दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' के हटने पर बोले- 'हद हो गई', जानिए जसवंत सिंह खालड़ा कौन थे
L'essentiel
दिलजीत दोसांझ ने अपनी फिल्म 'सतलुज' के जी-5 से हटने पर निराशा जताई है। फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा पर आधारित है, जिन्हें 1995 में पुलिस ने अगवा कर हत्या कर दी थी।
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मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा ने 1980-90 के दशक में पंजाब में पुलिसिया अत्याचारों का पर्दाफ़ाश किया था। उन्हें 1995 में पुलिस ने अगवा कर हत्या कर दी थी।
अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने अपनी फ़िल्म 'सतलुज' के ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ज़ी-5 से हटने पर अफ़सोस ज़ाहिर किया है लेकिन साथ ही कहा कि उन्हें पहले से ही इस बात का अंदेशा था.
दिलजीत ने इंस्टाग्राम लाइव पर कहा, "कई लोगों को लग रहा था कि संडे को आराम से फ़िल्म देखेंगे. मुझे भी लग रहा था कि फ़िल्म को मंडे तक हटा देंगे लेकिन फ़िल्म संडे शाम ही हटा दी गई."
दिलजीत ने कहा, "मुझे पहले से ही लग रहा था कि ऐसा होगा. जिसकी (जसवंत सिंह खालड़ा) आवाज़ को 1995 में भी दबाया गया और आज 2026 है. कमाल की बात है. हद हो गई है. हम 2026 में जी रहे हैं और कहां खड़े हैं. आज भी आप बात नहीं करने दे रहे हो. कोर्ट ने जो फ़ैसले दिए हैं हम उसी पर बात कर रहे हैं. कोई नई बात नहीं कर रहे हैं. ये बात मेरी समझ से पूरी तरह बाहर है."
उन्होंने आगे कहा, "मुझे इस बात की ख़ुशी है कि ये फ़िल्म कुछ लोगों तक पहुंच गई है. ये लोगों की फ़िल्म है. ये रुक नहीं सकती."
मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित दिलजीत दोसांझ की फ़िल्म 'सतलुज' नाम से ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ज़ी-5 पर तीन जुलाई को रिलीज़ हुई थी, लेकिन पांच जुलाई को इसे प्लेटफ़ॉर्म से हटा दिया गया.
ज़ी-5 ने आधिकारिक एक्स हैंडल पर इस बारे में एक बयान जारी करके कहा है, "सतलुज भले ही थम गई हो, लेकिन उसने जो चर्चा छेड़ी थी, वो अब भी जारी है. आपके अपार प्यार के लिए दिल से धन्यवाद. हमें उम्मीद है कि हम जल्द ही इसे फिर से आपके बीच लेकर आएंगे."
मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा वह शख़्स थे, जो 1980–90 के दशक में पंजाब में चरमपंथ के दौर में लापता लोगों की तलाश करते हुए एक दिन खुद ही लापता हो गए.
सीबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक़ पुलिस अधिकारियों ने 6 सितंबर 1995 को उन्हें उनके आवास से ही अगवा कर लिया था.
इस रिपोर्ट में हम खालड़ा के बारे में तो बताएंगे ही, साथ ही यह भी बात करेंगे कि कैसे पंजाब पुलिस के अफ़सरों ने उन्हें अगवा किया, कैसे उनकी हत्या की गई और आखिरकार अपराध में शामिल इन पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई कैसे संभव हुई.
जसवंत सिंह खालड़ा कौन थे?
बीबीसी संवाददाता अरविंद छाबड़ा ने इस मामले में पहली बार 6 सितंबर 2023 को ये रिपोर्ट दी थी.
अदालतों में सीबीआई ने केस के जो विवरण दिए, उसके अनुसार जसवंत सिंह खालड़ा एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे और शिरोमणि अकाली दल के मानवाधिकार विंग के महासचिव रह चुके हैं.
विवरण के अनुसार, "पंजाब में 1980 और 1990 के दशक में अगर आतंकवादी घटनाएं हुईं, तो पुलिस प्रताड़ना, हिरासत में मौतें और फर्जी पुलिस मुठभेड़ भी लगातार चर्चा में रहे."
"यह मुद्दा मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के हवाले से चर्चा में आया जब उन्होंने अमृतसर, मजीठा और तरनतारन के तीन श्मशान घाटों में जून 1984 से दिसंबर 1994 तक जलाई गई लाशों के विवरण उजागर किए."
उन्होंने यह दावा किया कि ये लावारिस लाशें पुलिस की गैर-कानूनी कार्रवाइयों की गवाही देती हैं.
सीबीआई के मुताबिक जसवंत सिंह खालड़ा ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई. "स्थानीय पुलिस को यह पसंद नहीं आ रहा था और उसने उन्हें अगवा करने की साज़िश रची और इस आपराधिक साज़िश को आगे बढ़ाते हुए स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने 6 सितंबर 1995 को उन्हें उनके आवास से अगवा कर लिया."
"उन्हें गैरकानूनी हिरासत में रखने के बाद उनकी हत्या कर दी गई. उनकी लाश हरीके इलाके में नहर में फेंक दी गई."
हालांकि उनकी लाश को कभी बरामद नहीं किया जा सका.
खालड़ा की हत्या का मकसद क्या था?
जसवंत सिंह खालड़ा को क्यों मारा गया? सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में टिप्पणियाँ की हैं, जिनमें से कुछ नीचे दी गई हैं.
मानवाधिकार कार्यकर्ता होने के नाते, जसवंत सिंह खालड़ा ने अमृतसर और तरनतारन जिलों में पुलिस के कथित गलत कामों का पर्दाफ़ाश करने का काम किया था. पुलिस ने आतंकवादियों के नाम पर बेकसूर लोगों को मारकर बिना किसी पहचान के उनका अंतिम संस्कार किया.
पुलिस अधिकारियों को खालड़ा की ऐसी गतिविधियाँ पसंद नहीं आईं और उन्होंने उन्हें यह काम बंद करने को कहा. पुलिस अधिकारियों ने खालड़ा को टेलीफ़ोन पर धमकियाँ दीं.
जसवंत सिंह खालड़ा ने अज्ञात संदिग्ध व्यक्तियों की दी जा रही धमकियों के बारे में जानकारी दी थी, जो उनके घर के आसपास घूम रहे थे और कुछ संदिग्ध तत्वों ने उनका पीछा किया था.
खालड़ा पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ सार्वजनिक दबाव पैदा करने में सक्षम थे, जो पुलिस पर ग़ुस्से और दबाव का कारण था.
एसएसपी अजीत सिंह संधू ने दोषियों और कुछ अन्य पुलिस कर्मियों के साथ मिलकर जसवंत सिंह खालड़ा को अगवा करने और उन्हें ख़त्म करने या ख़तरे में डालने की साज़िश रची.
वैन में अपहरण
जसवंत सिंह खालड़ा को 6 सितंबर 1995 को अमृतसर के कबीर पार्क स्थित उनके घर से अगवा कर लिया गया था.
गवाह बने किरपाल सिंह रंधावा ने डीएसपी जसपाल सिंह, सुरिंदरपाल सिंह, जसबीर सिंह और सतनाम सिंह को अन्य अभियुक्तों के साथ जसवंत सिंह खालड़ा को सफेद रंग की वैन में कबीर पार्क से ले जाते हुए देखा था.
यूनिवर्सिटी में काम करने वाली जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर यह ख़बर मिलते ही घर पहुंच गईं.
उन्होंने उसी दिन पुलिस में शिकायत की कि उनके पति को पुलिस की वर्दी में कुछ व्यक्तियों ने अगवा कर लिया था. अगली सुबह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 365 के तहत अपहरण की एफ़आईआर दर्ज की गई.
हालांकि, जांच आगे नहीं बढ़ सकी और जसवंत सिंह खालड़ा का कोई पता नहीं चल सका.
जसवंत सिंह खालड़ा का सुराग देने वाले को 1 लाख रुपये के इनाम की घोषणा की गई. लेकिन इन सबके बावजूद उनका कुछ पता नहीं लग सका.
1995 में ही खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर (जिन्हें नहीं पता था कि उनके पति ज़िंदा हैं या नहीं) ने हैबियस कॉर्पस याचिका दायर कर अदालत का दरवाज़ा खटखटाया.
राज्य सरकार के खालड़ा के ठिकाने के बारे में कोई जानकारी न दिए जाने के कारण अदालत ने जांच सीबीआई को सौंप दी.
ड्रग केस के अभियुक्त ने देखा था
कुलवंत सिंह नाम के एक व्यक्ति ने सीबीआई को दिए अपने बयान में कहा कि उसे थाना झबाल पुलिस ने 4 सितंबर 1995 को एनडीपीएस एक्ट के तहत एक केस में हिरासत में लिया था.
उन्होंने बताया कि जसवंत सिंह खालड़ा को भी दो दिन बाद उसी थाने लाया गया था.
कुलवंत ने आगे कहा कि खालड़ा ने उसे बताया था कि उन्हें इस बात का कोई पता नहीं था कि एसएचओ सतनाम सिंह और डीएसपी जसपाल सिंह उन्हें थाने क्यों लेकर आए थे.
एक पुलिसकर्मी के बयान से पूरी बात आई सामने
कुलदीप सिंह, स्पेशल पुलिस अफ़सर (एसपीओ), इस केस में अहम गवाह बने. उन्हें थाना झबाल के एसएचओ सतनाम सिंह के साथ तैनात किया गया था.
कुलदीप सिंह ने सीबीआई को बताया कि जसवंत सिंह खालड़ा को थाना झबाल लाए जाने से लेकर उनकी मौत तक उनके साथ जो कुछ हुआ, उसकी उन्हें जानकारी थी.
पुलिस हिरासत में जसवंत सिंह खालड़ा को खाना खिलाना कुलदीप सिंह की ड्यूटी का एक हिस्सा था.
उन्हें इस संबंध में जानकारी गुप्त रखने के लिए कहा गया था. उन्होंने सीबीआई को बताया कि जसवंत सिंह खालड़ा की सेहत बहुत कमज़ोर और नाज़ुक हो गई थी.
एक दिन शाम को एसएसपी अजीत सिंह संधू, डीएसपी जसपाल सिंह अपने बॉडीगार्ड अरविंदर सिंह के साथ बिना रजिस्ट्रेशन नंबर वाली एक कार में आए.
कुछ देर बाद एसएचओ सतनाम सिंह, एसएचओ जसबीर सिंह और प्रिथीपाल सिंह दूसरी कार में आए.
वे सभी उस कमरे में चले गए, जहां खालड़ा को नज़रबंद किया गया था.
एसएसपी अजीत सिंह संधू ने उन्हें अपनी गतिविधियां बंद करने के लिए कहा. उन्होंने खालड़ा की पिटाई भी की.
इसके तीन दिन बाद एसएचओ सतनाम सिंह, जसवंत सिंह खालड़ा और कुलदीप सिंह को तरनतारन में एसएसपी अजीत सिंह संधू के घर ले गए.
वहां कुछ वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आए हुए थे. जसवंत सिंह खालड़ा से बंद कमरे में बातचीत की गई. फिर कुछ समय बाद खालड़ा को वापस थाना झबाल लाया गया.
'मैंने गोलियों की आवाज़ सुनी'
कुलदीप सिंह ने आगे बताया कि कुछ दिनों बाद एक शाम डीएसपी जसपाल सिंह और उनके बॉडीगार्ड अरविंदर सिंह वहां आए, फिर सुरिंदरपाल सिंह, जसबीर सिंह और प्रिथीपाल सिंह भी शामिल हो गए.
वे सभी उस कमरे में गए, जहां जसवंत सिंह खालड़ा को नज़रबंद किया गया था, और उन्हें पीटना शुरू कर दिया.
कुलदीप सिंह को गर्म पानी लाने के लिए कहा गया. जब वह इसका इंतज़ाम करने के लिए कमरे से बाहर निकले, तो उन्होंने दो गोलियां चलने की आवाज़ सुनी.
खालड़ा की मौत हो गई थी. उनकी लाश को वैन की डिक्की में रखा गया था, जबकि उनके शरीर से खून बह रहा था.
कुलदीप सिंह समेत ये सभी तीन कारों में सवार होकर गांव हरीके गए. जसवंत सिंह खालड़ा की लाश नहर में फेंक दी गई.
कुलदीप सिंह के मुताबिक, जब तक एसएसपी अजीत सिंह संधू ज़िंदा रहे, उन्होंने डर के कारण किसी को भी इस घटना के बारे में नहीं बताया.
कुलदीप सिंह की गवाही इस केस के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित हुई. हालांकि, अदालत ने कहा, "पुलिस द्वारा खालड़ा को हिरासत में लेने के बारे में दर्ज किए गए उनके बयान की पुष्टि पुलिस स्टेशन के रिकॉर्ड, पुलिस वाहनों की लॉग बुक समेत किसी भी स्रोत से नहीं हुई."
अदालत ने टिप्पणी की, "उस स्थान के किसी भी कर्मचारी या व्यक्ति, जहां खालड़ा को हिरासत में रखा गया था, या उस गेस्ट हाउस से, जहां उनकी लाश को नहर में फेंकने से पहले ले जाया गया था, कुलदीप सिंह की गवाही की पुष्टि के लिए जांच नहीं की गई."
7 साल की सज़ा उम्रकैद में बदली
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, पटियाला ने नवंबर 2005 में सभी अपीलकर्ताओं और कुछ अन्य अभियुक्तों को धारा 364/34 आईपीसी के तहत अपहरण का दोषी ठहराते हुए सात साल की सज़ा सुनाई थी.
अदालत ने डीएसपी जसपाल सिंह और अमरजीत सिंह को धारा 302/34 आईपीसी और धारा 201/34 आईपीसी के तहत हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी.
मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया. खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर ने चार अभियुक्तों की सज़ा बढ़ाने की अपील की, जिन्हें सात साल की सज़ा हुई थी.
2007 में हाईकोर्ट ने अमरजीत सिंह को बरी कर दिया था. हालांकि, कोर्ट ने बाक़ी चारों अभियुक्तों-सतनाम सिंह, सुरिंदरपाल सिंह, जसबीर सिंह और प्रिथीपाल सिंह-की सज़ा सात साल से बढ़ाकर उम्रकैद कर दी.
पंजाब पुलिस की 'मिलीभगत'
2011 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला पंजाब पुलिस के उच्च अधिकारियों के ध्यान में लाए जाने के बावजूद भी कोई कार्रवाई नहीं की गई.
सीबीआई ने यहां तक कहा कि जब तक मामले में शामिल कुछ पुलिस अधिकारियों का अमृतसर और तरनतारन जिलों से बाहर तबादला नहीं किया जाता, तब तक जांच को निष्पक्ष रूप से करना संभव नहीं था.
अदालत ने पुलिस प्रमुख को आदेश दिया था कि उन अधिकारियों के तबादले उन जिलों से बाहर किए जाएं और साथ ही उन्हें आसपास के जिलों में भी तैनात न किया जाए.
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस के बारे में यह टिप्पणी की, "इस केस की जांच सीबीआई को सौंपे जाने के बावजूद, पंजाब पुलिस के अधिकारियों ने सीबीआई को सहयोग नहीं दिया और जांच में उचित सहयोग नहीं किया."
"पंजाब के पुलिस अधिकारी एक नापाक गठजोड़ में एकजुट हो गए क्योंकि उनके साथी शामिल थे और यह मामला पंजाब पुलिस की छवि को खराब करने वाला था. गवाहों ने सीबीआई के सामने अपने बयानों में पुलिस अधिकारियों के नाम लिए और अदालत में अभियुक्तों की पहचान की."
पुलिस ने 2000 से अधिक लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार किया
पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अदालत ने सीबीआई को ऐसे घृणित अपराधों के लिए आपराधिक केस दर्ज करने के आदेश दिए.
अदालत ने जांच की निगरानी की. 1996 में सीबीआई ने अदालत को बताया कि 2097 लाशों के अज्ञात अंतिम संस्कार किए गए थे.
अदालत के समय-समय पर दिए गए उपरोक्त आदेशों और वर्षों तक मिलकर इस केस की निगरानी करने के मद्देनज़र सीबीआई की जांच पूरी की गई.
1996 में सीबीआई ने पटियाला की एक अदालत में नौ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की, जिसमें मुख्य अभियुक्त अजीत सिंह संधू थे, जो तरनतारन ज़िले के तत्कालीन एसएसपी थे.
इनमें अशोक कुमार, सतनाम सिंह, रछपाल सिंह, जसबीर सिंह, अमरजीत सिंह, सुरिंदरपाल सिंह, प्रिथीपाल सिंह और डीएसपी जसपाल सिंह शामिल थे.
एसएसपी अजीत सिंह संधू के खिलाफ आरोप तय नहीं किए जा सके क्योंकि आरोप तय होने से पहले ही उन्होंने ख़ुदकुशी कर ली थी.
आरोप यह थे कि ये सभी जसवंत सिंह खालड़ा को अगवा कर खत्म करने की साज़िश में शामिल थे. इस तरह उन पर धारा 120-बी आईपीसी, धारा 364 के साथ-साथ 34 आईपीसी लगाई गई.
इनमें से तीन डीएसपी जसपाल सिंह, अमरजीत सिंह और रछपाल सिंह ने आपराधिक साज़िश के परिणामस्वरूप खालड़ा की हत्या की थी.
Questions ouvertes
- फिल्म 'सतलुज' को फिर से कब रिलीज़ किया जाएगा?
- क्या पुलिस के सभी दोषी अधिकारियों को सज़ा मिली?


