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मानसून ब्रेक: भारत के कई हिस्सों में बारिश की कमी, मौसम विशेषज्ञ चिंतित
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मानसून ब्रेक: भारत के कई हिस्सों में बारिश की कमी, मौसम विशेषज्ञ चिंतित

En resumen

भारत के कई राज्यों में मानसून की भारी बारिश से जीवन अस्त-व्यस्त है, लेकिन मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम-उत्तर और मध्य भारत में 'मानसून ब्रेक' के कारण कई दिनों तक बारिश की संभावना नहीं है। यह स्थिति चिंताजनक है, खासकर जब देश में मानसून की बारिश पहले से ही औसत से काफी कम हुई है।

Resumen generado por IA

Por qué importa

भारत में मानसून की बारिश औसत से कम हुई है, और पश्चिम-उत्तर व मध्य भारत में 'मानसून ब्रेक' के कारण बारिश की संभावना कम है। अल नीनो का प्रभाव भी इस स्थिति को बढ़ा रहा है।

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Author, चंदन कुमार जजवाड़े

पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रकाशित 58 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 7 मिनट

एक तरफ़ भारत के कई राज्यों में मानसून की भारी बारिश से आम लोगों की ज़िंदगी बेहाल है, लेकिन मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक़ पश्चिम-उत्तर और मध्य भारत में 'मानसून ब्रेक' की वजह से कई दिनों तक बारिश की संभावना नहीं है.

मौसम में आए इस अचानक बदलाव पर विशेषज्ञ चिंता ज़ाहिर कर रहे हैं. ख़ास कर ऐसे वक़्त पर जब देश में मानसून की बारिश पहले से ही औसत से काफ़ी कम हुई है.

मौसम विभाग ने भी शनिवार को बताया कि अगले 6–7 दिनों के दौरान उत्तर-पश्चिम भारत के मैदानी क्षेत्रों, पश्चिम-मध्य भारत और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में बारिश के कमज़ोर रहने की संभावना है.

मानसून के मौसम में इस तरह का बदलाव कितनी गंभीर घटना है और इसका क्या असर पड़ सकता है, इस कहानी में हम यही जानने की कोशिश करेंगे.

एक गैर सरकारी संस्था लाईव वेदर ऑफ़ इंडिया के संस्थापक नवदीप दहिया ने एक्स पर लिखा, "जुलाई के दूसरे सप्ताह की सैटेलाइट तस्वीरें बेहद चिंताजनक स्थिति दिखा रही हैं."

"पश्चिमी घाट से लेकर देश के अंदरूनी हिस्सों के मुख्य मानसूनी क्षेत्रों तक लगभग कहीं भी बारिश के संकेत नहीं हैं. अरब सागर और बंगाल की खाड़ी, दोनों में बादलों की मौजूदगी बेहद कम है. स्थिति 12 जुलाई की बजाय 12 अप्रैल की सुबह जैसी दिखाई दे रही है."

उनके अनुसार, "18 जुलाई से पहले मानसून की स्थिति में सुधार की संभावना नहीं है."

मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली एनसीआर और देश के कई इलाक़ों में हो रही बारिश आने वाले दिनों कम होने की संभावना है.

दरअसल मौसम में यह बदलाव मानसून ब्रेक की वजह से हो रहा है. हालाँकि यह एक सामान्य घटना है लेकिन इस साल यह असमान्य है.

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स्काईमेट वेदर के प्रमुख और मौसम विशेषज्ञ महेश पहलावत ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया है कि पश्चिम-उत्तर और मध्य भारत में 19-20 जुलाई तक बारिश होने की संभावना नहीं है.

इसकी वजह से दिल्ली एनसीआर समेत कई इलाक़ों में बारिश बुरी तरह प्रभावित रहेगी, साथ ही दिल्ली और इसके आसपास के इलाक़ों का तापमान 37-38 डिग्री सेल्सियस तक रह सकता है.

महेश पहलावत कहते हैं, "मानसून ब्रेक जुलाई और अगस्त में एक-दो बार होता ही है. पिछले कुछ सालों से पूरा मानसून ब्रेक नहीं हो रहा है. अभी उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में सूखा है लेकिन पूर्वी भारत में बारिश हो रही है. "

दरअसल, ये ख़रीफ़ का सीज़न है और अधिकांश खेती मानसून की बारिश पर निर्भर रहती है. इसलिए किसानों की चिंता भी बढ़ रही है.

हालांकि महेश पहलावत का कहना है कि मानसून के फिर से सक्रिय होने के बाद ही इन इलाक़ों में फिर से बारिश होने की संभावना है.

उनके अनुसार, "इस स्थिति में पहाड़ों की तलहटी में ज़्यादा बारिश होती है, लेकिन मध्य और पश्चिम भारत में मौसम लगभग पूरी तरह शुष्क हो जाता है. इस दौरान ह्यूमिडिटी कम हो जाती है. बारिश रुक जाती है और आसमान तकरीबन साफ़ हो जाता है क्योंकि नमी नहीं रहती है."

"जब यह मानसून दक्षिण की तरफ आएगा, जो कि 19-20 जुलाई के पास हो सकता है, तब इन इलाक़ों में फिर से बारिश शुरू हो सकती है."

मानसून ब्रेक की वजह से कई लोग चिंता भी ज़ाहिर करने लगे हैं.

टीएमसी की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, "यह बहुत ही चिंताजनक स्थिति है. जुलाई में कमजोर मानसून से खेती, पानी की सुरक्षा और गावों में लोगों की रोज़ी-रोटी पर ख़तरा मंडरा रहा है. क्या मोदी सरकार के पास कोई योजना है? मैं संसद में यह मुद्दा उठाउंगी. "

संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हो रहा है. यह 13 अगस्त तक चलेगा. हालाँकि तब तक मानसूनी बारिश फिर से शुरू हो सकती है. लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो संसद में यह मुद्दा उठ सकता है.

भारत में इस साल जून महीने में औसत से क़रीब 40 फ़ीसदी कम बारिश हुई, हालाँकि उसके बाद 9 जुलाई तक देश में अच्छी बारिश हुई है.

इस तरह से 9 जुलाई तक बारिश की औसत कमी 12 फ़ीसदी ही रह गई. लेकिन मानसून ब्रेक की वजह से बारिश की कमी फिर से काफ़ी चिंताजनक स्थिति तक पहुंच सकती है.

महेश पहलावत कहते हैं, "मानसून ब्रेक हर बार होता है लेकिन इस बार अल नीनो का असर है. मानसून वैसे ही कमज़ोर है और यह लंबा ब्रेक है. मानसून ब्रेक इतना लंबा नहीं होता है.

"बारिश 4-5 दिन ऊपरी इलाक़ों की तरफ शिफ़्ट होती है, फिर नीचे हो जाती है. लेकिन इस बार यह दस दिनों का रहेगा, तो लंबा ब्रेक हो जाएगा. इतना नहीं होना चाहिए."

उन्होंने बताया कि इससे मानसूनी बारिश का आंकड़ा और कमज़ोर हो जाएगा.

अल नीनो मौसम संबंधी एक प्राकृतिक और जटिल घटना है. यह मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर के समुद्री जल के सामान्य से अधिक गर्म होने पर एक्टिव होता है.

इसके प्रभाव से वैश्विक तापमान बढ़ जाता है, ट्रेड विंड्स कमज़ोर हो जाती हैं. इससे दुनिया भर में बारिश के चक्र पर असर पड़ता है.

अल नीनो के कारण भारतीय उपमहाद्वीप में हवा का दबाव प्रभावित होता है, जिससे अक्सर मानसून कमजोर हो जाता है और देश के कई हिस्सों में सूखे की स्थिति बन सकती है.

मानसून ब्रेक आम तौर पर मौसम संबंधी एक सामान्य घटना है. किसी ज़्यादा ताक़तवर हवा के असर से मानसून में ब्रेक लगना कोई अनोखी घटना नहीं है.

महेश पहलावत कहते हैं, "हवा की दिशा की वजह से मानसून ब्रेक होता है. अगर पश्चिमी हवा ज़्यादा प्रभावशाली हो जाए तो यह मानसून के टर्फ़ को ऊपर की तरफ़ ले जाती है."

उनका कहना है कि कोई नया वेदर सिस्टम बन जाए, यानी कोई चक्रवाती कम दबाव का क्षेत्र बन जाए, जो ज़्यादा असरदार हो तो यह मानसून को नीचे की तरफ़ खींच लेता है.

वह कहते हैं, "जब बंगाल की खाड़ी में कोई चक्रवाती सिस्टम बनेगा और वह अंदर की तरफ़ आएगा तो यह मानसून को खींचेगा. इससे बारिश फिर से शुरू हो जाएगी."

"अभी मानसून का पश्चिमी शिरा पहाड़ों पर है और पूर्वी शिरा दक्षिण में है. इसलिए पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल में बारिश जारी रहेगी. लेकिन कई इलाक़े सूखे बने रहेंगे."

इस साल अभी तक बारिश कम होने के पीछे अल नीनो इफ़ेक्ट को कारण माना जा रहा है.

11 जून को प्रकाशित बीबीसी एक स्टोरी के मुताबिक़, अमेरिका की नेशनल ओशियानिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) ने कहा है कि 2026 के बाकी महीनों में अल नीनो की स्थिति और मजबूत होने की संभावना है.

कई पूर्वानुमानों के मुताबिक़, यह अब तक दर्ज सबसे शक्तिशाली एल नीनो घटनाओं में से एक हो सकता है.

इंसानी गतिविधियों की वजह से दशकों से बढ़ रहे वैश्विक तापमान के बीच, साल 2027 सबसे गर्म साल बन सकता है. इसका असर मौसम, खाद्य आपूर्ति और अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ने की आशंका है.

एनओएए के वैज्ञानिकों ने मध्य उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक दर्ज होने के बाद अल नीनो के नए चरण की शुरुआत की पुष्टि की.

अनुमान है कि यह स्थिति कम से कम 2027 की शुरुआत तक बनी रहेगी.

Qué observar

Perspectiva de IA — posibilidades, no hechos

  • मानसून 19-20 जुलाई के आसपास फिर से सक्रिय हो सकता है।

    Probable · En días

  • अल नीनो का प्रभाव 2027 की शुरुआत तक बना रह सकता है।

    Probable · En años

Preguntas abiertas

  • मानसून ब्रेक कब तक जारी रहेगा?
  • सरकार की क्या योजनाएं हैं?
  • खेती और पानी की सुरक्षा पर कितना असर पड़ेगा?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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