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Zurückगिलगित-बल्तिस्तान में सिंधु नदी से सोना निकालने वाली भारी मशीनों से क्यों डरे हुए हैं लोग?
गिलगित-बल्तिस्तान में सिंधु नदी से सोना निकालने वाली भारी मशीनों से क्यों डरे हुए हैं लोग?
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BBC हिंदीvor 20 StundenEnvironment6 Min. LesezeitIndia

गिलगित-बल्तिस्तान में सिंधु नदी से सोना निकालने वाली भारी मशीनों से क्यों डरे हुए हैं लोग?

गिलगित-बल्तिस्तान में सिंधु नदी के किनारे भारी मशीनों से सोना निकालने का काम तेज़ी से बढ़ रहा है, जिससे स्थानीय लोग, पर्यावरण और बुनियादी ढाँचे के लिए बड़ा ख़तरा पैदा हो गया है।

Auf einen Blick

गिलगित-बल्तिस्तान में सिंधु नदी पर भारी मशीनों से हो रहे सोने के खनन के कारण बड़े पैमाने पर भूमि कटाव हो रहा है। स्थानीय लोग, मानवाधिकार कार्यकर्ता और सरकारी विभाग पुलों, पर्यावरण और बांधों को पहुँचने वाले नुक़सान को लेकर चिंता जता रहे हैं।

KI-generierte Zusammenfassung

Warum es wichtig ist

गिलगित-बल्तिस्तान में सिंधु नदी के किनारे पारंपरिक तरीकों के बजाय भारी मशीनों से सोने का खनन बढ़ गया है।

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पाकिस्तान के प्रशासन वाले क्षेत्र गिलगित-बल्तिस्तान के रहने वाले बाक़िर हुसैन की ज़िंदगी बाग़वानी और खेती पर निर्भर है. लेकिन पिछले कुछ समय से सिंधु नदी के किनारे स्थित उनकी कृषि भूमि तेज़ी से नदी में समा रही है.

बाक़िर, ज़िला हुंज़ा की तहसील नासिराबाद के 'शीना' क्षेत्र के निवासी हैं. उनका कहना है कि जब से सिंधु नदी के किनारे नदी की मिट्टी से सोना निकालने के लिए भारी मशीनें लगाई गई हैं, तब से भूमि कटाव साफ़ तौर पर बढ़ गया है.

बाक़िर कहते हैं कि उन्होंने अपनी खेती की ज़मीन की सीमा तय करने के लिए जो पत्थर लगाए थे, वह जगह अब नदी में समा चुकी है.

उनके अनुसार, अब ऐसा लगता है कि सिंधु नदी रोज़ उनकी ज़मीन का कुछ हिस्सा अपने साथ बहाकर ले जा रही है.

बाक़िर के मुताबिक़, यह स्थिति इसलिए भी ज़्यादा चिंताजनक है क्योंकि उनकी रोज़ी-रोटी इसी भूमि पर होने वाली खेती से चलती है.

हालांकि शीना क्षेत्र के लोगों के लिए यह कोई नई बात नहीं है.

वो कहते हैं, "मैंने संबंधित विभागों को आवेदन भी दिए हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई."

उनका कहना है कि जब से सोने की तलाश के लिए सिंधु नदी के किनारों पर भारी मशीनों की संख्या बढ़ी है, तब से उनकी समस्याएँ भी बढ़ गई हैं.

अब स्थिति यह है कि शीना की पूरी आबादी स्थानीय विलेज काउंसिल के नेतृत्व में सिंधु नदी के किनारे होने वाले सोना खनन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रही है.

विलेज काउंसिल के अध्यक्ष मुमताज़ अली ने बीबीसी से बातचीत में दावा किया कि इस स्थिति के कारण अब तक स्थानीय लोगों की कम से कम 40 कनाल खेती योग्य ज़मीन नदी में समा चुकी है.

उन्होंने दावा किया कि सोना निकालने के लिए सिंधु नदी के प्राकृतिक किनारों को कई जगह खोदकर गहरे गड्ढों और झील में बदल दिया गया है.

मुमताज़ अली के अनुसार, यह विरोध केवल शीना तक सीमित नहीं है. ज़िला नगर में भी सिंधु नदी के किनारे रहने वाले लोग सोना खनन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं.

स्थानीय लोगों के अनुसार, पिछले कुछ वसालों में सिंधु नदी के किनारों से पारंपरिक तरीक़े से सोना निकालने की बजाय भारी मशीनों का इस्तेमाल शुरू हो गया है.

गिलगित-बल्तिस्तान के खनिज विभाग के अनुसार, अब तक सोना खनन के लिए कम से कम 77 लीज़ समझौते जारी किए जा चुके हैं. इनमें से पाँच समझौते विदेशी कंपनियों को दिए गए हैं, जबकि बाकी स्थानीय कंपनियों को मिले हैं.

खनिज विभाग के महानिदेशक मुहम्मद ज़ुबैर के अनुसार, क़ानूनी समझौतों के अलावा ग़ैरक़ानूनी खनन भी हो रहा है. सरकार और संबंधित विभाग इसके बारे में नीति तैयार कर रहे हैं.

'हमें जीने का हक़ दिया जाए'

गिलगित-बल्तिस्तान के मानवाधिकार और पर्यावरण कार्यकर्ता बाबा जान कहते हैं, "हम कुछ नहीं माँगते. हम सिर्फ़ इतना कहते हैं कि हमें जीने का हक़ दिया जाए. गिलगित-बल्तिस्तान पर्यावरण के लिहाज़ से बहुत संवेदनशील इलाक़ा है."

वो कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान की वजह से क्षेत्र पहले ही कई समस्याओं का सामना कर रहा है. ऐसे में अगर बड़ी मशीनों से सोने का खनन किया जाएगा तो स्थानीय लोगों के लिए तबाही को रोकना मुश्किल हो जाएगा.

उनका दावा है कि कुछ समय पहले तक नदी में सोना निकालने की अनुमति नहीं थी. लेकिन जब पंजाब और ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में इस पर पाबंदियाँ लगीं और ग़ैरक़ानूनी खनन के ख़िलाफ़ कार्रवाई हुई, तो इसके बाद बड़ी संख्या में मशीनें गिलगित-बल्तिस्तान के नदी किनारों पर पहुँच गईं.

उन्होंने कहा कि पहले 'सोनेवाल' क़बीले के लोग हाथ से यह काम करते थे. वे सिर्फ़ बेलचा और साधारण औज़ार इस्तेमाल करते थे, जिससे पर्यावरण को बहुत कम नुक़सान होता था. लेकिन अब बड़े पैमाने पर विनाश शुरू हो गया है.

उन्होंने सवाल किया कि अगर पंजाब और ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में पाबंदी और सख़्ती है तो गिलगित-बल्तिस्तान में इसकी अनुमति क्यों दी गई है?

उनका कहना है कि पर्यावरणीय नुक़सान को देखते हुए स्थानीय समुदाय लगातार इसके ख़िलाफ़ अभियान चला रहे हैं.

वो कहते हैं कि हुंज़ा के शिमशाल क्षेत्र में स्थानीय लोगों ने विरोध करके खनन रुकवाया था. इसी तरह अन्य इलाक़ों में भी ऐसा हो रहा है.

बंजी में अहम पुलों के पास खनन

इस मुद्दे पर सिर्फ़ स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि गिलगित-बल्तिस्तान सरकार के विभाग भी अपनी चिंताएँ जता रहे हैं.

बीबीसी को मिली सरकारी दस्तावेज़ों से पता चलता है कि कई सरकारी विभाग भारी मशीनों से होने वाले खनन के संभावित नुक़सान के बारे में सरकार को चेतावनी दे रहे हैं.

सरकारी विभागों ने नदी किनारों के कटाव, सिंधु नदी पर बने पुलों की नींव को संभावित नुक़सान, नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव, बाँधों में मिट्टी और रेत जमा होने, ग्लेशियरों, जंगलों, राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीवन को होने वाले ख़तरों की ओर ध्यान दिलाया है.

पिछले वर्ष 27 जून को ज़िला अस्तोर के बंजी क्षेत्र के नायब तहसीलदार ने खनन गतिविधियों पर एक विशेष रिपोर्ट तैयार की थी.

रिपोर्ट में कहा गया कि सिंधु नदी के किनारे भारी मशीनों से बड़े पैमाने पर खुदाई हो रही है. इससे नदी किनारे लगातार कटाव का शिकार हो रहे हैं और तीन नज़दीकी पुलों, जिनमें बंजी सस्पेंशन ब्रिज भी शामिल है, की नींव को नुक़सान पहुँचने का ख़तरा पैदा हो गया है.

रिपोर्ट में पुलों से लगभग 300 फ़ीट के दायरे में चल रही सभी खुदाई तुरंत रोकने की सिफ़ारिश की गई.

इसके बाद डिप्टी कमिश्नर अस्तोर ने बंजी आरसीसी पुल, बंजी सस्पेंशन पुल और थलाची आरसीसी पुल के 300 फ़ीट के भीतर सभी खनन गतिविधियाँ बंद करने का आदेश दिया.

लगभग एक महीने बाद संचार और निर्माण विभाग की एक और रिपोर्ट सामने आई.

इसमें कहा गया कि बंजी पुल से लगभग 250 फ़ीट दूर एक चीनी कंपनी खनन कर रही है और खनन से निकला मलबा सिंधु नदी में डाला जा रहा है. इससे नदी का बहाव प्रभावित हो रहा है.

रिपोर्ट में आशंका जताई गई कि इससे पुल के पिलर को नुक़सान पहुँच सकता है. साथ ही कंपनी को दिए गए एनओसी को रद्द करने की सिफ़ारिश भी की गई.

सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, नदी किनारों और नदी के तल में भारी मशीनों, हाइड्रोलिक उपकरणों और बड़े डंपरों से व्यापक खनन किया जा रहा है.

निर्माण विभाग ने बंजी आरसीसी पुल, थलाची पुल और बंजी सस्पेंशन पुल को गंभीर और तत्काल ख़तरे में बताया.

ये पुल स्थानीय आबादी, व्यापारिक मार्गों, आपातकालीन सेवाओं और नॉर्दर्न लाइट इन्फ़ैंट्री की आवाजाही के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण हैं.

विभाग ने खनन तुरंत बंद कराने, खनन स्थलों को सील करने और विशेषज्ञों की उच्चस्तरीय तकनीकी समिति बनाने की सिफ़ारिश की.

बाँधों पर भी ख़तरा

बंजी क्षेत्र के पुलों को लेकर चिंताओं के अलावा वॉपडा ने भी खनन के प्रभावों के बारे में चेतावनी दी है.

30 अप्रैल 2026 को डायमर बाँध परियोजना के अधिकारियों ने पर्यावरण संरक्षण एजेंसी को पत्र लिखकर बताया कि चिलास के पास बसरी से राइकोट तक सिंधु नदी के तल में बड़े पैमाने पर सोने का खनन हो रहा है.

यह इलाक़ा प्रस्तावित बाँध के जलाशय क्षेत्र में आता है.

वॉपडा ने कहा कि खनन से नदी का प्राकृतिक स्वरूप प्रभावित हो रहा है. साथ ही नदी में बहने वाली मिट्टी और रेत की मात्रा बढ़ रही है.

इस अतिरिक्त मिट्टी और रेत के तरबेला बाँध सहित अन्य जल परियोजनाओं तक पहुँचने की आशंका जताई गई.

वॉपडा ने चेतावनी दी कि इससे जलाशयों की पानी संग्रहण क्षमता घट सकती है. बिजली उत्पादन करने वाली मशीनों की कार्यक्षमता और आयु भी प्रभावित हो सकती है.

बड़े राष्ट्रीय जल परियोजनाओं की कुल आयु कम होने का भी ख़तरा है.

इसका मतलब है कि बंजी में होने वाला खनन सिर्फ़ स्थानीय स्तर का मुद्दा नहीं है. इसके असर नदी के साथ नीचे स्थित बड़ी जल परियोजनाओं तक पहुँच सकते हैं.

पर्यावरण एजेंसी की चेतावनी

गिलगित-बल्तिस्तान पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) ने भी व्यापक चिंताएँ व्यक्त की हैं. एजेंसी के अनुसार क्षेत्र में खनिज खोज और खनन गतिविधियों में असाधारण वृद्धि हुई है.

ईपीए का कहना है कि संवेदनशील इलाक़ों में पर्याप्त पर्यावरणीय अध्ययन और सुरक्षा उपायों के बिना खनन गंभीर और संभवतः अपूरणीय पर्यावरणीय नुक़सान पहुँचा सकता है.

एजेंसी ने कहा कि गिलगित-बल्तिस्तान पहले ही ग्लेशियर झील फटने, बाढ़, बादल फटने, भूस्खलन, मलबे की धाराओं, नदी कटाव और पहाड़ी ढलानों की अस्थिरता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है.

खनन, विस्फोट, सड़क निर्माण और जंगलों की सफ़ाई से ये जोखिम और बढ़ सकते हैं.

ईपीए के अनुसार, नदियों के किनारे अंधाधुंध खुदाई, नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव और खुदाई का मलबा दोबारा नदी में डालने से नदी का पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहा है.

इससे कटाव बढ़ सकता है, प्राकृतिक जल निकासी बाधित हो सकती है, अस्थायी झीलें बन सकती हैं और निचले इलाक़ों में बाढ़ का ख़तरा बढ़ सकता है.

एजेंसी का कहना है कि खनन से पैदा होने वाली मिट्टी और रेत जलाशयों में जमा होकर उनकी क्षमता और बड़े जलविद्युत परियोजनाओं की आयु को प्रभावित कर सकती है.

ईपीए के अनुसार, खनिज विभाग और पर्यावरण एजेंसी दोनों को निगरानी के लिए सीमित संसाधनों, कम कर्मचारियों और लॉजिस्टिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. इसलिए दुर्गम क्षेत्रों में खनन की प्रभावी निगरानी करना मुश्किल है.

सरकार क्या कहती है?

गिलगित-बल्तिस्तान के पर्यावरण, वन और वन्यजीव मंत्री राजा नासिर ने बीबीसी उर्दू से कहा कि सरकार इन चिंताओं से परिचित है और इस बारे में एक औपचारिक योजना तैयार की जा रही है.

उन्होंने कहा कि एक नया तंत्र और प्राधिकरण बनाया जा रहा है. इसमें सभी स्टेक होल्डर्स को शामिल किया जाएगा, जिनमें खनन में निवेश करने वाले लोग भी होंगे.

उन्होंने कहा, "हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज़ लोगों की जान, माल और पर्यावरण की सुरक्षा है. गिलगित-बल्तिस्तान पहले ही जलवायु परिवर्तन से गंभीर रूप से प्रभावित है और वर्तमान सरकार इसके संरक्षण को प्राथमिकता देती है."

उन्होंने यह भी कहा कि पारंपरिक तरीक़े से हाथ से सोना निकालने वाले 'सोनेवाल' कबीलों को भी इस व्यवस्था में स्थान देना होगा, क्योंकि यह अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प है.

उन्होंने उम्मीद जताई कि नई सरकार ने इस मुद्दे को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया है. इसलिए आने वाले समय में स्थिति में काफ़ी सुधार होगा.

एक सवाल के जवाब में उन्होंने माना कि स्थानीय लोगों की यह शिक़ायत सही है कि पिछले दो सालों में सिंधु नदी के किनारों पर मशीनों की संख्या रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ी है.

Worauf zu achten ist

KI-Ausblick — Möglichkeiten, keine Fakten

  • सरकार खनन के लिए एक नया तंत्र और प्राधिकरण बनाएगी

    Wahrscheinlich · Innerhalb von Monaten

Offene Fragen

  • सरकार अवैध खनन पर पूरी तरह कब रोक लगाएगी?
  • प्रभावित किसानों को मुआवजा मिलेगा या नहीं?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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