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कोच्चि का ज्यू टाउन: 500 साल बाद भी यहूदियों की यादें बाकी, पर अब सिर्फ़ एक यहूदी
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कोच्चि का ज्यू टाउन: 500 साल बाद भी यहूदियों की यादें बाकी, पर अब सिर्फ़ एक यहूदी

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Author, मिर्ज़ा एबी बेग

पदनाम, बीबीसी उर्दू, कोच्चि

प्रकाशित 8 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 10 मिनट

केरल के तटीय शहर कोच्चि (कोचीन) में मट्टानचेरी नाम की एक बस्ती आबाद है जो 'ज्यू टाउन' यानी यहूदियों की बस्ती कहलाती है.

यह वह इलाक़ा है जहां पूरे 500 साल पहले मशहूर पुर्तगाली नाविक और खोजी वास्को डा गामा आए और कोच्चि वह जगह है जो भारत में पहली यूरोपीय कॉलोनी बनी. उन्होंने यहीं अंतिम सांस ली और यहीं दफ़न हुए.

ऐतिहासिक रूप से वास्को डा गामा के आने के बाद पुर्तगालियों ने यहूदियों को निशाना बनाया तो कोचीन के राजा ने उन्हें अपने महल से सटी हुई ज़मीन दान की और एक ताम्र पत्र दिया जिस पर लिखा था, "जब तक सूरज और चांद आसमान पर चमकते रहेंगे, तब तक यह ज़मीन यहूदियों की रहेगी."

यहूदियों की यही बस्ती बाद में 'ज्यू टाउन' कहलाई.

आज इस जगह पर उनकी यादें तो हैं लेकिन एक यहूदी कीथ हेलोगुआ के अलावा सभी यहूदी इस जगह को छोड़कर चले गए हैं.

सवाल यह पैदा होता है कि आख़िर वह कहां और क्यों गए?

यहां यह जानना ज़रूरी है कि अब इस इलाक़े में ज़्यादातर मुसलमानों की दुकानें हैं जिनमें कश्मीरियों की दुकानें ज़्यादा नज़र आती हैं.

इससे पहले कि हम ज्यू टाउन की सैर करें, यह जानना दिलचस्प होगा कि आख़िर हिंदुस्तान में पहली बार यहूदी कब आए?

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पैग़ंबर सुलेमान के दौर में केरल के तट पर पहला क़ाफ़िला

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इस क्षेत्र में यहूदियों का पहला क़ाफ़िला लगभग एक हज़ार साल ईसा पूर्व पैग़ंबर सुलेमान के दौर में समुद्र के रास्ते दक्षिण भारत के तटों पर उतरा था.

उस वक़्त कोच्चि के तट के बजाय वहां से लगभग 40 किलोमीटर उत्तर में मुज़िरिस (यूनानी नाम) यानी क्रंगानूर (अब कोडुंगलूर) की बंदरगाह थी.

ये लोग व्यापारिक सामान के साथ आए और इस क्षेत्र में इस तरह रच-बस गए कि यहीं के होकर रह गए, बाद में वे मालाबारी यहूदी कहलाए.

कोचीन में यहूदी इबादतगाह (परदेसी सिनेगॉग) के रिकॉर्ड के अनुसार यहूदियों का दूसरा बड़ा प्रवास और भारत आगमन 1492 में स्पेनिश अत्याचारों से भागने वाले सेफ़ार्दी यहूदियों का था.

पुर्तगाल, तुर्की और बग़दाद के रास्ते यात्रा करते हुए वे केरल पहुंचे और कोच्चि में आबाद हुए और विदेशी यहूदियों के नाम से जाने गए.

मालाबारी और विदेशी यहूदी मिलकर 'कोचीनी यहूदी' कहलाए. वह कोच्चि में बस गए, जो पहले अरबों, फिर पुर्तगाली, ब्रिटिश और डच लोगों के लिए व्यापारिक केंद्र बना.

यहूदियों को कोच्चि के राजा ने सुरक्षा मुहैया कराई और वह उस वक़्त से बीसवीं सदी में यहां से वापस जाने तक सुख-शांति से यहां आबाद रहे.

आज का ज्यू टाउन

कोच्चि हेरिटेज प्रोजेक्ट चलाने वाले कोच्चि के निवासी योहान बिन्नी कुरुविला इस सफ़र में हमारे साथ थे.

हमने इस उम्मीद पर वहां की यात्रा अप्रैल की शुरुआत में की ताकि शायद वहां मौजूद सिनेगॉग में कुछ यहूदियों से मुलाक़ात हो जाए क्योंकि यह समय उनके धार्मिक उत्सव 'पासओवर' का होता है.

यह त्योहार यहूदियों की पवित्र पुस्तक के अनुसार, मिस्र के फ़िरऔन (फ़राओ) से मुक्ति की ख़ुशी में मनाया जाता है, लेकिन इस अवसर पर सिनेगॉग और म्यूज़ियम छुट्टी के कारण बंद थे.

हमारी मुलाक़ात वहां के विज़िटिंग रब्बी (यहूदियों के विद्वान और धर्मगुरु) जोनाथन श्मिट गोल्डस्मिथ से हुई जो इस अवसर पर वहां मौजूद थे.

उन्होंने न केवल हमारी मेज़बानी की बल्कि ज्यू टाउन के यहूदियों के बारे में और उनके यहां से चले जाने के कारणों को भी बताया. लेकिन पहले बात ज्यू टाउन की.

राजा के महल की दीवार और सिनेगॉग के साथ एक क्लॉक टॉवर है जिसकी अपनी ही कहानी है.

राजा के महल की ओर से हम जैसे ही आगे बढ़े, ज्यू टाउन के साइनबोर्ड से पहले ही एंटीक की एक दुकान पर हिजाब पहने एक महिला नज़र आईं.

उन्होंने बताया कि वह लोग सदियों पहले गुजरात के रेगिस्तानी इलाक़े कच्छ से आए और यहीं आबाद हो गए. उनकी बिरादरी कच्छी मेमन बिरादरी कहलाती है.

उन्होंने यह भी बताया कि यहां अब यहूदी तो गिने-चुने ही नज़र आते हैं और यहां 70 फ़ीसद दुकानें मुसलमानों की हैं.

अभी उनसे बात हो ही रही थी कि सामने कपड़ों की दुकान के बाहर एक शख़्स नज़र आया जो कश्मीरी था.

उनसे मुलाक़ात ने भाषा की समस्या हल कर दी क्योंकि अभी तक हम कोच्चि हेरिटेज प्रोजेक्ट के संस्थापक और कोच्चि के निवासी योहान बिन्नी कुरुविला से ज्यू टाउन की कहानी सुन रहे थे.

उन्होंने बताया कि उनके अलावा और भी कश्मीरी हैं जो कई दशकों से यहां आबाद हैं और उनकी अपनी एक ट्रेड यूनियन भी है.

बाद में हमारी मुलाक़ात कश्मीर व्यापारी संघ के पूर्व अध्यक्ष साजिद हुसैन खताई से हुई जिन्होंने बताया कि हालांकि "अब यहां यहूदी कम ही नज़र आते हैं लेकिन यहां जो इमारतें हैं सब की सब तीन सौ चार सौ साल पुरानी हैं. सरकार ने एक अच्छा काम यह किया कि कम से कम इमारतों के बाहरी आर्किटेक्चर को ज्यों का त्यों रहने दिया."

हमने देखा कि वहां की इमारतों पर जगह-जगह 'स्टार ऑफ़ डेविड' यानी दाऊद का सितारा अब भी मौजूद है. यह छह कोनों वाला सितारा यहूदियों का पवित्र प्रतीक चिह्न है जो इसराइल के झंडे पर भी नज़र आता है.

इसके अलावा वहां की कुछ इमारतों पर स्वास्तिक भी नज़र आते हैं जो नाज़ी जर्मनी का प्रतीक है लेकिन इसका संबंध आर्य नस्ल से भी है. शायद यहूदियों ने नस्लीय भेदभाव के लिए अपने दरवाज़ों और दीवारों पर इसका चित्र बनाया था.

मसालों का केंद्र

साजिद हुसैन खताई ने बताया कि पहले यहां मसालों का व्यापार होता था. ज्यू टाउन के एक तरफ़ आपको हर इमारत के साथ संकरी गलियां नज़र आती हैं जिसके दूसरी तरफ़ समंदर है. लोग नावों से इस इलाक़े में मसाले लाया करते थे.

मसालों के लिए रोमन साम्राज्य, यूनानियों, अरबों और बाद में पुर्तगालियों, डच और ब्रिटेन के लोगों ने भी यहां का रुख़ किया.

योहान के अनुसार कोचीन के राजा ने यहूदियों को विशेष सुविधाएं इसलिए दीं क्योंकि उस ज़माने में दूसरे राजा जिन्हें ज़मोरिन कहा जाता था, वह ख़ास तौर से अरबों और मुसलमानों के समर्थक थे.

योहान ने यह भी बताया कि ज्यू टाउन के यहूदियों के जहाज़ चलते थे और मसालों के व्यापार पर यहां एक तरह से उनका एकाधिकार था. इसके साथ ही वह कोचीन के राजा के प्रतिनिधि के रूप में दूसरे दरबारों के दौरे भी किया करते थे जिनमें मुग़ल दरबार भी शामिल था.

काली मिर्च का 'एक्सचेंज'

कोच्चि हैंडीक्राफ्ट एसोसिएशन के सचिव जुनैद सुलेमान ने बताया कि ज्यू टाउन में एक पेपर (काली मिर्च) एक्सचेंज है. यहां वॉल स्ट्रीट की तरह मसालों की कीमत तय की जाती है. इसका संचालन इंडियन पेपर एंड स्पाइस ट्रेड एसोसिएशन (आईपस्टा) के तहत होता है.

जुनैद सुलेमान आज भी मसालों के कारोबार से जुड़े हैं. इसके अलावा, यहूदियों के सिनेगॉग के पास उनका मोचा कैफ़े भी है.

उन्होंने बताया कि जब प्रिंस चार्ल्स (अब किंग चार्ल्स तृतीय) और डचेस ऑफ़ कॉर्नवाल कैमिला ने 2013 में ज्यू टाउन का दौरा किया था, तब उन्होंने सिनेगॉग के साथ उनके कैफ़े का भी दौरा किया था.

जुनैद सुलेमान के मुताबिक, आसपास के इलाकों में मसाले, खासकर काली मिर्च उगाने वाले किसान अपना माल एक्सचेंज में एक तय कीमत पर जमा कर देते हैं. उन्हें मसालों की कीमत का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा तुरंत नकद मिल जाता है. बाद में, किसी शेयर बाज़ार की तरह, मालिक की इच्छा के अनुसार मसालों की बिक्री की जाती है.

जब उनसे अच्छी काली मिर्च की पहचान के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि अगर काली मिर्च बहुत ज़्यादा चमकदार दिखे, तो समझ लेना चाहिए कि उसके साथ छेड़छाड़ की गई है.

उन्होंने कहा, "या तो उस पर तेल की पॉलिश की गई है या फिर उसका वज़न बढ़ाने के लिए उसे पानी में भिगोया गया है."

उनके अनुसार, जो काली मिर्च दिखने में बहुत ज़्यादा आकर्षक न लगे, उसके असली होने की संभावना अधिक होती है.

भारत का सबसे पुराना क्लॉक टॉवर

ज्यू टाउन के बहुसांस्कृतिक स्वरूप की ओर इशारा करते हुए योहान ने वहां मौजूद एक क्लॉक टॉवर का ज़िक्र किया. उनके अनुसार, यह भारत के सबसे पुराने क्लॉक टॉवरों में से एक है. इसका निर्माण 1760-70 के दशक में हुआ था. इस लिहाज़ से यह इंग्लैंड के प्रसिद्ध क्लॉक टॉवर बिग बेन (1859) से भी पुराना है.

इस क्लॉक टॉवर की सबसे खास बात इसकी चारों दिशाओं में लगी घड़ियां हैं. लंबे समय तक खराब रहने के बाद इन्हें फिर से बहाल किया गया है.

हर दिशा में लगी घड़ी पर अलग-अलग भाषाओं के अंक लिखे गए हैं. सिनेगॉग की ओर लगी घड़ी पर रोमन अंक हैं. राजा के महल की ओर वाली घड़ी पर मलयालम अंक लिखे हैं. वहीं, ज्यू टाउन की दिशा में लगी घड़ी पर हिब्रू भाषा के अंक दिखाई देते हैं.

कहा जाता है कि जब यह क्लॉक टॉवर बनाया गया था, तब समुद्र की ओर वाली दीवार पर अरबी अंक भी लिखे गए थे. ये अंक दूर से आने वाले नाविकों को दिखाई देते थे. हालांकि, अब उस दीवार पर कोई अंक नहीं हैं.

ज्यू टाउन का व्यापारिक सामान बदल गया

ज्यू टाउन के बारे में साजिद हुसैन खताई कहते हैं कि अब यह बाज़ार अपग्रेड हो गया है. मसालों की दुकानों की जगह एंटीक की दुकानों ने ले ली है. उनके अनुसार मसालों का बाज़ार अब भी मौजूद है लेकिन वह फ़ोर्ट कोच्चि की ओर स्पाइस रोड पर ज़्यादा नज़र आता है, लेकिन दुनिया भर से लोग इस इलाक़े को देखने के लिए आते हैं.

सिनेगॉग की ओर जाते हुए हमें कुछ युवा नज़र आए जो तस्वीरें ले रहे थे. उनमें से कुछ से हमने बात की. रफ़आ ने बताया कि वह सोशल मीडिया पर इसका नाम सुनकर यहां आई हैं जबकि सना का कहना था कि हालांकि यहां जो सामान मिलते हैं वह थोड़े महंगे हैं लेकिन उन्होंने यहां से इसलिए ख़रीदारी की क्योंकि यह उनके लिए किसी सोवेनियर (यादगार) से कम नहीं.

ज्यू टाउन अंग्रेज़ी के अक्षर 'यू' के आकार में है जहां दो-तीन गलियां हैं. कोने पर काशी हेलोगुआ की इमारत है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह 1761 में बनाई गई थी और अब इसे एक आर्ट गैलरी में बदल दिया गया है.

मट्टानचेरी के सबसे पुराने व्यापारी परिवार से आने वाले जुनैद सुलेमान ने बताया कि पहले यह जगह किसी यूरोपीय स्ट्रीट की तरह नज़र आती थी जहां सारे मकान दो मंज़िला थे. ऊपर के हिस्से में यहूदी परिवार आबाद थे जबकि नीचे के हिस्से में उनकी दुकानें हुआ करती थीं और कुछ के नौकर या कर्मचारी निचले हिस्से में रहा करते थे.

'प्रॉमिस्ड लैंड'

"इसलिए जब इसराइल की स्थापना हुई तो दुनिया भर से यहूदियों ने इस भविष्यवाणी के तहत इसराइल का रुख़ किया और यही क़दम यहां के यहूदियों ने भी उठाया."

उन्होंने यह भी कहा कि यहां या भारत के दूसरे हिस्सों में यहूदियों को कोई जान-माल का ख़तरा नहीं था बल्कि उन्होंने भविष्यवाणी के कारण इसराइल का रुख़ किया.

लेकिन जुनैद के मुताबिक़ यहां के सभी यहूदी इसराइल नहीं गए बल्कि वह बेहतर भविष्य के लिए अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और दूसरे देश चले गए और उनमें से कुछ आज भी यहां आते हैं.

उनके अनुसार यहां आबाद बहुत ही कम यहूदियों को हिब्रू भाषा आती थी क्योंकि उनकी मातृभाषा मलयालम थी जबकि शिक्षा की भाषा अंग्रेज़ी थी.

सूरज ढलने के समय हम तीसरी गली में पहुंचे जहां यहूदियों का क़ब्रिस्तान है. इसे देखकर यह एहसास हुआ कि इंसान की आख़िरी मंज़िल तो यही है और जो यहूदी यहां दफ़्न हैं उनके लिए राजा के ताम्र पत्र की वह बात कितनी सारगर्भित है जिसपर लिखा था, "जब तक सूरज और चांद निकलते रहेंगे, यह ज़मीन यहूदियों की रहेगी."

This article was originally published by BBC हिंदी.

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