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Zurückओमान के पास अमेरिकी हमले में तीन भारतीय मरीन के मारे जाने के बाद मोदी सरकार के रुख़ पर चौतरफ़ा सवाल
ओमान के पास अमेरिकी हमले में तीन भारतीय मरीन के मारे जाने के बाद मोदी सरकार के रुख़ पर चौतरफ़ा सवाल
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BBC हिंदी13.6.2026Welt9 Min. LesezeitIndia

ओमान के पास अमेरिकी हमले में तीन भारतीय मरीन के मारे जाने के बाद मोदी सरकार के रुख़ पर चौतरफ़ा सवाल

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ओमान के पास अमेरिकी हमले में तीन भारतीय मरीन के मारे जाने के बाद भारत सरकार के रुख़ पर सवाल उठ रहे हैं. विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री से बात कर आपत्ति जताई है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की भारत को लेकर सोच बदल गई है.

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प्रकाशित एक मिनट पहले

पढ़ने का समय: 9 मिनट

ओमान के पास अमेरिकी हमले में तीन भारतीय मरीन के मारे जाने के बाद मोदी सरकार के रुख़ पर चौतरफ़ा सवाल उठ रहे थे.

केवल विपक्ष ही नहीं बल्कि मोदी सरकार से सहानुभूति रखने वाले लोग भी दबी ज़ुबान में सवाल पूछ रहे थे. विपक्ष तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछ रहा है कि उन्होंने इस पर एक शब्द भी क्यों नहीं बोला.

सामरिक मामलों से विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने अमेरिका को जवाब देने में भारत और चीन के बीच के फ़र्क़ को समझाया है.

चेलानी ने लिखा है, ''आठ से 11 जून के बीच अमेरिकी बलों ने विदेशी झंडे वाले तीन तेल टैंकरों पर हमला किया, जिन पर भारतीय चालक दल के सदस्य सवार थे. इनमें एमटी सेटेबेलो पर हुआ हमला भी शामिल था, जिसमें तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई.

''भारत ने इन घटनाओं पर एक नियमित कूटनीतिक विरोध दर्ज कराया है और ऐसा प्रतीत होता है कि वह इन हमलों के महत्व को कम करके दिखाने की कोशिश कर रहा है.''

''अगर मारे गए नाविक चीनी होते, तो बीजिंग की प्रतिक्रिया लगभग निश्चित रूप से अलग होती. चीन संभवतः इन हमलों को अमेरिका की ओर से एक प्रत्यक्ष और घातक उकसावे की कार्रवाई मानता और इसे एक बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट में बदल देता. चीन की प्रतिक्रिया केवल सार्वजनिक निंदा तक सीमित नहीं रहती.''

''बीजिंग संभवतः उन अमेरिकी रक्षा कंपनियों पर प्रतिबंध लगाता, जिनके हथियार इन हमलों में इस्तेमाल हुए. वह सैन्य-से-सैन्य संपर्क निलंबित कर सकता था और वॉशिंगटन के साथ व्यापक कूटनीतिक संवाद को भी रोक सकता था.''

''इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण 1999 का बेलग्रेड दूतावास बमबारी प्रकरण है. उस समय अमेरिकी मिसाइलों ने यूगोस्लाविया में स्थित चीनी दूतावास को निशाना बनाया था, जिसमें तीन चीनी पत्रकारों की मौत हो गई थी. इस घटना के बाद चीन में कई सप्ताह तक सरकार समर्थित अमेरिका-विरोधी प्रदर्शन हुए. बीजिंग स्थित अमेरिकी दूतावास पर पथराव किया गया और चीन-अमेरिका के बीच संवाद लगभग पूरी तरह ठप हो गया था.''

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इन सवालों के बीच भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने शुक्रवार रात एक्स पर एक पोस्ट के ज़रिए बताया कि उनकी बात अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से हुई है और उन्होंने तीन भारतीयों के मारे जाने का मुद्दा उठाया.

उन्होंने शुक्रवार को एक्स पर लिखा, "आज शाम अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से बात हुई. मैंने गल्फ़ में अमेरिकी नेवी के उन हमलों पर भारत की कड़ी आपत्ति दोहराई, जिनमें तीन भारतीय मारे गए थे. कमर्शियल शिपिंग के ख़िलाफ़ ऐसी जानलेवा कार्रवाई सही नहीं है."

लेकिन ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बाद भारत की विदेश नीति से जुड़े कई सवाल उठ रहे हैं. ट्रंप कई बार भारत को असहज कर चुके हैं लेकिन मोदी सरकार इन मामलों में संयम बरतना ज़्यादा पसंद करती है.

ट्रंप जब पिछले साल दूसरे कार्यकाल के लिए चुने गए तो शायद भारत को अंदाज़ा नहीं था कि चीज़ें इस क़दर बदल जाएंगी.

जब डोनाल्ड ट्रंप को जीत मिली तो भारत कहीं से भी निराश नहीं दिख रहा था.

पिछले साल नवंबर के दूसरे हफ़्ते में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने तो यहाँ तक कहा था कि डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका के दोबारा राष्ट्रपति बनने से कई देश नर्वस हैं लेकिन भारत उन देशों में नहीं है.

जयशंकर ने ये भी कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डोनाल्ड ट्रंप से अच्छे संबंध हैं और यह भारत के लिए अच्छा है.

आदित्य बिड़ला ग्रुप स्कॉलरशिप के सिल्लर जुबली प्रोग्राम को संबोधित करते हुए जयशंकर ने कहा था, ''ट्रंप के आने से कई देश नर्वस हैं लेकिन भारत उन देशों में नहीं हैं. ट्रंप के आने से चीज़ें शिफ़्ट करेंगी. शिफ़्ट तो हम भी कर रहे हैं. वो चाहे अर्थव्यवस्था के मामले में हो, इंडियन कॉर्पोरेट हों, उनकी पहुँच हो या फिर भारत के प्रोफ़ेशनल हों.''

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पिछले हफ़्ते गुरुवार को फ़िनलैंड में आयोजित 'कलटारंटा टॉक्स' के दौरान बातचीत में जब उनसे ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बारे में उनसे पूछा गया तो जवाब थोड़ा अलग था.

गिडियन रैकमैन ब्रिटिश अख़बार फ़ाइनैंशियल टाइम्स में चीफ़ फॉरन अफ़ेयर्स कॉमेंटेटर हैं. वो इस पैनल डिस्कशन को होस्ट कर रहे थे.

उन्होंने भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर से पूछा, ''अंतरराष्ट्रीय मामलों पर किसी भी चर्चा का संबंध आख़िरकार ट्रंप जुड़ जाता है. उनके दूसरे कार्यकाल की दिशा ने आपको कितना हैरान किया है? जब वे दोबारा चुने गए, तो बहुत से लोगों ने कहा था कि हम जानते हैं कि वह कैसे हैं, हम उन्हें पहले भी सत्ता में देख चुके हैं. क्या इस बार हम एक अलग ट्रंप का सामना कर रहे हैं?

इसके जवाब में जयशंकर ने कहा, ''यह स्वाभाविक है कि लोग एक कार्यकाल के अनुभव को दूसरे कार्यकाल पर लागू करके अनुमान लगाएं, लेकिन यह भी सच है कि दूसरे कार्यकाल की राजनीति काफ़ी अलग रही है. मेरा मानना है कि अमेरिका की उस राजनीति, उसकी संस्थाओं और व्यवस्थाओं का प्रभाव दुनिया के बाक़ी हिस्सों तक पहुँचा है.''

"एक तरह से इसका जवाब हाँ भी है और नहीं भी. पहले कार्यकाल और चुनाव से पहले के दौर ने हमें यह संकेत दे दिया था कि बहुत बड़े बदलाव आने वाले हैं. हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि जो कुछ हुआ, उसका काफ़ी हिस्सा पहले से घोषित किया गया था.''

"उदाहरण के लिए टैरिफ. बस दुनिया, जो अपनी पुरानी आदतों की आदी थी, यह मानने को तैयार नहीं थी कि इन घोषणाओं को वास्तव में लागू किया जाएगा. लोगों को लगता था कि यह केवल राजनीतिक बयानबाज़ी है, यह नीति नहीं बनेगी या व्यवहार में नहीं आएगी.''

"इस अर्थ में मैं कहूंगा कि हम सभी ऐसे कार्यकाल के लिए तैयार थे, जिसमें अतीत से, यहां तक कि ट्रंप के पहले कार्यकाल से भी, काफ़ी बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे. लेकिन मेरा मानना है कि शायद हममें से ज़्यादातर लोगों ने, सच कहूं तो शायद किसी ने भी नहीं, यह उम्मीद नहीं की थी कि यह बदलाव इतना व्यापक और इतना तीव्र होगा.''

"अब कुछ देशों और कुछ परिस्थितियों ने इसका प्रभाव कम महसूस किया है. मिसाल के तौर पर हमारे मामले में, हम अमेरिका के साथ किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं, इसलिए इसका असर हमारी सुरक्षा पर वैसा नहीं पड़ा जैसा किसी नेटो देश या द्विपक्षीय सुरक्षा संधि वाले देश पर पड़ता.''

"कुछ देश अन्य क्षेत्रों में अधिक प्रभावित हुए. उदाहरण के लिए टैरिफ़. कुछ देश प्रवासी नीतियों से अधिक प्रभावित हुए. इसलिए आप कोई भी मुद्दा चुन लीजिए, दुनिया पर इसका प्रभाव समान रूप से नहीं पड़ा.''

"लेकिन कुल मिलाकर मैं निश्चित रूप से कहूंगा कि दुनिया ने दूसरे कार्यकाल में पिछली नीतियों से हुए इस बदलाव की तीव्रता का सही अनुमान नहीं लगाया था.''

भारत को लेकर क्या अमेरिका की सोच बदल गई है?

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की नीतियां भारत को असहज करने वाली रही हैं.

इसी साल फ़रवरी महीने में अमेरिकी विदेश विभाग के सहायक मंत्री समीर पॉल कपूर ने कहा था, अमेरिका दक्षिण एशिया में किसी एक शक्ति को ज़्यादा प्रभावशाली बनने से रोकना चाहता है.

कपूर की इस टिप्पणी पर सामरिक मामलों के जाने माने विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी ने कहा था, ''कपूर की टिप्पणियां ट्रंप प्रशासन की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति की सोच को ही प्रतिबिंबित करती हैं. इस रणनीति के अनुसार, अमेरिका 'किसी भी देश को इतना शक्तिशाली नहीं बनने दे सकता' कि वह अमेरिकी हितों के लिए चुनौती बन जाए, और उसे 'वैश्विक के साथ क्षेत्रीय शक्ति संतुलन' बनाए रखना होगा.''

"अमेरिका की नज़र में ऐसा क्षेत्रीय ढांचा, जिसमें कई शक्तियां मौजूद हों, किसी एक देश के प्रभुत्व वाले ढांचे की तुलना में अधिक स्थिर और अमेरिकी हितों के अनुकूल है. भले ही वह देश उसका क़रीबी रणनीतिक साझेदार ही क्यों न हो.''

2017 की रणनीति के विपरीत, अमेरिका की नई राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में भारत का बहुत कम उल्लेख है.

उसमें केवल इतना कहा गया है कि अमेरिका भारत के साथ व्यापारिक और अन्य संबंधों को बेहतर बनाना चाहता है, ताकि वह इंडो-पैसिफिक सुरक्षा में योगदान दे सके.

अमेरिका की चिंताएं केवल भू-राजनीतिक नहीं हैं. हाल ही में नई दिल्ली की यात्रा के दौरान अमेरिकी उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडाउ ने कहा था, "हम भारत के साथ वही ग़लती नहीं दोहराएंगे जो हमने 20 साल पहले चीन के साथ की थी."

उन्होंने संकेत दिया था कि अमेरिका भारत को अपना बाज़ार विकसित करने की छूट देकर बाद में ख़ुद को व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में पीछे नहीं छोड़ना चाहता.

चेलानी ने लिखा है, ''अमेरिका अब भारत को पहले की तरह एक ऐसे रणनीतिक साझेदार के रूप में नहीं देखता जिसे मज़बूत किया जाए, बल्कि एक क्षेत्रीय और आर्थिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखने लगा है, जिसे सीमित या संतुलित रखा जाना चाहिए.''

नौ जून को अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में अशोका यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर कांति वाजपेयी ने कुछ इसी तरह की बात लिखी थी.

वाजपेयी ने लिखा था, ''भारत सही है या ग़लत, यह एक अलग बहस का विषय हो सकता है. लेकिन अमेरिका अब भारत को ऐसी शक्ति के रूप में नहीं देखता जिसे मज़बूत किया जाना चाहिए. इसके बजाय वह भारत को अपने उत्पादों, निवेश और हथियारों के लिए एक बड़े बाज़ार के रूप में देखता है. भविष्य आदर्शवाद का नहीं, बल्कि ठंडे दिमाग़ से किए जाने वाले लेन-देन और व्यावहारिक हितों की राजनीति का है.''

वाजपेयी ने लिखा है, ''क़रीब 30 सालों तक भारत ने चीन के ख़िलाफ़ रणनीतिक संतुलन, आतंकवाद के ख़िलाफ़ सहयोग, अपने निर्यात और निवेश के लिए अमेरिकी बाज़ार, कुशल भारतीय पेशेवरों के लिए अवसरों के साथ सैन्य उपकरणों के लिए अमेरिका की ओर देखा. व्यापक रूप से देखें तो अमेरिका भारत को अधिक सुरक्षित और अधिक शक्तिशाली बनाने में मदद करता था.''

"भारत में अमेरिकी दिलचस्पी भी इसी का प्रतिबिंब थी. भारत चीन के ख़िलाफ़ एक संतुलनकारी शक्ति था, आतंकवाद के ख़िलाफ़ एक साझेदार था, अमेरिकी निर्यात और निवेश के लिए एक बड़ा बाज़ार था, मानव संसाधन का स्रोत था और अमेरिकी हथियारों का एक प्रमुख ग्राहक था. भारत को औपचारिक सहयोगी नहीं माना जाता था, लेकिन एशिया में एक रणनीतिक साझेदार के रूप में उसे मज़बूत किया जाता था.''

"यह विशेष संबंध अब कमज़ोर पड़ गया है क्योंकि भारत को लेकर अमेरिका का नज़रिया बदल चुका है. आर्थिक दृष्टि से अमेरिका की अपेक्षाएं लगभग वही हैं, भारत उसके उत्पादों (अब ऊर्जा सहित), निवेश और हथियारों के लिए एक बड़ा बाज़ार बना रहे. दूसरी ओर, माइग्रेशन को लेकर अमेरिकी चिंताओं ने प्रतिभाशाली भारतीयों की मांग को पीछे छोड़ दिया है.''

"अमेरिका के भारत के प्रति बदले हुए रणनीतिक दृष्टिकोण को समझने के लिए यूरेशिया के प्रति उसके भू-राजनीतिक नजरिये को समझना होगा. यूरोप से लेकर, जो इस महाद्वीप के एक छोर पर है, जापान तक, जो दूसरे छोर पर स्थित है पिछले 30 सालों में (और वास्तव में उससे भी पहले से), अमेरिका यूरेशिया में तीन चुनौतियों को नियंत्रित करना चाहता रहा है. यूरोप में रूस, ऊर्जा-संपन्न खाड़ी क्षेत्र में इस्लामी कट्टरपंथ, और एशिया में चीन.''

यूरोप के मामले में जयशंकर का ये जवाब

जयशंकर ने फिनलैंड के उसी पैनल डिस्कशन में यूरोप को आड़े हाथों लिया.

दरअसल इस बातचीत के दौरान जयशंकर से यूक्रेन पर हमले में रूस से कथित सहानुभूति रखने और तेल ख़रीदने से जुड़े सवाल पूछे गए थे.

इसके जवाब में उन्होंने कहा, "अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बाड़ी मात्रा में रूसी तेल उपलब्ध था, क्योंकि यूरोपीय देश मध्य-पूर्व से तेल ख़रीद रहे थे, जो पहले भारत के पारंपरिक आपूर्तिकर्ता थे. ऐसे हालात में भारत को अपनी ज़रूरतों के लिए अनुसार फ़ैसले लेने पड़े.''

जब उनसे इस पर विस्तार से बोलने के लिए कहा गया, तो जयशंकर ने कहा, "यूरोप ऐसे हथियार बेचता है, जिनका इस्तेमाल भारत पर हमला करने के लिए किया जाता है. सिर्फ़ अभी नहीं, बल्कि कई सालों से ऐसा होता आया है. हम भारतीयों ने कभी ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे यूरोप की सुरक्षा को ख़तरा हो.''

शायद जयशंकर का इशारा पाकिस्तान की ओर था, जो यूरोप से भी हथियारों का सौदा होता है.

इसी साल जनवरी में पेरिस पहुँचे एस जयशंकर ने पोलैंड के उप प्रधानमंत्री रादोस्वाव सिकोर्सकी से पाकिस्तान को सैन्य मदद न देने के लिए कहा था.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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