बृजभूषण शरण सिंह केस, फ़ैसला सार्वजनिक न करने पर उठते सवाल
भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह को यौन उत्पीड़न के मामले में बरी कर दिया गया है, लेकिन फ़ैसला सार्वजनिक न किए जाने पर कानूनी सवाल उठ रहे हैं।
Auf einen Blick
भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह को यौन उत्पीड़न मामले में राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने बरी कर दिया है। हालांकि, 244 पन्नों के इस फैसले को सार्वजनिक न करने और वकीलों से अंडरटेकिंग लेने पर कानूनी और संवैधानिक सवाल खड़े हो रहे हैं।
KI-generierte Zusammenfassung
Warum es wichtig ist
महिला पहलवानों ने 2023 में बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप लगाते हुए जंतर-मंतर पर धरना दिया था।
भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष और बीजेपी नेता बृज भूषण शरण सिंह को महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न के मामले में बरी कर दिया गया है.
लेकिन दिल्ली के राउज़ एवेन्यू कोर्ट के इस फैसले को कई दिनों बाद, इस रिपोर्ट के प्रकाशित किए जाने तक, सार्वजनिक नहीं किया गया है.
दिल्ली के राउज़ एवेन्यू मजिस्ट्रेट कोर्ट के बृज भूषण शरण सिंह को दोषमुक्त क़रार देने के फ़ैसले पर अपील करने की बात इन महिला खिलाड़ियों में से एक ने कही है.
बृज भूषण शरण सिंह पर छह महिला पहलवानों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे. पहलवानों ने बृज भूषण के इस्तीफ़े और उनकी गिरफ़्तारी की माँग करते हुए 2023 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर लंबे समय तक धरना-प्रदर्शन भी किया था.
कोर्ट ने अपना 244 पन्नों का फ़ैसला तीन अगस्त को सुनाया था और अपने फ़ैसले की कॉपी 10 अगस्त को दोनों पक्षों के वकीलों को दी थी लेकिन इस फ़ैसले को वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया गया है, जजमेंट आने के बाद कुछ ही घंटों के भीतर उसे वेबसाइट पर अपलोड कर दिया जाता है.
साथ ही, दोनों पक्षों के वकीलों ने बीबीसी को फ़ोन पर बताया है कि उनसे एक 'अंडरटेकिंग' साइन करवाई गई है जिसमें लिखा गया है कि वकील संबंधित पक्षों के अलावा वे किसी और को ये ऑर्डर नहीं देंगे.
असामान्य रोक पर सवाल
अभियोजन पक्ष से जुड़ी हुई वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने कोर्ट के फ़ैसले को सार्वजनिक न किए जाने को असामान्य बताया.
बीबीसी हिन्दी से उन्होंने व्हाट्सएप मैसेज में कहा, "अदालती फ़ैसले सार्वजनिक दस्तावेज होते हैं और आवश्यक संपादन (रिडैक्शन) किए जाने के बाद उन्हें सार्वजनिक करने पर कोई कानूनी रोक नहीं है."
उन्होंने आगे कहा, "मुझे लगता है कि यह पाबंदी अनावश्यक है. कोई कानून या नियम जजमेंट के सार्वजनिक होने पर रोक नहीं लगाता. यौन उत्पीड़न के पीड़ितों के नाम या उनकी पहचान उजागर करने पर रोक होती है."
लीगल थिंक टैंक विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के स्वप्निल त्रिपाठी कहते हैं कि प्रथम दृष्टि में कोर्ट की ये रोक गहरे संविधानिक सवाल खड़े करती है.
उन्होंने बीबीसी हिन्दी को बताया, "सुप्रीम कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में न्यायिक कार्यवाहियों की रिपोर्टिंग का अधिकार भी शामिल है."
"अदालत ने यह भी रेखांकित किया है कि मीडिया की भूमिका मुकदमे से पहले, मुकदमे के दौरान, और मुकदमे के बाद तक बनी रहती है. यह खुली न्याय व्यवस्था के सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और निष्पक्ष तथा सटीक रिपोर्टिंग को सुनिश्चित करता है."
साथ ही, वे कहते हैं कि अदालतें इस तरह की चिंताओं का हल निकालने के लिए कई बार बंद कमरे में सुनवाई करती हैं और पीड़ितों की पहचान छुपाने का आदेश देती हैं.
स्वप्निल ने आगे कहा, ''जब फ़ैसला सुनाया जा चुका हो, और उसे सार्वजनिक करने को लेकर प्रतिबंध लगाया जाए तो ऐसे में इस पर संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत सवाल उठाए जा सकते हैं.
अगर अदालत ऐसे किसी प्रतिबंध को आवश्यक मानती भी है, तो कम-से-कम वह प्रतिबंध अस्थायी होना चाहिए और ये देखा जाना चाहिए कि संवैधानिक तौर पर ये कितना आवश्यक है."
दोनों पक्षों के वकीलों से बातचीत के बाद बीबीसी को ये जानकारी नहीं मिल सकी कि अंडरटेकिंग में किन प्रावधानों के तहत और कब तक के लिए कोर्ट ऑर्डर को सार्वजनिक करने की मनाही है.
क्या कहता है कोर्ट ऑर्डर?
बृज भूषण शरण सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 354, 354 A (यौन उत्पीड़न), 354 D (पीछा करना) और 506 (आपराधिक धमकी) के आरोपों से बरी कर दिया गया है.
जबकि भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व जनरल सेक्रेटरी विनोद तोमर को धारा 506 (1) (धमकी देने) के मामले में बरी किया गया है.
बीबीसी और कुछ दूसरे मीडिया संस्थानों ने इस फ़ैसले की प्रति देखी है जिसमें मजिस्ट्रेट अश्विन पंवार ने बृज भूषण के ख़िलाफ़ दाख़िल इस केस को एक 'गहरी साज़िश' बताया है.
मजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में कहा है, "बृज भूषण के ख़िलाफ़ जो आरोप लगे हैं वो मनगढ़ंत थे और उन्हें काल्पनिक तरीक़े से तैयार किया गया था."
बृज भूषण के वकील राजीव मोहन ने बीबीसी हिन्दी से फ़ोन पर बात करते हुए कहा, "अभियोजन पक्ष के बयानों को हमने ध्वस्त किया, और उसे कोर्ट ने सराहा है. गवाहों के कुछ बयान और उनकी ही कही पुरानी बातों में तालमेल नहीं था. साथ ही, ऐसी शिकायतों को उजागर करने में जो देरी हुई, कोर्ट ने उसे संज्ञान में लिया और ये फैसला सुनाया."
दो गवाहों का मुकरना
राजधानी दिल्ली के कनॉट प्लेस थाने में दर्ज एफ़आईआर में छह महिलाएं शिकायतकर्ता थीं, जिनमें से दो अपने पहले दिए बयान से मुकर गई थीं.
कोर्ट ने कहा कि मुकरने वाले गवाहों के बयान अभियोजन पक्ष के मामले को पूरी तरह से झूठा और मनगढ़ंत साबित करता है. इन महिलाओं ने कोर्ट से कहा कि उनके ऊपर बृज भूषण के ख़िलाफ़ बयान देने का राजनीतिक दबाव था.
अभियोजन पक्ष से जुड़ी वरिष्ठ वकील रेबेका जॉन कहती हैं, "ये बड़ी अविश्वसनीय और हैरान कर देने की बात है कि ट्रायल कोर्ट ने बिना किसी ठोस सबूत के कहा कि पीड़ितों ने बृज भूषण को किसी साज़िश में फंसाया है."
उन्होंने आगे कहा, "जिन चश्मदीद गवाहों और पीड़ितों ने यौन उत्पीड़न के बारे में बेहद ठोस और विस्तृत गवाही दी, उनकी गवाही को तारीखों में मामूली त्रुटियों के आधार पर ख़ारिज कर देना अपने आप में न्याय का घोर मज़ाक है. इसे पलटा जाना चाहिए."
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि बृज भूषण ने पहलवानों से सौहार्द्रपूर्ण संबंध बनाए रखा और उन्हें शादियों अन्य समारोहों में आमंत्रित किया.
मजिस्ट्रेट पंवार ने अपने फ़ैसले में लिखा है, "यह बात समझ में आती है कि (अभियुक्त-1) भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष होने के नाते उनका (महिला पहलवानों का) करियर ख़राब कर सकते थे. हालांकि, यह बात समझ से परे है कि उनके साथ (अभियुक्त-1) ने वर्षों तक सौहार्द्रपूर्ण संबंध क्यों बनाए रखे."
अदालत ने सबूत के तौर पर पेश की गई एक तस्वीर के बारे में कहा, ''पीड़िता सहज भाव (कम्फर्टेबल बॉडी लैंग्वेज) से उस व्यक्ति के साथ कभी दिखाई नहीं दे सकती, जिसने उसका बार-बार उत्पीड़न किया हो.''
मजिस्ट्रेट अश्विन पंवार ने अपने फैसले में एक पहलवान के पति के ऊपर भी सवाल खड़े किए. मजिस्ट्रेट ने कहा कि शिकायतकर्ता और उनके पति ने 'अभियुक्त के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे' और कथित घटना के बाद, वे दोनों उनके निवास पर विवाह के बाद आशीर्वाद लेने गए थे.
ग़लतियां और बदलाव
अदालत ने कहा कि कुछ बयानों में 'बदलाव' किए गए और उनमें विरोधाभास थे.
कोर्ट ने कहा कि पहलवानों की ओर से दिए गए विवरण में कुछ ग़लतियां भी थीं, जिन्हें कोर्ट ने 'अभियोजन पक्ष के लिए घातक' बताया.
"सभी पीड़ितों ने यह गवाही दी है कि उन्होंने समय रहते अभियुक्तों के ख़िलाफ़ कोई आरोप इसलिए नहीं लगाए क्योंकि उन्हें अपना करियर बर्बाद होने का डर था. और जब उन्होंने ऐसा करने की हिम्मत जुटाई, तो उन्होंने घटना के कथित स्थान और साल के रूप में ग़लत देश और ग़लत सा का उल्लेख कर दिया. यह विरोधाभास अभियोजन पक्ष के लिए घातक है."
मजिस्ट्रेट ने कहा कि 'आरोपों में इतनी कमियाँ हैं कि ये सच नहीं लगते. ऐसा लगता है जैसे गवाह को सब कुछ सिखाया-प पढ़ाया गया हो.'
Worauf zu achten ist
KI-Ausblick — Möglichkeiten, keine Fakten
महिला खिलाड़ियों द्वारा फैसले के खिलाफ अपील की जाएगी।
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Offene Fragen
- अंडरटेकिंग में कोर्ट ऑर्डर को कब तक सार्वजनिक न करने की बात कही गई है?
- क्या अभियोजन पक्ष इस फैसले के खिलाफ उच्च अदालत में अपील करेगा?


