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जंतर मंतर प्रदर्शन: वायरल रील और धमकियों के बीच सहमी 15 साल की बच्ची और उसकी मां की कहानी
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BBC हिंदीhace 21 horasCrime6 min de lecturaIndia

जंतर मंतर प्रदर्शन: वायरल रील और धमकियों के बीच सहमी 15 साल की बच्ची और उसकी मां की कहानी

कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान वायरल हुई रील के बाद 15 साल की एक नाबालिग बच्ची को मिल रही धमकियों और उसके संघर्ष की कहानी।

En resumen

दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन में वायरल रील मामले में फंसी 15 वर्षीय छात्रा और उसकी मां घर छोड़ने को मजबूर हैं। माफी मांगने और पीएम मोदी द्वारा माफ किए जाने के बावजूद उन्हें लगातार जान से मारने और बलात्कार की धमकियां मिल रही हैं।

Resumen generado por IA

Por qué importa

राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में 36 दिनों तक आंदोलन चला। प्रदर्शन के दौरान एक 15 साल की लड़की द्वारा बनाई गई रील वायरल हुई जिसके बाद उस पर अभद्र भाषा के इस्तेमाल का आरोप लगा।

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राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में 36 द‍िनों तक चला आंदोलन सरकार से बातचीत के बाद ख़त्‍म हो गया है लेकिन इससे जुड़ी ख़बरों के आने का सिलसिला लगातार जारी है. इनमें कुछ ख़बरें उन लड़कियों से जुड़ी हैं, जो प्रदर्शन में शामिल हुई थीं और वायरल रील का हिस्सा बन गईं.

इन्हीं में से एक 15 साल की बच्ची है जिसने एक्स पर अपनी भाषा के लिए माफ़ी का वीडियो डाला.

यह बच्‍ची फ़ैशन डिज़ाइनर और मेकअप आर्टिस्ट बनना चाहती है. लेकिन फिलहाल दसवीं में पढ़ने वाली यह छात्रा नहीं जानती कि वो बोर्ड की परीक्षा भी दे पाएगी या नहीं. भविष्य के बारे में सोचना तो अभी दूर की बात है.

एफ़आईआर दर्ज होने के बाद वह 26 जुलाई से अपनी मां के साथ घर छोड़कर कहीं और रह रही हैं. इन्हें नहीं पता कि घर अब कब लौटना होगा.

इंस्टाग्राम और दोस्तों से मिली जानकारी के बाद वह बच्‍ची 22 जुलाई को जंतर मंतर पहुँची थीं और एक समूह का हिस्सा बनीं.

बीबीसी ह‍िन्‍दी से उन्‍होंने कहा कि लोगों की बातों से प्रभावित होकर कुछ ऐसा बोल गईं, जो उन्हें बोलना नहीं चाहिए था. इस बात का एहसास उन्हें बाद में हुआ. जब तक वह कुछ कर पातीं उनकी रील वायरल हो चुकी थी.

मामले में दर्ज हुई थी ज़ीरो एफ़आईआर

श्रुत‍ि (बदला हुआ नाम) बताती बताती हैं, ''यह घटना 22 जुलाई की है और मैंने दो दिन बाद ये बात मां को बताई. इस रील के साथ-साथ मुझ पर भद्दे कमेंट किए जा रहे थे. मुझे मारने, मेरा रेप करने, तेज़ाब फेंकने की धमकियां दी गईं. मुझे ये भी कहा गया कि ये 500 वाली ... और इनाम तक रखे जा रहे थे. मैं बहुत डर गई थी. मैं दो दिन तक घर से बाहर नहीं निकली. मेरा नंबर लीक हो गया था. मुझे कॉल और मैसेज में ये सारी चीज़ें कही गईं. और यह सिलसिला रुका नहीं है.''

उनकी मां बताती हैं कि वह सोशल मीडिया से दूर रहती हैं और पति के जाने के बाद भजन पर ध्यान देती हैं और घर चलाने के लिए छोटे-मोटे काम करती हैं.

जब उन्हें बेटी से इस बारे में पता चला तो तीन दिन तक वो सुन्‍न हो गई थी और कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें.

उनकी मां बीबीसी ह‍िन्‍दी से कहती हैं, ''ऐसा लगा जैसे बम फट गया हो. यकीन नहीं हो रहा था कि मेरी बेटी ने ऐसी गालियां निकाली हैं. कल तक दुनिया अलग थी और आज बिल्कुल अलग है.''

वह अपने आंसुओं को पोंछते हुए कहती हैं, ''कोई कह रहा है ये देशद्रोही हैं, आतंकवादी हैं. इनका पाकिस्तान से लिंक है. मां कैसी होगी? क्या संस्कार दिए हैं? धंधे वाली होगी ये बातें तो सही नहीं हैं न. सबने कहा माफ़ी मांग लो, मैं भी मानती हूं कि गाली नहीं देनी चाहिए थी. गालियों से विरोध प्रदर्शन नहीं होता. एफ़आईआर में भी ग़लत जानकारी दी गई. एफ़आईआर ख़ारिज हो गई, लेकिन कोई ये क्यों नहीं बोलता, घर जाओ, हम तुम्हारे साथ हैं.''

इस मामले में वकील स्मृति सिंह चंदेल ने आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ अपमानजनक और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया है.

साथ ही उनकी शिकायत में यह भी कहा गया था कि इन टिप्पणियों ने न केवल संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुंचाई बल्कि जानबूझकर नफ़रत फैलाने और सार्वजनिक शांति भंग करने का भी प्रयास किया.

इस मामले में नोएडा पुलिस ने ज़ीरो एफ़आईआर दर्ज की थी. इसमें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 352 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना), धारा 353 (1) (सार्वजनिक उपद्रव को बढ़ावा देने वाले बयान) और धारा 356 (1) (मानहानि) के तहत मामला दर्ज किया गया.

ये मामला दर्ज होने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रवक्ता सौरव दास ने कहा था कि युवती की टिप्पणियां ग़लत हो सकती है, लेकिन इस तरह की कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए.

सौरव दास ने एक्स पर लिखा था, ''उनके ख़िलाफ़ आपराधिक क़ानून का इस्तेमाल करना स्वीकार्य नहीं है. अपशब्दों का इस्तेमाल अपने आप में आपराधिक मामला नहीं बनता. लोकसभा के लगभग 50% सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें क़रीब 100 सांसद बीजेपी के हैं. पुलिस को अपनी ऊर्जा उनके मामलों पर लगानी चाहिए, किसी 25 वर्षीय युवती को निशाना बनाने पर नहीं. युवाओं का उत्पीड़न तुरंत बंद होना चाहिए.''

जब बीबीसी ने स्मृति सिंह चंदेल से इस बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि जब यह मामला दिल्ली पुलिस के पास गया तो उनका कॉल आया. इसके बाद उन्होंने अपनी शिकायत वापस ले ली है.

वह बताती हैं कि सारी धाराएं वापस ले ली गई हैं और ये फ़ैसला इसलिए लिया क्योंकि ''जब प्रधानमंत्री ने बच्चों को माफ़ कर दिया तो हम लोग उनसे बड़े नहीं हैं. इसलिए हमने भी माफ़ कर दिया.''

स्मृति सिंह चंदेल पेशे से वकील हैं और जनता दल लोकतांत्रिक पार्टी से जुड़ी हैं.

ज़ीरो एफ़आईआर वह होती है जो किसी घटनास्थल के दायरे से बाहर किसी थाने में दर्ज की जाती है. हालाँकि बाद में यह एफ़आईआर संबंधित थाने में भेज दी जाती है, जिसकी हद में आने वाले इलाक़े में घटना हुई हो.

लड़की ने मांगी माफ़ी

एक अगस्त को लड़की की तरफ से माफ़ी मांगते हुए एक वीडियो जारी किया गया था, जिसमें उन्होंने कहा था, "ये मेरी पहली और आख़िरी ग़लती है" और साथ ही कहा था कि वे प्रोटेस्ट में शामिल हुए समूह से प्रभावित हो गई थीं.

इस वीडियो में उन्होंने कहा, "मैं प्रोटेस्ट साइट पर थी और वहां कई समूह थे जो पीएम मोदी के बारे में अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे. ये लोग दूसरे लोगों को भी उकसा रहे थे. मैं बहुत शर्मिंदा हूं कि मैंने वे बातें कहें और मैं अपनी आंख तक नहीं उठा पा रही हूं. मैं इसके लिए पूरे देश से माफ़ी मांगती हूं. ये मेरी पहली और आख़िरी ग़लती है.''

दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक वीडियो मैसेज जारी क‍िया था.

इसमें उन्होंने कहा था कि "बचपन ग़लतियों को सुधारने का अवसर भी होता है. ये गुमराह बच्चे हैं, इन्हें राह दिखाने का समय है, मैं इन्हें माफ़ करना चाहता हूं."

उन्होंने कहा था, "जंतर-मंतर पर जो हुआ देश और दुनिया ने देखा. कुछ शरारती बच्चों ने भद्दी और अपशब्दों वाली भाषा का इस्तेमाल किया, ऐसे शब्द जो किसी भी सभ्य समाज के लिए ठीक नहीं हैं. मुझे व्यक्तिगत रूप से अपशब्द कहे गए और मेरी स्वर्गीय मां को भी गाली दी गई."

नहीं रुक रहीं धमकियाँ

15 साल की बच्ची कहती हैं कि 'माफ़ी मांगने के बावजूद धमकियां कम नहीं हो रही हैं, जैसे मैंने कोई अक्षम्य अपराध कर दिया हो.'

उनका कहना है, ''मैं दो बार आत्महत्या करने की कोशिश कर चुकी हूं लेकिन फिर मुझे लगा कि मज़बूत होना होगा. मेरी ग़लती थी. मैंने माफ़ी मांगी वो मुझे मिल भी गई, मेरे पास कोई प्रोटेक्शन नहीं है लेकिन अब अंत तक मुझे ही इसे सुलझाना होगा. मैं इन लोगों के लिए जान नहीं देने वाली.''

वह पूछती हैं, ''क्या मैं इसी देश की बच्ची हूं क्योंकि देश के बच्चों को तो ऐसे ट्रीट नहीं किया जाता.''

मां और बेटी दोनों का कहना है, ''हां ग़लती हुई है, हमने माफ़ी मांग ली, आपने (प्रधानमंत्री ने) माफ़ भी कर दिया. लेकिन जो इस तरह की धमकियां दे रहे हैं उन्हें क्यों रोका नहीं जा रहा है. हमारी इतनी मदद तो की जाए. हम अपने घर नहीं लौट सकते हैं. चेहरा छिपा कर रहना पड़ रहा है कि अगर पहचाने गए तो कोई मार न दे.''

तीन सदस्यों का परिवार डर की वजह से अभी तक घर नहीं लौटा है. पुलिस से मदद मांगने के सवाल पर उनका कहना है कि भरोसा नहीं है और वे सुरक्षित महसूस नहीं कर रही हैं.

जब हमने स्मृति से मां बेटी की परेशानी के बारे में सवाल किया तो उनका कहना था, "उन्हें पुलिस से मदद मांगनी चाहिए और इस मुद्दे का राजनीतिकरण किया जा रहा है."

जबकि बच्ची की मां कहती हैं, ''बस किसी तरह से कहीं-कहीं छिपकर जी रहे हैं. रिश्तेदार बोलते हैं हमें फ़ोन मत करो. हम परेशानी में फंस जाएंगे. पहले रिश्तेदार बात करते थे. दोस्त कॉल करती थीं लेकिन आज जब ज़रूरत है तो कोई नहीं है.''

वे सवाल करती हैं कि 'हमारा संविधान कहता है कि एक व्यक्ति को अभिव्यक्ति का अधिकार है तो वह अब क्यों कहीं नहीं दिखता.'

मां कहती हैं, "मेरी-बेटी बच्‍चों के ल‍िए प्रोटेस्ट करते हुए मर जाती तो मुझे सब्र हो जाता है क‍ि उसकी जान बच्‍चों का भव‍िष्‍य सुधारने के ल‍िए गई. लेकिन अब कोई मेरी बेटी को कभी भी मार डालेगा, इस डर में हम कैसे जी सकते हैं."

Preguntas abiertas

  • धमकियां देने वालों पर पुलिस कार्रवाई क्यों नहीं कर रही?
  • पीड़ित परिवार कब तक घर लौटने में असमर्थ रहेगा?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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