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हवाई यात्रियों की सुरक्षा के लिए क्या पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं? - बीबीसी पड़ताल
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BBC हिंदी15.06.2026Other10 dk okumaIndia

हवाई यात्रियों की सुरक्षा के लिए क्या पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं? - बीबीसी पड़ताल

Auf einen Blick

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाज़ार है, लेकिन लगातार हो रही दुर्घटनाएं, विवाद और आंकड़ों से सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि तेज विकास के साथ मजबूत नियम और नियंत्रण की कमी है, जिससे पायलटों की थकान और कर्मचारियों की कमी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।

KI-generierte Zusammenfassung

Warum es wichtig ist

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाज़ार है और भविष्य में इसके और बढ़ने की उम्मीद है। हालांकि, लगातार हो रही दुर्घटनाएं और विवादों ने हवाई यात्रियों की सुरक्षा पर चिंताएं बढ़ा दी हैं।

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हवाई यात्रियों की सुरक्षा के लिए क्या पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं? - बीबीसी पड़ताल

Author, जुगल पुरोहित

पदनाम, बीबीसी संवाददाता

........से, नई दिल्ली, चेन्नई और कोच्चि

प्रकाशित 13 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 10 मिनट

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाज़ार है. अंतरराष्ट्रीय एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (आईएटीए) के अनुसार, भारत का स्थान अमेरिका और चीन के बाद आता है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, 2025 में भारत के हवाई अड्डों से 35 करोड़ यात्रियों ने यात्रा की.

और भविष्य को लेकर भारत काफ़ी आशावादी है.

अभी देश में 163 हवाई अड्डे चालू हैं,और सरकार की योजना है कि अगले 20 वर्षों में इनकी संख्या बढ़ाकर लगभग 400 कर दी जाए. भारत के वाणिज्यिक विमानों की संख्या अभी 800 से ज्यादा है, 2040 तक लगभग तीन गुना होने की उम्मीद है.

भारत के नागरिक उड्डयन मंत्रालय के साथ काम कर चुके एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी से कहा, "भारतीय अभी भी अमेरिका और चीन की तुलना में औसतन कम उड़ान भरते हैं, इसलिए बढ़त की काफ़ी गुंजाइश है."

लेकिन कई लोग यह सब देखकर अब और ज्यादा चिंतित हो रहे हैं. इसकी वजह लगातार हो रही दुर्घटनाएं, विवाद और सामने आ रहे आंकड़े हैं.

हाल-फ़िलहाल में ये बड़े हादसे हुए

पिछले साल जून में अहमदाबाद से उड़ान भरने के तुरंत बाद एयर इंडिया की फ्लाइट 171 के दुर्घटनाग्रस्त होने से 260 लोगों की मौत हुई, जो विमानन के सबसे बड़ी हादसों में से एक था.

इसके अलावा, पिछले साल उत्तराखंड में दो हेलीकॉप्टर हादसों में 13 लोगों की जान गई.

दिसंबर में जब अधिकारियों ने पायलटों की थकान कम करने के लिए ड्यूटी नियम लागू करने की कोशिश की, तो बड़ी अव्यवस्था हुई और भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो को 6890 उड़ानें रद्द करनी पड़ीं.

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जनवरी 2026 में महाराष्ट्र के तत्कालीन उप मुख्यमंत्री अजित पवार की एक विमान हादसे में चार अन्य लोगों के साथ मौत हो गई. इसके अगले ही महीने झारखंड में एक और विमान दुर्घटना में 7 लोगों की जान चली गई.

संसद में मार्च 2026 में पेश की गई एक रिपोर्ट में बताया गया, "जनवरी 2025 से फरवरी 2026 के बीच 754 विमानों की जांच में पाया गया कि 377 विमानों में बार-बार तकनीकी खराबियां सामने आईं."

इसी रिपोर्ट में देश की विमानन सुरक्षा व्यवस्था में बुनियादी स्तर पर बदलाव करने की बात कही गई.

विशेषज्ञ बोले- हमारी नींव कमजोर है

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इन घटनाओं और इनसे निपटने के लिए भारत योजनाओं के बीच के अंतर को समझने के लिए, बीबीसी ने कई विशेषज्ञों से बात की, जिनमें पायलट, केबिन क्रू, अधिकारी, एयर ट्रैफ़िक कंट्रोलर (एटीसी) और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं.

एटीसी वे लोग होते हैं जो पायलटों के साथ मिलकर विमानों को एक जगह से दूसरी जगह सुरक्षित ले जाने में मदद करते हैं.

इन सभी का लगभग यह कहना था कि इस बढ़त के साथ मजबूत नियम और नियंत्रण भी ज़रूरी हैं. भारत की एक घरेलू एयरलाइन के एक वरिष्ठ पायलट ने चिंता जताते हुए कहा, "हम बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं, जहां सिस्टम बिना ज़रूरी विशेषज्ञों के ही फैलने की कोशिश कर रहा है."

संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की एक एजेंसी अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (आईसीएओ) का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत की विमानन सुरक्षा में सुधार हुआ है. इसने 2022 में भारत के नियामक डीजीसीए (डीजीसीए) का ऑडिट किया, जिसके बाद भारत का स्कोर 69.95% से बढ़कर 85.49% हो गया.

लेकिन कई लोगों को यह स्कोर असल स्थिति से काफ़ी अलग लगता है.

सेफ़्टी मैटर्स फ़ाउंडेशन के संस्थापक कैप्टन अमित सिंह ने कहा, "कोई भी दुर्घटना यह दिखाती है कि आपकी पूरी सुरक्षा व्यवस्था फ़ेल हो गई है."

भारत में लगातार हो रही दुर्घटनाओं की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, "यहां हालात इतने बिखरे हुए हैं कि यह समझना मुश्किल है कि समस्या कहां है. हमारी नींव कमज़ोर है और हमारे पास सही निगरानी के लिए प्रशिक्षित लोग नहीं हैं."

डीजीसीए भी कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में पायलट और विमानों का अनुपात लगभग 14 है, जो दुनिया के सामान्य स्तर 18-20 से कम है.

भारत को हर साल करीब 3000 पायलटों की ज़रूरत है, लेकिन पिछले साल सिर्फ़ 1652 लाइसेंस ही जारी किए गए.

संसद की रिपोर्ट के अनुसार, पायलट ट्रेनिंग की लागत 35 से 50 लाख रुपये होने के कारण यह पेशा ज़्यादातर भारतीयों के लिए आसान नहीं है.

एटीसी के मामले में आंकड़े बताते हैं कि मंज़ूर पदों और काम कर रहे कर्मचारियों में 23% की कमी है. सुरक्षा विशेषज्ञों में यह कमी क़रीब 50% तक है. नियामक संस्था डीजीसीए भी कर्मचारियों की 48% कमी से जूझ रही है.

नागरिक उड्डयन मंत्रालय के साथ काम कर चुके अनुभवी पायलट कैप्टन मोहन रंगनाथन ने कहा, "इसका मतलब है कि आप बहुत जोखिम में उड़ान भर रहे हैं."

उन्होंने आगे कहा, "डीजीसीए का काम एयरलाइनों, उनके अलग-अलग विभागों और हवाई अड्डों का ऑडिट करना है, लेकिन डीजीसीए और नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने संसद को बताया है कि इस कमी का कामकाज पर कोई असर नहीं पड़ रहा. यह दुख की बात है कि वे संसद में ऐसे बयान देते हैं और किसी की ज़िम्मेदारी तय नहीं होती."

बीबीसी ने डीजीसीए से कई बार संपर्क किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

'नींद की कमी एक महामारी'

2024 में डीजीसीए ने पायलटों की थकान कम करने और उड़ान सुरक्षा बढ़ाने के लिए बड़े बदलाव करने का आदेश दिया था. एयरलाइनों को जून 2024 तक इन नियमों को लागू करने का समय दिया गया था.

लेकिन दिसंबर 2025 में, उड़ानों में चल रही दिक्कतों को देखते हुए सरकार ने इन नियमों को लागू करने का अपना आदेश फिर अस्थायी रूप से रोक दिया, जिससे इनके लागू होने में और देरी हो गई.

पायलट संगठनों के अनुसार, आज तक ये नियम पूरी तरह लागू नहीं हुए हैं. डीजीसीए से पूछे गए सवालों का भी कोई जवाब नहीं मिला.

एक एयरलाइन पायलट ने पहचान न बताने की शर्त पर कहा, "हर कोई मुनाफ़ा कमाना चाहता है, इसमें कुछ ग़लत नहीं है. लेकिन पहले हम सुरक्षा की सीमाओं का ध्यान रखते थे. आज वे सीमाएं कम होती जा रही हैं."

कैप्टन सिंह की संस्था पायलटों के बीच सर्वे कराती रहती है.

उन्होंने कहा, "2022 के सर्वे में 66% पायलटों ने बताया कि उड़ान के दौरान वे बिना दूसरे पायलट को बताए सो गए थे. लगभग 70% पायलटों ने कहा कि उन्हें थकान के कारण उस समय उड़ान नहीं भरनी चाहिए थी. 2024 के सर्वे में पायलटों ने बताया कि थकान का मुख्य कारण बार-बार बदलने वाला शेड्यूल है."

कुछ समय पहले 50 साल से कम उम्र में गुजर चुके एक पायलट के परिजन ने भी नाम न बताने की शर्त पर हमसे बात की.

उन्होंने कहा, "ऐसे कई बार होता था जब वह (पायलट) सिर्फ़ तीन घंटे ही सो पाते थे और फिर उड़ान भरने चले जाते थे. मैंने कई बार उन्हें कहा कि उनके शरीर को आराम की ज़रूरत है. फिर अचानक उनकी मौत हो गई, जबकि पहले कोई बीमारी नहीं थी."

"इससे साफ़ है कि कारण तनाव और थकान थी. बाद में कई पायलटों ने मुझे बताया कि वे भी बहुत ज़्यादा काम कर रहे हैं और उन्हें नींद नहीं मिल रही."

कर्मचारियों की कमी के कारण काम का तनाव

बीबीसी ने देश के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रहे एटीसी (एटीसी) कर्मचारियों से भी बात की.

लगभग सभी ने कहा कि कर्मचारियों की कमी के कारण काम का तनाव बढ़ गया है.

एटीसी गिल्ड ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष रह चुके चेन्नई के डीएस राघवन ने कहा, "एटीसी कर्मचारियों को उनकी छुट्टी के समय भी अतिरिक्त ड्यूटी के लिए बुला लिया जाता है. अगर कोई दो घंटे काम करता है, तो उसे आधे घंटे का आराम मिलना चाहिए. लेकिन 15 मिनट के बाद ही उन्हें फिर से काम पर लगा दिया जाता है. ऐसा नहीं होना चाहिए...अगर उससे ग़लती हो जाए तो?"

राघवन एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआई) में जॉइंट जनरल मैनेजर के पद से रिटायर हुए हैं, जो एटीसी सेवाएं संभालती है.

बीबीसी ने एएआई और डीजीसीए को कई सवाल भेजे और बार‑बार याद भी दिलाया, लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया.

बीबीसी ने एयर इंडिया और इंडिगो से भी इस मुद्दे पर बातचीत की कोशिश की. इंडिगो ने मना कर दिया और एयर इंडिया की तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया.

हवाई अड्डों की स्थिति

2019 से 2025 के बीच, आंकड़ों के अनुसार, सरकार और निजी कंपनियों ने मिलकर देश के हवाई अड्डों के 'इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर' बनाने के लिए 96,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा ख़र्च किए.

इसके चलते देश के कई हिस्सों में नए और आधुनिक हवाई अड्डे बने या पुराने हवाई अड्डों को नया रूप दिया गया.

लेकिन इसके साथ ही ज़रूरी विभागों के बजट में कटौती भी हो रही है.

संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार, "डीजीसीए के पूंजी बजट को 30 करोड़ रुपये से घटाकर 17 करोड़ रुपये करना, मंत्रालय के इस दावे से मेल नहीं खाता कि वह नियामक क्षमता बढ़ा रहा है. डीजीसीए को अपनी तकनीक और निगरानी उपकरणों को बेहतर बनाने के लिए लगातार निवेश की ज़रूरत है."

सरकार के विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (एएआईबी) के बजट में भी कटौती की गई है.

संसद की रिपोर्ट ने इसे 'नीति में विरोधाभास' बताया और कहा, "मंत्रालय (सचिवालय और एएआईबी) का कुल पूंजी बजट 25 करोड़ रुपये से घटाकर 5 करोड़ रुपये कर दिया गया है.''

हमने जिन कई एटीसी कर्मचारियों से बात की, उन्होंने दावा किया कि बड़े हवाई अड्डों पर भी आधुनिक और नए रडार सिस्टम आसानी से नहीं मिलते.

राघवन के अनुसार, "सरकार ज़रूरी जगहों पर, जैसे ऑपरेशन और एयर ट्रैफ़िक मैनेजमेंट में थोड़े से पैसे ख़र्च करने की भी बात नहीं कर रही है. अगर आप एयर ट्रैफिक कंट्रोल यूनिट्स का निरीक्षण करें, तो वहां के उपकरणों की हालत ख़राब दिखेगी. ये काफ़ी पुराने हैं."

एएआई और डीजीसीए ने इन बातों से उठने वाले सवालों का कोई जवाब नहीं दिया.

लेकिन एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "जब हम महंगे और भव्य टर्मिनल बनाते हैं, तो उसका खर्च यात्रियों से वसूला जाता है. इसके बजाय, मैं चाहता हूं कि ज़्यादा पैसा बेहतर रनवे, एटीसी के लिए अच्छे उपकरण और रियल‑टाइम निगरानी पर ख़र्च किया जाए."

भारत के हवाई अड्डों के आसपास आसमान में पक्षियों से टकराने (बर्ड हिट) की घटनाएं 2021 में 775 से बढ़कर 2025 में 1782 हो गई हैं, सरकारी आकड़े बताते हैं.

विशेषज्ञ कहते हैं कि हर बार बर्ड हिट से दुर्घटना नहीं होती, लेकिन इससे हादसा हो सकता है.

अधिकारियों ने बताया कि हवाई अड्डे के 10 किमी के दायरे में कचरा फेंकने और जानवर काटने पर रोक लगाने जैसे नियम भारत में बनाए गए हैं, ताकि पक्षी वहां इकट्ठा न हों.

बीबीसी ने पशु कल्याण कार्यकर्ता गौरी मौलेखी के साथ राजधानी के कुछ इलाकों का दौरा किया, जिन्होंने इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की है.

क्या सुधार होने चाहिए

मंत्री ने उस समय जवाब नहीं दिया, लेकिन कहा कि वे 'इस हफ़्ते के अंदर' इंटरव्यू देंगे.

हालांकि, बार‑बार संपर्क करने के बावजूद उन्होंने हमसे मुलाक़ात नहीं की.

अमेरिका के वर्जीनिया से बीबीसी से बात करते हुए फ़्लाइट सेफ़्टी फ़ाउंडेशन के सीईओ डॉ हसन शाहिदी ने कहा, "भारत के लिए तीन मुख्य ज़रूरतें हैं. पहली, नियामक क्षमता बढ़ाने के लिए विशेषज्ञों की ज़रूरत है, जैसे निरीक्षक, विश्लेषक, इंजीनियर और ऑपरेशन से जुड़े विशेषज्ञ."

"दूसरी, पायलट, मेंटेनेंस और तकनीशियनों की ट्रेनिंग की मांग तेजी से बढ़ रही है, साथ ही ग्राउंड स्टाफ़ की भी ज़रूरत है. तीसरी ज़रूरत मेंटेनेंस और क्वालिटी सिस्टम को मजबूत करने की है."

क्या नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधीन काम करने वाली डीजीसीए को स्वतंत्र भूमिका दी जानी चाहिए, जैसा कि कई लोग मांग कर रहे हैं?

इस पर डॉ शाहिदी ने कहा, "यह ज़रूरी है कि डीजीसीए अपनी स्वतंत्रता बनाए रखे और अपने काम, जैसे नियम बनाना और निगरानी करना, बिना दबाव के कर सके. इसमें सरकार का समर्थन भी ज़रूरी है."

Worauf zu achten ist

KI-Ausblick — Möglichkeiten, keine Fakten

  • सुरक्षा नियमों के सख्त अनुपालन के लिए डीजीसीए को अधिक स्वायत्तता और संसाधन दिए जा सकते हैं।

    Möglich · Innerhalb von Monaten

  • कर्मचारियों की कमी को दूर करने के लिए भर्ती प्रक्रिया में तेजी लाई जा सकती है।

    Wahrscheinlich · Innerhalb von Monaten

Offene Fragen

  • डीजीसीए कर्मचारियों की कमी को कैसे दूर करेगा?
  • पायलटों की थकान को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे?
  • हवाई अड्डों के बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए बजट कटौती का क्या प्रभाव पड़ेगा?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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