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Retour36 साल बाद कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट हत्या मामले में चार्जशीट, परिवार बोला- अब कोई मतलब नहीं
36 साल बाद कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट हत्या मामले में चार्जशीट, परिवार बोला- अब कोई मतलब नहीं
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BBC हिंदी02/07/2026Politique4 min de lectureIndia

36 साल बाद कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट हत्या मामले में चार्जशीट, परिवार बोला- अब कोई मतलब नहीं

L'essentiel

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने 36 साल पुराने कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट की हत्या के मामले में चार्जशीट दायर की है। परिवार का कहना है कि इतनी देरी से न्याय का कोई मतलब नहीं रह गया है। पुलिस ने जेकेएलएफ़ के चरमपंथियों पर अपहरण और हत्या का आरोप लगाया है।

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Author, जहांगीर अली

पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर से

प्रकाशित 3 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 6 मिनट

कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट की हत्या का मामला 36 साल बाद एक बार फिर सुर्ख़ियों में है. दरअसल इस मामले में जम्मू-कश्मीर पुलिस की ओर से चार्जशीट दाख़िल की गई है.

लेकिन परिवारवालों का कहना है कि इस चार्जशीट का उनके बुजुर्ग माता-पिता के लिए अब "कोई मतलब नहीं" है.

सरला की मौसी के बेटे प्रेदिमन कृष्ण भट्ट ने बताया, "उन्हें 36 साल तक न्याय नहीं मिला, तो अब उनके लिए इस प्रक्रिया का कोई मतलब नहीं है."

उन्होंने यह भी कहा, "एक कहावत है कि न्याय में देरी का मतलब न्याय न मिलना है. चार्जशीट से शायद उम्मीद की एक किरण जगी तो है कि सरला के क़ातिलों को सज़ा मिलेगी, लेकिन उनके माता-पिता को न्याय नहीं मिला. अगर उनकी आत्मा को अब शांति मिल जाए, जैसा कि हमारे (हिंदू) धर्म में माना जाता है, तो यही काफ़ी होगा."

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने सोमवार को एक प्रेस नोट जारी करके बताया है कि इस मामले में एंटी-टेररिज्म कोर्ट में 737 पन्नों की चार्जशीट दायर की गई है. जिसमें कहा गया है कि भट्ट का अपहरण प्रतिबंधित संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ़) के चरमपंथियों ने किया था.

पुलिस ने अपने बयान में कहा है कि सरला भट्ट को प्रताड़ित किया गया और बाद में मार डाला गया. पुलिस के मुताबिक यह "कश्मीरी पंडितों के ख़िलाफ़ टारगेटेड हिंसा के एक व्यवस्थित अभियान का हिस्सा था, जिसका मकसद दहशत फैलाना और उन्हें कश्मीर घाटी से जबरन पलायन के लिए मजबूर करना था."

पुलिस का मानना है कि तब भारतीय प्रशासन वाले कश्मीर के रहने वाले खुर्शीद अहमद चालकू ने भट्ट पर गोली चलाई थी. चालकू के बारे में स्थानीय पुलिस का कहना है कि वारदात के बाद वे पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर भाग गए.

पुलिस ने इस मामले में तीन अन्य अभियुक्तों- अब्दुल हामिद शेख़, मोहम्मद यूसुफ़ सूफ़ी और गुलाम मोहम्मद टपलू- का नाम लिया है, ये तीनों अब जीवित नहीं हैं.

अपहरण और हत्या

27 वर्षीय सरला, दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में रहने वाले स्कूल हेडमास्टर शंभू नाथ भट्ट के चार बच्चों में सबसे बड़ी थीं. भट्ट श्रीनगर में शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस (एसकेआईएमएस) के नियोनेटोलॉजी विभाग में नर्स के तौर पर काम कर रही थीं.

उनके मौसरे भाई ने बीबीसी को बताया कि कश्मीर में उग्रवाद के चरम पर होने के दौरान अपने समुदाय को मिल रही धमकियों के बावजूद वह अस्पताल में ड्यूटी पर जाती रहीं.

18 अप्रैल 1990 को एसकेआईएमएस के हब्बा खातून हॉस्टल से सरला का अपहरण कर लिया गया. आरोपों के मुताबिक जेकेएलएफ़ के चरमपंथियों ने एक वैन के ज़रिए उन्हें अगवा कर लिया.

इसके अगले दिन, लाल बाज़ार के मल्ला बाग-उमर कॉलोनी रोड से गोलियों से छलनी उनका शव बरामद किया गया.

पुलिस के बयान के मुताबिक जेकेएलएफ़ ने इस हत्या की ज़िम्मेदारी ली थी. यह बात हाथ से लिखे एक नोट से पता चली, जो भट्ट के शव के पास मिला था.

इस नोट में उन्हें सुरक्षा बलों का "मुखबिर" बताया गया था. साथ ही, उन पर सुरक्षा बलों को जानकारी देने का आरोप लगाया गया था जिसके कारण 8 अप्रैल 1990 को श्रीनगर के नरवारा इलाके में छापेमारी हुई थी.

उस छापेमारी के दौरान जेकेएलएफ़ प्रमुख यासीन मलिक (जो अभी आतंकवाद के आरोपों में तिहाड़ जेल में बंद हैं) घायल होने के बावजूद भागने में सफल रहे थे जबकि संगठन के कुछ चरमपंथियों को पकड़ लिया गया था.

हत्या के बाद के दिन

श्रीनगर के रहने वाले भट्ट ने बताया कि उन्हें अपनी कज़िन की हत्या के बारे में पहली जानकारी बीबीसी के ब्रॉडकास्ट से ही मिली थी. 1990 के दशक में बीबीसी हिन्दी और बीबीसी उर्दू के रेडियो प्रसारण कश्मीर घाटी में सुने जाते थे.

जानकारी मिलने के बाद जब भट्ट अनंतनाग पहुँचे, तो सरला का अंतिम संस्कार हो चुका था.

शाम को उन्हें और दूसरे रिश्तेदारों को सरला की अस्थियाँ लेने के लिए श्मशान घाट भेजा गया. उन्होंने बताया कि जब वे वहाँ पहुँचे, तो घाट पर करीब 150-200 लोग मौजूद थे.

उन्होंने कहा, "वह हमें गालियाँ देने लगे और मज़ाक उड़ाया, पूछा कि हम कश्मीर से भाग क्यों नहीं गए. मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की. इसके बजाय उन्होंने अस्थियों को पैरों से रौंद दिया. मैंने जल्दी से मुट्ठी भर अस्थियाँ (राख) उठाईं और वहाँ से भाग निकला."

भट्ट ये भी दावा करते हैं कि पीड़ित परिवार के अनंतनाग वाले घर पर ग्रेनेड फेंका गया, जो मुख्य गेट के पास फटा.

उन्होंने ये बताया, "पुलिस हमारी मदद के लिए नहीं आई. किसी तरह हमने हिम्मत जुटाई और सड़क तक पहुँचे. (अनंतनाग में) महिला डिग्री कॉलेज के पास सेना के कुछ जवान थे. उन्होंने अंकल, आंटी और मेरे एक कज़िन को खानाबल पहुँचने में मदद की, जहाँ से वे जम्मू चले गए."

जीवन भर का दुख

सरला के बीमार माता-पिता की उम्र अब 90 साल के करीब है, जम्मू के मुट्ठी इलाके में रहते हैं. दोनों अक्सर बीमार रहते हैं. सरला के बाक़ी तीन भाई बहनों की शादी हो चुकी है. दो भाइयों में से एक, रमेश कुमार भट्ट हाल ही में शिक्षा विभाग से रिटायर हुए हैं.

साथ बिताए समय को याद करते हुए भट्ट ने बताया कि सरला ने शादी नहीं की थी, जबकि सरला की छोटी बहन की शादी 1989 में हो गई थी - यानी उनकी मौत से एक साल पहले.

वे बताते हैं, "शादी उनके मन में नहीं थी. उन्हें बस अपने माता-पिता और भाई-बहनों की देखभाल करने में दिलचस्पी थी. अब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि उनका फ़ैसला सही था. अगर उन्होंने शादी की होती तो इस त्रासदी की वजह से और भी लोग दुखी होते."

भट्ट ने यह भी बताया, "उनके माता-पिता अब चुप हो गए हैं और ज़िंदा लाश बन गए हैं. उन्होंने अपनी प्यारी बेटी को बहुत ही बर्बर तरीक़े से खोने का दर्द सहा है."

जांच में देरी क्यों हुई?

जम्मू-कश्मीर पुलिस की स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी ने 18 मार्च, 2024 को यह केस अपने हाथ में लिया और श्रीनगर की एक अदालत में दलील दी कि पिछले तीन दशकों से ज़्यादा समय की हिंसा से जांच पर "बुरा असर" पड़ा है.

एजेंसी ने अदालत को बताया कि कश्मीर में "आतंकवादी संगठनों द्वारा पैदा किए गए डर और धमकी के माहौल" का "गवाहों के सामने आने की क्षमता" पर बुरा असर पड़ा.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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