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ईरान-अमेरिका समझौता: पाकिस्तान की 'कूटनीतिक कामयाबी' पर विदेशी मीडिया में ऐसी चर्चा
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BBC हिंदी20/6/2026Mundo8 min de lecturaIndia

ईरान-अमेरिका समझौता: पाकिस्तान की 'कूटनीतिक कामयाबी' पर विदेशी मीडिया में ऐसी चर्चा

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ईरान और अमेरिका के बीच 100 दिनों के युद्ध के बाद हुए समझौते में पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई, जिसे विदेशी मीडिया उसकी बड़ी कूटनीतिक जीत मान रहा है।

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ईरान-अमेरिका समझौता: पाकिस्तान की 'कूटनीतिक कामयाबी' पर विदेशी मीडिया में ऐसी चर्चा

प्रकाशित 2 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 8 मिनट

इसराइल, अमेरिका और ईरान के बीच 100 दिनों के युद्ध के बाद समझौता हो गया है. समझौते की बाक़ी शर्तें कैसे पूरी होंगी, उस पर अगले 60 दिनों में बात होगी.

दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने में पाकिस्तान प्रमुख मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है. अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की पहली बातचीत इस्लामाबाद में हुई थी.

पाकिस्तान की इस भूमिका की दुनिया भर में चर्चा हो रही है. अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इसे उसकी बड़ी कूटनीतिक जीत माना जा रहा है.

पाकिस्तान की इस भूमिका के बारे में अमेरिकी अख़बार 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' में स्तंभकार सदानंद धुमे ने लिखा, ''अगर समझौता अंतिम रूप लेता है तो कम-से-कम एक देश इसे अपनी बड़ी जीत के रूप में देखेगा और वो है पाकिस्तान. अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की मुख्य भूमिका पाकिस्तान ने निभाई है.''

पाकिस्तान ने कैसे उठाया फ़ायदा?

सदानंद धुमे ने लिखा, ''हो सकता है कि इस कामयाबी का असर स्थायी न रहे लेकिन पाकिस्तान को चाहिए कि वह वैश्विक मंच पर मिली इस नई अहमियत का इस्तेमाल अपनी आर्थिक समस्याओं को दूर करने में करे.''

''एक साल पहले अगर कोई ऐसे दृश्य की कल्पना करता तो ख़्वाबों की दुनिया में रहने वाला शख़्स कहा जाता . लेकिन पाकिस्तान की यह कूटनीतिक सफलता वैसी ही है, जैसे फ़ीफ़ा विश्व कप में केप वर्डे की जीत.''

उन्होंने लिखा, '' राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों में काफ़ी सुधार आया. पाकिस्तान ने आतंकवाद के ख़िलाफ़ अभियान में अमेरिका का साथ दिया और उसे रेयर अर्थ मिनरल्स के एक्सेस का वादा किया. पिछले साल भारत और पाकिस्तान के बीच चार दिन चले संघर्ष के बाद पाकिस्तान ने सार्वजनिक रूप से ट्रंप की भूमिका की सराहना की जबकि भारत ने इस दावे को ख़ारिज कर दिया था.''

उन्होंने लिखा, ''भविष्य में अन्य देश भी यह समझने के लिए पाकिस्तान के तौर-तरीक़ों का अध्ययन कर सकते हैं कि व्हाइट हाउस के साथ बेहतर संबंध कैसे बनाए जाएं.''

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सदानंद धुमे लिखते हैं, ''पाकिस्तान को अतीत में कई बार कूटनीतिक सफलताएं मिलीं, लेकिन उनका आम नागरिकों को बहुत कम लाभ हुआ. पिछले वर्ष विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि दक्षिण एशिया के अन्य देशों की तुलना में पाकिस्तान आर्थिक रूप से पीछे छूट गया है. प्रति व्यक्ति जीडीपी लगभग एक दशक से ठहरा हुआ है. यह 2015 में 1,380 डॉलर से बढ़कर 2024 में केवल 1,478 डॉलर तक पहुंचा.

''अगर पाकिस्तान का नेतृत्व दूरदर्शिता दिखाता है तो वह वैश्विक मंच मिली इस नई पहचान का उपयोग आर्थिक विकास को गति देने और व्यापक ग़रीबी और कठिनाइयों में कम कर सकता है.''

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अंतरराष्ट्रीय मामलों की पत्रिका 'द डिप्लोमैट' ने लिखा कि पश्चिम एशिया के सभी देशों पर इन घटनाक्रमों का बड़ा असर पड़ेगा, लेकिन पाकिस्तान पर इसका असर कुछ ख़ास होगा. क्योंकि उसने पूरे मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभाई है.

पत्रिका ने लिखा है, '' हालांकि शांति प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में है और आने वाले महीनों में कई चुनौतियां सामने आ सकती हैं, फिर भी पाकिस्तान में निवेश, व्यापार और विदेशी मुद्रा के प्रवाह को लेकर व्यापक उम्मीदें हैं.''

''पाकिस्तानियों को उम्मीद है कि लंबे समय से अटका हुआ ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट अब आखिरकार पूरा हो जाएगा, जिससे देश को ऊर्जा संकट से काफ़ी राहत मिल सकती है.''

''इसके अलावा लोगों को उम्मीद है कि दुनिया के लिए खुलती हुई अर्थव्यवस्था वाले एक भरोसेमंद सहयोगी के रूप में ईरान,पाकिस्तान की आर्थिक संभावनाओं को भी मज़बूत करेगा.''

''यह भी उम्मीद की जा रही है कि क्षेत्रीय स्थिरता में अपनी बड़ी भूमिका के बदले पाकिस्तान को खाड़ी देशों से रियायती दरों पर तेल मिल सकता है. साथ ही, पाकिस्तान अपनी बढ़ी हुई वैश्विक प्रतिष्ठा का लाभ उठाकर निवेश आकर्षित करने में भी सफल हो सकता है.''

''पाकिस्तानियों को यह उम्मीद भी है कि युद्ध से सम्मानजनक तरीक़े से बाहर निकलने में अमेरिका की मदद करने के कारण पाकिस्तान और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय संबंध और बेहतर होंगे.''

पत्रिका ने लिखा है, ''हालांकि अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों का इतिहास सैन्य सहयोग और फिर उपेक्षा के दौरों से भरा रहा है. उदाहरण के लिए, 1980 के दशक में अमेरिका ने अफ़गान मुजाहिदीन को हथियार और अन्य रसद सहायता पहुंचाने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल किया था. लेकिन जैसे ही सोवियत संघ अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकला, अमेरिका को पाकिस्तान की ज़रूरत कम महसूस हुई और उसने उस पर प्रतिबंध तक लगा दिए.''

''अब लोगों को उम्मीद है कि अमेरिका, पाकिस्तान की मदद लेने के बाद उसे भूल जाने वाली अपनी पुरानी नीति नहीं दोहराएगा.''

पत्रिका ने लिखा है, '' युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता दिलाने में मदद करने के बाद पाकिस्तानियों की अमेरिका से कम-से-कम यह अपेक्षा है कि वह पाकिस्तानी कंपनियों को ईरान के तेल और गैस क्षेत्र में काम करने की अनुमति देगा, जिससे आम जनता को सीधे लाभ मिल सके.''

''हालांकि यह आशावाद अक्सर अतीत के अनुभवों से संतुलित हो जाता है, जब ऐसे लेन-देन आधारित गठबंधनों का बोझ पाकिस्तान को लंबे समय तक उठाना पड़ा, जबकि अमेरिका आगे बढ़ गया.''

''सवाल उठ रहा है कि क्या इस बार अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता करने के बदले पाकिस्तान को उसके जोखिमों के मुताबिक़ फ़ायदा मिलेगा.''

''युद्ध के बाद पाकिस्तान निस्संदेह पश्चिम एशिया में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में उभरा है. यह कहा जा सकता है कि दक्षिण एशियाई पहचान के साथ-साथ उसे अब मध्य-पूर्व से जुड़ी एक नई पहचान और भूमिका भी मिली है.''

''भारत और अफ़ग़ानिस्तान से जुड़े सुरक्षा संबंधी मुद्दे भले ही पाकिस्तान को दक्षिण एशिया से जोड़े रखते हों, लेकिन पश्चिम एशिया में उसकी बढ़ी हुई भूमिका ने उसे बड़े जियोपॉलिटिकल फ़ायदे दिए हैं और उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा और कूटनीतिक असर को मज़बूत किया है.''

''हालांकि पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने घरेलू हालात को दुरुस्त करना है. शासन व्यवस्था और अर्थव्यवस्था से जुड़े कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें सुलझाए बिना वह अपनी बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा का पूरा लाभ नहीं उठा सकेगा.''

डिप्लोमैट ने राजनीतिक विश्लेषक खुर्रम हुसैन का डॉन में प्रकाशित एक लेख का हवाला दिया है, जिसमें कहा गया है, ''ईरान हमें किस नज़र से याद रखता है और अमेरिका हमें कितना इनाम देता है, यह हमारे नियंत्रण में नहीं है.''

उन्होंने लिखा था, "ये दूसरे लोगों के फ़ैसले हैं, जो दूसरे देशों की राजधानियों में अपने कारणों से लिए जाते हैं."

उनके मुताबिक़, "जो चीज़ हमारे नियंत्रण में है, वही वास्तव में सबसे अहम है लेकिन हम लगातार उसी को टालते रहे हैं.

उन्होंने घरेलू सुधारों की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है.

'भरोसा हासिल करना सबसे बड़ी चुनौती थी'

फ़्रांस 24 ने पाकिस्तान की इस नई भूमिका का ज़िक्र करते हुए ईरान में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत आसिफ़ दुर्रानी का हवाला दिया है

फ़्रांस 24 लिखता है, ''आसिफ़ दुर्रानी ने कहा था, "सबसे अहम बात मध्यस्थ की विश्वसनीयता थी. पाकिस्तान इस भूमिका के लिए ठीक था क्योंकि उसे ईरान और अमेरिका दोनों का भरोसा हासिल था."'

ईरान और पाकिस्तान के संबंध काफी गहरे हैं. दोनों देशों के बीच 900 किलोमीटर लंबी सीमा है और सांस्कृतिक रिश्ते भी मज़बूत हैं.

सुन्नी बहुल पाकिस्तान में ईरान के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया आबादी रहती है.

''अमेरिका के साथ पाकिस्तान के संबंध भी अहम हैं. हालांकि वे जटिल रहे हैं. अफ़़गानिस्तान युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने नेटो को सप्लाई रूट मुहैया कराए और बदले में अरबों डॉलर की अमेरिकी सहायता प्राप्त की.''

''लेकिन 2011 में अमेरिका ने 9/11 हमलों के मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में मारा, जिसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव आ गया.''

''पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर के व्यक्तिगत संबंधों ने इस्लामाबाद के प्रभाव को बढ़ाने में मदद की है. एक प्रभावशाली सैन्य नेता के रूप में मुनीर ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के कमांडरों से परिचित थे.''

''उनके डोनाल्ड ट्रंप के साथ भी क़रीबी संबंध बताए जाते हैं. भारत-पाकिस्तान संघर्ष के बाद, जिसमें ट्रंप ने मध्यस्थता की थी, अमेरिकी राष्ट्रपति ने मुनीर को अपना "पसंदीदा फील्ड मार्शल" कहा था.''

आसिफ दुर्रानी ने कहा, "द्विपक्षीय और बहुपक्षीय वार्ताओं में भाषा के प्रभावी इस्तेमाल के लिए पाकिस्तान की हमेशा अच्छी प्रतिष्ठा रही है. यह कौशल यहां काफ़ी काम आया."

वैश्विक संघर्षों में लंबे समय से मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाला क़तर भी हाल के सप्ताहों में अधिक सक्रिय हो गया. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने क़तर को इस मध्यस्थता प्रयास में "भाई" कहा.

''पाकिस्तान अपने दो पड़ोसी देशों, अफ़गानिस्तान और कट्टर प्रतिद्वंद्वी भारत के साथ चल रहे विवादों में अंतरराष्ट्रीय समर्थन भी चाहता है. भारत अहम जल संसाधनों की आपूर्ति रोकने की धमकी दे चुका है.''

फ़्रांस 24 ने अपने लेख में अटलांटिक काउंसिल के दक्षिण एशिया विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन का हवाला दिया है.

कुगलमैन ने कहा, "पाकिस्तान ने साफ़ तौर पर दिखा दिया है कि उसे वैश्विक स्तर पर अलग-थलग करने की भारत की कोशिशें विफल रही हैं."

कुगलमैन ने कहा, "एक शांति दूत और मध्यस्थ के रूप में ख़ुद को पेश करके पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के कई देशों की धारणा बदल दी है. पहले उसे एक ऐसे संकटग्रस्त देश के रूप में देखा जाता था, जिसका वैश्विक असर सीमित है.''

उन्होंने कहा कि आतंकवाद और उग्रवाद से जुड़ी चुनौतियों ने पाकिस्तान की वैश्विक छवि को नुक़सान पहुंचाया था.

''पाकिस्तान को उम्मीद है कि अब वह विदेशी निवेश आकर्षित कर सकेगा और ईरान से प्रस्तावित गैस पाइपलाइन परियोजना को मंज़ूरी मिल सकती है, जो अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण वर्षों से अटकी हुई है.''

''हालांकि प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है. शुरुआती समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े सबसे विवादित मुद्दों को शामिल नहीं किया गया है. इसलिए आगे और कूटनीति की ज़रूरत होगी, जो पाकिस्तान के लिए नई चुनौतियां भी लेकर आएगी.''

कुगलमैन ने कहा, "पाकिस्तान ने सार्वजनिक रूप से मध्यस्थ की भूमिका को खुले तौर पर स्वीकार किया, जिससे उसने कुछ जोखिम भी उठाए. अगर स्थिति बिगड़ती, तो दोष का ठीकरा उसी के सिर फोड़ा जा सकता था. लेकिन वह यह जोखिम उठाने को तैयार था."

'पाकिस्तान की बड़ी कूटनीतिक जीत'

''पाकिस्तान के नेताओं ने लगभग उम्मीद छोड़ दी थी. अमेरिका-इसराइल और ईरान के बीच युद्ध को समाप्त कराने के लिए दो सप्ताह से अधिक समय तक चली भागदौड़, फोन कॉल और कूटनीतिक बैठकों के बाद ऐसा लगने लगा था कि हालात सुधरने के बजाय पाकिस्तान के सबसे बड़े डरावने सपने की ओर बढ़ रहे हैं.''

''पाकिस्तान की सरकार और सेना, जो देश की वास्तविक शक्ति मानी जाती है, के लिए युद्ध समाप्त कराना केवल प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं था. देश की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, राष्ट्रीय हित और सांप्रदायिक संतुलन सब कुछ इस पर निर्भर था.''

''सऊदी अरब के साथ हाल ही में हुए रक्षा समझौते का मतलब था कि अगर रियाद युद्ध में शामिल होता, तो पाकिस्तान भी किसी न किसी रूप में उसमें खिंच सकता था.''

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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