टेलीग्राफ़ के पूर्व संपादक आर. राजगोपाल का वोटर लिस्ट से नाम हटने के बाद पासपोर्ट वेरिफिकेशन अटका, नागरिकता पर सवाल
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द टेलीग्राफ़ के पूर्व संपादक आर. राजगोपाल का वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के बाद पासपोर्ट वेरिफिकेशन अटक गया है। उन्होंने इसे नागरिकता पर अनिश्चितता पैदा करने वाला अपमानजनक कदम बताया है।
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Por qué importa
चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल सहित नौ राज्यों में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) शुरू किया था, जिसका उद्देश्य अयोग्य मतदाताओं को हटाना और योग्य को शामिल करना था।
टेलीग्राफ़ के पूर्व संपादक बोले, 'ये बेहद अपमानजनक', वोटर लिस्ट से नाम हटने के बाद उनका पासपोर्ट वेरिफ़िकेशन भी लटका
Author, मयूरी सोम
पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोलकाता
प्रकाशित 30 जून 2026, 07:27 IST
पढ़ने का समय: 5 मिनट
कोलकाता से प्रकाशित होने वाला अंग्रेज़ी दैनिक द टेलीग्राफ़ के पूर्व संपादक आर राजगोपाल ने एसआईआर में वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने और पासपोर्ट वेरिफिकेशन पेन्डिंग होने को अपमानजनक बताया है.
आर राजगोपाल ने बीबीसी से कहा, "अचानक मतदाता सूची से नाम हटा दिया जाए और कहा जाए कि आप वोट नहीं दे सकते, एक नागरिक के लिए इससे ज़्यादा अपमानजनक शायद कुछ नहीं हो सकता. मतदान आपका सबसे पवित्र अधिकार है."
वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के बाद राजगोपाल का पासपोर्ट भी फ़िलहाल अमान्य हो गया है.
पिछले साल अक्तूबर में चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल सहित नौ राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता सूची का स्पेशल इंटेसिव रिविजन यानी एसआईआर शुरू किया था.
चुनाव आयोग के अनुसार, इसका मक़सद यह सुनिश्चित करना था कि कोई अयोग्य मतदाता सूची में शामिल न हो और कोई योग्य मतदाता बाहर न रह जाए.
हालांकि सत्यापन प्रक्रिया की सटीकता पर सवाल उठे, क्योंकि लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी यानी तार्किक विसंगतियों के आधार पर लगभग 60 लाख मतदाताओं की अलग से जांच की गई.
इनमें से 27 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम एक अहम राज्य में चुनाव से पहले वोटर लिस्ट से हटा दिए गए. राजगोपाल भी उन्हीं में शामिल थे.
उन्होंने कहा कि मतदाता के रूप में अयोग्य घोषित किए जाने के ख़िलाफ़ उनकी अपील फ़िलहाल अपीलीय ट्राइब्यूनल में लंबित है.
'मेरी नागरिकता को संदिग्ध बना दिया गया'
उनके पासपोर्ट का नवीनीकरण भी लंबित है. राजगोपाल का कहना है कि पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए बायोमेट्रिक प्रक्रिया पूरी किए हुए 100 दिन से अधिक हो चुके हैं.
उन्होंने बताया कि पासपोर्ट जारी करने वाली अथॉरिटी ने उन्हें सूचित किया कि कोलकाता पुलिस ने प्रतिकूल रिपोर्ट भेजी है, जिसमें मतदाता सूची से नाम हटने का हवाला दिया गया है.
उन्होंने कहा, "मुझे ऐसा लगता है कि मेरी नागरिकता को लेकर अनिश्चितता पैदा कर दी गई है. मुझे आधा नागरिक जैसा महसूस होता है."
राजगोपाल ने स्पष्ट किया कि उनके आवेदन पर संदेह पासपोर्ट अथॉरिटी ने नहीं, बल्कि कोलकाता पुलिस ने जताया.
उनके मुताबिक, पुलिस ने कहा कि जब तक उनका नाम मतदाता सूची में बहाल नहीं होता, पुलिस वेरिफिकेशन क्लियर नहीं किया जाएगा.
राजगोपाल ने पूछा कि यह फ़ैसला किस क़ानून, सरकारी आदेश या मेमो के आधार पर लिया गया है, क्योंकि पासपोर्ट पोर्टल पर कहीं भी मतदाता पहचान पत्र अनिवार्य नहीं बताया गया.
उन्होंने कहा कि पुलिस ने उनके सवालों का सीधा जवाब नहीं दिया.
इसके बाद कोलकाता क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय ने 17 जून को उन्हें बताया कि पुलिस से 'एडवर्स रिपोर्ट' मिली है, जिसमें एसआईआर के तहत नाम हटने का उल्लेख है.
राजगोपाल का कहना है कि उन्हें फिर क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय बुलाया गया, लेकिन यह नहीं बताया गया कि कौन-से दस्तावेज़ साथ लाने हैं या दोबारा क्यों बुलाया जा रहा है.
यह उन शुरुआती ज्ञात मामलों में से एक है, जहाँ मतदाता सूची से नाम हटने का असर किसी अन्य सरकारी पहचान पत्र को हासिल करने या नवीनीकरण की प्रक्रिया पर पड़ता दिख रहा है.
हाल ही में विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं.
वोटर लिस्ट से नाम हटने के बाद नागरिकता हुई संदिग्ध
सुप्रीम कोर्ट भी पहले कह चुका है कि निर्वाचन आयोग मतदाता पात्रता की जांच से आगे जाकर किसी व्यक्ति की नागरिकता तय नहीं कर सकता.
पश्चिम बंगाल में नई बीजेपी सरकार की मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कहा है कि एसआईआर में जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटे हैं, उन्हें अन्नपूर्णा भंडार योजना का लाभ नहीं मिलेगा.
हालांकि जिनकी अपील लंबित है या जिन्होंने नागरिकता संशोधन क़ानून के तहत आवेदन किया है, उन्हें लाभ मिलता रहेगा.
राजगोपाल ने कहा कि उन्होंने अपनी आपबीती इसलिए सार्वजनिक की क्योंकि दिल्ली स्थित एक मीडिया संगठन ने उन्हें पत्रकारिता पुरस्कार की जूरी में शामिल होने का निमंत्रण दिया था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया.
उन्होंने कहा कि उन्हें यह देखकर झटका लगा कि मीडिया का बड़ा हिस्सा इस प्रक्रिया से आम लोगों पर पड़े असर से अनजान है, क्योंकि वे ख़ुद इससे प्रभावित नहीं हुए.
उन्होंने कहा, "मैं बेहद मामूली काग़ज़ी कामों में उलझा हूँ, जैसे 1958 की अपने पिता की मार्कशीट ढूंढना, मां की जन्मतिथि के दस्तावेज़ खोजना."
उन्होंने कहा कि दिन का अधिकांश समय दस्तावेज़ स्कैन करने और ढूंढने में निकल रहा है.
राजगोपाल ने बताया कि नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज़ खोजते समय उन्हें अपना जन्म प्रमाणपत्र मिला, जिसमें उनकी मां के उपनाम में विसंगति थी.
उन्होंने कहा, "मेरी मां का नाम राधा देवी है, लेकिन वहां राधा बाई लिखा हुआ था. सिर्फ बाई को देवी कराने के लिए मुझे मां का मैट्रिक प्रमाणपत्र चाहिए."
Preguntas abiertas
- किस कानून के तहत वोटर लिस्ट से नाम हटने पर पासपोर्ट वेरिफिकेशन रोका गया?
- क्या यह प्रक्रिया नागरिकता को संदिग्ध बनाने के लिए है?
- अपीलीय ट्राइब्यूनल में अपील लंबित होने पर क्या होगा?

