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Zurückलाल किले पर पहली बार गाया गया 'वंदे मातरम', 80वें स्वतंत्रता दिवस पर परंपरा में बदलाव
लाल किले पर पहली बार गाया गया 'वंदे मातरम', 80वें स्वतंत्रता दिवस पर परंपरा में बदलाव
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लाल किले पर पहली बार गाया गया 'वंदे मातरम', 80वें स्वतंत्रता दिवस पर परंपरा में बदलाव

भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले पर राष्ट्रगान से पहले राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' गाया गया, जिसे लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस छिड़ गई है।

Auf einen Blick

भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर नई दिल्ली के लाल किले पर राष्ट्रगान से पहले पहली बार राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' गाया गया। मोदी सरकार द्वारा इस गीत को कानूनी संरक्षण देने और इसके पूर्ण संस्करण को अनिवार्य बनाने के बाद से विपक्षी दलों और मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध किया है।

KI-generierte Zusammenfassung

Warum es wichtig ist

केंद्र सरकार ने हाल ही में कानून में संशोधन कर 'वंदे मातरम' को 'जन गण मन' के बराबर कानूनी दर्जा दिया है और इसके अपमान पर सजा का प्रावधान किया है।

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भारत 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है. नई दिल्ली के ऐतिहासिक लाल क़िले पर आधिकारिक समारोह में इस बार 80 साल की परंपरा में पहली बार बदलाव देखने को मिला.

नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर के लिखे राष्ट्रगान 'जन गण मन' से पहले राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' गाया गया.

पीएम मोदी ने लाल क़िले से अपने संबोधन में कहा, ''आज़ादी के बाद यह पहली बार है, जब लाल किले पर 'वंदे मातरम' बजाया गया है.

'वंदे मातरम्' के पूर्ण संस्करण को हाल ही में राष्ट्रगान के समान क़ानूनी संरक्षण दिया गया है. 80वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर शुक्रवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले और उसके समापन पर भी 'वंदे मातरम' बजाया गया था.

यह इसलिए अहम है क्योंकि राष्ट्रगान को संवैधानिक दर्जा हासिल है और आधिकारिक प्रोटोकॉल के तहत इसे गणतंत्र का सर्वोच्च संगीतमय प्रतीक माना जाता है.

हालांकि, बीजेपी और संघ परिवार से जुड़े संगठन 'वंदे मातरम' की वकालत लंबे समय से करते रहे हैं. इसमें हिंदू धार्मिक संदर्भ भी हैं.

हाल ही में नरेंद्र मोदी सरकार ने क़ानून में संशोधन कर 'वंदे मातरम' को 'जन गण मन' के बराबर दर्जा दिया है. इससे पहले राष्ट्रगान को सरकारी और राजकीय समारोहों में बजाया जाता था, जबकि राष्ट्रीय गीत मुख्य रूप से सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित था.

स्वतंत्रता दिवस समारोह की ज़िम्मेदारी संभालने वाले रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में घोषणा की थी कि 'वंदे मातरम्' के 150वें वर्ष को यादगार बनाने के लिए पहली बार इसे विशेष सम्मान दिया जाएगा.

नए प्रोटोकॉल के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल क़िले पहुँचने पर सबसे पहले राष्ट्रीय गीत बजाया गया. इसके बाद राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया और उस दौरान राष्ट्रगान बजाया गया.

वंदे मातरम को लेकर कई आलोचकों का तर्क रहा है कि यह संघ परिवार के बड़े हिंदुत्व एजेंडे का हिस्सा है, जिसके तहत भारत की विविधता और बहुलता का जश्न मनाने वाले राष्ट्रगान की जगह 'वंदे मातरम' के सभी छह पदों को प्रमुखता देने की कोशिश हो रही है.

'वंदे मातरम' के इन पदों में हिंदू देवी-देवताओं, जिनमें दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी संदर्भ शामिल हैं, और भारत को एक पूजनीय मातृ देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

संशोधित क़ानून के मुताबिक़, राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 जिसे संसद ने पारित किया और इस सप्ताह की शुरुआत में राष्ट्रपति की मंजूरी मिली, राष्ट्रीय गीत का अपमान करने पर भी तीन साल तक की जेल की सज़ा हो सकती है, जैसा कि राष्ट्रगान के अपमान के मामले में होता है.

इसे लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा सांसद शशि थरूर ने आपत्ति जताई थी.

थरूर ने एक्स पर लिखा था, ''राष्ट्रपति ने वंदे मातरम संशोधन को मंज़ूरी दे दी है. इसे संसद में बिना चर्चा के पारित किया गया था. इसके तहत राष्ट्रगान के अलावा, हर आधिकारिक समारोह की शुरुआत और अंत में राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' का पूरा संस्करण गाना अनिवार्य होगा.''

''मैं दोनों का बहुत सम्मान करता हूँ और 'वंदे मातरम' के पहले दो पद गा सकता हूँ, लेकिन इसके बाक़ी चार पद नहीं, क्योंकि अब तक उन्हें गाना अनिवार्य नहीं था. मैं सिर्फ़ एक व्यावहारिक पहलू की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं, जिसे हमारे अति-उत्साही लोगों ने नज़रअंदाज कर दिया है: इंसानी स्वभाव.''

थरूर ने लिखा है, ''जन गण मन के दौरान लोगों को सम्मानपूर्वक खड़े होकर क़रीब 52 सेकंड तक ध्यान केंद्रित रखना होता है. वहीं 'वंदे मातरम्' का पूरा संस्करण तीन मिनट 10 सेकंड का है. तमिलनाडु ने अभी फ़ैसला किया है कि इन दोनों से पहले राज्य गीत 'तमिल थाई वाज़्थु' भी गाया जाएगा, जो क़रीब दो मिनट का है.''

''क्या हम सचमुच उम्मीद करते हैं कि हर समारोह की शुरुआत और अंत में लोग क़रीब छह मिनट तक स्थिर खड़े रहकर सम्मानपूर्वक इन गीतों को सुनेंगे? यानी हर समारोह में कुल 12 अतिरिक्त मिनट? क्या सम्मान और धैर्य को क़ानून बनाकर लागू किया जा सकता है? मुझे डर है कि विधेयक का मक़सद यानी राष्ट्रीय गीत के प्रति अधिक सम्मान पैदा करना, पूरा नहीं होगा. बल्कि इसका उल्टा असर हो सकता है.''

मुस्लिम संगठनों ने इस प्रावधान का विरोध किया है. उनका तर्क है कि इस्लाम की बुनियादी मान्यताओं के तहत अल्लाह के अलावा किसी और की पूजा नहीं की जा सकती.

हैदराबाद से लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इसका विरोध करते हुए कहा था, "जब आप 'जन गण मन' गाते हैं, तो उसमें आपको क्या दिखाई देता है? आपको यह देश और इसके लोग दिखाई देते हैं. जब आप 'वंदे मातरम्' गाते हैं, तो इसमें देवी-देवताओं की पूजा शामिल है.''

''अब आप उन स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में क्या कहेंगे, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी? 'जन गण मन' लोगों के लिए लिखा गया था. मेरा मानना है कि 1950 में राजेंद्र प्रसाद ने एक बड़ी ग़लती की. उन्होंने बिना किसी औपचारिक प्रस्ताव के इसे 'राष्ट्रीय गीत' घोषित कर दिया, जबकि इसके लिए एक प्रस्ताव पारित किया जाना चाहिए था. 'राष्ट्रीय गीत' की परिभाषा कहीं भी नहीं दी गई है. केंद्र सरकार संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 का उल्लंघन कर रही है."

दरसअक, मोदी सरकार ने जब संसद में महज 15 मिनट की चर्चा के बाद यह विधेयक पारित कराया, तब भी विपक्षी सांसदों ने इसका विरोध किया था.

द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) की सांसद के. कनिमोई ने बीजेपी पर राष्ट्रवाद की आड़ में हिंदुत्व का एजेंडा लाने का आरोप लगाया था. उन्होंने कहा था कि यह क़ानून "फ़ेडरलिज़म के ख़िलाफ़" है और राष्ट्रवाद को क़ानून के ज़रिए थोपा नहीं जा सकता.

1937 में जब कांग्रेस, जिसका नेतृत्व उस समय जवाहरलाल नेहरू कर रहे थे, ने 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाने को लेकर रवींद्रनाथ टैगोर से सलाह ली थी, तो टैगोर ने कहा था कि एकेश्वरवाद में विश्वास रखने वाले लोग, जैसे मुसलमान और ब्रह्म समाज के अनुयायी, इसके बाद के पदों पर आपत्ति कर सकते हैं, क्योंकि उनमें देवी दुर्गा का आह्वान किया गया है.

उन्होंने नेहरू को सलाह दी थी कि राष्ट्रीय गीत के रूप में केवल पहले दो पदों को रखा जाए, क्योंकि उनमें मातृभूमि की सुंदरता का वर्णन है.

इस बात का उल्लेख पत्रकार और लेखक नीलांजन मुखोपाध्यान ने फ्रंटलाइन में 14 अगस्त को प्रकाशित हुए अपने एक लेख में किया है.

नीलांजन मुखोपाध्याय ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''सिसिर कुमार दास की संपादित किताब 'द इंग्लिश राइटिंग्स ऑफ रविंद्रनाथ टैगोर' में इसका स्पष्ट रूप से ज़िक्र है.''

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 'वंदे मातरम्' 1875 में लिखा था. इसके बाद इसके अन्य पदों को उनके 1882 के उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किया गया.

ग़ैर बीजेपी शासित तमिलनाडु और केरल ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वे केंद्र सरकार के आदेश का पालन नहीं करेंगे. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने बुधवार को घोषणा की थी कि राज्य का आधिकारिक गीत 'तमिल थाई वाज़्थु' तमिलनाडु में सभी सरकारी कार्यक्रमों और आधिकारिक समारोहों में सबसे पहले गाया जाएगा.

Worauf zu achten ist

KI-Ausblick — Möglichkeiten, keine Fakten

  • गैर-भाजपा शासित राज्य जैसे तमिलनाडु और केरल केंद्र के आदेश का पालन करने से इनकार करेंगे

    Wahrscheinlich · Innerhalb von Wochen

Offene Fragen

  • क्या गैर-भाजपा शासित राज्य इस नियम को पूरी तरह लागू करेंगे?
  • क्या अदालतों में इस संशोधन को चुनौती दी जाएगी?

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