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क्या बीजेपी असमंजस में है? मुस्लिम धर्मगुरुओं की गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग पर प्रतिक्रिया
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BBC हिंदी02/06/2026Politique7 min de lectureIndia

क्या बीजेपी असमंजस में है? मुस्लिम धर्मगुरुओं की गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग पर प्रतिक्रिया

L'essentiel

मुस्लिम धर्मगुरुओं की गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग पर बीजेपी नेताओं ने मिश्रित प्रतिक्रिया दी है। सीएम योगी ने कहा कि गाय हमारी माता है, जबकि कानून मंत्री ने कहा कि सरकार ऐसे किसी प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही है।

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गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मुस्लिम धर्मगुरुओं की मांग पर क्या बीजेपी असमंजस में है?

प्रकाशित 24 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 9 मिनट

मुस्लिम धर्मगुरुओं की गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग के बाद से इस पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कई नेता टिप्पणी कर चुके हैं. हालांकि अब तक इस मांग का किसी ने समर्थन नहीं किया है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार को कहा कि "गाय हमारी माता है और क्या मां और पुत्र के बीच कुछ घोषित करने की ज़रूरत पड़ती है?"

वहीं केंद्रीय क़ानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल पहले ही कह चुके हैं कि केंद्र सरकार गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने जैसे किसी भी प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही है.

हिंदू धर्मगुरु रामभद्राचार्य ने योगी आदित्यनाथ के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि गोवध बंद करने का एक ही तरीक़ा है और वो है कि "अगले लोकसभा चुनावों में हिंदुत्ववादियों को 370 सीटें मिल जाएं."

रामभद्राचार्य ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग को प्रचार और राजनीति से प्रेरित बताया.

राष्ट्रीय पशु घोषित करने की चर्चा कहां से हुई शुरू?

गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की चर्चा हाल ही में मुसलमानों के दूसरे बड़े त्योहार ईद-उल-अज़हा या बकरीद से पहले शुरू हुई थी.

बीते महीने पश्चिम बंगाल में पहली बार बीजेपी की सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने 13 मई को एक आदेश जारी किया था.

पश्चिम बंगाल में तब तक गोवंश के जानवरों को मारने पर कोई रोक नहीं थी. लेकिन शुभेंदु अधिकारी सरकार ने एक नियम जारी किया जिसके तहत गाय, बैल, सांड, भैंस या बछड़े को तभी मारा जा सकता है जब स्थानीय अधिकारी और सरकारी पशु चिकित्सा सर्जन इसकी अनुमति दें.

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अब तक राज्य में ऐसी कोई भी रोक नहीं थी और बकरीद से पहले इस तरह का नियम जारी करने से राज्य में किसानों और व्यापारियों के बीच खलबली सी मच गई थी.

इस नियम को कलकत्ता हाई कोर्ट में चुनौती भी दी गई थी लेकिन हाई कोर्ट ने सरकार के फ़ैसले को सही मानते हुए सभी याचिकाओं को ख़ारिज कर दिया था.

इसके बाद से पश्चिम बंगाल में कई मुस्लिम धर्मगुरुओं की ओर देखा गया जब उन्होंने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग की. इसके बाद जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी ने एक्स पर पोस्ट कर गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की मांग की.

उन्होंने एक्स पर लिखा, "गाय के नाम पर होने वाली मॉब लिंचिंग, बेगुनाह इंसानों की हत्या, नफ़रत की राजनीति और मुसलमानों को बदनाम करने का यह खेल अब बंद होना चाहिए. हमें ख़ुशी होगी अगर गाय को 'राष्ट्रीय पशु' घोषित कर इस समस्या का स्थाई समाधान निकाला जाए, ताकि न किसी इंसान की जान जाए और न धर्म के नाम पर राजनीति हो."

पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने भी इस मांग का समर्थन करते हुए कहा था कि अगर गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने से गोहत्या से जुड़े बार-बार होने वाले झगड़ों को सुलझाने में मदद मिल सकती है, तो इस पर विचार किया जाना चाहिए.

अंसारी ने मुसलमानों से बकरीद पर गाय की क़ुर्बानी न देने की भी अपील की थी. साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि इस्लाम किसी ख़ास जानवर की क़ुर्बानी को ज़रूरी नहीं मानता.

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राष्ट्रीय पशु घोषित करने को लेकर सत्तारूढ़ बीजेपी की ओर से किसी बड़े नेता की प्रतिक्रिया सोमवार तक नहीं आई थी. बीजेपी नेता लगातार गोवंश के पशुओं को मारने के ख़िलाफ़ मुखर रहे हैं.

हालांकि, शनिवार को केंद्रीय क़ानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए इंटरव्यू में कहा था कि केंद्र सरकार ऐसे किसी प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही है.

उन्होंने कहा, "अलग-अलग संगठन इन मुद्दों पर काम करते रहते हैं और सांसदों से भी संपर्क करते हैं. लोग एप्लीकेशन देते हैं और कहते हैं कि ऐसा क़दम उठाया जाना चाहिए."

हालांकि, केंद्रीय मंत्री ने साफ़ किया कि इस मामले पर अभी कोई प्रस्ताव केंद्रीय मंत्रिमंडल के सामने नहीं है.

मेघवाल ने कहा, "अभी तक कैबिनेट के पास ऐसा कोई मामला विचाराधीन नहीं है. अगर कोई प्रस्ताव ऐसे स्तर पर पहुंचता है जहां सरकार या कैबिनेट के दख़ल की ज़रूरत होती है, तो हम आपको बता देंगे."

उन्होंने पश्चिम बंगाल में नई बीजेपी सरकार के हाल ही में राज्य के 1950 के क़ानून के तहत मवेशियों को मारने के नियमों में बदलाव के क़दम का ज़िक्र करते हुए कहा, "अलग-अलग राज्य ऐसे मामलों पर अपने हालात और मेरिट के आधार पर फ़ैसले लेते हैं."

वहीं सोमवार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिजनौर में एक कार्यक्रम के दौरान गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग पर प्रतिक्रिया दी.

उन्होंने कहा, "मैं इस समय एक चलन देख रहा हूं. तमाम मौलवी और मौलाना यह बयान दे रहे हैं कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करो. हमने कहा कि गो हमारी माता है और जन्म-जन्मांतर का हमारा नाता है."

उन्होंने आगे कहा, "क्या मां और पुत्र के बीच कुछ घोषित करने की ज़रूरत पड़ती है? यह हमारे संस्कार हैं. अपनी मां के बारे में जो सम्मान का भाव रखते हैं, वही भाव हमारा भी है, हमने गाय को माता माना है."

योगी आदित्यनाथ ने कहा कि गो माता तो स्वघोषित राष्ट्रमाता है और उसे राष्ट्रमाता घोषित करने की आवश्यकता नहीं है.

उन्होंने कहा, "गाय हमारे लिए माता है, पशु तो तुम्हारी बुद्धि है. तुम्हारी सोच पशुवत है, जो गाय माता को पशु बोल रहे हो. जैसे हमारी माता के बारे में किसी को परिचय देने की ज़रूरत नहीं होती, वैसे ही गो माता के बारे में भी किसी घोषणा की आवश्यकता नहीं है."

राष्ट्रीय पशु घोषित करने से क्या होगा?

भारत के संविधान में सीधे तौर पर किसी भी राष्ट्रीय पशु का उल्लेख नहीं है लेकिन भारत सरकार ने रॉयल बंगाल टाइगर यानी बाघ को साल 1972 में राष्ट्रीय पशु घोषित किया था.

उस साल तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने 'प्रोजेक्ट टाइगर' की शुरुआत की थी जिसका मक़सद दुर्लभ बाघों को विलुप्त होने से बचाना था.

वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 जैसे कई क़ानून हैं जो पशुओं को ख़ास महत्व देते हैं.

वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत भारत के राष्ट्रीय पशु (बाघ) और अन्य लुप्तप्राय प्रजातियों के शिकार तथा अवैध व्यापार पर पूर्ण प्रतिबंध है. इसके तहत बाघों को अनुसूची-1 में रखकर सर्वोच्च क़ानूनी सुरक्षा प्रदान की गई है.

अगर गाय या गोवंश के जानवरों को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाता है तो इससे यह सुनिश्चित हो जाएगा कि उनको मारा नहीं जा सकेगा और उनके अवैध व्यापार पर पूर्ण प्रतिबंध होगा. इसकी मांग पहले से ही हिंदूवादी संगठन और बीजेपी करती आई है.

हालांकि क़ानून विशेषज्ञ और पूर्व केंद्रीय कानून सचिव पीके मल्होत्रा समाचार एजेंसी भाषा से कहते हैं कि गाय को देश के 'राष्ट्रीय पशु' का दर्जा दिया जाता है, तो उसके संरक्षण के लिए भी वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की तरह के प्रावधान बनाने होंगे.

वो यह चेतावनी भी देते हैं कि ऐसा क़ानून बनाने से पहले इसके कारण और प्रभाव पर विचार करना आवश्यक होगा.

उन्होंने कहा कि ऐसे क़ानून की कोई 'व्यावहारिक उपयोगिता' नहीं होगी और यह केवल 'प्रतीकात्मक' प्रकृति का होगा.

भारतीय विधि सेवा के पूर्व अधिकारी मल्होत्रा ने कहा कि केंद्र सरकार में काम के बंटवारे को देखते हुए, अगर यह क़ानून लाया जाता है तो मत्स्य पालन, पशुपालन और दुग्ध उत्पादन मंत्रालय इसके लिए नोडल एजेंसी हो सकता है.

पूर्व क़ानून सचिव ने संविधान के अनुच्छेद 48 का उल्लेख करते हुए कहा कि कई राज्यों ने इसके प्रावधानों के आधार पर स्थानीय क़ानून बनाकर गोहत्या पर पहले ही प्रतिबंध लगा दिया है.

उन्होंने कहा कि कुछ राज्य "फ़िट फ़ॉर स्लॉटर" (वध के लिए उपयुक्त) सिद्धांत के आधार पर गायों के वध की अनुमति देते हैं, जिसके तहत जो गायें बूढ़ी हो जाती हैं या दूध नहीं देतीं, उन्हें वध के लिए उपयुक्त माना जाता है.

अनुच्छेद 48 में लिखा है, "राज्य आधुनिक और वैज्ञानिक तर्ज़ पर कृषि और पशुपालन को संगठित करने का प्रयास करेगा और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू एवं भार ढोने वाले पशुओं की नस्लों के संरक्षण और सुधार के लिए क़दम उठाएगा तथा उनके वध पर रोक लगाएगा."

मांस का व्यापार

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के आंकड़े बताते हैं कि भारत से लगातार मांस का निर्यात बढ़ रहा है.

प्राधिकरण के मुताबिक़, पशु उत्पादों से जुड़ा जो सबसे बड़ा निर्यात भारत की ओर से हो रहा है उसमें भैंस के मांस का सबसे बड़ा योगदान है. वित्त वर्ष 2025 में भारत से 406 करोड़ डॉलर का भैंस के मांस का निर्यात किया गया जो कि डेयरी और पॉल्ट्री प्रॉडक्ट से कई गुणा अधिक था.

इन आंकड़ों में भी मांस का उत्पादन पांच राज्यों में सबसे अधिक होता है जो कुल निर्यात में 57.45 फ़ीसदी का योगदान करते हैं. इनमें पश्चिम बंगाल (12.62%), उत्तर प्रदेश (12.29%), महाराष्ट्र (11.28%), तेलंगाना (10.85%) और आंध्र प्रदेश (10.41%) शामिल हैं.

गाय को मारने या उसके मांस से जुड़े व्यापार के नियम राज्य के अंतर्गत आते हैं क्योंकि पूर्वोत्तर भारत के कई राज्य और केरल ऐसे राज्य हैं जहां पर गोवंश के जानवरों को मारने पर रोक नहीं है.

हालांकि गोवंश के जानवरों के मांस के निर्यात पर वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने पूरी तरह प्रतिबंध लागू कर रखा है. लेकिन फिर भी कई बार ऐसे राजनीतिक वाद-विवाद सामने आए हैं जब भैंस के मांस के निर्यात को लेकर भी सवाल उठाए जाते रहे हैं.

उन्होंने दावा किया था कि कुल मांस निर्यात में यूपी का योगदान 40 फ़ीसदी से अधिक है और सभी निर्यात के आंकड़े 'भैंस के मांस' के तौर पर दर्ज किए जाते हैं, बिना डीएनए टेस्टिंग के इस मांस की आड़ में गोवंश के मवेशियों को मारकर भेजा जा रहा है.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का दावा था कि राज्य में दर्ज कुल भैंसों की संख्या और निर्यात होने वाले मांस की मात्रा में काफ़ी अंतर है.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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