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Backवाराणसी: गंगा में इफ़्तार के बाद हड्डियाँ फेंकने के मामले में 8 युवकों को ज़मानत
वाराणसी: गंगा में इफ़्तार के बाद हड्डियाँ फेंकने के मामले में 8 युवकों को ज़मानत
NOTICIA
BBC हिंदी21.05.2026Law4 dk okumaIndia

वाराणसी: गंगा में इफ़्तार के बाद हड्डियाँ फेंकने के मामले में 8 युवकों को ज़मानत

En resumen

वाराणसी में गंगा नदी में इफ़्तार के दौरान मुर्गी की हड्डियाँ फेंकने के आरोप में गिरफ़्तार 14 युवकों में से आठ को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ज़मानत दे दी है. कोर्ट ने कहा कि गंगा का महत्व बहुत है और इससे धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं, लेकिन यह भी माना कि यह मामला ज़मानत का था.

Resumen generado por IA

Por qué importa

मार्च 2026 में रमज़ान के दौरान वाराणसी में गंगा नदी में नाव पर इफ़्तार के बाद कथित तौर पर मुर्गी की हड्डियाँ फेंकने के आरोप में 14 युवकों को गिरफ़्तार किया गया था. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शुक्रवार 15 मई को इनमें से आठ युवकों को ज़मानत दे दी.

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Author, उमंग पोद्दार

पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रकाशित 21 मई 2026, 07:12 IST

पढ़ने का समय: 6 मिनट

इस साल मार्च में रमज़ान के दौरान कुछ लोगों ने वाराणसी में गंगा नदी में नाव पर इफ़्तार क‍िया. उन पर आरोप लगा क‍ि उन्‍होंने मुर्गी की हड्ड‍ियाँ गंगा में फेंकी. इसके बाद 14 युवक ग‍िरफ़्तार क‍िए गए. शुक्रवार 15 मई को इनमें से आठ युवकों को इलाहाबाद हाई कोर्ट की दो अलग-अलग पीठों ने ज़मानत दे दी.

जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की पीठ ने पांच लोगों को ज़मानत दी. वहीं जस्टिस जितेंदर कुमार सिन्हा की पीठ ने तीन लोगों को ज़मानत दी. बचे छह लोगों की याचिकाएं अब भी लंबित हैं.

ज़मानत देते हुए जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला ने अपने फ़ैसले में कहा, "न केवल हिंदुओं में बल्कि पूरे देश में गंगा नदी का बड़ा महत्व है." इसके बाद कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कुछ मुसलमान समुदाय के लोगों ने रोज़ा खोलते हुए गंगा में एक नाव पर मांस खाया था और कथित तौर पर उसे नदी में फेंका था.

कोर्ट ने अपने फ़ैसले में लिखा, "न्यायालय की निष्पक्ष राय है कि ऐसा करना हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला कहा जा सकता है."

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यहां एक बात ध्‍यान रखना ज़रूरी है कि गंगा के बारे में यह टिप्पणी केस का प्राथम‍िक मुद्दा नहीं था. इसलिए इससे आगे वाले मामलों पर फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए. कोर्ट केवल ज़मानत के मुद्दे पर सुनवाई कर रहा था.

आगे हम समझने की कोश‍िश करते हैं इस टिप्पणी पर क़ानून के विशेषज्ञों की क्या राय है और कोर्ट ने पहले ऐसे मुद्दों पर क्या कहा है?

धार्मिक भावनाओं को ठेस

भारत के आपराधिक क़ानूनों में किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने को दंडनीय बनाया गया है. जैसे, भारतीय दंड संहिता की धारा 295ए के मुताब‍िक़, अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे से, किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं या मान्यताओं का अपमान करता है तो उस व्यक्ति को तीन साल तक के कारावास की सज़ा मिल सकती है.

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यही बात भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 299 भी कहती है.

इन 14 लोगों पर बीनएस की धारा 299 के अलावा कई और धाराएँ लगाई गई हैं. जैसे, किसी पूजा स्थल को अपवित्र करना. किसी सार्वजनिक जल के स्रोत को दूषित करना और किसी व्यक्ति को डरा-धमका कर उससे ज़बरदस्ती वसूली करना.

हालाँकि, इस घटना के कुछ हफ़्ते बाद ही ख़बर आई थी कि एक व्यक्ति गंगा नदी में शराब का सेवन कर रहा था. उस मामले में पुलिस ने धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाने की धारा नहीं लगाई है.

गंगा में इफ़्तार के मामले पर वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े का कहना है कि, "सबसे पहले तो सवाल है, आपराधिक मनःस्थिति का. क्या यह एक ऐसा कार्यक्रम था जो विशेष रूप से भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए किया गया था? मुझे ऐसा नहीं लगता."

उन्होंने आगे कहा, "मान लीजिए कि इफ़्तार पूरी तरह से शाकाहारी था और उसके बाद गंगा में मलबा फेंका गया होता. तब भी क्या वही धाराएँ लगाई जातीं? मुझे नहीं लगता. यह मान लेना ग़लत है कि 'हिंदू' का मतलब स‍िर्फ़ शाकाहारी हिंदुओं की भावनाएँ हैं."

उनका मानना था कि, "जब मानव शरीरों को या मानव अवशेषों को गंगा में प्रवाहित किया जाता है, तो कुछ मुर्गे की हड्डियों के मुकाबले नदी ज़्यादा अपवित्र नहीं हो जाएगी."

अदालत ने टिप्पणी की कि कोर्ट की निष्पक्ष राय में मुर्गी की हड्डियों को फेंकने से हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचेगी. इस पर संजय हेगड़े का कहना था, "यह मुसलमानों के कृत्‍यों का नहीं, बल्कि हिंदुओं की भावनाओं का मूल्यांकन कर रहे हैं कि हिंदुओं का क्रोधित होना उचित है. मैं कोर्ट के इस वाक्य को ऐसे देखता हूँ."

वरिष्ठ वकील संजॉय घोष का कहना है, "मुझे लगता है कि जब गंगा और यमुना में बड़ी मात्रा में गंदा पानी और ज़हरीला कचरा बहाया जाता है तो उससे हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ज़्यादा ठेस पहुँचनी चाहिए. न क‍ि इस बात से कि नाव पर पिकनिक कर रहे कुछ मुसलमानों ने गंगा में कुछ हड़्डियाँ फेंकी हैं."

वे इस बात का ज़िक्र कर रहे थे कि गंगा में बड़ी मात्रा में प्रदूषित चीज़ों को बहाया जाता है.

संजॉय घोष कहते हैं, "दूसरी बात यह है कि गंगा में मांस-मछली खाना जायज़ है या नहीं? ऐसा कौन-सा क़ानून है जो कहता है कि आप नॉन-वेज खाना नहीं खा सकते? बंगाल में गंगा क्रूज़ चलते हैं, जहाँ मांस परोसा जाता है."

दोनों वकीलों का कहना था कि गंगा पर सभी भारतीयों का हक़ है. संजॉय घोष का कहना था, "सिर्फ़ इसलिए कि कोई समुदाय बहुसंख्यक है, इस पर उनका कोई विशेष अधिकार नहीं हो जाता."

संजय हेगड़े का कहना था, "कोई भी एक समुदाय किसी नदी पर अपने विशेष अधिकार का दावा नहीं कर सकता. कुछ समुदाय उसे पवित्र मान सकते हैं."

उन्होंने कहा, लेकिन जब गंगा में इतनी प्रदूषित चीज़ें बहाई जाती हैं तो यह कहना कि मुर्गी की हड्डियों से भावनाओं को ठेस पहुँचेगी, यह ग़लत बात है.

जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे से अपमान

धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के मामले में कोर्ट ने कई फ़ैसले दिए हैं. हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने कई बार यह कहा है कि ऐसे मामले में किसी व्यक्ति की मंशा देखनी होगी. साथ ही यह देखना होगा कि क्या जानबूझकर किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई जा रही है.

साल 1957 के एक फ़ैसले में कोर्ट ने कहा था, "(आईपीसी की धारा 295ए ने) हर धार्मिक अपमान को दंडित नहीं किया है. केवल उन्हीं अपमानों को दंडित किया है जो क‍िसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को अपमानित करने के ल‍िए जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे से किए जाते हैं... अनजाने में या लापरवाही से या बिना सोचे-समझे किए गए धर्म का अपमान इस धारा के अंतर्गत नहीं आता है."

यह बात कई बार सुप्रीम कोर्ट ने बाद के फ़ैसलों में भी दोहराई है.

रही बात किसी भी नदी के स्वामित्व की, इस पर सुप्रीम कोर्ट ने साल 1996 में अपने एक फ़ैसले में कहा है, "राज्य उन सभी प्राकृतिक संसाधनों का 'ट्रस्टी' है जो स्वाभाविक रूप से सार्वजनिक उपयोग और आनंद के लिए हैं."

इसमें समुद्र तट, बहता पानी, हवा और जंगल शामिल हैं. कोर्ट ने कहा, "एक ट्रस्टी के रूप में राज्य का प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना क़ानूनी कर्तव्य है. सार्वजनिक उपयोग के लिए बने इन संसाधनों को निजी स्वामित्व में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है." इसे सार्वजनिक न्यास सिद्धांत (पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन) भी कहा जाता है.

कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने गंगा को साफ़ रखने के लिए भी 'पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन' का इस्तेमाल कई बार किया है.

साल 1988 में सुप्रीम कोर्ट ने गंगा में लाशों और अधजले शवों को फेंकने की प्रथा पर भी रोक लगाई थी. हालाँकि, ये प्रथा अब भी चलती आ रही है. साल 2021 में कोविड-19 के दौरान भी बड़ी संख्या में लाशें गंगा में तैरती पाई गई थीं.

मार्च के गंगा में इफ़्तार मामले में अभी केवल आठ लोगों को ज़मानत मिली है. छह अभी भी जेल में हैं. कोर्ट ने केवल ज़मानत पर फ़ैसले दिए हैं. यह अब तक तय नहीं हुआ है कि उन पर लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं.

अभियुक्तों ने कोर्ट से कहा है कि उन पर लगाए गए आरोप झूठे हैं. दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि उन्होंने सोच समझकर सांप्रदायिक शांति ब‍िगाड़ने के लिए ऐसा किया था.

Preguntas abiertas

  • क्या गंगा में हड्डियाँ फेंकना जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के इरादे से किया गया था?
  • क्या गंगा नदी में मांस-मछली खाना या हड्डियाँ फेंकना किसी कानून का उल्लंघन है?
  • गंगा नदी के स्वामित्व और उसके उपयोग को लेकर क्या कानूनी स्थिति है?
  • क्या गंगा नदी में अन्य प्रदूषित चीज़ों को बहाने के मामलों में भी इसी तरह की धाराएँ लगाई गई हैं?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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