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Atrásपीएम मोदी के यूरोप दौरे पर प्रेस के सवाल न लेने का विवाद, भारत ने लोकतंत्र का किया बचाव
पीएम मोदी के यूरोप दौरे पर प्रेस के सवाल न लेने का विवाद, भारत ने लोकतंत्र का किया बचाव
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BBC हिंदी21/5/2026Política5 min de lecturaIndia

पीएम मोदी के यूरोप दौरे पर प्रेस के सवाल न लेने का विवाद, भारत ने लोकतंत्र का किया बचाव

En resumen

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के यूरोप दौरे में प्रेस के सवालों का जवाब न देने के फैसले पर विवाद हो रहा है। विदेश मंत्रालय ने भारत के लोकतंत्र का बचाव करते हुए कहा कि यह एक सिविलाइजेशनल नेशन है।

Resumen generado por IA

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प्रकाशित 20 मई 2026

पढ़ने का समय: 6 मिनट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के यूरोप दौरे में प्रेस के सवाल न लेने के फ़ैसले पर विवाद हो रहा है.

इन विवादों को सुलझाने के लिए विदेश मंत्रालय ने भारत के लोकतंत्र का बचाव किया है. पीएम मोदी के इस दौरे में दूसरी बार था, जब इन मुद्दों पर सरकार को सफ़ाई देनी पड़ी.

नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनस गार स्टोरे के साथ संयुक्त प्रेस वार्ता के दौरान नॉर्वे की एक महिला पत्रकार ने प्रधानमंत्री मोदी से मीडिया के सवालों का जवाब देने का आग्रह किया था. लेकिन पीएम मोदी ने कोई सवाल नहीं लिया था.

यूरोपीय देशों में विदेशी नेता से सवाल पूछना पुरानी परंपरा का हिस्सा है.

नॉर्वे की महिला पत्रकार हेला लेंग ने विदेश मंत्रालय की ब्रीफ़िंग में भी मानवाधिकारों को लेकर सवाल उठाए. इस पर विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भारत एक सिविलाइज़ेशनल नेशन है.

इससे पहले हेला लेंग ने ओस्लो के गवर्नमेंट गेस्ट हाउस में प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री स्टोर की प्रेस ब्रीफिंग ख़त्म होने के बाद खड़े होकर सवाल पूछा था.

विदेश मंत्रालय को देनी पड़ी सफ़ाई

हेला ने पूछा था, "प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवाल क्यों नहीं लेते? क्या आप हमारी सरकार के विश्वास के योग्य हैं?" पीएम मोदी ने इन सवालों का कोई जवाब नहीं दिया था.

हेला के सवाल पर भारत में भी काफ़ी बहस हो रही है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को आड़े हाथों लिया और पूछा कि सवालों से घबरा क्यों रहे हैं?

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भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू के दिल्ली में स्थानीय संपादक वर्गीज़ के जॉर्ज ने एक्स पर लिखा है, ''भारत में पत्रकारिता और लोकतंत्र को लेकर कई चिंताएं हो सकती हैं. लेकिन यह मान लेना कि नॉर्वे लोकतंत्र या पत्रकारिता का कोई अंतिम मानक है तो यह अलग-अलग देशों की विशिष्ट परिस्थितियों की अनदेखी करना होगा. पश्चिम अक्सर यह मानकर चलता है कि लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता को भी ऊंचाई और वज़न की तरह एक ही पैमाने से मापा जा सकता है. नॉर्वेजियन पत्रकार भी अपने ही एक सुरक्षित और सीमित दृष्टिकोण वाले घेरे में रह रहे हैं.''

17 मई को प्रधानमंत्री की नीदरलैंड्स यात्रा के दौरान भी स्थानीय पत्रकारों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल न लेने की परंपरा पर आपत्ति जताई थी.

इस पर विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी सिबी जॉर्ज ने जवाब देते हुए कहा था, "हमें इस तरह के सवाल मूलतः सवाल पूछने वाले व्यक्ति की समझ की कमी के कारण झेलने पड़ते हैं."

जर्मनी के दौरे पर भी उठे थे सवाल

विदेश मंत्रालय की ब्रीफिंग में जब सिबी जॉर्ज से पूछा गया कि क्या मेज़बान देशों के नेताओं ने भारतीय पक्ष से मीडिया के सवाल लेने को कहा था और क्या सरकार अपनी नीति पर विचार कर रही है? इसके जवाब में जॉर्ज ने कहा था कि पीएम की यात्रा पर विदेश मंत्रालय ही सवालों का जवाब देगा.

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2022 में जर्मनी के दौरे पर गए थे. तब जर्मनी के चांसलर ओलाफ़ शॉल्त्स थे. जर्मनी में परंपरा रही है कि कोई भी विदेशी नेता जर्मन चांसलर से मिलने के बाद मीडिया के सामने आएगा तो पत्रकारों के सवालों का जवाब देगा. इस दौरे में ऐसा नहीं हुआ.

तब जर्मन ब्रॉडकास्टर डॉयचे वेले के चीफ़ इंटरनेशनल एडिटर रिचर्ड वॉकर ने प्रधानमंत्री मोदी की जर्मनी यात्रा के दौरान इस मुद्दे को उठाया.

उन्होंने 2022 में दो मई को एक्स पर लिखा था, ''मोदी और शॉल्त्स अब बर्लिन में प्रेस के सामने आने वाले हैं. दोनों सरकारों के बीच 14 समझौतों की घोषणा की जाएगी. लेकिन भारतीय पक्ष के आग्रह पर एक भी सवाल नहीं लिया जाएगा.''

डॉयचे वेले ने तब अपनी एक रिपोर्ट में लिखा था, ''मोदी और शॉल्त्स ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों के सवाल नहीं लिए. रिपोर्टों के मुताबिक़, यह फ़ैसला प्रधानमंत्री मोदी के आग्रह पर लिया गया था.''

जर्मनी के दौरे के क़रीब एक साल बाद जून 2023 में पीएम मोदी अमेरिका के दौरे पर गए और उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया के दो सवाल लिए थे.

पश्चिम के मीडिया में इसे एक दुर्लभ घटना के रूप में देखा गया था. हालांकि यह प्रेस कॉन्फ्रेंस भी वैसी खुली नहीं थी जैसी अमेरिकी राष्ट्रपति आमतौर पर विदेशी नेताओं के साथ करते हैं.

अमेरिका दौरे पर मोदी ने दिए थे सवालों के जवाब

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समाचार एजेंसी एपी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था, ''भारतीय अधिकारियों ने इस कार्यक्रम के लिए केवल एक दिन पहले सहमति दी थी. अमेरिकी प्रशासन के अधिकारियों ने मोदी के सलाहकारों से कहा था कि मीडिया के सवाल लेना व्हाइट हाउस में होने वाले स्टेट विज़िट की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है.''

नरेंद्र मोदी से पूछे गए दो सवालों में एक भारतीय पत्रकार ने जलवायु परिवर्तन से निपटने को लेकर सवाल पूछा था जबकि एक अमेरिकी पत्रकार ने मानवाधिकार संबंधी चिंताओं पर मोदी से सवाल किया था.

नरेंद्र मोदी ने मानवाधिकार और लोकतंत्र के सवाल पर जवाब में कहा था, ''लोकतंत्र हमारी रगों में बहता है. हमारे लोकतंत्र में भेदभाव के लिए बिल्कुल कोई जगह नहीं है.''

मीडिया के सवालों को लेना प्रधानमंत्री मोदी के लिए बेहद असामान्य माना जाता है. प्रधानमंत्री बनने के बाद से उन्होंने भारत में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित नहीं किया है, जिसमें पत्रकारों के सवाल लिए गए हों. मई 2019 में वह एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल ज़रूर हुए थे, लेकिन कोई सवाल नहीं लिया था. तब सवालों का जवाब अमित शाह दे रहे थे.

मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं करते हैं?

मई 2024 में इंडिया टुडे के साथ एक इंटरव्यू के दौरान मोदी से पूछा गया कि वह प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं करते. इस पर मोदी ने विस्तार से जवाब दिया था.

उन्होंने कहा था, "ज़्यादातर समय मीडिया का इस्तेमाल सत्ता में बैठे लोग करते हैं. यह अब एक संस्कृति बन गई है. उन्हें लगता है कि आपको कुछ करने की ज़रूरत नहीं है, बस मीडिया का इस्तेमाल करिए और जो कहना है, वह कह दीजिए, फिर वही पूरे देश में फैल जाएगा. मैं उस रास्ते पर नहीं चलना चाहता. मैं मेहनत करना चाहता हूँ. मैं ग़रीब लोगों के दरवाज़े तक पहुँचना चाहता हूँ."

मोदी ने कहा था, "मैंने एक नई कार्य संस्कृति शुरू की है. अगर मीडिया को यह नई संस्कृति सही लगती है, तो वह उसे उसी तरह पेश कर सकता है या न भी करे."

मोदी ने कहा था कि अब मीडिया ही जनसंचार का एकमात्र माध्यम नहीं रह गया है और मीडिया के बिना भी लोगों से सीधे संवाद करना संभव है.

मोदी ने कहा था कि पहले मीडिया बेनाम हुआ करता था, लेकिन अब पत्रकारों की पहचान उनके विचारों से जुड़ गई है.

उन्होंने कहा, "पहले लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते थे कि विश्लेषण करने वाला व्यक्ति कौन है या उसकी विचारधारा क्या है. लेकिन समय बदल गया है."

लेकिन नरेंद्र मोदी के इस तर्क से प्रेस कॉन्फ़्रेंस नहीं करने के सवाल का जवाब मिल गया, ऐसा नहीं कहा जा सकता.

भारत पर विशेषज्ञता रखने वाले फ्रांसीसी राजनीतिक वैज्ञानिक क्रिस्टोफ जफरलो ने द डिप्लोमैट मैगज़ीन से कहा था, "मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस या खुली बातचीत स्वीकार नहीं करते क्योंकि उनकी दलील उस भारत का चित्रण करती है जो वास्तव में मौजूद नहीं है."

जफरलो का तर्क था कि मोदी ने एक तरह की काल्पनिक दुनिया बनाई है, जिसमें आकर्षक तस्वीरें और मिथक गढ़े गए हैं.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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