Última hora
ITTerremoto 7.7 in Indonesia: evacuazione per tsunami nelle zone costiere di FloresFRPremière cyberattaque massive sans humain : des IA liées à la Chine visent un gouvernementCN日本銀行秋季可能再度升息 日美協調干預暫壓制日圓貶值USMichigan Shootings Leave 5 Dead, Including Suspect, After Multi-Location IncidentGLOBALTrump Seeks Supreme Court Intervention to Resume $400M White House Ballroom ConstructionTRİran Cumhurbaşkanı Pezeşkiyan: 'Ekonomik Sıkıntılarımız Kat Kat Arttı'RU7.7-Magnitude Earthquake Strikes Off Indonesia, Triggering Tsunami and Killing at Least 5UKProfessor Jason Arday Found Dead at Home After Resigning from Cambridge University Amid Plagiarism AllegationsTRİranlı Pilotlar Katar'da EsirDETrockenheit in Deutschland: Wasserarmut belastet Wirtschaft und IndustrieITTerremoto 7.7 in Indonesia: evacuazione per tsunami nelle zone costiere di FloresFRPremière cyberattaque massive sans humain : des IA liées à la Chine visent un gouvernementCN日本銀行秋季可能再度升息 日美協調干預暫壓制日圓貶值USMichigan Shootings Leave 5 Dead, Including Suspect, After Multi-Location IncidentGLOBALTrump Seeks Supreme Court Intervention to Resume $400M White House Ballroom ConstructionTRİran Cumhurbaşkanı Pezeşkiyan: 'Ekonomik Sıkıntılarımız Kat Kat Arttı'RU7.7-Magnitude Earthquake Strikes Off Indonesia, Triggering Tsunami and Killing at Least 5UKProfessor Jason Arday Found Dead at Home After Resigning from Cambridge University Amid Plagiarism AllegationsTRİranlı Pilotlar Katar'da EsirDETrockenheit in Deutschland: Wasserarmut belastet Wirtschaft und Industrie
Newsgather
Atrásगोवा के इन दो गांवों के लोग पिछले 100 दिनों से क्यों कर रहे हैं आंदोलन?
गोवा के इन दो गांवों के लोग पिछले 100 दिनों से क्यों कर रहे हैं आंदोलन?
En desarrollo
BBC हिंदीayerEnvironment7 min de lecturaIndia

गोवा के इन दो गांवों के लोग पिछले 100 दिनों से क्यों कर रहे हैं आंदोलन?

गोवा के सरवन और कारापुर गांवों के लोग 'हाउस ऑफ़ अभिनंदन लोढ़ा' के 'वन गोवा' प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ 100 दिनों से ज़्यादा समय से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

En resumen

गोवा के सरवन और कारापुर गांवों के लोग रियल एस्टेट प्रोजेक्ट 'वन गोवा' के ख़िलाफ़ 100 दिनों से अधिक समय से प्रदर्शन कर रहे हैं। ग्रामीणों को डर है कि इससे प्राकृतिक सुंदरता को नुक़सान और जल संकट पैदा होगा।

Resumen generado por IA

Por qué importa

गोवा के सरवन और कारापुर गांवों में 'हाउस ऑफ़ अभिनंदन लोढ़ा' के 'वन गोवा' टाउनशिप प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ ग्रामीण 100 दिनों से अधिक समय से विरोध कर रहे हैं।

Tamaño de fuente

गोवा के सरवन और कारापुर गांवों के लोग 100 दिनों से ज़्यादा समय से विरोध कर रहे हैं.

गांव के लोगों ने रियल एस्टेट कंपनी 'हाउस ऑफ़ अभिनंदन लोढ़ा' के 'वन गोवा' प्रोजेक्ट को रद्द करने की मांग की है.

यह प्रोजेक्ट गांव से कुछ दूरी पर चल रहा है. लोगों को डर है कि इससे गांव की प्राकृतिक सुंदरता को नुक़सान होगा और संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा.

उन्होंने आरोप लगाया है कि प्रोजेक्ट का काम चलने के दौरान उनके आने-जाने का रास्ता बंद कर दिया गया. जिस ज़मीन पर वे किराएदार के तौर पर काजू और दूसरी फ़सलें उगा रहे थे, उसे भी नुक़सान पहुंचाया गया.

इस बीच, प्रोजेक्ट के विरोध में हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई है.

विश्वास राणे ने गोवा के मंत्री विश्वजीत राणे के ख़िलाफ़ सिविल केस दायर किया है. उनका कहना है कि कुछ ज़मीन उनकी है, फिर भी उसे बेच दिया गया.

हालांकि, विश्वजीत राणे ने सभी आरोपों से इनकार किया है और सवाल उठाया, "अब हर कोई क्यों जाग रहा है?"

वहीं, 'हाउस ऑफ़ अभिनंदन लोढ़ा' के प्रतिनिधियों ने दावा किया है कि गांव के लोगों को गुमराह किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि इस प्रोजेक्ट में उन्होंने कोई ग़ैर-क़ानूनी काम नहीं किया है.

उन्होंने बताया कि प्रोजेक्ट का काम सभी ज़रूरी मंज़ूरियों के साथ शुरू हुआ था और साफ़ किया कि यह मामला संबंधित अधिकार क्षेत्र में आता है.

क्यों हो रहा है विरोध?

कारापुर और सरवन उत्तर गोवा के बिचोलिम में स्थित गांव हैं. प्राकृतिक सुंदरता से भरे इन गांवों का दौरा करते समय हमने एक पेड़ पर बैठे मोर को देखा.

गांव के लोगों का कहना है कि इस इलाक़े में सिर्फ़ मोर ही नहीं, बल्कि दूसरे जानवर भी दिखाई देते हैं. इस प्राकृतिक धरोहर को बचाने के लिए गांव के लोग दिनभर मंदिर के सामने बने मंडप में बैठकर विरोध कर रहे हैं. उनके विरोध को 100 दिन पूरे हो चुके हैं. जब हम वहां गए, तब विरोध का 117वां दिन था.

यह सब दो साल पहले शुरू हुआ था. विरोध कर रहे तरुण गौरेश घाड़ी का कहना है कि जब पता चला कि गांव में इस तरह का कोई प्रोजेक्ट आने वाला है, तो ग्राम सभा में ही इस पर सवाल उठाए गए. हालांकि, उनका दावा है कि ग्राम सभा में गांव के लोगों को बताया गया था कि सिर्फ़ प्लॉटिंग की जा रही है.

लेकिन असल में 'हाउस ऑफ़ अभिनंदन लोढ़ा' की वेबसाइट पर दिए गए विज्ञापनों में बताया गया है कि 132 एकड़ में फैला यह प्रोजेक्ट एक टाउनशिप है. इसमें सर्विस्ड अपार्टमेंट, एम्फ़ीथिएटर, जॉगिंग ट्रैक और इंसानों द्वारा बनाया गया समुद्र तट जैसी कई सुविधाएं हैं.

प्रोजेक्ट वाली जगह पर निर्माण भी शुरू हो गया है. इस इलाक़े में पहले से ही पानी की समस्या है. ऐसे में इस प्रोजेक्ट से यहां के रिसोर्सेस पर दबाव पड़ेगा. इसलिए गांव के लोग प्रोजेक्ट का काम तुरंत रोकने की मांग कर रहे हैं. इसके लिए उन्होंने गांव में विरोध प्रदर्शन किया है और हाई कोर्ट में याचिका भी दायर की है.

अपनी मांगों के बारे में बताते हुए गौरेश घाड़ी ने कहा, "हमारे गांव में पानी की समस्या है. इस साल हुई बारिश का भी इस पर असर पड़ा है. हमने देखा कि इस प्रोजेक्ट के लिए 7 से 8 बोरवेल खोदे गए हैं. अगर ऐसा ही चलता रहा तो रिसोर्सेस पर दबाव पड़ेगा."

"इस प्रोजेक्ट में क़रीब 17 हज़ार लोगों के आने की उम्मीद है. इसलिए उन्हें कुछ सौ लीटर पानी की ज़रूरत होगी. इसके लिए ज़मीन में और बोरवेल खोदे जाएंगे. इसका मतलब है कि ग्राउंड वाटर का लेवल प्रभावित होगा. इससे हमारे कुएं सूख जाएंगे."

गांव के लोगों की क्या मांगें हैं?

गांव के लोगों ने विरोध वाली जगह पर लगाए गए बोर्ड और दिए गए बयानों के ज़रिए अपनी मांगें साफ़ तौर पर बताई हैं. उनकी मांगों के अनुसार -

खेती की ज़मीन और बागों को बचाया जाना चाहिए.

ज़मीन के नीचे पानी पहुंचाने वाले स्रोतों को बचाया जाना चाहिए, पहाड़ों और उनकी प्राकृतिक स्थिति को बचाया जाना चाहिए.

गांव के लोगों की कमाई का ज़रिया बनने वाली ज़मीन और पानी के स्रोतों को बचाया जाना चाहिए.

कारापुर की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को बनाए रखा जाना चाहिए.

साफ़ और स्वस्थ प्रकृति में रहने के अधिकार को सुनिश्चित किया जाना चाहिए.

उनके अनुसार, प्रोजेक्ट से

ग्राउंड वाटर का लेवल कम हो सकता है.

खेती की ज़मीन और बागों को नुक़सान होने की आशंका है.

पर्यावरण को नुक़सान होगा.

गांव और आसपास के इलाक़ों में प्रदूषण और कचरा बढ़ेगा.

वाहनों की संख्या बढ़ने से ट्रैफ़िक और रिसोर् पर दबाव पड़ेगा.

इसके अलावा, गांव के लोग पर्यावरण के लिहाज़ से संवेदनशील इलाक़ों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठा रहे हैं.

खेती की ज़मीन का विवाद

विरोध कर रहे गांव के लोगों का दावा है कि जिस इलाक़े में प्रोजेक्ट का काम चल रहा है, उसके बीच में उनकी खेती की ज़मीन है. पहले यहां काजू और दूसरी सब्ज़ियां उगाई जाती थीं. उनका कहना है कि इस ज़मीन के मालिक के रूप में राणे का नाम दर्ज है, लेकिन वे इस पर किराएदार के तौर पर खेती कर रहे हैं.

आदिवासी समुदाय से आने वाले गांव के लोगों का कहना है कि पिछली पीढ़ियों से इस ज़मीन पर उनका क़ब्ज़ा रहा है. हालांकि, उनका आरोप है कि प्रोजेक्ट का काम शुरू होने के बाद इस इलाक़े में चारदीवारी बना दी गई और वहां जाने से रोक दिया गया.

क़ानूनी लड़ाई के बाद भी उनका दावा है कि वहां जाने की अनुमति मिलने के बावजूद ज़मीन पर लगी फ़सलों को नुक़सान पहुंचाया गया. उनका कहना है कि इससे इस मौसम की कमाई कम हो गई है.

बीबीसी मराठी से बात करते हुए साटू सतु सालेलकर ने कहा, "अब मेरी उम्र 76 साल है. मेरे दादा और परदादा यहां खेती करते थे. वे कुलीथ और नाचणी जैसी फ़सलें उगाते थे. लेकिन अब ये सब नष्ट हो गया है. इसी कमाई से हम 20-25 लोगों का पेट पालते थे. हम इसे बाज़ार में बेचते थे."

एक और किसान मंजिता चांडेकर कहती हैं, "हमारे यहां बहुत सारे काजू के पेड़ थे, लेकिन उन्हें काट दिया गया. इस साल रास्ता बंद होने के कारण हम यहां नहीं आ सके. काजू के पेड़ों को नुक़सान पहुंचा. अब जब हमें यहां आने की अनुमति मिली है, तो हमने काजू, भिंडी आदि लगाए हैं."

ज़मीन के मालिकाना हक़ का विवाद

एक तरफ़ गांव के लोग विरोध कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ़ इस ज़मीन के मालिकाना हक़ को लेकर भी विवाद है. इस ज़मीन का मालिक राणे परिवार है.

गोवा के टाउन एंड कंट्री प्लानिंग मंत्री विश्वजीत राणे ने कारापुर की ज़मीन बेच दी. हालांकि, राणे के रिश्तेदारों का दावा है कि ज़मीन उनकी होने के बावजूद आपसी सहमति के बिना इसे बेच दिया गया. इसे लेकर उन्होंने अदालत में सिविल केस दायर किया है.

इस याचिका के बारे में याचिकाकर्ता विश्वास राणे ने कहा, "क़रीब 5 लाख वर्ग मीटर ज़मीन की बिक्री का दस्तावेज़ बनाया गया है. कुल ज़मीन 11 लाख 75 हज़ार वर्ग मीटर है. इस पूरी ज़मीन का बंटवारा नहीं हुआ था. इस ज़मीन का आधा हिस्सा विश्वजीत राणे का है और बाक़ी आधा हिस्सा हमारा है, यानी केरी इलाक़े में रहने वाले एक अन्य राणे परिवार का है. लेकिन इसे बिना बंटवारे के ही बेच दिया गया."

हालांकि, मंत्री विश्वजीत राणे ने इन सभी आरोपों से इनकार किया है.

बीबीसी मराठी से फ़ोन पर बात करते हुए राणे ने कहा, "हमने सब कुछ नियमों के मुताबिक़ किया है. हर मामले के कई पहलू होते हैं. इस मामले के भी अपने पहलू हैं. आपको इसकी जांच करनी चाहिए. राजनीति में रहने पर कुछ काम राजनीतिक वजहों से भी किए जाते हैं. इसमें नियमों, मंज़ूरी आदि का कोई मुद्दा नहीं है. हमने सभी मंज़ूरियां ली हैं और क़ानूनी प्रक्रिया का पालन किया है."

राणे परिवार के दावे के बारे में उन्होंने कहा, "यह मामला अदालत में विचाराधीन है. हालांकि, मेरा सवाल है कि 50 साल बाद अब ये दावे क्यों किए जा रहे हैं. मुझे लगता है कि कुछ आरोप लगाए जा रहे हैं. यह निजी ज़मीन है और इसे विकसित करने का अधिकार है. मनोहर पर्रिकर के समय इस ज़मीन का रिकॉर्ड बदला गया था. लेकिन, यह मामला अदालत में विचाराधीन है, इसलिए मेरे लिए इस पर आगे टिप्पणी करना सही नहीं होगा."

उन्होंने यह भी दावा किया कि मंत्री होने के नाते उन्होंने इन मंज़ूरियों में कोई दख़ल नहीं दिया.

'हाउस ऑफ़ अभिनंदन लोढ़ा' की क्या भूमिका है?

एक तरफ़ याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है, वहीं दूसरी तरफ़ प्रोजेक्ट का काम भी जारी है. कोर्ट ने काम रोकने का आदेश नहीं दिया है. इसलिए प्रोजेक्ट के प्रतिनिधियों ने कहा है कि काम रोकने की ज़रूरत नहीं है.

गांव के लोगों के आरोपों को ख़ारिज करते हुए 'हाउस ऑफ़ अभिनंदन लोढ़ा' के डायरेक्टर नयन भेड़ा ने बीबीसी मराठी से कहा कि वे सभी प्रक्रियाएं क़ानून के मुताबिक़ कर रहे हैं.

नयन भेड़ा ने कहा, "जब यह विरोध शुरू हुआ, तो मैं 3 मई को विरोध वाली जगह पर गया था. हमने यह ज़मीन 2024 में खरीदी थी. हमें इसकी मंज़ूरी मिली थी. इसके बाद अब निर्माण का काम लगभग पूरा होने वाला है. प्रोजेक्ट शुरू हुआ, हमने ज़मीन खरीदी, लेकिन जब लोगों ने ज़मीन खरीदी, तब कोई नहीं आया."

"हमने सरकार को 100 करोड़ रुपये से ज़्यादा की स्टांप ड्यूटी दी है. हमने ग्राम पंचायत को भी पैसे दिए हैं. मैं राजनीति जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहता, लेकिन अगर बाद में कोई इस पर आपत्ति करता है, तो यह लोगों को गुमराह करने की कोशिश है. हमारी ज़मीन पर एक मंदिर है, वहां जाने के लिए हम उन्हें रास्ता देते हैं. हम उनके सही कार्यक्रम का समर्थन करते हैं. वे ज़मीन पर जाने का रास्ता चाहते थे, हमने वह भी दिया."

"यह काम बाहर के लोग कर रहे हैं. हम स्थानीय लोगों के साथ मिलकर रहना चाहते हैं. हम कोई ऐसा काम नहीं कर रहे हैं जिसकी अनुमति नहीं है. गोवा भारत में है और भारतीय लोगों को वहां रहने का अधिकार है."

कारापुर-सरवन के निवासी अपनी लड़ाई और न्याय की मांग को लेकर जंतर-मंतर भी गए हैं. गांव में चल रहे विरोध को कई राजनीतिक दलों ने भी समर्थन दिया है.

गांव के लोग विरोध जारी रखने पर अड़े हुए हैं, वहीं निर्माण से जुड़े लोग प्रोजेक्ट को पूरा करने पर अड़े हुए हैं.

Qué observar

Perspectiva de IA — posibilidades, no hechos

  • अदालत ज़मीन विवाद और प्रोजेक्ट पर फ़ैसला सुनाएगी

    Probable · En meses

Preguntas abiertas

  • क्या अदालत प्रोजेक्ट पर रोक लगाएगी?
  • क्या ज़मीन के मालिकाना हक़ का विवाद सुलझेगा?

Temas relacionados

This article was originally published by BBC हिंदी.

Noticias relacionadas

Más sobre este temaगोवा