सरकार ने कहा, यूपीआई पेमेंट रहेगा 'फ़्री', फिर भी क्यों छिड़ी है बहस
En resumen
केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि यूपीआई पेमेंट यूज़र्स के लिए फ़्री रहेगा और ज़्यादातर मर्चेंट ट्रांजेक्शन भी बिना शुल्क के जारी रहेंगे। हालांकि, हालिया विधायी संशोधनों और अमेरिकी रिपोर्ट के बीच यूपीआई पर एमडीआर शुल्क को लेकर राजनीतिक और आर्थिक बहस छिड़ गई है।
Resumen generado por IA
Por qué importa
सरकार ने टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल, 2026 के माध्यम से पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट में बदलाव का प्रस्ताव रखा है। साल 2020 में भारत ने यूपीआई पर एमडीआर समाप्त किया था।
केंद्र सरकार ने साफ़ किया है कि यूपीआई से पेमेंट करने वाले यूज़र्स से किसी तरह का ट्रांजे़क्शन चार्ज नहीं लिया जाएगा. साथ ही यूपीआई पर होने वाले ज़्यादातर मर्चेंट ट्रांजेक्शन भी बिना किसी शुल्क के जारी रहेंगे.
सरकार ने कहा कि पर्शन-टू-पर्शन ट्रांजैक्शन पूरी तरह फ़्री रहेंगे. वहीं, अगर भविष्य में मर्चेंट डिस्काउंट रेट लागू किया जाता है, तो यह केवल कुछ चुनिंदा मर्चेंट ट्रांजेक्शन पर, एक तय सीमा से ऊपर और मामूली दर पर लगाया जाएगा.
यह दर डेबिट या क्रेडिट कार्ड के एमडीआर से काफ़ी कम होगी. 'मर्चेंट डिस्काउंट रेट' या एमडीआर लागू होने की स्थिति में भी यह शुल्क केवल एक तय सीमा से अधिक के लेनदेन पर ही लगाया जाएगा और ज़्यादातर लेनदेन पर कोई शुल्क नहीं लगेगा.
सरकार ने बताया कि टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल, 2026 के जरिए पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 की धारा 10ए में बदलाव का प्रस्ताव है.
संसद से बिल पास होने के बाद, एमडीआर लागू करना है या नहीं और इसकी दर क्या होगी, इसका फ़ैसला एनपीसीआई की अध्यक्षता वाली यूपीआई एंड सर्विस स्टीयरिंग कमिटी करेगी.
सरकार ने कहा कि पेमेंट्स एंड सैटलमेंट्स सिस्टम्स एक्ट में हालिया संशोधन को लेकर कुछ भ्रम पैदा हुआ है. कुछ लोगों ने इसे आम यूज़र्स पर चार्ज लगाने की तैयारी के तौर पर देखा, जबकि सरकार के मुताबिक़ ऐसा नहीं है.
सरकार का कहना है कि यूपीआई पर लेनदेन का वॉल्यूम लगातार तेजी से बढ़ रहा है. ऐसे में साइबर सिक्योरिटी, फ़्रॉड रोकने और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए लगातार निवेश की ज़रूरत है.
सरकार ने यह भी कहा कि यूपीआई के विस्तार के लिए ज़्यादा कंपनियों को इस क्षेत्र में लाना ज़रूरी है. इसके लिए लंबे समय में ऐसा मॉडल चाहिए, जो सिर्फ सरकारी सब्सिडी पर निर्भर न रहे और यूपीआई को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाए.
सरकार की बार-बार सफ़ाई के बावजूद भारत में डिज़िटल भुगतान व्यवस्था को लेकर बहस तेज़ हो गई है. इसकी वजह है कि विपक्ष और आर्थिक मामलों के कई जानकार यूपीआई भुगतान पर शुल्क लगाए जाने की आशंका जता रहे हैं.
हालांकि स्पष्ट किया है कि यूपीआई उपभोक्ताओं के लिए फ़्री बना रहेगा, हालांकि यह भी कहा गया है कि चार्ज सिर्फ व्यवसायों पर लागू होगा.
पेमेंट्स काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने भी स्पष्टीकरण जारी किया है, जिसे पीएमओ (प्रधानमंत्री कार्यालय) ने पेमेंट्स काउंसिल के स्पष्टीकरण से जुड़ी ख़बर को अपने एक्स हैंडल से शेयर किया है.
शुक्रवार को पेमेंट्स काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने कहा कि उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों के लिए यूपीआई ट्रांजैक्शन पर कोई फ़ीस नहीं लगेगी.
शनिवार को पेमेंट्स ऐप फोनपे के फ़ाउंडर और सीईओ समीर निगम ने एक्स पर लिखा कि यूपीआई पेमेंट्स पर कंज्यूमर से कोई चार्ज नहीं लिया जाएगा.
उन्होंने लिखा कि 'यूपीआई फ़्री है और भारत के सभी उपभोक्ताओं के लिए फ़्री रहेगा.'
इससे पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को कहा था कि डिज़िटल ट्रांजैक्शन पर लगने वाला मर्चेंट डिस्काउंट रेट सिर्फ़ व्यापारियों पर लागू होता है, कस्टमर पर नहीं.
निर्मला सीतारमण, कांग्रेस नेता जयराम रमेश के उस बयान का जवाब दे रही थीं, जिसमें उन्होंने कहा था कि यूपीआई इस्तेमाल करने वाले लोगों को अब ज़्यादा पैसा देना होगा.
सीतारमण के इस बयान पर अर्थशास्त्री जयति घोष ने एक्स पर लिखा, ''इस बयान की आर्थिक मूर्खता को अलग भी रख दें, तो भी आख़िरकार इसकी लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा."
उन्होंने लिखा, "यह भी ध्यान देने वाली बात है कि यूपीआई का इस्तेमाल करने वाले ज़्यादातर 'मर्चेंट' छोटे और माइक्रो बिज़नेसमैन हैं. यानी आम लोगों पर ज़्यादा लागत का बोझ डाला जाएगा, ताकि अमेरिकी वित्तीय कंपनियों को फ़ायदा पहुंचाया जा सके. और यह सब ट्रंप को खुश करने की एक और बेकार कोशिश में हो रहा है."
इकोनॉमिक्स टाइम्स के मुताबिक़, व्यापार मामलों के थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (जीटीआरआई) ने कहा है कि "भारत को अमेरिका के दबाव में आकर यूपीआई और रुपे जैसी घरेलू भुगतान प्रणालियों की नीतियों में बदलाव नहीं करना चाहिए."
जीटीआरआई के निदेशक अजय श्रीवास्तव ने एक लेख में लिखा, "अमेरिका ने भारत की शून्य-एमडीआर नीति, रुपे को बढ़ावा देने, यूपीआई से क्रेडिट कार्ड जोड़ने में रुपे को मिले शुरुआती लाभ, डेटा लोकलाइज़ेशन नियमों और यूपीआई ऐप्स के लिए एनपीसीआई की प्रस्तावित 30 प्रतिशत बाज़ार हिस्सेदारी सीमा पर आपत्ति जताई है."
"इन नीतियों को अमेरिकी कंपनियों के लिए बाधा बताया जा रहा है. सरल शब्दों में कहें तो वीज़ा और मास्टरकार्ड शुल्क से होने वाली आय गंवा रहे हैं और चाहते हैं कि भारतीय सरकार उनकी मदद करे."
दरसअल अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) की 2026 की रिपोर्ट में भारत के यूपीआई और रूपे भुगतान प्रणालियों की आलोचना की गई है. रिपोर्ट में ब्राज़ील की पिक्स भुगतान प्रणाली का भी ज़िक्र किया गया है.
लोकसभा में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट संशोधन विधेयक छह अगस्त को पारित हुआ, जिसका विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं.
ये विधेयक संसद के दोनों सदनों से पास होकर क़ानून बनने के बाद सरकार को बैंकों और पेमेंट सेवा प्रदाताओं को यूपीआई और अन्य डिज़िटल भुगतान माध्यमों पर 'मर्चेंट डिस्काउंट रेट' (एमडीआर) लगाने की अधिकार मिल जाएगा.
इसी वजह से भविष्य में एमडीआर लागू होने की आशंकाएं जताई जा रही हैं.
फ़ाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक़, मार्च 2026 में जारी अमेरिका की विदेशी व्यापार बाधाओं संबंधी रिपोर्ट में भारत की यूपीआई और रुपे पर लागू ज़ीरो एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) नीति पर आपत्ति जताई थी.
यूएसटीआर का कहना था कि यह व्यवस्था विदेशी भुगतान सेवा प्रदाताओं की तुलना में घरेलू कंपनियों को बढ़त देती है.
अमेरिकी पक्ष के अनुसार, इससे वीज़ा और मास्टरकार्ड जैसी अमेरिकी भुगतान कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा का माहौल बराबरी का नहीं रह जाता.
साल 2020 में सरकार ने यूपीआई और रूपे डेबिट कार्ड से होने वाले लेनदेन पर एमडीआर को समाप्त कर दिया था.
इसका मक़सद डिज़िटल भुगतान को बढ़ावा देना था, ख़ासकर कोविड-19 महामारी के दौरान और उसके बाद, जब नक़दी रहित लेनदेन को प्रोत्साहित करने की ज़रूरत थी.
भारत में आमतौर पर क्रेडिट कार्ड से भुगतान पर लगभग 1.5% एमडीआर लगता है, जबकि डेबिट कार्ड पर यह 0.9% तक होता है. फिलहाल यूपीआई से होने वाले भुगतान पर कारोबारियों से कोई एमडीआर नहीं लिया जाता.
विपक्ष का कहना है कि अगर व्यापारियों पर अतिरिक्त लागत डाली जाती है, तो उसका बोझ आख़िरकार वस्तुओं और सेवाओं की क़ीमतों के ज़रिए उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है.
जबकि सरकार और पेमेंट इंडस्ट्री का कहना है कि यूपीआई को सुरक्षित और सुचारु बनाए रखने के लिए लगातार निवेश की ज़रूरत होती है. अगर भविष्य में बड़े व्यापारियों पर कोई शुल्क लगाया भी जाता है, तो उसका असर सीधे उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ेगा.
जीटीआरआई के निदेशक अजय श्रीवास्तव का कहना है, "भारत को अपनी नीतिगत स्वायत्तता, प्रतिस्पर्धा और भुगतान क्षेत्र की संप्रभुता की रक्षा करनी चाहिए. केवल अमेरिकी चिंताओं को दूर करने या वीज़ा और मास्टरकार्ड जैसी विदेशी कंपनियों के हितों के लिए एमडीआर नहीं लागू किया जाना चाहिए."
उन्होंने पेमेंट डेटा लोकलाइज़ेशन के नियम बनाए रखने की भी वक़ालत की है. उनका कहना है कि इससे धोखाधड़ी की जांच, साइबर सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा को मज़बूती मिलती है.
इसी मामले में द इंडियन एक्सप्रेस ने पेमेंट इंडस्ट्री से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से लिखा है कि यूपीआई पर किसी संभावित फ़ीस का कोई जुड़ाव भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता से नहीं है. साथ ही यह भी कहा है कि 95 फ़ीसदी से अधिक यूपीआई भुगतानों पर ऐसी कोई फ़ीस नहीं लगेगी.
जीटीआरआई ने यह भी कहा है कि 'यूपीआई की सफलता में ज़ीरो एमडीआर नीति की बड़ी भूमिका रही है. इससे ग्राहकों और छोटे दुकानदारों के लिए डिजिटल भुगतान बिना किसी शुल्क के संभव हुआ.'
हालांकि थिंक टैंक ने माना है कि यूपीआई प्रणाली को चलाने और सुरक्षित रखने के लिए साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने, तकनीकी ढांचे और विवाद निपटान पर काफ़ी ख़र्च होता है. इसलिए इसके लिए एक टिकाऊ वित्तीय मॉडल की ज़रूरत पड़ सकती है.
मगर उसका कहना है कि वित्तीय मॉडल ऐसा नहीं होना चाहिए जिसमें जनरल मर्चेंट चार्ज़ की ज़रूरत हो.
इस मामले में आशंकाएं बढ़ने के बाद पेमेंट काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने एक प्रश्नोत्तरी (एफ़ ए क्यू) जारी करके भी साफ़ किया है कि आम उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों पर यह चार्ज़ नहीं लगेगा.
उसका यह भी कहना है कि अगर भविष्य में बड़े व्यापारियों पर कोई शुल्क लागू किया जाता है, तो उसका मतलब यह नहीं होगा कि ग्राहकों को यूपीआई इस्तेमाल करने के लिए अतिरिक्त पैसा देना पड़ेगा.
पीसीआई के अनुसार, यूपीआई अब दुनिया की सबसे बड़ी रियल-टाइम पेमेंट प्रणाली बन चुकी है, जिसे सुरक्षित और सुचारु रूप से चलाने के लिए लगातार निवेश की ज़रूरत होती है.
फ़िलहाल इस व्यवस्था का ख़र्च बैंक और पेमेंट सेवा प्रदाता उठाते हैं. यूपीआई की सुरक्षा, भरोसेमंदी और निरंतर विस्तार सुनिश्चित करना जारी रखना ज़रूरी है.
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने आरोप लगाया था कि टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (संशोधन) विधेयक, 2026 यूपीआई लेनदेन को शुल्क-मुक्त रखने वाली व्यवस्था को खत्म करने का रास्ता खोलता है और भविष्य में यूपीआई सहित डिज़िटल भुगतान पर एमडीआर लगाए जाने की आशंका पैदा करता है.
इन आरोपों पर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जवाब दिया है.
उन्होंने कहा, "एमडीआर केवल व्यापारियों (मर्चेंट्स) पर लागू होता है, आम उपभोक्ताओं पर नहीं. इससे बैंक और फिनटेक कंपनियां इंफ्रास्ट्रक्चर, इनोवेशन और सुरक्षा पर अधिक निवेश कर सकेंगी, जिसका लाभ सभी यूपीआई यूजर्स को मिलेगा."
वित्त मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि यूपीआई पर एमडीआर लागू करने को लेकर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है.
उन्होंने कहा कि इस पर निर्णय एनसीपीआई की यूपीआई एवं सर्विसेज़ स्टीयरिंग कमेटी करेगी.
कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा ने इस पर तंज करते हुए एक्स पर लिखा, "दूसरे शब्दों में, निर्मला जी जो कह रही हैं, उसका मतलब यह है कि वह यूपीआई प्रणाली पर बुलडोज़र नहीं चलाएंगी. वह उसे पूरी तरह ख़त्म कर देंगी. लेकिन नतीजा वही होगा. नकदी रहित अर्थव्यवस्था का सपना मोदी सरकार में टिक नहीं पाएगा. स्पष्टीकरण के लिए धन्यवाद, माननीय वित्त मंत्री. 'एंटायर फ़ाइनेंस' में आपकी डिग्री देश के लिए लगातार एक संपत्ति बनी हुई है।"
यह मुद्दा तूल पकड़ने के बाद बीजेपी के आईटी डिपार्टमेंट के इंचार्ज अमित मालवीय ने एक्स पर एक लंबी पोस्ट में विपक्ष की आशंकाओं और आरोपों को बेबुनियाद बताया.
उन्होंने लिखा, "जयराम रमेश यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत ने किसी काल्पनिक विदेशी दबाव में आकर अपने भुगतान कानूनों को बदल दिया, जबकि यह दावा तथ्यों से मेल नहीं खाता. विदेशी भुगतान कंपनियों की ओर से यूपीआई को लेकर आपत्तियां कोई नई बात नहीं हैं. भारत लगातार अपने नागरिकों और फिनटेक क्षेत्र के हित में फैसले लेता रहा है."
"यूएसटीआर ने 2026 में अचानक यूपीआई की खोज नहीं की. उसकी 2023 और 2025 की रिपोर्टों में पहले ही एनपीसीआई के यूपीआई नियमों पर आपत्ति जताई गई थी, जिसमें यूपीआई ऐप्स के लिए 30 प्रतिशत बाज़ार हिस्सेदारी सीमा का प्रस्ताव भी शामिल था."
"रुपे कार्डों की हिस्सेदारी 2017 में 15 प्रतिशत से बढ़कर 2020 में 63 प्रतिशत हो गई. यही वजह थी कि 2021 में वीजा ने भी वॉशिंगटन में इसी तरह की शिकायत की. भारत की प्रतिक्रिया दोनों वैश्विक कंपनियों के खिलाफ रुपे और यूपीआई का और तेज विस्तार करना था."
"एमडीआर पर बहस मूल रूप से भारत की आंतरिक नीति बहस है, अमेरिकी नहीं. यूपीआई की लागत कौन वहन करेगा, यह सवाल यूपीआई की शुरुआत से ही चर्चा में रहा है."
"यदि भविष्य में एमडीआर लागू भी किया जाता है, तो संभावित शुल्क डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड या नकदी प्रबंधन जैसे अन्य भुगतान विकल्पों की तुलना में काफी कम रहने की संभावना है. ऐसी स्थिति में लागत उपभोक्ताओं पर नहीं, बल्कि व्यापारियों पर आएगी. इसके अलावा, व्यक्ति से व्यक्ति भुगतान पर किसी शुल्क की कोई व्यवस्था प्रस्तावित नहीं है।"
Qué observar
Perspectiva de IA — posibilidades, no hechos
संसद से बिल पास होने के बाद एनपीसीआई की कमिटी एमडीआर पर फैसला लेगी
Probable · En meses
Preguntas abiertas
- क्या भविष्य में बड़े व्यापारियों पर एमडीआर लागू होगा?
- क्या उपभोक्ताओं पर इसका अप्रत्यक्ष असर पड़ेगा?

