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विपक्ष का बीजेपी को रोकने का क्या प्लान है, चंद्रशेखर ने बताया
Política
BBC हिंदीhace 6 díasPolítica9 min de lecturaIndia

विपक्ष का बीजेपी को रोकने का क्या प्लान है, चंद्रशेखर ने बताया

यूपी चुनाव और जंतर-मंतर आंदोलन पर चंद्रशेखर आज़ाद का बयान

En resumen

सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने दावा किया कि उन्होंने जंतर-मंतर आंदोलन को सबसे पहले समझा और विपक्ष को एकजुट होकर बीजेपी को हराने का आह्वान किया। उन्होंने आरक्षण और दलित मुद्दों पर भी बात की।

Resumen generado por IA

Por qué importa

जंतर-मंतर पर युवा आंदोलन के दौरान दलित नेता चंद्रशेखर आज़ाद ने दावा किया कि उन्होंने आंदोलन को सबसे पहले समझा और विपक्ष को एकजुट होकर बीजेपी का मुकाबला करने का आह्वान किया।

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लेखक: दिलनवाज़ पाशा, बीबीसी संवाददाता

पदनाम, बीबीसी संवाददाता

........से, नई दिल्ली

प्रकाशित 39 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 9 मिनट

दलित नेता और यूपी की नगीना सीट से सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने बीबीसी न्यूज़ से बात करते हुए दावा किया कि विपक्ष में अगर किसी ने जंतर-मंतर के युवा आंदोलन को सबसे पहले समझा तो ये वो ही थे.

उनका दावा है कि राष्ट्रीय स्तर का कोई बड़ा राजनीतिक नेता उनसे पहले वहां नहीं पहुंचा था.

साथ ही उन्होंने आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को लेकर कहा कि बीजेपी को हराने के लिए विपक्षी दलों को साथ आना चाहिए.

उन्होंने मायावती की राजनीति पर सीधे कोई प्रतिक्रिया नहीं दी मगर कहा कि दलित समाज के सामने खड़ी हुई नई चुनौतियों से लड़ने के लिए नई ऊर्जा की ज़रूरत है.

चंद्रशेखर कहते हैं, "12 जुलाई को मैंने आंदोलन का समर्थन किया था, जबकि तब तक किसी राजनीतिक दल ने ऐसा नहीं किया था. 13 जुलाई को आंदोलन के नेता मुझसे मिले और 15 जुलाई को मैंने आंदोलन स्थल जाने का एलान किया."

उन्होंने कहा कि 25 जुलाई को सरकार ने इसलिए युवाओं की बात मान ली क्योंकि आंदोलन देशभर में फैल रहा था, बिहार में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर एके-47 चला दी, सरकार को समझ में आ गया कि अब बात हाथ से निकल सकती है.

"सरकार ने तब मांगें तो मान लीं मगर फिर वादे से मुकर गई. अब आंदोलन से जुड़े लोगों पर कार्रवाई की जा रही है."

चंद्रशेखर कहते हैं, "सरकार इस बात को नहीं जानती उनका मुकाबला किससे है. उनका मुकाबला किसी नेता या सामाजिक आंदोलन से नहीं है. बल्कि उनका मुक़ाबला ऐसे एज ग्रुप से है जो इस उम्र में आपको नहीं सुनेंगे, आपको उनकी बात सुननी पड़ेगी. चालाकी करना सरकार को भारी पड़ जाएगा."

हालांकि वह यह भी जोड़ते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी को ये बात समझ में आ रही है इसलिए ही इंस्टाग्राम पर वीडियो के जरिए युवाओं को संबोधित कर रहे हैं.

सांसद चंद्रशेखर ने कहा कि उन्होंने छात्र नेतृत्व (सीजेपी) से कहा है कि अगर किसी मुद्दे पर उन्हें उनकी ज़रूरत पड़ेगी या उन पर कोई संकट आएगा, तो वे उनके साथ खड़े होंगे.

वे यह भी बोले कि लंबे समय से हम शिक्षा के मुद्दे पर आंदोलन कर रहे हैं, ऐसे में सीजेपी को इश्यू बेस समर्थन आगे भी मिलेगा.

सीजेपी के भविष्य को लेकर उनका कहना है कि वह एक ग़ैर-राजनीतिक संगठन हैं इसलिए उनके नेता ही इसका भविष्य तय करेंगे.

'जय भीम किसी एक जाति का नारा नहीं'

जंतर मंतर पर हुए आंदोलन के दौरान जय भीम का नारा गूंजने के पीछे दलित नेता चंद्रशेखर का मानना है कि यह महज़ एक समुदाय का नारा नहीं रह गया है.

वे बोले- "ये नारा हमेशा से लगता आया है मगर लोगों ने इसे नोट करना अब शुरू किया है."

उन्होंने उदाहरण दिया कि नागरिकता संशोधन के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन और उसके पहले के कई ऐसे आंदोलनों में जय भीम गूंजा जो किसी जाति समाज के आंदोलन नहीं थे.

वे कहते हैं कि "जय भीम" कोई धार्मिक या जातिगत नारा नहीं है. यह सामाजिक बदलाव और न्याय की लड़ाई का प्रतीक है. जिस तरह "इंकलाब ज़िंदाबाद" क्रांतिकारी आंदोलनों की पहचान बना, उसी तरह "जय भीम" अन्याय, भेदभाव और अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का नारा है. यह भारतीय संविधान के मूल्यों, समानता, सामाजिक न्याय और अधिकारों की रक्षा के संकल्प को व्यक्त करता है.

आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर ने कहा कि जब लोग अपनी मांगों और अधिकारों के लिए सड़क पर उतरते हैं, तो वे अक्सर संविधान को अपने साथ रखते हैं क्योंकि वही उन्हें न्याय की लड़ाई लड़ने की ताक़त देता है.

उन्होंने कहा कि लोगों को बार-बार संविधान का सहारा इसलिए लेना पड़ता है क्योंकि उसके मूल आदर्श अभी पूरी तरह ज़मीन पर लागू नहीं हो पाए हैं. उनके अनुसार, सरकारें समाज के अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, सम्मान और न्याय जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने में पूरी तरह सफल नहीं रही हैं. इसी वजह से लोग अपने अधिकारों की मांग करते वक़्त संविधान को प्रतीक के रूप में सामने रखते हैं.

आरक्षण के ख़िलाफ़ आंदोलन पर क्या बोले चंद्रशेखर

सांसद चंद्रशेखर ने कहा कि अगर आरक्षण के ख़िलाफ़ कोई आंदोलन होता है तो उसका स्वागत होना चाहिए और इस विषय पर खुली बहस होनी चाहिए.

उन्होंने कहा, "अगर किसी को आरक्षण ग़लत लगता है, तो उसे तथ्यों के आधार पर चर्चा करनी चाहिए. हम इस बहस के लिए तैयार हैं."

उन्होंने कहा कि आरक्षण का मुद्दा जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता से जुड़ा है. उनका तर्क था कि जब तक समाज में जाति के आधार पर भेदभाव मौजूद रहेगा, तब तक आरक्षण की आवश्यकता भी बनी रहेगी.

चंद्रशेखर ने कहा, "लेकिन आरक्षण ख़त्म कैसे होगा? पहले आप जाति ख़त्म करोगे तभी तो आरक्षण ख़त्म होगा. जब जाति के आधार पर भेदभाव ख़त्म नहीं होगा तो कैसे आप आरक्षण ख़त्म कर दोगे?"

उनके मुताबिक, जातिविहीन समाज बनने पर आरक्षण की ज़रूरत अपने आप खत्म हो जाएगी.

उन्होंने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए शुरू हुए आरक्षण का सवाल उठाया.

चंद्रशेखर ने कहा, "कुछ लोगों को आरक्षण आज़ादी के बाद मिला, जबकि कुछ को आज़ादी से हजारों साल पहले से ये आरक्षण मिल रहा है. 2019 से ईडब्लूएस आरक्षण लागू है. अगर आरक्षण को पूरी तरह ग़लत बताया जाता है तो यह सवाल भी उठता है कि जो लोग इसके विरोध की बात करते हैं, वे ख़ुद इसका लाभ क्यों ले रहे हैं?"

खुद को क्या सिर्फ़ दलित नेता मानते हैं चंद्रशेखर?

आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर ने कहा कि कुछ लोग उनकी राजनीति को जाति के चश्मे से देखते हैं, लेकिन वह खुद को किसी एक समुदाय का नहीं, बल्कि पूरे देश के लोगों के मुद्दों का नेता मानते हैं.

उन्होंने कहा कि छात्र आंदोलन के दौरान जोखिम के बावजूद वह प्रदर्शनकारियों के बीच खड़े रहे और शिक्षा, रोज़गार तथा युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों पर आवाज़ उठाई.

चंद्रशेखर कहते हैं, "क्या आपको पता है कि 19 जुलाई की रात की आईबी रिपोर्ट में यह सलाह दी गई थी कि 20 जुलाई को कोई बड़ा नेता प्रदर्शनकारी भीड़ के बीच न जाए. आशंका थी कि अनगाइडेड क्राउड नुकसान पहुंचा सकता है. मगर मेरे अलावा किसी पार्टी का राष्ट्रीय नेता वहां नहीं गया. वे सब दलित तो नहीं थे."

उन्होंने कहा कि वे एनआरसी विरोधी प्रदर्शनों, महिला पहलवानों के आंदोलन और किसान आंदोलन में अपनी भागीदारी दे चुके है.

चंद्रशेखर ने कहा कि सामाजिक न्याय और संविधान की बात करने वाले नेताओं को अक्सर जाति से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन उनकी राजनीति का केंद्र शिक्षा, रोज़गार, अधिकार और समानता जैसे मुद्दे हैं.

क्या सपा संग यूपी चुनाव में उतरेंगे चंद्रशेखर?

गठबंधन की संभावना पर चंद्रशेखर ने कहा कि वह किसी भी दल के लिए दरवाज़े बंद नहीं कर रहे हैं. अगर कोई पार्टी साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहेगी, तो उसका स्वागत किया जाएगा.

"अखिलेश के साथ मिलकर लड़ने के सवाल पर चंद्रशेखर बोले, मैं किसी को ना थोड़ा ही कर रहा हूँ. अगर कोई आकर कहेगा कि भाई हम आपके साथ मिलकर लड़ना चाहते हैं तो मैं उसका स्वागत करूंगा."

गठबंधन के सवाल पर उन्होंने कहा कि उनकी प्राथमिकता अपनी आज़ाद समाज पार्टी को मज़बूत करना है.

उन्होंने कहा कि वे किसी गठबंधन के भरोसे नहीं बैठे हैं और अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने पर काम कर रहे हैं.

हालांकि, उन्होंने कहा कि भाजपा को रोकने के लिए विपक्षी एकता की कोशिश होनी चाहिए.

ओवैसी और स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं के साथ संभावित गठबंधन पर उन्होंने कहा कि राजनीति में सभी विकल्प खुले हैं और अगर परिस्थितियां अनुकूल हों तो मिलकर चुनाव लड़ा जा सकता है.

उनका कहना था कि विपक्षी वोटों का बंटवारा रोकने के लिए व्यापक गठबंधन की कोशिश की जानी चाहिए.

हालांकि उन्होंने 2024 में महागठबंधन का सहयोग न मिलने पर नाराज़गी भी दिखाई. बोले, तब गठबंधन ने मेरी ज़रूरत नहीं समझी और अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए. इसके बाद मैं अपने दम पर लड़कर जीता.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी को लेकर उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने संगठन को मज़बूत करना शुरू कर दिया है. प्रभारियों की नियुक्ति की जा चुकी है और बूथ स्तर तक तैयारी चल रही है, इस बार हम कड़ा मुक़ाबला देंगे.

गौरतलब है कि चंद्रशेखर ने कहा कि 2022 के विधानसभा चुनाव में चंद्रशेखर की ज़मानत तक जब्त हो गई थी. मगर फिर 2024 के लोकसभा चुनाव में जीतकर वे संसद पहुंचे.

सपा पर कटाक्ष करते हुए चंद्रशेखर बोले, "अपनी पार्टी के नेताओं को नहीं बचा पा रहे हैं. आज़म ख़ान की यूनिवर्सिटी के लिए हमने पूरे प्रदेश में ज्ञापन दिलाया."

'बीजेपी का एजेंट' कहे जाने के आरोप पर क्या बोले?

चंद्रशेखर ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी से उनका वैचारिक विरोध है. उसके अलावा वे किसी भी दल से संगठन के बारे में सोच सकते हैं.

चंद्रशेखर ने बीजेपी का एजेंट होने के आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहा कि राजनीति में ऐसे आरोप लगाना आसान है, लेकिन उनका कोई आधार नहीं है.

उन्होंने यह भी कहा कि विभिन्न दल समय-समय पर एक-दूसरे के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ते रहे हैं और नेताओं के दल बदलने की घटनाएं भी होती रही हैं. ऐसे में किसी एक व्यक्ति पर एजेंट होने का आरोप लगाना उचित नहीं है.

वे बोले, "जब कमज़ोरों की लीडरशिप खड़ी होती है तो स्थापित (दलों) को तकलीफ़ होती है. यहाँ बड़ी पार्टी चाहती है कि टू पार्टी सिस्टम बन जाए. क्षेत्रीय दल ख़त्म हो जाएं. आरोप लगाने के बजाय राजनीतिक तौर पर मुक़ाबला होना चाहिए."

उन्होंने कहा कि उनकी राजनीति स्वतंत्र है और उन्होंने बाबा साहेब आंबेडकर के विचारों से प्रेरणा लेकर अपना राजनीतिक संगठन खड़ा किया है.

मायावती की राजनीति को कैसे देखते हैं?

चंद्रशेखर ने कहा कि वह बसपा संस्थापक कांशीराम और मायावती के योगदान का सम्मान करते हैं, लेकिन उनका मानना है कि आज बहुजन समाज के सामने नई चुनौतियां हैं जिनके लिए नई राजनीतिक ताकत की ज़रूरत है.

"अब ज़्यादा दिन समाज इंतज़ार नहीं करेगा, इसलिए ज़रूरत है कि हम पावर में आकर अपने लोगों का भला करे. ये न सोचें कि कौन कमजोर हो रहा है, कौन ताक़तवर हो रहा है."

चंद्रशेखर ने यह भी कहा कि उनकी पार्टी किसी की राजनीतिक "ग़ुलाम" नहीं है और उसका अपना स्वतंत्र जनाधार है.

Preguntas abiertas

  • विपक्षी दलों के बीच गठबंधन की रूपरेखा क्या होगी?
  • आरक्षण विरोधी आंदोलन के प्रति सरकार की प्रतिक्रिया क्या होगी?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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