
चीन में लागू हुआ नया 'एथनिक यूनिटी लॉ' विदेश में बैठे आलोचकों के लिए चिंता का सबब बन गया है। यह कानून सरकार को देश के बाहर रहने वाले लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई करने का अधिकार देता है, जिससे तिब्बती, वीगर और मंगोल जैसे अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की आवाज उठाने वाले निशाने पर आ सकते हैं।
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चीन इस नए क़ानून से क्या विदेश में बैठे आलोचकों को निशाना बना सकता है?
Author, लॉरा बिकर
पदनाम, चीन संवाददाता
प्रकाशित 5 मिनट पहले
पढ़ने का समय: 10 मिनट
23 साल की झांग यादी, जिन्हें तारा के नाम से भी जाना जाता है. उन्हें इस वक्त ब्रिटेन की एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करनी चाहिए थी.
लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि तारा को फिलहाल चीन के अंदर हिरासत में रखा गया है.
सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म 'एक्स' पर अपनी आख़िरी पोस्टों में से एक में उन्होंने दलाई लामा को 90वें जन्मदिन की शुभकामनाएं दी थीं. फ्रांस में पढ़ाई के दौरान उन्होंने चीनी भाषा के एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के संपादन में मदद भी की थी. यह प्लेटफॉर्म तिब्बती लोगों के अधिकारों को बढ़ावा देता है.
माना जाता है कि विदेश में रहते हुए तिब्बतियों के समर्थन में लिखी गई उनकी बातें ही उनकी जेल जाने की वजह बनीं. निर्वासन में रह रहे आध्यात्मिक नेता दलाई लामा को चीन एक अलगाववादी मानता है.
चीन ने 1950 में तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र को अपने नियंत्रण में लिया था और इसे वह अपने देश का अभिन्न हिस्सा बताता है.
रिपोर्टों के मुताबिक, पिछले साल जुलाई में तारा चीन गई थीं और इसी वक्त युन्नान प्रांत के शांग्री-ला शहर में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.
माना जा रहा है कि तारा पर, "दूसरों को देश तोड़ने और राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने के लिए उकसाने" का आरोप लगाया गया है.
तारा की कहानी दिखाती है कि चीन सरकार असहमति या जिसे वह अलगाववाद मानती है, उसे कितना कम बर्दाश्त करती है.
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यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब चीन में एक नया क़ानून लागू हो रहा है. इस क़ानून से सरकार को देश की सीमाओं के बाहर रहने वाले लोगों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई करने का क़ानूनी आधार मिल सकता है.
चीन पर लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं कि वह विदेशों में रहने वाले अपने ऐसे नागरिकों को डराने धमकाने की कोशिश करता है जो सरकार की आलोचना करते हैं.
इसमें वीगर कार्यकर्ताओं पर दबाव बनाना, निर्वासन में रह रहे सरकार के आलोचकों का पीछा करना और हांगकांग के लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं पर इनाम घोषित करना शामिल है.
'एथनिक यूनिटी लॉ' 1 जुलाई से चीन में लागू हो गया है.
यह क़ानून ऐसे समय लागू हो रहा है जब चीन दुनिया में एक बड़ी ताक़त के रूप में अपनी छवि मजबूत करने की कोशिश कर रहा है.
चीन एक तरफ विदेशी नेताओं और पर्यटकों का स्वागत कर रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री सर किएर स्टार्मर समेत दुनिया के कई नेता चीन के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल पहुंचे. वहां उन्होंने रेड कार्पेट पर चलते हुए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की.
चीन ने वीज़ा नियमों में ढील दी है. उसने खास ऑनलाइन अभियान भी शुरू किए हैं.
इनका मकसद यूरोप के ज़्यादातर देशों समेत 77 देशों के लोगों को चीन घूमने के लिए आकर्षित करना है.
सोशल मीडिया पर कई इन्फ्लुएंसर चीन की यात्रा के वीडियो और तस्वीरें साझा कर रहे हैं. वे तिब्बत और शिनजियांग जैसे सख्त निगरानी वाले इलाकों में भी जा रहे हैं. उनकी पोस्ट में चीन की प्राकृतिक खूबसूरती और अलग-अलग तरह के इलाकों को दिखाया जा रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह नया क़ानून शी जिनपिंग के लिए मददगार साबित हो सकता है. इससे विदेशों में चीन की आलोचना करने वालों पर दबाव बनाने में मदद मिल सकती है.
ये लोग अपने अनुभव और जानकारी के ज़रिए चीन की सरकार के दावों को चुनौती देते हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह क़ानून चीन की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान भी पहुंचा सकता है.
यूरोपीय संसद के कई सदस्यों ने पहले ही चेतावनी दी है कि चीन के साथ प्रत्यर्पण संधियों पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए.
उनका कहना है कि अगर इस क़ानून का इस्तेमाल यूरोपीय नागरिकों के ख़िलाफ़ किया गया, तो इससे यूरोपीय संघ और चीन के रिश्तों पर गंभीर असर पड़ सकता है.
विदेशों में रहने वाले आलोचक क्यों चिंतित हैं?
इस क़ानून का उद्देश्य चीन के 56 जातीय समुदायों के बीच एकता और साझा राष्ट्रीय पहचान बनाना बताया गया है.
इन समुदायों में तिब्बती और वीगर भी शामिल हैं. ये दोनों समुदाय पहले कई बार चीनी शासन के ख़िलाफ़ विरोध और विद्रोह कर चुके हैं.
लेकिन आलोचकों को डर है कि यह क़ानून तिब्बत, शिनजियांग और इनर मंगोलिया में रहने वाले अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों को और कमजोर कर सकता है.
इस क़ानून में एक ऐसा प्रावधान भी है जिसने विदेशों में रहने वाले कई चीनी नागरिकों की चिंता बढ़ा दी है.
आलोचकों का कहना है कि इस प्रावधान का असर चीन के बाहर रहने वाले लोगों पर भी पड़ सकता है.
इस क़ानून का अनुच्छेद 63 चीन की सरकार को देश के बाहर भी कार्रवाई करने का अधिकार देता है.
अगर कोई संगठन या व्यक्ति चीन के मुताबिक 'जातीय एकता और प्रगति को कमजोर करता है' या 'जातीय विभाजन पैदा करता है' तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जा सकती है.
इसका मतलब यह है कि विदेशों में रहकर अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की आवाज़ उठाने वाले लोगों को भी चीन निशाना बना सकता है.
एमनेस्टी इंटरनेशनल की उप-क्षेत्रीय निदेशक सारा ब्रूक्स कहती हैं, "यह क़ानून विविधता और समानता की रक्षा करने के बजाय लोगों से एक जैसी सोच और व्यवहार अपनाने की मांग करता है."
उनका कहना है कि दुनिया के किसी भी हिस्से में रहकर अगर कोई व्यक्ति चीन के अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की शांतिपूर्ण तरीके से भी बात करता है, तो उसे 'जातीय एकता को कमजोर करने' वाला बताया जा सकता है.
सारा ब्रूक्स के मुताबिक, यह क़ानून उन नीतियों को क़ानूनी आधार देता है जिनकी वजह से पहले ही वीगर मुसलमानों, तिब्बतियों और दूसरे समुदायों के अधिकारों को गंभीर नुकसान पहुंच चुका है.
हालांकि इस क़ानून को दूसरे देशों में लागू करना आसान नहीं होगा.
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसका मकसद लोगों को इस विषय पर बोलने या बहस करने से रोकना हो सकता है.
विदेशों में रहने वाले कई प्रमुख कार्यकर्ताओं के परिवार अब भी चीन में रहते हैं.
उनका कहना है कि यह क़ानून उनके लिए एक साफ संदेश है कि विदेश में रहकर कही गई उनकी बातों का असर चीन में रहने वाले उनके परिवारों पर पड़ सकता है.
उन्हें यह भी डर है कि भविष्य में वे शायद ही कभी सुरक्षित तरीके से अपने देश वापस लौट पाएं.
चीन के बाहर रहने वाले कई प्रमुख कार्यकर्ताओं और आलोचकों ने तिब्बतियों, वीगरों और मंगोल समुदाय के लोगों के साथ चीन सरकार के व्यवहार पर सवाल उठाए हैं.
उन्होंने मानवाधिकार संगठनों को बताया है कि पिछले एक साल में चीन में रहने वाले उनके परिवारों को पहले के मुकाबले ज्यादा धमकियां मिल रही हैं.
निर्वासन में रह रहे तिब्बती इस क़ानून को लेकर खास तौर पर चिंतित हैं. इसकी एक वजह यह भी है कि यह क़ानून दलाई लामा के 91वें जन्मदिन से कुछ ही दिन पहले लागू हुआ है.
चीन की 'सिनिसाइजेशन' नीति क्या है?
चीन की सरकार ने साल 2000 के दशक के आखिर में 'सिनिसाइजेशन' यानी 'चीनीकरण' की नीति पर ज़ोर देना शुरू किया.
इस नीति का मकसद अलग-अलग जातीय समुदायों को चीन के सबसे बड़े और प्रभावशाली हान समुदाय की संस्कृति में शामिल करना है.
सरकार का कहना है कि इससे पूरे देश में एक साझा राष्ट्रीय पहचान बनेगी. चीन की करीब 140 करोड़ आबादी में 90 प्रतिशत से ज्यादा लोग हान समुदाय से हैं.
राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी कई बार अल्पसंख्यक समुदायों से मुख्यधारा में ज्यादा घुलने-मिलने की अपील कर चुके हैं.
उन्होंने कहा है कि सभी समुदायों को 'अनार के दानों की तरह एकजुट' होकर रहना चाहिए, ताकि चीन और मजबूत बन सके.
यह नया कानून भी उसी नीति का हिस्सा माना जा रहा है. सरकार का कहना है कि शिक्षा और आवास जैसी योजनाओं के जरिए अलग-अलग समुदायों के बीच एकता बढ़ाई जाएगी.
कानून के मुताबिक अब सभी बच्चों को शुरुआत से लेकर हाई स्कूल तक मैंडरिन भाषा पढ़नी होगी.
पहले तिब्बती, वीगर और मंगोल जैसे समुदायों के छात्र अपनी मातृभाषा में भी पढ़ाई कर सकते थे.
चीन का कहना है कि इस बदलाव का मकसद अगली पीढ़ी को बेहतर अवसर देना है. सरकार के मुताबिक, पूरे चीन में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली मैंडरिन भाषा सीखने से अल्पसंख्यक समुदायों के युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे.
लेकिन आलोचकों का कहना है कि ज्यादातर यह बदलाव अल्पसंख्यक समुदायों पर जबरन थोपा गया है.
उनके मुताबिक, राष्ट्रपति शी जिनपिंग के कार्यकाल में विरोध और असहमति के प्रति सरकार का रुख पहले से ज्यादा सख्त हुआ है और इसी के साथ यह नीति भी तेज़ी से लागू की गई है.
तिब्बत में अधिकारियों ने कई बौद्ध भिक्षुओं को गिरफ्तार और कई मठों को अपने नियंत्रण में ले लिया है.
आलोचकों का कहना है कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि वहां दलाई लामा की पूजा न हो सके. पिछले साल जुलाई में बीबीसी ने तिब्बत के एक ऐसे मठ का दौरा किया था, जो कभी विरोध का प्रमुख केंद्र माना जाता था.
वहां के भिक्षुओं ने बताया था कि वे डर और दबाव के माहौल में रह रहे हैं.
शिनजियांग में चीन सरकार ने लाखों वीगर मुसलमानों को कैंपों में बंद कर रखा है. सरकार इन्हें 'री-एजुकेशन' केंद्र कहती है.
लेकिन मानवाधिकार संगठनों ने इसमें करीब दस लाख वीगर मुसलमानों की नजरबंदी का दस्तावेजीकरण किया है. संयुक्त राष्ट्र भी चीन पर गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगा चुका है.
2020 में उत्तरी चीन में मंगोल समुदाय के लोग सड़कों पर उतर आए थे. उनकी मांग थी कि स्कूलों में मंगोलियाई भाषा में पढ़ाई बंद न की जाए.
दरअसल, सरकार मंगोलियाई की जगह मैंडरिन भाषा में पढ़ाई लागू करना चाहती थी. कई अभिभावकों ने विरोध में बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया था.
उनका मानना था कि यह कदम उनकी सांस्कृतिक पहचान के लिए ख़तरा है, लेकिन सरकार ने सख्ती से कार्रवाई की और विरोध की आवाजें दब गईं.
नया क़ानून माता-पिता और अभिभावकों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई का रास्ता खोलता है. अगर वे बच्चों में ऐसे विचार भरते हैं जो सरकार की नज़र में 'नुकसानदेह' हैं और जातीय सद्भाव को नुकसान पहुंचाते हैं, तो उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है.
क़ानून में एक-दूसरे से घुल-मिलकर सामुदायिक माहौल बनाने की बात भी कही गई है. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इससे अल्पसंख्यक बहुल इलाके अलग-थलग पड़ सकते हैं.
पिछले महीने इस क़ानून को पेश करने के लिए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई थी. इसमें डिप्टी जस्सिट मिनिस्टर हू वेइली ने विदेशी मीडिया की आलोचना की थी.
इस साल की शुरुआत में पेन अमेरिका और साउदर्न मंगोलियन ह्यूमन राइट्स इन्फॉर्मेशन सेंटर ने एक रिपोर्ट जारी की थी.
इसमें दावा किया गया है कि चीन के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से मंगोलियाई भाषा का कंटेंट व्यवस्थित तरीके से हटाया जा रहा है.
रिपोर्ट के मुताबिक सोशल मीडिया ग्रुप बंद और अकाउंट डिलीट किए जा रहे हैं. इसके अलावा डिजिटल समुदायों को भी निशाना बनाया जा रहा है.
पेन अमेरिका के पेन/बार्बी फ्रीडम टू राइट सेंटर की सीनियर मैनेजर एरिका न्गुयेन कहती हैं, "जैसे-जैसे एथनिक यूनिटी लॉ लागू होगा, चीन सरकार के दमन का शिकंजा कसता जाएगा."
वे कहती हैं, "सरकार बेशर्मी से सांस्कृतिक संस्थाओं, टेक्नोलॉजी और मीडिया को हथियार बना रही है और इसका मकसद मंगोलियाई संस्कृति का एक सरकारी संस्करण थोपना है."
न्गुयेन 'सेव अवर मदर टंग' नाम की रिपोर्ट की सह-लेखिका भी हैं. यह रिपोर्ट चीन में मंगोलियाई संस्कृति के ऑनलाइन दमन और मिटाए जाने पर आधारित है.
उनका मानना है कि इस क़ानून की धारा 63 को दूसरे देशों के लिए एक चेतावनी की तरह देखा जाना चाहिए.
वे कहती हैं कि इस क़ानून के बाद अन्य देशों को निर्वासित तिब्बती, वीगर और मंगोल लेखकों, कलाकारों, पत्रकारों और कार्यकर्ताओं की रक्षा करने और उन्हें सहयोग देने के लिए आगे आना चाहिए. ये लोग अपनी जान जोखिम में डालकर अपना काम जारी रखे हुए हैं.
जैसे ही यह क़ानून लागू होगा, मानवाधिकार संगठनों को डर है कि अल्पसंख्यक भाषाओं को स्कूलों और सरकारी कामकाज से बाहर कर दिया जाएगा.
चीन में ऐसी जगहें और भी कम हो जाएंगी जहां ये भाषाएं पढ़ाई या बोली जाती हों. साथ ही यह भी आशंका है कि यह क़ानून चीन की सीमाओं से परे भी इस मुद्दे पर बहस की गुंजाइश को खत्म कर देगा.
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