, न ही रडार. उनके पास कुछ और नहीं बचा है."

अमेरिका बार-बार दावा करता रहा है कि उसका मुख्य मक़सद ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना था और वह उसमें कामयाब रहा है.

इस पर ग़ज़ाला कहती हैं, "यह हैरानी की बात है और ईरान ने तो कभी भी परमाणु हथियार बनाने की बात नहीं कही थी, यहां तक कि उनके पूर्व सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ने भी इसके ख़िलाफ़ फ़तवा दिया था. ईरान ने तो पहले अमेरिका के साथ न्यूक्लियर समझौते पर भी साइन किए थे जिसमें कहा गया था कि वह कभी भी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा."

उन्होंने कहा कि इसे अमेरिका और इसराइल ने मुद्दा बनाया है.

पाकिस्तान की मध्यस्थ की भूमिका पर उन्होंने कहा कि पूरी बातचीत के दौरान उसकी भूमिका काफ़ी अहम रही है.

फ़्रांस में ट्रंप और मोदी की मुलाक़ात कितनी अहम

भारतीय प्रधानमंत्री और अमेरिका के राष्ट्रपति नरेंद्र मोदी ने फ़्रांस के इवियां में आयोजित जी-7 समिट के दौरान द्विपक्षीय बैठक की.

इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने ओमान के तट के पास अमेरिकी हमलों में मारे गए तीन भारतीय नाविकों का भी ज़िक्र किया.

ऐसे समय में जब भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर कई तरह के सवाल मौजूद हैं, इस मुलाकात को काफ़ी अहम माना जा रहा है.

राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि भारत और अमेरिका एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते के काफी करीब हैं.

इसके साथ ही राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि अगर भारत पर कोई हमला करेगा तो वो मदद के लिए वहां आएंगे.

कूटनीतिक लिहाज से यह मुलाक़ात, भारत और अमेरिका के संबंधों के लिए कितनी अहम है?

इस पर कांति बाजपेयी कहते हैं, "मोदी और ट्रंप के बीच जो मीटिंग हुई वह काफी छोटी रही. बहुत लंबी नहीं थी और ज्यादातर तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोले और ऐसा लग रहा था कि ट्रंप बड़े ध्यान से उनको सुन रहे हैं."

"प्रधानमंत्री ने भारतीय नाविकों की मौत पर भारत का पक्ष रखा, साथ ही भविष्य में अमेरिका और भारत के दीर्घकालीन रिश्तों पर भी बात की. और ये सारी बातें ट्रंप ने स्वीकार कर लीं. लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज में मुझे विनम्रता और गर्मजोशी नहीं दिखी."

ईरान ने मौजूदा परमाणु क्षमता बनाए रखी तो क्या होगा

"यह तो अमेरिका ने तय कर लिया है कि ईरान अब परमाणु बम नहीं बनाएगा."

अब सवाल ये है कि अगर इसके बाद भी किसी तरह से ईरान अपनी मौजूदा परमाणु क्षमता को बनाए रखने में कामयाब होता है तो इसके बावजूद क्या अमेरिका एक तरह से जीत का दावा कर पाएगा?

इस पर अरुण कुमार कहते हैं, "समझौते में जो 14 बिंदु हैं उनमें न्यूक्लियर डील की भी बात है."

उन्होंने कहा, ''समझौते की एक बहुत अहम शर्त यह है कि ईरान तेल बेच पाएगा. इससे बड़ा फर्क पड़ेगा.''

Worauf zu achten ist

KI-Ausblick — Möglichkeiten, keine Fakten

  • अगले 60 दिनों में अमेरिका-ईरान एमओयू को औपचारिक समझौते में बदलना.

    Möglich · Innerhalb von Monaten

  • भारत और अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते के करीब पहुंचेंगे.

    Wahrscheinlich · Innerhalb von Monaten

Offene Fragen

  • क्या ईरान अपनी परमाणु क्षमता बरकरार रख पाएगा?
  • क्या अमेरिका इसराइल के साथ है?
  • पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कितनी अहमियत मिलेगी?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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