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उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में गोमूत्र खरीद की योजना: किसानों और महिलाओं के लिए नई पहल या राजनीति?
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उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में गोमूत्र खरीद की योजना: किसानों और महिलाओं के लिए नई पहल या राजनीति?

बुलंदशहर में गोमूत्र से प्राकृतिक खाद और कीटनाशक बनाने का पायलट प्रोजेक्ट शुरू, राजनीतिक दलों में छिड़ी बहस।

Auf einen Blick

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में 10 रुपये लीटर की दर से गोमूत्र खरीदने का पायलट प्रोजेक्ट शुरू हुआ है। एफपीओ द्वारा संचालित इस योजना का उद्देश्य प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना और महिलाओं को रोजगार देना है, जबकि सपा ने इसे राजनीति और ध्यान भटकाने वाला बताया है।

KI-generierte Zusammenfassung

Warum es wichtig ist

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में गोमूत्र से प्राकृतिक खाद और कीटनाशक बनाने का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है।

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उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में गोमूत्र 10 रुपये लीटर खरीदने की योजना चलाई जा रही है. किसान उत्पादक संगठन (एफ़पीओ) ने गोमूत्र से प्राकृतिक खाद और कीटनाशक बनाने का यह पायलट प्रोजेक्ट बुलंदशहर से शुरू किया है.

सरकार का कहना है कि इससे किसानों और पशुपालकों को अतिरिक्त आमदनी होगी, महिलाओं को रोजगार मिलेगा और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जाएगा.

समाजवादी पार्टी ने इस योजना पर सवाल उठाते हुए कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने गाय के नाम पर धोखा देने का काम किया है. पार्टी ने आरोप लगाया कि राज्य में एक रुपये किलो आलू खरीदा जा रहा है लेकिन सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है. पार्टी ने इसे राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों से भी जोड़ा है.

फ़िलहाल यह योजना पूरे उत्तर प्रदेश में लागू नहीं है. इसकी शुरुआत बुलंदशहर की स्याना तहसील के नरसैना गांव से हुई है और आसपास के लगभग पंद्रह गांवों को इससे जोड़ा गया है.

लेकिन इस पहल की शुरुआत होने के बाद से कई तरह के सवाल भी उठ रहे हैं.

समाजवादी पार्टी ने इसे ध्यान भटकाने वाला बताया है जबकि बीजेपी ने सपा को नए प्रयोगों का विरोधी बताया है.

बुलंदशहर में कैसे शुरू हुआ प्रयोग?

बुलंदशहर में इस पायलट प्रोजेक्ट को केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत किसान उत्पादक संगठन के रूप में पंजीकृत 'नर्सैना ऑर्गेनिक फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड' के माध्यम से चलाया जा रहा है.

इस प्रयोग को बुलंदशहर में किसान उत्पादक संगठन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉक्टर प्रवीण कुमार की देखरेख में चलाया जा रहा है.

प्रवीण कुमार ने बीबीसी हिन्दी को बताया, "इस पायलट प्रोजेक्ट के तहत 15 गांवों को चिह्नित कर गोमूत्र डेयरी खोली गई है. महिला समूहों से दस रुपये प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीदा जा रहा है. इसमें लगभग 300 महिलाएं जुड़ी हैं जो प्रतिदिन आठ से दस लीटर गो-मूत्र इकट्ठा कर लेती हैं."

उनका दावा है कि प्रतिदिन लगभग 500 लीटर गोमूत्र इकट्ठा हो रहा है. इससे ग्रामीण महिलाओं और किसानों की आमदनी में वृद्धि हो रही है.

गांवों से गोमूत्र इकट्ठा कर प्लांट तक लाया जाता है और वहां गोमूत्र में कई तरह की जड़ी-बूटियों को डालकर उबाला जाता है. जिससे लिक्विड, पावडर और दानेदार खाद का निर्माण किया जाता है.

प्रवीण कुमार ने बताया, "हमने प्रॉसेस प्लांट के लिए किराए पर जमीन लिया है. इसका प्लांट लगभग 6000 वर्ग फुट में फैला है. प्लांट में पांच टेक्निकल और 25 लेबर काम करते हैं जिसमें महिलाओं की संख्या अधिक है."

क्या आपने गोमूत्र से बनने वाली खाद का वैज्ञानिक शोध किया है?

इस सवाल के जवाब में प्रवीण कुमार कहते हैं, "मैं स्वयं प्लांट ब्रीडिंग विषय से पीएचडी हूँ. हमने शोध किया है और गोमूत्र से बने कीटनाशक के छिड़काव से पौधों में लम्बे समय तक फंगस नहीं लगते हैं."

बांदा कृषि विश्वविद्यालय के वेटेरिनरी एनाटॉमी विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर शैलेन्द्र चौरसिया ने बीबीसी हिन्दी को बताया, "बांदा कृषि विश्वविद्यालय में इस विषय पर कोई शोध नहीं किया गया है लेकिन लिटरेचर के आधार पर वैज्ञानिक शोधों से संकेत मिलता है कि गोमूत्र में जैव-कीटनाशक और फफूंदनाशक उत्पादों के प्राकृतिक घटक के रूप में संभावनाएं मौजूद हैं."

"कई कृषि कीटों और फफूंदजनित रोगों के पर इसका असर देखा गया है, ख़ासकर जब इसे नीम और मेलिया एज़ेडारच जैसे पौधों के अर्क के साथ मिलाकर इस्तेमाल किया गया हो."

वो बताते हैं, "आईसीएआर-एनसीआईपीएम और आईएआरआई के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक फ़ील्ड अध्ययन में गोमूत्र आधारित वनस्पति-आधारित फॉर्मूलेशन से टमाटर के फल छेदक कीट पर लगभग 70–80% नियंत्रण पाया गया."

"इसके साथ फसल की पैदावार में भी सुधार देखा गया. अध्ययन में इसे समेकित कीट प्रबंधन में पर्यावरण-अनुकूल घटक के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की संभावना बताई गई."

कोऑपरेटिव के माध्यम से बिक्री

उत्तर प्रदेश सरकार गौसेवा आयोग अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने इस प्रोजेक्ट को प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और रसायनमुक्त खेती की दिशा में सरकार का ठोस कदम बताया है.

श्याम बिहारी गुप्ता ने बीबीसी हिन्दी से कहा, "जबसे पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू हुआ तभी से कैमिकल फ़र्टिलाइजर, एलपीजी और पेट्रोलियन का संकट आया है. इसे देखते हुए, गांवों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल कर जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशक तैयार करने पर काम किया जा रहा है."

"गुजरात के बनासकांठा में 10,000 लीटर की गोमूत्र डेरी है जहां वे कीटनाशक बनाते हैं. वह एक सफल प्रयोग है."

उन्होंने बताया, "इस योजना को योगी सरकार का पूरी तरह से समर्थन प्राप्त है. बुलंदशहर के प्लांट में जो प्राकृतिक खाद या कीटनाशक बन रहा है वह कोऑपरेटिव के माध्यम से बिक रहा है."

हालांकि, गोमूत्र खरीदने का प्रयोग छत्तीसगढ़ में पहले हो चुका है. भूपेश बघेल सरकार ने गोधन न्याय योजना के तहत दो रुपये प्रति किलो की दर से गोबर और चार रुपये प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीदना शुरू किया था.

इनसे जैविक खाद और कीटनाशक बनाए जाते थे.

कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने बीबीसी हिन्दी को कहा, "गोमूत्र का उपयोग खेती में तो है ही पहले भी लोग खरीदते रहते हैं. किसानों को अतिरिक्त कमाई हो रही है ये अच्छी ख़बर है. लेकिन एफ़पीओ के प्लांट में किस प्रॉसेस से खाद या कीटनाशक बनाया जा रहा है बिना देखे उसके बारे में कुछ कहना उचित नहीं होगा."

'चुनाव से पहले ध्यान भटकाने की कोशिश'

हालांकि समाजवादी पार्टी ने इस योजना को ध्यान भटकाने वाला बताया है.

समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने बीबीसी हिन्दी से कहा, "जिस बीजेपी की दस साल की सरकार ने कुछ भी डिलीवर नहीं किया, उसने गाय के नाम पर धोखा देने का काम किया है."

"प्रदेश में कोई भी नियुक्ति बिना पेपर लीक और रुकावट के सम्पन्न नहीं हुई है. बीजेपी पेपर लीक और राम मंदिरत चढ़ावा मामले फंसी हुई है. इसलिए ये जनता का ध्यान बांटने के लिए इस तरह के मुद्दे उठा रहे हैं."

उन्होंने आगे कहा, "आज प्रदेश में एक रुपये किलो आलू खरीदा जा रहा है. किसान आलू बेचने की जगह फेंक रहा है. जो बीजेपी सरकार अमेरिका जाकर किसानों के हितों से समझौता कर ली हो उससे क्या उम्मीद की जा सकती है?"

वहीं, बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता आनन्द दुबे ने समाजवादी पार्टी को नए प्रयोगों का विरोधी बताया.

आनंद दुबे ने बीबीसी हिन्दी से कहा, "एक समय था जब समाजवादी पार्टी के संरक्षित गुंडे किसानों की ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लेते थे. किसानों की फसल नहीं खरीदी जाती थी. गन्ने का भुगतान नहीं होता था और किसान चीनी मिलों के चक्कर लगाते थे लेकिन आज यूपी का माहौल बदला है. किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिल रहा है. एक हफ़्ते के अंदर पेमेंट मिल रहा है."

उन्होंने आगे कहा, "किसान कैसे सशक्त हों, गोपालन को बढ़ावा मिले, रासायनिक उर्वरकों पर उनकी निर्भरता कम हो और वे कम लागत में अधिक पैदावार कर सकें, सरकार इस दिशा में लगातार काम कर रही है."

छत्तीसगढ़ में गोमूत्र खरीदी

जुलाई 2022 में छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने गोमूत्र की ख़रीदी शुरू की थी. गोमूत्र की ख़रीद के लिए 4 रुपये प्रति लीटर की दर तय की गई थी.

राज्य के उस समय के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने महिलाओं के एक स्वयंसहायता समूह को 5 लीटर गोमूत्र बेच कर इस योजना की शुरुआत की थी.

बदले में महिला स्वयंसहायता समूह ने मुख्यमंत्री को 20 रुपये का भुगतान किया था.

राज्य की अलग-अलग पंचायतों में गाय-बैलों के लिए बनाए गए गौठान में गोमूत्र की ख़रीदी की योजना बनाई गई थी.

Offene Fragen

  • क्या यह योजना पूरे उत्तर प्रदेश में लागू की जाएगी?
  • एफपीओ के प्लांट में खाद बनाने की प्रक्रिया क्या है?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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