कॉकरोच जनता पार्टी: सोशल मीडिया से उभरा नया प्रेशर ग्रुप जो दे रहा है सरकार को चुनौती
बीते तीन महीनों में चर्चा का केंद्र बनी 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने नीट पेपर लीक और नालसार विवाद पर दो बड़ी सफलताएं हासिल की हैं और अब 'स्कूल ठीक करो अभियान' शुरू किया है।
Auf einen Blick
भारत में सोशल मीडिया से उभरे 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) नामक प्रेशर ग्रुप ने पिछले तीन महीनों में नीट पेपर लीक और नालसार दीक्षांत समारोह विवाद में सफलता हासिल करने के बाद 15 अगस्त से 'स्कूल ठीक करो अभियान' की शुरुआत की है।
KI-generierte Zusammenfassung
Warum es wichtig ist
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने सोशल मीडिया से शुरुआत कर नीट पेपर लीक और नालसार दीक्षांत समारोह विवाद में दबाव बनाकर सफलताएं हासिल की हैं।
'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) ये वो नाम है जो बीते तीन महीने से भारत के राजनीतिक और सामाजिक परिवेश में चर्चा का केंद्र बना हुआ है.
सोशल मीडिया से शुरू हुए इस अभियान ने बीते तीन महीने बतौर प्रेशर ग्रुप दो बड़ी सफलताएं हासिल की हैं.
पहली नीट पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा. और दूसरी, बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (बीसीआई) के चेयरमैन मनन मिश्रा के नालसार विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह विवाद के बाद वहां के विद्यार्थियों से माफ़ी मांगना.
दरअसल, बीसीआई ने हैदराबाद स्थित नेशनल एकेडमी ऑफ़ लीगल स्टडीज़ एंड रिसर्च (नालसार) लॉ यूनिवर्सिटी के 2026 बैच के ग्रेजुएट्स के एनरोलमेंट पर रोक लगा दी थी.
इस फैसले के बाद से ही मनन मिश्रा और बीसीआई सोशल मीडिया पर चर्चाओं के केंद्र में आ गए.
बीसीआई के विद्यार्थियों के एनरोलमेंट पर रोक लगाने के फ़ैसले के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने भी एक्स पर पोस्ट किया, "क्या मनन मिश्रा का इस्तीफ़ा मांगने का वक़्त आ गया है."
सोशल मीडिया पर बने दबाव की वजह से मनन मिश्रा ने पहले अपना फ़ैसला वापस लिया और फिर उन्होंने इस मामले को लेकर विद्यार्थियों से माफ़ी भी मांगी.
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत ने भी बीसीआई की आलोचना करते हुए इसे 'अपने और विद्यार्थियों के बीच का मामला' बताया और बीसीआई को 'बेवजह दख़ल' देने के लिए फटकार लगाई.
लेकिन जिस तरह से कुछ ही घंटों में मनन मिश्रा ने अपना स्टैंड बदला, उसमें सोशल मीडिया पर सीजेपी की ओर से छेड़ी गई मुहिम का असर साफ़तौर पर देखने को मिला.
और इस घटना ने साफ़ किया कि फ़िलहाल के लिए सीजेपी एक प्रेशर ग्रुप के रूप में सत्ता पर दबाव बनाने में कामयाब हो रही है.
'स्कूल ठीक करो अभियान'
बीते कुछ दिनों में सीजेपी के प्रवक्ताओं की ओर से जारी बयानों में साफ़तौर पर कहा गया है कि फ़िलहाल वो सरकार और व्यवस्था के ख़िलाफ़ अपनी मुहिम को बतौर प्रेशर ग्रुप के तौर पर जारी रखेंगे.
इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए 15 अगस्त को सीजेपी ने 'स्कूल ठीक करो अभियान' भी शुरू किया है.
सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने हाल ही में बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया कि उनकी आगे की रणनीति क्या होगी. उन्होंने कहा कि इस बार पार्टी का ध्यान देश के स्कूलों की स्थिति सुधारने पर होगा. रांका ने कहा कि अगर सरकार ने स्कूलों के बारे में उनकी बात नहीं सुनी तो वे दोबारा आंदोलन करेंगे.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के पॉडकास्ट दिनभर में मोहनलाल शर्मा से बातचीत के दौरान आशुतोष रांका ने एलान किया कि 15 अगस्त को सीजेपी एक नए अभियान की शुरुआत करने जा रही है.
आशुतोष रांका ने बीबीसी न्यूज हिन्दी को बताया था, "हम लोग 15 अगस्त से स्कूल ठीक करो अभियान की शुरुआत कर रहे हैं. हम अपने बच्चों को स्कूलों से वंचित नहीं रहने देंगे. और यही है जंतर-मंतर का सीज़न-टू."
उनका कहना था, "हम चाहते हैं कि इस देश के लोग इस अभियान को लीड करें. देश में आज़ादी के बाद लगातार सरकारी स्कूलों को इग्नोर किया गया. जान-बूझकर गांव में रहने वाले हमारे बच्चों को शिक्षा से वंचित रखा गया. पिछले कुछ सालों में इस देश में 94 हज़ार स्कूल बंद हुए हैं. ये देश के बच्चों को सरकार द्वारा मजबूर बनाने की कोशिश लगती है."
सीजेपी के 'स्कूल ठीक करो अभियान' के लॉन्च करने के बाद से ही लगातार उनके सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो पोस्ट किए जा रहे हैं जिनमें देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद सरकारी स्कूलों की ख़राब हालत देखने को मिल रही है.
सीजेपी के फ़ाउंडर अभिजीत दीपके ने शनिवार को यह अभियान शुरू करने के बाद एक्स पर एक वीडियो पोस्ट कर कहा, "मुझे गाँव आकर ध्वजारोहण करने का अवसर मिला. मुझे इस बात का बहुत गर्व है, लेकिन यहां के सरकारी स्कूल की हालत देखकर बहुत दुख भी होता है कि आज़ादी के 80 साल बाद भी हम हमारे बच्चों के पढ़ाई के लिए अच्छे स्कूल नहीं बना पा रहे हैं."
लगातार बंद होते स्कूल
लेकिन इन सब बातों के बीच सीजेपी और उसके अभियान को लेकर एक मुख्य सवाल यह है कि बतौर प्रेशर ग्रुप सीजेपी कितनी छाप छोड़ने में कामयाब हो पा रही है.
साथ ही सीजेपी ने अभी तक ऐसा क्या अलग किया है जो देश के तमाम विपक्षी दल नहीं कर पा रहे थे. इसके अलावा सीजेपी के सामने किस तरह की चुनौतियां भी आ सकती हैं.
इन सवालों के जवाब जानने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री और वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शरद गुप्ता से बात की है.
हेमंत अत्री और शरद गुप्ता दोनों का ही मानना है कि अभी तक बतौर प्रेशर ग्रुप सीजेपी ने एक पॉज़िटिव छाप छोड़ी है और उनकी मुहिम का काफ़ी असर भी देखने को मिल रहा है.
हेमंत अत्री का कहना है कि सीजेपी अभी वही भूमिका निभाते हुए नज़र आ रही है जो कि सिविल सोसाइटी निभाया करती थी. उन्होंने कहा, "सिविल सोसाइटी की जो भूमिका होती है, सीजेपी अभी वैसी भूमिका निभाते हुए नज़र आ रही है."
"ये मानना पड़ेगा कि जो पहला आंदोलन जंतर-मंतर वाला था, उससे सीजेपी की साख़ मज़बूत हुई. इसमें कोई शक नहीं है. और अब जिस तरीके़ से ये इश्यूज़ को ले रहे हैं, जैसे स्कूल्स के अंदर फैसिलिटीज़ क्या हैं, उनका वो सब ऑडिट कर रहे हैं. वो भी एक बहुत ही अच्छा इनिशिएटिव है."
यूनिफ़ाइड डिस्ट्रिक्ट इंफ़ॉर्मेशन सिस्टम फ़ॉर एजुकेशन प्लस, देश भर के सभी स्कूलों से जुड़ी जानकारी ऑनलाइन एकत्र करने वाला एक बड़ा डेटाबेस है. इसके मुताबिक पिछले करीब 10 वर्षों में देश में स्कूलों की कुल संख्या में दो तरह के बदलाव देखने को मिले हैं.
2014-15 से 2017-18 के बीच स्कूलों की संख्या लगातार बढ़ी. इस दौरान स्कूलों की संख्या 15.16 लाख से बढ़कर 15.58 लाख हो गई, लेकिन 2018-19 के बाद स्कूलों की संख्या लगातार घटने लगी. 2022-23 तक यह संख्या घटकर 14.66 लाख रह गई.
यानी 2017-18 के मुकाबले करीब 92 हज़ार स्कूल कम हो गए. 2023-24 में थोड़ी बढ़ोतरी हुई, लेकिन 2024-25 में स्कूलों की कुल संख्या करीब 14.71 लाख रही, जो अभी भी 2017-18 के आंकड़े से काफी कम है.
रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूलों की संख्या में कमी का मतलब यह ज़रूरी नहीं है कि बच्चों की स्कूलों तक पहुंच कम हो गई है. इसके पीछे स्कूलों को आपस में मिलाने, कम बच्चों वाले स्कूलों को मर्ज करने और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने जैसी वजहें भी हैं.
'एक अच्छी पहल'
शरद गुप्ता कहते हैं, "सीजेपी का स्कूल ठीक करो अभियान, स्कूलों की असल हकीकत को बयां कर रहा है. कहीं पर टॉयलेट्स टूटे हुए हैं. कहीं पर पीने का पानी ही नहीं है. मीड डे मील में दाल की जगह पानी मिल रहा है. स्कूलों की हालत सच में बहुत ख़राब है."
"अगर पिछले 10 सालों में देश के एक लाख के करीब सरकारी स्कूल बंद हुए हैं. तो बाकी स्कूलों का क्या हाल है? ये स्कूल क्यों बंद हो रहे हैं?"
हेमंत अत्री मानते हैं कि जिस तरह से सीजेपी शिक्षा के मुद्दे पर फोकस कर रही है, वो एक अच्छी पहल है.
उन्होंने कहा, "सबसे बड़ी बात है कि सीजेपी अभी तक एक राजनीतिक दल नहीं है. जो भी उसका स्पेस है, वो वर्चुअल है. लेकिन वर्चुअल स्पेस में जिस तरीके से यंगस्टर्स को एक प्लेटफ़ॉर्म चाहिए था और जो वैक्यूम था, उसको इन्होंने कुछ हद तक भरा है."
"अभी तक सबसे ज़्यादा कोई नेगलेक्टेड फील्ड है तो वो एजुकेशन का है. चाहे ज़िला स्तर पर हो, या ब्लॉक लेवल पर, स्कूलों की हालत ख़राब ही रही है."
शरद गुप्ता मानते हैं कि स्कूलों की ख़राब हालत सिर्फ़ केंद्र सरकार का मसला नहीं है, बल्कि जहां-जहां विपक्ष की सरकारें भी हैं, वहां भी स्कूलों के अच्छे उदाहरण देखने को नहीं मिल रहे हैं.
उन्होंने कहा, "हम पश्चिम बंगाल की बात करें, वहां बीजेपी अभी सत्ता में आई है, 15 साल से टीएमसी की सरकार थी. लेकिन सोशल मीडिया पर हम बंगाल के ख़राब स्कूलों की हालत भी देख रहे हैं."
इन सब बातों के बीच यह सवाल भी निकलकर आता है कि क्या सीजेपी विपक्ष के स्पेस को भी कैप्चर कर रही है.
शरद गुप्ता कहते हैं, "आम आदमी से जुड़ी हुई समस्याओं को हर राजनीतिक दल को खासतौर पर विपक्ष को उठाना चाहिए. लेकिन होता क्या है कि आप आज विपक्ष में हैं. कल को सत्ता पक्ष में हैं. जो आज सत्ता पक्ष में है, कल कोई विपक्ष में होगा. तो लोगों की स्थिति सुधारने में किसी का इंटरेस्ट नहीं है. राजनीतिक दलों का इंटरेस्ट है सिर्फ सत्ता पाने में."
"सीजेपी अभी सत्ता की रेस में नहीं है और उसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है. इनके खिलाफ अभी तक केस नहीं है. सीजेपी को विपक्ष की तरह ईडी और सीबीआई के डर का सामना नहीं करना पड़ रहा है."
लेकिन शरद गुप्ता मानते हैं कि जैसे ही भविष्य में सीजेपी प्रेशर ग्रुप से राजनीतिक पार्टी में तब्दील होने की कोशिश करेगी तो उनके लिए राह मुश्किल हो सकती है.
उन्होंने कहा, "जिस दिन वो पॉलिटिकल पार्टी बनाते हैं उस दिन उनके अलग इंटरेस्ट शुरू हो जाएंगे. तब लोगों को भी सोचना होगा कि क्या सीजेपी व्यवस्था परिवर्तन ला पाएगी या ये भी सत्ता परिवर्तन में ही शामिल होकर रह जाएगी."
Worauf zu achten ist
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सीजेपी 15 अगस्त से 'स्कूल ठीक करो अभियान' के तहत आगे आंदोलन जारी रखेगी।
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- क्या सीजेपी भविष्य में एक राजनीतिक दल का रूप लेगी?
- स्कूल ठीक करो अभियान का सरकार पर कितना असर पड़ेगा?



