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Retourसरियों से पिटाई, चोकर की रोटी और पिटबुल का पहरा: 12 बंधुआ मज़दूरों की आपबीती
सरियों से पिटाई, चोकर की रोटी और पिटबुल का पहरा: 12 बंधुआ मज़दूरों की आपबीती
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BBC हिंदी25/06/2026Crime6 min de lectureIndia

सरियों से पिटाई, चोकर की रोटी और पिटबुल का पहरा: 12 बंधुआ मज़दूरों की आपबीती

L'essentiel

उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में दोना बनाने वाली फ़ैक्ट्री से 12 बंधुआ मज़दूरों को मुक्त कराया गया है. उन्होंने बताया कि उन्हें क़ैदियों की तरह रखा जाता था, पीटा जाता था और सिर्फ़ चोकर की रोटी दी जाती थी. पुलिस ने दो अभियुक्तों को गिरफ़्तार किया है.

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सरियों से पिटाई, चोकर की रोटी और पिटबुल का पहरा: 12 बंधुआ मज़दूरों की आपबीती

Author, शहबाज़ अनवर

पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए

प्रकाशित 24 जून 2026

पढ़ने का समय: 7 मिनट

(चेतावनी: इस रिपोर्ट के कुछ विवरण पाठकों को विचलित कर सकते हैं)

उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के मांडी गांव में दोना बनाने वाली एक फ़ैक्ट्री से 12 लोगों को बंधुआ मज़दूरी से मुक्त कराया गया है.

पुलिस और श्रम विभाग की संयुक्त कार्रवाई में छुड़ाए गए इन श्रमिकों ने बताया कि उन्हें क़ैदियों की तरह रखा जाता था, मोबाइल छीन लिए गए, पहचान पत्र जला दिए गए और बाहर निकलने की मनाही थी.

छुड़ाए गए मज़दूरों में उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, हरियाणा, राजस्थान और नेपाल तक के लोग शामिल हैं.

मुज़फ़्फ़रनगर के एसएसपी संजय वर्मा ने बताया है कि कुछ मज़दूरों की पसलियां टूट गईं, कई ने अपनी गंभीर चोटें दिखाई हैं, ऐसे आरोप हैं कि अत्याचार के चलते कुछ लोगों की मौतें भी हुईं.

इस मामले में दो अभियुक्तों को गिरफ़्तार किया गया है, जबकि कथित फ़ैक्ट्री संचालक अंकित बालियान की तलाश है.

बीबीसी ने अभियुक्त अंकित बालियान के मोबाइल नंबर पर संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन मोबाइल स्विच्ड ऑफ़ मिला. बाक़ी दो अभियुक्तों के परिवार से संपर्क नहीं हो सका है.

बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने इन मज़दूरों से बात की है, जिसमें इन्होंने अपनी आपबीती सुनाई है.

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बीती 22 जून को मुज़फ़्फ़रनगर के थाना तितावी के गांव मांडी में पुलिस, प्रशासन और श्रम विभाग की टीम ने छापा मारकर 12 मज़दूरों को मुक्त कराया. पुलिस के प्रेस नोट के मुताबिक़, इन लोगों को जबरन एक दोना बनाने वाली फ़ैक्ट्री में रखा गया था.

पुलिस का कहना है कि "फ़ैक्ट्री में मज़दूरों के साथ जानवरों जैसा बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया जाता था. उन्हें लोहे की गर्म रॉड, बेल्ट और डंडों से बुरी तरह पीटा जाता था. मज़दूरों के शरीर पर गंभीर चोटों के निशान पाए गए. इनमें कुछ नाबालिग भी शामिल बताए जा रहे हैं. ये सभी मज़दूर बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों से हैं."

मुज़फ़्फ़रनगर के एसएसपी संजय कुमार ने मीडिया को बताया, "सूचना मिलने पर पुलिस और श्रम विभाग ने फ़ैक्ट्री में छापा मारा. यहां से 12 श्रमिकों को मुक्त कराया गया. सभी को यातनाएं दी गई थीं. किसी के कान में चोट थी, किसी की कमर पर गहरी चोटें थीं और एक मज़दूर की कुछ पसलियां तक टूट चुकी थीं. इनमें से किसी को दो साल से तो किसी को कुछ महीनों से बंधक बनाकर रखा गया था."

उन्होंने बताया, "सूचना के अनुसार अभियुक्तों के अत्याचार के चलते कुछ लोगों की मृत्यु भी हुई थी. इनमें से एक व्यक्ति की पहचान हो चुकी है और कार्रवाई जारी है. इस मामले में दो अभियुक्त, शिवा त्यागी (बुढ़ाना, मुज़फ़्फ़रनगर) और प्रदीप बालियान (तितावी, मुज़फ़्फ़रनगर) को गिरफ़्तार किया गया है. अंकित बालियान फ़रार है, जो इसी गांव का रहने वाला है."

अभियुक्तों के ख़िलाफ़ बाल श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम 1986, किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2015 की धाराएं 75/79, तथा बंधुआ मज़दूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम 1976 की धाराएं 16/17/18 समेत कई अन्य धाराओं में एफ़आईआर दर्ज की गई है.

मज़दूरों ने सुनाई आपबीती

बीबीसी ने यहां से छुड़ाए गए मज़दूरों से बात की, जिसमें उन्होंने अपने साथ हुए अत्याचारों के बारे में बताया.

उत्तराखंड के नैनीताल के रहने वाले रामू कहते हैं, "हम लोगों को फ़ैक्ट्री में क़ैदियों की तरह रखा गया था. गेट के बाहर नहीं जाने दिया जाता था, मोबाइल छीन लिए गए, आधार कार्ड जला दिए गए. हमें सरियों से पीटा जाता था और खाने में सिर्फ़ चोकर की रोटी दी जाती थी."

उन्होंने कहा, "हमसे कई-कई घंटे लगातार काम कराया जाता था, सोने नहीं दिया जाता था. फ़ैक्ट्री मालिक अंकित हमें लेकर आए थे. पुलिस ने हमें नया जीवन दिया है."

20 वर्षीय रामू के माता-पिता जीवित नहीं हैं. उन्हें ढाई महीने पहले अंबाला रोडवेज़ स्टेशन से मज़दूरी कराने के नाम पर मुज़फ़्फ़रनगर लाया गया था. उनके तीन भाई-बहन हैं.

उत्तर प्रदेश के औरैया के रहने वाले 26 साल के शिवम कुमार भी उन मजदूरों में शामिल हैं, जिन्हें मुक्त कराया गया है. शिवम की शादी हो चुकी है और उनकी एक बेटी भी है. परिवार में दो बहनें हैं. वो छह महीनों से फ़ैक्ट्री में जबरन रखे गए थे. उन्होंने मीडिया को अपने कूल्हों और कमर पर गंभीर चोटों के निशान दिखाए.

यूपी के सीतापुर के रहने वाले 50 वर्षीय जगदीश ने रोते हुए बताया, "हमें यहां 11 महीने हो गए हैं. जब हम कहते थे कि हमारा मन नहीं लगता है, घर जाना है, तो ये लोग हमें बुरी तरह पीटते थे."

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के रहने वाले नाराय फ़ैक्ट्री से छूटने के बाद बेहद ख़ुश दिखे और बार-बार पुलिस का आभार जताते रहे.

उन्होंने बताया, "परिवार में दो भाई और दो बच्चे हैं. पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से मुझे मज़दूरी कराने की बात कहकर मुज़फ़्फ़रनगर लाया गया था. मैं यहां क़रीब चार महीने से था. घरवालों की बहुत याद आती थी."

इन बंधुआ मज़दूरों में नेपाल के पाल्पा ज़िले के सत्यवती गांव के रहने वाले दानबहादुर थापा भी शामिल हैं. दानबहादुर ने बताया कि वो इस फ़ैक्ट्री में लगभग दो साल से बंधक थे. इन दो सालों में उनकी कभी भी घर पर बात नहीं हुई.

उन्होंने कहा, "हमसे मज़दूरी करवाई जाती थी. खाने को सिर्फ़ चोकर की रोटी मिलती थी, साथ में नमक और लाल मिर्च का पाउडर. चाय में चीनी तक नहीं होती थी. "

'पिटबुल रखते थे, ताकि मज़दूर कहीं भाग न जाएं'

पुलिस ने मीडिया को बताया कि पकड़े गए अभियुक्त मज़दूरों को रेलवे और बस स्टेशनों से मज़दूरी कराने के बहाने से लाते थे. उन्हें 10 से 12 हज़ार रुपये प्रतिमाह, भोजन और रहने की सुविधा का लालच दिया जाता था. लेकिन फ़ैक्ट्री में पहुंचने के बाद न तो वेतन दिया जाता था और न ही अच्छा भोजन.

मुज़फ़्फ़रनगर की जिस फ़ैक्ट्री से मज़दूरों को छुड़ाया गया, वहां से पुलिस ने एक पिटबुल नस्ल का कुत्ता भी बरामद किया. तितावी थाना प्रभारी प्रमोद कुमार ने बताया कि मज़दूर कहीं भाग न जाएं, इसके लिए बाहर इस कुत्ते को पहरे पर रखा गया था.

पुलिस जांच में सामने आया कि बंधक बनाए गए मज़दूरों के मोबाइल छीन लिए गए थे. इस कारण वे महीनों से अपने परिजनों से संपर्क में नहीं थे.

तितावी थाना प्रभारी प्रमोद कुमार ने बीबीसी से कहा, "अभी तो श्रमिकों को छुड़ाया गया है, उनके घरवालों से संपर्क किया जा रहा है. कुछ एक के परिजन पहुंच रहे हैं जबकि कई और लोग आने बाकी हैं."

उन्होंने आगे कहा, "ज़ाहिर है जब मज़दूरों को फ़ैक्ट्री में बंधक बना लिया गया और उनके मोबाइल छीन लिए गए तो वे घरवालों से कैसे बात करते. अब ये जांच का विषय है कि मज़दूरों के परिजनों ने उनकी गुमशुदगी थानों में दर्ज कराई थी या नहीं."

गांव के लोगों का क्या है कहना

इस मामले के सार्वजनिक होने के बाद से वांछित अभियुक्त के परिवार के लोग से संपर्क नहीं हो पाया है. जब अभियुक्त के बारे में गांववालों से पूछा गया तो अधिकांश लोग कुछ भी बताने से बचते दिखे.

बीबीसी ने अभियुक्त अंकित बालियान के मोबाइल नंबर पर संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन मोबाइल स्विच्ड ऑफ़ मिला.

दोना बनाने की यह फ़ैक्ट्री गांव मांडी के बाहरी छोर पर स्थित है और कई बीघा में फैली हुई है. गांव के पूर्व प्रधान बिजेंद्र ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "हमें इस बारे में मालूम नहीं था कि यहां ऐसा चल रहा है. बस इतना पता था कि कोई कारख़ाना है."

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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