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Backपीएम मोदी की यूरोप यात्रा: प्रेस फ्रीडम से रक्षा समझौते तक, क्या हैं मायने?
पीएम मोदी की यूरोप यात्रा: प्रेस फ्रीडम से रक्षा समझौते तक, क्या हैं मायने?
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BBC हिंदी24.05.2026Welt8 dk okumaIndia

पीएम मोदी की यूरोप यात्रा: प्रेस फ्रीडम से रक्षा समझौते तक, क्या हैं मायने?

Auf einen Blick

पीएम मोदी की यूरोप यात्रा ने प्रेस की स्वतंत्रता और रक्षा समझौतों जैसे मुद्दों पर चर्चा छेड़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये यात्राएं व्यापार से अधिक रणनीतिक महत्व रखती हैं, खासकर मध्य पूर्व में तनाव के बीच।

KI-generierte Zusammenfassung

Warum es wichtig ist

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया पांच देशों की यूरोप यात्रा ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई मुद्दों को जन्म दिया है। यूरोप में प्रेस की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर उठी चिंताओं के बीच भारत ने यूएई के साथ रक्षा समझौता किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन यात्राओं का महत्व केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है।

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प्रकाशित 2 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 11 मिनट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल में संपन्न हुई पांच देशों की यात्रा ने घरेलू सोशल मीडिया में काफ़ी चर्चा बटोरी.

यूरोप की यात्रा के दौरान नीदरलैंड्स व नॉर्वे में भारतीय प्रेस की स्वतंत्रता का मुद्दा उठा, जिसने मेहमान भारतीय पीएम की टीम को असहज स्थिति में डाला.

इससे देश में प्रेस फ्रीडम पर बहस छिड़ गई लेकिन दो रोज़ बाद ही घरेलू सोशल मीडिया ने उस टॉफी की चर्चा पकड़ ली, जो पीएम मोदी ने इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी को गिफ्ट की थी.

विशेषज्ञ मानते हैं कि इन हालिया यात्राओं के मकसद और हासिल की परतें, सोशल मीडिया के हर दिन बदलते ट्रेंड से कहीं अधिक स्थायी और गहरी हैं.

मध्य पूर्व में जारी संकट के बीच भी भारत ने यूएई से रक्षा समझौता किया. उस देश नीदरलैंड्स ने भारत को अपना रणनीतिक साझेदार घोषित किया, जहां सबसे पहले भारत में प्रेस की स्थिति और मानवाधिकार का मुद्दा छिड़ा था.

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वैश्विक परिप्रेक्ष्य में इन घटनाक्रमों को कैसे देखा जाए?

इसे समझने के लिए बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम "द लेंस" में विदेशी मामलों के विशेषज्ञों से चर्चा हुई.

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इस चर्चा में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा के साथ शामिल हुए पेरिस स्थित मीडिया इंडिया ग्रुप के मैनेजिंग एडिटर रणवीर सिंह नायर.

साथ ही, जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी की प्रोफे़सर डॉक्टर स्वास्ति राव ने अपने विचार रखे, जो द प्रिंट में विदेश और रणनीतिक मामलों की सलाहकार संपादक के रूप में कार्यरत हैं.

मुक्त व्यापार समझौते के बीच यूरोपीय दौरों की अहमियत

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हाल में भारत का यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौता हुआ, ऐसे में चार यूरोपीय देशों (नीदरलैंड्स, स्वीडन, नॉर्वे और इटली) की यात्रा की टाइमिंग को कैसे देखा जाए? सामरिक स्तर पर इसकी क्या अहमियत है?

पत्रकार रणवीर नायर कहते हैं, "भारत के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते को लेकर कोई भी यूरोपीय संघ का सदस्य देश खुद से फ़ैसला नहीं ले सकता, यह सिर्फ़ यूरोपीय संघ को देखना है. ऐसे में इससे ख़ास फर्क नहीं पड़ता."

हालांकि वे कहते हैं कि मध्य पूर्व में तनाव के बीच भारत के लिए ऊर्जा विविधीकरण ज़रूरी है, ऐसे में यूरोप में पीएम मोदी की यात्रा की टाइमिंग को वे कुछ हद तक अहम मानते हैं.

वे कहते हैं कि यूरोपीय देशों की यात्रा व्यापार नहीं बल्कि सामरिक स्तर पर अहम हैं क्योंकि ये भारत के लिए अलग-अलग तरह के मटीरियल के सप्लायर हैं.

वे नीदरलैंड्स का उदाहरण देते हैं, "टाटा के साथ यहां की एएसएमएल कंपनी का समझौता हुआ है, वह भारत को एआई क्षेत्र में बढ़ने में मददगार होगा. अगर ठीक से यह लागू हुआ तो भारत विश्वस्तरीय चिप बना पाएगा."

वे कहते हैं इटली और स्वीडन रक्षा से जुड़े सप्लायर हैं जो भारत को जहाज से लेकर तोप तक में मददगार हो सकते हैं.

पत्रकार स्वास्ति राव पीएम मोदी की इटली यात्रा को रेखांकित करते हुए कहती हैं, "इटली के साथ हमारा व्यापार अच्छा है लेकिन कुछ विवादों से हमारा रक्षा सहयोगी नहीं बन सका. अब इस तरफ कुछ अहम कदम उठे हैं. इसकी एयरोस्पेस व नेवल उपकरण निर्माता कंपनियां अब भारत में सक्रिय हो रही हैं. हाल ही में हेलिकॉप्टर पर एमओयू और डिफेंस रोडमैप साइन हुआ है."

मध्यपूर्व में तनाव के बीच यूएई के समझौते की अहमियत

मध्य पूर्व में जारी संकट के बीच संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा और रक्षा समझौता करके भारत ने क्या संकेत देने की कोशिश की है?

इसके जवाब में विदेश मामलों की पत्रकार प्रोफ़ेसर स्वास्ति राव का कहना है, "भारत के मध्य पूर्व में दो प्रमुख हित हैं. पहला हित- ऊर्जा से जुड़ा है क्योंकि मध्य एशिया में हम ऊर्जा आयात के लिए सऊदी, कतर और इराक पर बहुत निर्भर हैं. दूसरा हित- रक्षा से जुड़ा है. जिसमें इसराइल एक बड़ा रक्षा साझेदार बनकर उभरा है."

स्वास्ति का मानना है कि भारत की इसराइल व यूएई के साथ साझेदारी मजबूत हुई है क्योंकि भारत एक ऐसे समूह 'आई2यू2' का हिस्सा है, जिसे 'पश्चिम एशिया क्वाड' भी कहा जाता है. इन तीनों के अलावा इसमें अमेरिका भी शामिल है.

दूसरी ओर, भारत, इसराइल व यूएई इंडियन मिडिल ईस्ट यूरोप इकोनॉमिक कोरिडोर का भी हिस्सा हैं.

पीएम मोदी के दौरे पर हुए समझौते की अहमियत बताते हुए वे कहती हैं कि "वहां भारत का कोई सक्रिय बेस नहीं है, हम वहां पर एक तरीके का आंशिक बेस सेटअप कर सकते हैं."

"ओमान पोर्ट पर हमारे पास पहले से पहुंच के अधिकार हैं, अगर इसी तरह यूएई के पोर्ट में भी पहुंच मिले तो भारत के यूएई से रक्षा औद्योगिक सहयोग में तेज़ी आएगी."

'यूरोप ने प्रेस फ्रीडम का मुद्दा उठाकर भारत के प्रति रुख़ बदला'

16 मई को नीदरलैंड्स के एक अखबार की रिपोर्ट में डच पीएम के हवाले से लिखा गया कि वे भारत में 'प्रेस की आज़ादी' के अलावा, वहां 'अल्पसंख्यकों की स्थिति' को लेकर चिंतित हैं. यह रिपोर्ट डच और भारतीय पीएम की मुलाकात से ठीक पहले प्रकाशित हुई थी.

दूसरी ओर, 18 मई को पीएम मोदी और नॉर्वे के पीएम की संयुक्त प्रेस ब्रीफिंग के दौरान एक पत्रकार हेला लिंग के सवाल पूछने की कोशिश की. इन दोनों घटनाओं को विदेशी मामलों के पत्रकार रणवीर नायर यूरोप के बदले रुख़ के रूप में देखते हैं.

यहां यह भी ध्यान रखने योग्य है कि इन मुद्दों को भारतीय विदेश मंत्रालय के सचिव (वेस्ट) सिबी जॉर्ज ने यह कहते हुए खारिज़ किया था कि "भारत को लेकर इस तरह के सवाल ज्ञान की कमी की वजह से उठाए जाते हैं. उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां हर धर्म और समुदाय सुरक्षित है."

इस मामले में पत्रकार रणवीर सिंह नायर का कहना है, "ये टिप्पणियां काफी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि बीते 12 साल से मैंने देखा है कि यूरोपीय देश भारत के आंतरिक मामलों को 'नज़रअंदाज़' करते आए हैं. यूरोप में भारत को सिर्फ एक नज़र से देखा जाता रहा है कि वह 'इकोनॉमिक पावर हाउस' है. बहुत बड़ा बाज़ार है और यूरोप के लिए उस हिसाब से बहुत अहम है. लेकिन लगता है कि अब यूरोप ने रुख़ बदला है. यह भारत विशेषकर पीएम मोदी के लिए झटका है."

पत्रकार स्वास्ति राव कहती हैं, "प्रेस फ्रीडम वाले मुद्दे को सरकार को पर्सनल अटैक के तौर पर नहीं लेना चाहिए था. हमें समझना पड़ेगा कि यह उनकी संस्कृति का हिस्सा है कि विदेशी नेता मीडिया के सामने आकर सवालों का जवाब देते हैं."

वे समझाती हैं कि "अब भी यूरोप में कई जगहों पर आदर्श लोकतंत्र की स्थिति है इसलिए हमें अपने साझेदार की संस्कृति को भी समझना पड़ेगा जैसा कि हम अपनी संस्कृति को लेकर अपेक्षा करते हैं."

वे संकेत देती हैं कि "ऐसे सवाल यूएई में उठने की संभावना यूरोप के मुकाबले कम है."

फ्रांस दौरे पर फिर न उठ जाए यह मुद्दा

सवाल पूछने की स्वतंत्रता और मानवाधिकार के मुद्दे पर भारत को यूरोप में 'घेरे जाने' के बाद भविष्य के लिए पत्रकार रणवीर सिंह नायर आगाह करते हैं.

वह कहते हैं, "अब जबकि इन दो देशों में ये मुद्दे उठे हैं तो संभव है कि आगे भी ऐसा हो. आगामी जून में जी-7 समूह की मीटिंग के लिए पीएम मोदी फ्रांस जाएंगे, वहां भारत को शामिल होने के लिए न्यौता मिला है. ऐसे में वहां भी अंदेशा है कि फ्रांसीसी प्रेस इसी पर सवाल पूछ सकती है. और यह मेरे ख्याल से भारत के लिए कोई बहुत अच्छी चीज़ नहीं थी कि इस बात पर फोकस हुआ है."

हालांकि यह भी कहते हैं कि "भारत को लेकर उठे मुद्दे कुछ हद तक जरूरी भी हैं क्योंकि भारत में जो हो रहा है, वह दुनिया के लिए एक चिंता का विषय है."

नीदरलैंड्स का भारत को रणनीतिक साझेदार मानना अहम

भारत को लेकर नीदरलैंड्स की मीडिया ने भले चिंताएं जताई हों लेकिन इस देश ने भारत को अपना रणनीतिक साझेदार घोषित करके इसकी अहमियत को रेखांकित किया है. इस विरोधाभास को कैसे देखा जाना चाहिए?

इसके जवाब में पत्रकार नायर कहते हैं, "मेरे ख्याल से वे भारत की वर्तमान सरकार व भारतीय लोगों को दो अलग एलिमेंट में बांटकर देख रहे हैं. क्योंकि ऐसा नहीं हो सकता कि वे अचानक ही भारत से सारे संबंध तोड़ दें और फिर भारत को आइसोलेशन में डाल दें. हां ऐसा करके वे भारत सरकार को कम से कम यह अहसास दिला रहे हैं कि इस मुद्दे पर उनकी नज़र है और वो इस पर बात करना चाहते हैं."

प्रेस फ्रीडम में नंबर एक नॉर्वे भारत के लिए अहम

प्रेस की स्वतंत्रता के इंडेक्स में लंबे समय से नॉर्वे नंबर एक बना हुआ है. यहीं पर पीएम मोदी के प्रेस से सवाल न लेने का मुद्दा मुखरता से उठा था जो विवाद में बदल गया.

पत्रकार नायर बताते हैं कि भारत की ऊर्जा जरूरत के हिसाब से नॉर्वे अहम देश है. यह फॉसिल फ़्यूल का बड़ा उत्पादक है और ग्रीन एनर्जी पर भी उसका अच्छा काम है.

वहीं, पत्रकार राव बताती हैं कि "नॉर्वे में दुनिया का सबसे बड़ा 2.5 से 3 ट्रिलियन डॉलर का सरकारी निवेश फंड है. इसकी तुलना करें तो भारत की पूरी डीजीपी करीब 4 ट्रिलियन डॉलर की है. ऐसे में भारत नॉर्वे से निवेश चाहता है और इसीलिए वहां का दौरा करके पीएम मोदी ने रिश्तों की बेहतरी का कदम बढ़ाया है."

वह नॉर्वे की अहमियत को इस तरह भी बताती हैं कि वह एक गैर ईयू सदस्य देश है और जिस ईएफटीए का हिस्सा है, उसके साथ भारत ने मुक्त व्यापार समझौता किया है.

नॉर्वे के आफ्टर पोस्टेन अखबार में पीएम मोदी को एक संपेरे के रूप में दर्शाने वाले एक विवादास्पद कार्टून को पत्रकार नायर यूरोप का 'औपनिवेशिक दृष्टिकोण' नहीं मानते. बल्कि उनका कहना है, "मेरे हिसाब से यह एक संदेश है कि देश को एक नेता किस तरफ़ ले जा रहा है."

रूस से संबंधों का संतुलन और यूरोप से बढ़ती दोस्ती

भारत-रूस के पारंपरिक संबंधों के बीच भारत और यूरोप के रिश्ते कितने मजबूत रह पाएंगे?

जिस तरह से रूस के मुद्दे पर यूरोप की चिंता और भारत का अपने हितों को सुरक्षित रखने की कोशिश दिखी है. इस बैलेंस को यूरोप की नज़र से कैसे देखा जाना चाहिए?

इस पर पत्रकार रणवीर नायर का मानना है, "अभी यूरोप के लिए भारत से संबंधों को मजबूती देना बहुत जरूरी है. यूरोप जानता है कि भारत और रूस के पारंपरिक संबंधों को वह या अमेरिका तोड़ नहीं पाएंगा. "

उनकी राय है कि "यूरोप को ऐसा बीच का रास्ता ढूंढना पड़ेगा जिसमें उनका भारत से रिश्ता मजबूत हो और भारत के अन्य देशों जैसे रूस से रिश्ते चलते रहें."

हालांकि पत्रकार स्वास्ति राव का मानना है कि रूस के साथ ऐतिहासिक रिश्ते होने के बावजूद ऐसा नहीं है कि भारत-रूस रिश्तों में कोई बदलाव नहीं आया है.

वह तर्क देती हैं, "एक जमाने में रूस के साथ रक्षा उपकरण बहुत ज्यादा खरीदे जाते थे, लेकिन सिपरी की रिपोर्ट भी बताती है कि अब इसराइल और फ्रांस इस मामले में बड़े साझेदार हैं. अब हम रूस से बहुत ज्यादा तेल का आयात करते हैं जो मध्य पूर्व के तनाव के बीच हमारे लिए राहत बनकर उभरा है."

वे मानती हैं कि रूस से जोड़कर भारत और यूरोप के रिश्तों में सामरिक स्तर पर ज़रूर पेंच पैदा हो सकता है, लोकतांत्रिक मूल्यों में दोनों बराबर हैं. पत्रकार राव कहती हैं, "स्ट्रीटिजिक लेवल या हथियारों की टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के स्तर पर यूरोप फिर अपने हाथ थोड़े और पीछे खींच सकता है. वह कह सकता है कि हम पूरी तकनीक नहीं देंगे क्योंकि आपका (भारत) रूस के साथ रक्षा स्तर पर भी अच्छा संबंध है."

भारत-पाक को अब एक ही तराजू में नहीं रखता यूरोप

पत्रकार रणवीर नायर कहते हैं कि "पिछले साल के भारत-पाक संघर्ष से तो यूरोप के दृष्टिकोण में कोई फर्क नहीं दिखा. लेकिन यूरोप ने करीबन पांच-छह साल से दोनों देशों को अलग-अलग रखना शुरू कर दिया है. यूरोप को अहसास हो गया है कि भारत के साथ आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते मज़बूत करने के लिए वह, भारत और पाकिस्तान को एक ही तराजू में नहीं तोल सकता. "

वे यह भी जोड़ते हैं कि "दोनों की अपनी अलग-अलग मजबूती और कमज़ोरी है, उस हिसाब से उन्होंने काफी पहले भारत को एक विशेष दर्जा देना शुरू कर दिया था जिसमें न वृद्धि हुई है और न कमी आई है."

इसी मामले में पत्रकार स्वास्ति राव इटली का उदाहरण देते हुए कहती हैं कि भले भारत और इटली की पीएम की केमेस्ट्री चर्चा का विषय बनती हो, लेकिन यहां भी भारत की एक 'रेड लाइन' है. वह बताती हैं, "भारत ने इटली के साथ डिफेंस इंडस्ट्रियल रोडमैप साइन किया है लेकिन इटली का पाकिस्तान से साथ समानांतर रक्षा संबंध है."

Worauf zu achten ist

KI-Ausblick — Möglichkeiten, keine Fakten

  • फ्रांस में जी-7 बैठक के दौरान फ्रांसीसी प्रेस द्वारा भारत में प्रेस की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर सवाल उठाए जा सकते हैं।

    Wahrscheinlich · Innerhalb von Tagen

  • भारत और यूरोप के बीच रक्षा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के स्तर पर कुछ पेंच पैदा हो सकते हैं, क्योंकि यूरोप भारत के रूस के साथ रक्षा संबंधों को लेकर सतर्क रह सकता है।

    Möglich · Mittelfristig

Offene Fragen

  • यूरोप में प्रेस की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर उठाई गई चिंताओं का भारत के भविष्य के कूटनीतिक संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
  • यूएई के साथ रक्षा समझौते से भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति कैसे मजबूत होगी?
  • क्या भारत रूस के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को बनाए रखते हुए यूरोप के साथ अपनी दोस्ती को और गहरा कर पाएगा?
  • नीदरलैंड्स द्वारा भारत को रणनीतिक साझेदार घोषित करने के पीछे क्या कूटनीतिक मंशा है, जबकि मीडिया में चिंताएं जताई गई हैं?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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