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राम मंदिर ट्रस्ट पर लगे अनियमितताओं के आरोपों के बीच चंपत राय पर बंटी राय
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BBC हिंदी19/06/2026Politique10 min de lectureIndia

राम मंदिर ट्रस्ट पर लगे अनियमितताओं के आरोपों के बीच चंपत राय पर बंटी राय

L'essentiel

अयोध्या के राम मंदिर निर्माण से जुड़े ट्रस्ट पर चंदे और कार्यप्रणाली में अनियमितताओं के आरोप लगे हैं। इन आरोपों के बीच ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को लेकर लोगों की राय बंटी हुई है, जहाँ समर्थक उन्हें ईमानदार बताते हैं वहीं आलोचक संस्थागत जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।

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पदनाम, BBC Hindi TV journalist

प्रकाशित 7 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 8 मिनट

हिंदुओं के सबसे बड़े तीर्थ स्थलों में शुमार अयोध्या का राम मंदिर इन दिनों राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है. सदियों के इतिहास, आस्था और संघर्ष को समेटे इस नगरी के लिए सुर्खियों में आना कोई नई बात नहीं है. समय-समय पर अयोध्या ने विभिन्न कारणों से देश का ही नहीं, बल्कि दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है.

पर इस बार वजह कुछ अलग है.

अलग इसलिए, क्योंकि इस बार चर्चा मंदिर से जुड़े आंदोलन, उसके निर्माण कार्य, उसकी भव्यता, श्रद्धालुओं की भीड़ या फिर आध्यात्मिक उत्साह की नहीं, बल्कि उन सवालों की हो रही है जो मंदिर से जुड़े चंदे, ट्रस्ट की कार्यप्रणाली और कथित अनियमितताओं को लेकर उठाए जा रहे हैं.

समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव लगातार राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पर हमलावर हैं. उनका आरोप है कि ट्रस्ट की नाक के नीचे मंदिर का दान और चढावे की रकम के हिसाब-किताब में हेरफ़ेर की गई. उन्होंने दावा किया है कि राम मंदिर के चढ़ावे से करोड़ों रुपए गायब हैं.

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उनसे इतर कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और फिर स्थानीय स्तर पर पूर्व कारसेवक संतोष दुबे, बीजेपी के नेता डॉ रजनीश सिंह आदि इस कथित अनियमितता का हवाला देकर जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं.

दूसरी तरफ़ राज्य सरकार द्वारा गठित एसआईटी अपना काम कर रही है. पूरे मामले की जांच जारी है, लेकिन इस बीच जब आप अयोध्या के आम लोग और यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं से बात करते हैं तो निराशा और गुस्सा साथ-साथ नज़र आता है. अयोध्या के कई लोग तो कैमरे पर खुलकर बात करने से बचते हैं. पर जिन कुछ लोगों ने हमसे बात की, उन्होंने बहुत ही शिकायती लहजे में कहा कि जिस मंदिर को करोड़ों लोगों की आस्था और त्याग से बना बताया गया, उसी के नाम पर अब आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं.

कुछ लोगों ने इसे ''अयोध्या को कलंकित करने'' जैसा बताया, तो कुछ इसे जवाबदेही और पारदर्शिता की ज़रूरी मांग मानते हैं.

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मगर इन सवालों के केंद्र में है श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट, वही संस्था जिसे सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद राम मंदिर निर्माण और उसके संचालन की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी. और इसी ट्रस्ट का एक नाम सबसे ज़्यादा चर्चा में है - महासचिव चंपत राय.

लेकिन चंपत राय कौन हैं? वे राम मंदिर आंदोलन में कब और कैसे उभरे? और क्यों समर्थक उन्हें आंदोलन का रणनीतिकार मानते हैं, जबकि आलोचक उनसे जवाबदेही तय करने की बात कर रहे हैं.

कौन हैं चंपत राय?

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वर्तमान समय में चंपत राय श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव और विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष हैं.

फ़रवरी 2020 में अध्योया मामले में सुप्रीम कोर्ट के आए फ़ैसले के बाद सर्वोच्च न्यायालय के कहे अनुसार केंद्र सरकार ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया. 15 सदस्यीय इस ट्रस्ट में अध्यक्ष के रूप में महंत नृत्य गोपाल दास, कोषाध्यक्ष के रूप में स्वामी गोविंद देव गिरी, वरिष्ठ अधिवक्ता के. परासरन, डॉ. अनिल मिश्रा, कामेश्वर चौपाल, महंत दिनेंद्र दास समेत कई धार्मिक और सामाजिक प्रतिनिधि शामिल हैं.

ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय इसकी रोज़मर्रा की कार्यप्रणाली के सबसे प्रमुख पदाधिकारियों में गिने जाते हैं. मंदिर निर्माण परियोजना की निगरानी, दान और चढ़ावे से जुड़े प्रबंधन, ट्रस्ट की ओर से आधिकारिक संवाद, बैठकों के समन्वय और विभिन्न एजेंसियों के साथ तालमेल की ज़िम्मेदारी मुख्य रूप से उन्हीं के पास है. यही वजह है कि राम मंदिर से जुड़ी किसी भी बड़ी घोषणा, विवाद या प्रशासनिक फ़ैसले के दौरान ट्रस्ट का सबसे प्रमुख सार्वजनिक चेहरा अक्सर चंपत राय ही होते हैं.

नतीजा है कि ताज़ा विवाद के बीच भी मीडियाकर्मी चंपत राय से ट्रस्ट के ऊपर लग रहे इन आरोपों का जवाब चाहते हैं.

चंपत राय ने शुरुआत में एक वीडियो जारी कर आरोपों का खंडन भी किया लेकिन एसआईटी की गठन के बाद से उन्होंने मीडिया से दूरी बना ली है.

आरोपों पर चंपत राय ने क्या कहा?

अपने इस वीडियो में चंपत राय ने कहा था, ''श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र अपने भिन्न-भिन्न कार्यों का ऑडिट समय-समय पर करते रहता है. हुंडी काउंटिंग कमरे (हुंडी का अर्थ है - दान पात्र) का ऑडिट राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के न्यासी गण,कार्यकर्ता, स्टेट बैंक के कर्मचारी मिलकर करते हैं. ये कार्य कई दिनों तक चलता है. यही कार्य आज कल हो रहा है, कोई भी ऐसी उल्लेखनीय बात अभी तक किसी के भी ध्यान में नहीं आयी है.''

हमने चंपत राय से संपर्क स्थापित करने की कोशिश की लेकिन कोई जवाब नहीं आया. वह आमतौर पर अयोध्या के कारसेवकपुरम में रहते हैं, लेकिन यहां पहुंचने पर हमें विश्व हिंदू परिषद के ही एक सदस्य ने बताया कि बीते सात-दस दिनों से, यानी जबसे एसआईटी की जांच शुरू हुई, वह मंदिर परिसर में ही रह रहे हैं.

चंपत राय पर बंटी हुई राय

अयोध्या में जिन लोगों से बीबीसी ने बात की, चाहे वे स्थानीय निवासी हों, व्यापारी, संत-महात्मा हों या राम मंदिर से जुड़े सामाजिक और धार्मिक संगठनों के सदस्य...उनमें से कई ने कहा कि हालिया विवाद की ख़बर सुनकर उन्हें पूरी तरह हैरानी नहीं हुई. कुछ लोगों का कहना था कि पिछले कुछ वर्षों में मंदिर और ट्रस्ट से जुड़ी अलग-अलग तरह की खबरें और चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं, इसलिए सवाल उठना उनके लिए अप्रत्याशित नहीं था.

हालांकि, चंपत राय को लेकर लोगों की राय स्पष्ट रूप से बंटी हुई दिखाई देती है. उनके समर्थक उन्हें सादगीपूर्ण जीवन जीने वाला, संगठन के लिए दशकों तक काम करने वाला और व्यक्तिगत ईमानदारी के लिए पहचाना जाने वाला व्यक्ति बताते हैं. कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा कि यदि किसी तरह की अनियमितता हुई भी होगी, तो उसमें उनकी व्यक्तिगत संलिप्तता की कल्पना करना उनके लिए मुश्किल है.

वहीं दूसरी ओर, कुछ स्थानीय लोगों और आलोचकों का तर्क है कि राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव के तौर पर चंपत राय इतने केंद्रीय पद पर हैं कि उनकी जानकारी के बिना किसी बड़े स्तर की गड़बड़ी होना मुश्किल प्रतीत होता है. उनके अनुसार, भले ही किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत ईमानदारी पर सवाल न हो, लेकिन संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न अपनी जगह बना रहता है.

रसायन शास्र के शिक्षक से ट्रस्ट के महासचिव तक

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बिजनौर ज़िले से आने वाले चंपत राय के पिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए थे और परिवार का माहौल भी वैचारिक रूप से उसी दिशा में झुका हुआ था. पिता से प्रभावित होकर चंपत राय ने भी कम उम्र में संघ की शाखाओं में जाना शुरू किया.

हालांकि, पेशेवर जीवन की शुरुआत उन्होंने एक शिक्षक के रूप में की. बिजनौर के आरएसएम डिग्री कॉलेज में वे रसायन शास्त्र पढ़ाते थे. लेकिन 1980 के दशक में उन्होंने अध्यापन छोड़कर संघ के पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में काम करने का फ़ैसला किया.

विश्व हिंदू परिषद के सदस्य शरद शर्मा बताते हैं, "प्रचारक जीवन में व्यक्ति सीधे संगठन के काम से जुड़ जाता है. चंपत राय जी ने भी आगरा, देहरादून और हरिद्वार समेत कई जगहों पर संगठन के विस्तार का काम किया. वे विभाग प्रचारक रहे और बाद में उन्हें विश्व हिंदू परिषद में भेजा गया, जहां उन्होंने सह क्षेत्रीय संगठन मंत्री के तौर पर काम संभाला."

यहीं से उनकी भूमिका राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़ने लगी. उत्तर प्रदेश एसोसिएशन ऑफ जर्नलिस्ट्स के अध्यक्ष सर्वेश कुमार सिंह अपने एक लेख में लिखते हैं, ''1984 की धर्म संसद के बाद जब विश्व हिंदू परिषद ने राम जन्मभूमि आंदोलन को संगठित रूप से आगे बढ़ाना शुरू किया, तब संघ से अशोक सिंघल समेत कई प्रचारकों को विहिप में भेजा गया था, जिनमें चंपत राय भी शामिल थे. सिंह के अनुसार, आंदोलन के सार्वजनिक चेहरों के पीछे रहकर रणनीति तैयार करना, उसे अमल में लाना, मुकदमों की पैरवी के लिए दस्तावेज़ जुटाना और वकीलों के साथ समन्वय करना जैसे काम चंपत राय की प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल थे. सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई की हर अहम तारीख से पहले दिल्ली में वकीलों की बैठकें आयोजित कराने में भी चंपत राय की महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी. विहिप के भीतर भी उनका कद लगातार बढ़ता गया.''

संगठन से जुड़े लोगों के अनुसार, ''वे अशोक सिंघल के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाते थे. 2017-18 में जब विश्व हिंदू परिषद के भीतर नेतृत्व को लेकर संकट पैदा हुआ और संगठन डॉ. प्रवीण तोगड़िया तथा अन्य नेताओं के बीच टकराव का सामना कर रहा था, तब चंपत राय उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने संगठन को संभालने और संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई.''

बाद के वर्षों में वह विश्व हिंदू परिषद के शीर्ष नेतृत्व का हिस्सा बने और संगठन के सबसे प्रभावशाली रणनीतिकारों में गिने जाने लगे. नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले और फरवरी 2020 में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन के बाद चंपत राय की भूमिका एक बार फिर बदल गई.

आंदोलन के संगठनकर्ता और रणनीतिकार के रूप में पहचाने जाने वाले चंपत राय अब मंदिर निर्माण परियोजना के प्रशासक और ट्रस्ट के महासचिव के रूप में सामने आए.

चंपत राय चार भाइयों में से एक हैं. डेढ़ साल पहले उनके एक भाई की मृत्यु हो गई. बिजनौर के स्थानीय पत्रकार ज़ुबैर बताते हैं कि आख़िरी बार चंपत राय तभी अपने घर पहुंचे थे.

राष्ट्रव्यापी चंदा अभियान में भूमिका

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जब राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हुआ, तो उसके लिए धन जुटाने की ज़िम्मेदारी भी ट्रस्ट के सामने थी. ऐसे में जनवरी 2021 में देशभर में एक बड़ा चंदा अभियान शुरू किया गया, जिसे 'निधि समर्पण अभियान' नाम दिया गया.

इस अभियान की योजना बनाने और उसे लोगों तक पहुंचाने में चंपत राय की अहम भूमिका थी. ट्रस्ट के महासचिव के रूप में वे लगातार मीडिया के सामने आकर बताते रहे कि अभियान कैसे चलेगा, पैसा कैसे जमा होगा और उसका इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा.

हालांकि इसी साल ट्रस्ट और चंपत राय का नाम विवादों में भी आया.

पहले भी उठे ट्रस्ट और चंपत राय पर सवाल

जून 2021 में ट्रस्ट पर अयोध्या में ख़रीदी गई एक ज़मीन को लेकर सवाल खड़ा हुआ था. आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी के नेताओं ने आरोप लगाया था कि 'एक शख़्स ने जिस ज़मीन को दो करोड़ रुपये में ख़रीदा उसे इस सौदे के महज़ कुछ ही मिनटों बाद ट्रस्ट ने 18.5 करोड़ रुपए देकर ख़रीदा.'

इस पूरे सौदे की जांच की मांग की गई थी. उस समय कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने भी मामले में पारदर्शिता की मांग उठाई थी.

चंपत राय और ट्रस्ट ने इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज किया था. उनका कहना था कि सभी भूमि खरीद पारदर्शी तरीके से की गईं, भुगतान बैंकिंग माध्यमों से हुआ और ट्रस्ट ने बाज़ार मूल्य से कम कीमत पर भूमि ख़रीदी. चंपत राय ने आरोपों को "भ्रामक" और "राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित" बताया था.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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