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अमेरिका-ईरान समझौता: शांति की राह में फिर अड़चनें
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अमेरिका-ईरान समझौता: शांति की राह में फिर अड़चनें

L'essentiel

अमेरिका और ईरान के बीच तीन सप्ताह पहले हुआ युद्धविराम समझौता भंग हो गया है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर सीज़फ़ायर का पालन न करने का आरोप लगा रहे हैं, जिससे मध्य पूर्व में तनाव फिर बढ़ गया है।

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अमेरिका और ईरान के बीच तीन सप्ताह पहले एक समझौता हुआ था जिसका उद्देश्य मध्य पूर्व संकट से बाहर निकलना, होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलना और स्थायी शांति स्थापित करना था।

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अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौते के बाद जंग रुक गया, लेकिन स्थायी शांति स्थापित होने से पहले ही दोनों के बीच संघर्ष फिर शुरू हो गया.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तुर्की में कहा कि 'सीज़फ़ायर समाप्त' हो गया है. इस बयान के बाद यह आशंका और बढ़ गई कि केवल तीन सप्ताह पहले शुरू हुई बातचीत की प्रक्रिया बहुत जल्दी ख़त्म हो सकती है.

इस दौरान दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर सीज़फ़ायर का पूरी तरह पालन नहीं करने का आरोप लगाया और बीच-बीच में गोलीबारी की घटनाएं भी सामने आईं.

अब हमले फिर उसी स्तर पर शुरू हो गए हैं, जैसा दोनों देशों के बीच समझौते पर हस्ताक्षर के पहले हो रहे थे.

ईरान और अमेरिका के बीच हुआ समझौता मध्य पूर्व संकट से बाहर निकलने का रास्ता माना जा रहा था.

इसका मक़सद होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलना, ऊर्जा बाजार पर दबाव कम करना और 60 दिन के अंदर एक स्थायी समझौते तक पहुंचने के लिए बातचीत करना था.

लेकिन इस दौरान फ़ारस की खाड़ी में सैन्य टकराव जारी रहे, जहाज़ों के आवागमन के रास्तों को लेकर विवाद बढ़ा, लेबनान को लेकर तनाव गहराया और दोनों पक्ष अपने-अपने वादों को लेकर नए विवाद में उलझ गए.

समझौते पर हस्ताक्षर करने के समय से ही कई विश्लेषकों का कहना था कि यह दस्तावेज़ उन प्रमुख मतभेदों को दूर नहीं कर पाया, जिनकी वजह से जंग की शुरुआत हुई थी.

ब्रिटेन के रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट (आरयूएसआई) ने 19 जून को प्रकाशित एक विश्लेषण में कहा था कि यह समझौता भले ही ऊर्जा बाज़ार पर तत्काल दबाव कम कर सकता है, लेकिन सबसे जटिल विवादों को टालने वाला है.

शायद यही बात आज के हालात का सबसे सटीक सार है.

अलग-अलग व्याख्याएं और दोनों देशों के अधिकारियों के विरोधाभासी बयान बताते हैं कि ईरान और अमेरिका एमओयू के अर्थ को लेकर भी बुनियादी मतभेद रखते हैं.

थिंक टैंक चैथम हाउस ने 19 जून को प्रकाशित अपने विश्लेषण में कहा कि होर्मुज़ स्ट्रेट को लेकर ईरान और अमेरिका के बीच हुए समझौते में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, जिनकी अलग-अलग व्याख्या की जा सकती है.

समझौते के दस्तावेज़ में कहा गया है कि ईरान 60 दिनों तक जहाज़ों से कोई शुल्क या आने-जाने पर कोई शुल्क नहीं लेगा और व्यापारिक जहाज़ों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए 'अपना सर्वोत्तम प्रयास' करेगा.

लेकिन इस अवधि के बाद कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर स्थिति साफ़ नहीं है.

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के शोधकर्ता हमीदरेज़ा अज़ीज़ी ने बीबीसी फ़ारसी से बातचीत में कहा, "ईरान मानता है कि होर्मुज़ स्ट्रेट का प्रबंधन उसके ही नियंत्रण में रहेगा. और उसने केवल 60 दिनों तक शुल्क नहीं लेने की रियायत दी है, न कि जहाज़ों की आवाजाही की व्यवस्था तय करने में अपनी भूमिका छोड़ी है."

"दूसरी ओर अमेरिका मानता है कि इस अवधि में जहाज़ों की आवाजाही पूरी तरह बिना किसी प्रतिबंध के होनी चाहिए और होर्मुज़ तक पहुंचने वाले मार्ग, ईरान की मंज़ूरी पर निर्भर नहीं होने चाहिए. यह अंतर व्यवहार में विवाद का रूप ले चुका है."

लेकिन मतभेद केवल इसी मुद्दे तक सीमित नहीं है.

इस बारे में अज़ीज़ी कहते हैं, "ईरान का मानना है कि समझौते में लेबनान के मुद्दे के समाधान में उसकी भूमिका स्वीकार की गई है. जबकि अमेरिका का जोर केवल लेबनान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर है, न कि भविष्य की राजनीतिक प्रक्रिया में ईरान के लिए कोई ख़ास भूमिका स्वीकार करने पर."

समस्या यह है कि यही दस्तावेज़ अंतिम वार्ता की आधारशिला भी बनने वाला है. इसलिए इसकी हर धारा आगे की बातचीत में दबाव बनाने के एक साधन के रूप में इस्तेमाल हो सकती है.

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज (आईआईएसएस) ने 26 जून को प्रकाशित अपने विश्लेषण में लिखा कि खाड़ी के अरब देशों ने सार्वजनिक रूप से ईरान और अमेरिका के बीच हुए समझौते का समर्थन किया है.

आईआईएसएस के मुताबिक़, "वे नहीं चाहते कि युद्ध फिर भड़क उठे. लेकिन साथ ही इस समझौते ने कई अहम सवालों को छोड़ दिया है. इनमें फ़ारस की खाड़ी की भविष्य की सुरक्षा व्यवस्था, ईरान की भूमिका और समझौते के लागू होने में अरब देशों की स्थिति शामिल है."

फ़िलहाल होर्मुज़ स्ट्रेट, लेबनान और यहां तक कि निवेश से जुड़े मुद्दों पर जो स्थिति दिखाई दे रही है, वह बताती है कि दोनों देश युद्ध के बाद बनने वाली नई व्यवस्था को आकार देने की होड़ में हैं.

यही व्यवस्था आने वाले सालों में दोनों देशों की भूमिका, प्रभाव और रणनीतिक बढ़त तय करेगी.

हमीदरेज़ा अज़ीज़ी भी मौजूदा हालात को इसी नज़रिये से देखते हैं.

उनके अनुसार, "60 दिन की अवधि केवल समझौते को लागू करने का समय नहीं है, बल्कि बातचीत में अपनी स्थिति मजबूत करने की होड़ का दौर भी है."

वो कहते हैं, "दोनों पक्ष अंतिम समझौते से पहले बढ़त हासिल करना चाहते हैं. अमेरिका ईरान के प्रभाव को सीमित करना चाहता है, जबकि ईरान अपने लाभ को स्थायी रूप देना चाहता है."

"अमेरिका होर्मुज़ के दक्षिणी हिस्से में वैकल्पिक समुद्री मार्ग विकसित करना और लेबनान सरकार और इसराइल के बीच समझौता कराना चाहता है. दूसरी ओर ईरान समझौते और जंग से मिले अपने रणनीतिक लाभों को स्थायी बनाना चाहता है."

दोनों पक्षों के बीच असली मतभेद इस बात को लेकर है कि युद्ध का नतीजा क्या रहा और समझौते के आधार पर किस पक्ष को कौन से अधिकार मिले.

होर्मुज़ स्ट्रेट इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है. ओमान के सहयोग से अमेरिका दक्षिणी समुद्री मार्ग को ईरान के पसंद वाले मार्ग के विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहता है. जिससे आवाजाही के लिए ईरान पर कम निर्भरता हो.

अज़ीज़ी कहते हैं, "ईरान के लिए असली मुद्दा शुल्क नहीं है. वह चाहता है कि समुद्री मार्ग के प्रबंधन में उसकी प्रमुख भूमिका स्वीकार की जाए."

"अगर ईरान की सहमति के बिना वैकल्पिक मार्ग स्थायी रूप से स्थापित हो जाता है, तो वह इसे अपनी एक अहम रणनीतिक बढ़त के ख़त्म होने के रूप में देखेगा."

उनका कहना है, "अमेरिका, इसराइल और लेबनान सरकार की साझा रुचि यह है कि ईरान समझौते का इस्तेमाल हिज़्बुल्लाह या अपनी क्षेत्रीय भूमिका को मजबूत करने के लिए न कर सके."

एमओयू में लेबनान का ज़िक्र कई विश्लेषकों की नज़र में ईरान के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया.

लेकिन दूसरी ओर अमेरिका ने समानांतर कूटनीतिक प्रयासों के जरिए इस प्रभाव को कम करने की कोशिश की.

ईरान का मानना है कि लेबनान और इसराइल के बीच तेज होती बातचीत, ईरान की भूमिका को दरकिनार करने का प्रयास हो सकती है.

इसराइल के इंस्टीट्यूट फ़ॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज़ (आईएनएसएस) ने 22 जून के अपने विश्लेषण में लिखा कि यह दस्तावेज़ कोई नया परमाणु समझौता नहीं है, बल्कि युद्ध रोकने, होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलने और कठिन मुद्दों को बाद के लिए टालने का एक अस्थायी ढांचा है.

विश्लेषण में यह भी कहा गया, "समझौते में मौजूद अस्पष्ट बातें ईरान को अपनी क्षेत्रीय स्थिति फिर से मजबूत करने का अवसर दे सकती हैं."

इसलिए ऐसा लगता है कि समझौते के दायरे को सीमित करने के लिए अमेरिका का दबाव केवल ईरान पर अविश्वास का नतीजा नहीं है.

संभव है कि इसके पीछे अमेरिका के क्षेत्रीय सहयोगियों और उन देशों की चिंताएं भी हों, जिन्हें आशंका है कि ईरान और अमेरिका के बीच हुआ समझौता क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था में ईरान की भूमिका को और मजबूत कर सकता है.

माना जा रहा था कि यह समझौता ईरान के लिए आर्थिक लाभ लेकर आएगा. इनमें निवेश और आर्थिक पुनर्निर्माण से जुड़े प्रावधान शामिल थे, जिनमें खाड़ी के देशों की भागीदारी की उम्मीद की जा रही थी.

लेकिन जल्द ही स्पष्ट हो गया कि आर्थिक प्रोत्साहन भी राजनीतिक और सुरक्षा से जुड़े होड़ से अलग नहीं रहेंगे.

'द सूफान सेंटर' ने 18 जून के अपने विश्लेषण में लिखा, "इस समझौते में ईरान के पुनर्निर्माण और विकास के लिए खाड़ी के अरब देशों के निवेश को अमेरिका का समर्थन है. हालांकि खाड़ी के देशों के नेता तभी इस दिशा में आगे बढ़ेंगे, जब उन्हें अधिक स्पष्ट शर्तें और ठोस भरोसा मिलेगा."

हमीदरेज़ा अज़ीज़ी कहते हैं, "यहीं अमेरिका आर्थिक प्रोत्साहनों का इस्तेमाल उन रियायतों के लिए करना चाहता है, शुरुआती समझौते में जिनका स्पष्ट ज़िक्र नहीं था. इनमें ईरान का मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रम, और क्षेत्र में उसके समर्थक समूहों का व्यवहार शामिल है."

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने खाड़ी देशों की अपनी यात्रा के दौरान कहा कि ईरान में संयुक्त निवेश तभी संभव होगा, जब वह अपने मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों पर कदम उठाए और क्षेत्रीय नीति में बदलाव करे.

ये शर्तें शुरुआती समझौते के दस्तावेज में कहीं शामिल नहीं थीं.

दोनों पक्षों के बीच बातचीत के दरवाज़े अभी पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं, लेकिन दोनों ही एक साथ एक-दूसरे की परीक्षा भी ले रहे हैं.

शिकागो विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर रॉबर्ट पेप इस स्थिति को 'तनाव बढ़ने का जाल' कहते हैं.

उनके अनुसार, "यह ऐसी स्थिति है, जिसमें एक पक्ष का सीमित कदम दूसरे पक्ष को भी सीमित जवाबी कार्रवाई के लिए उकसाता है."

"इसमें शायद कोई भी पक्ष पूर्ण युद्ध नहीं चाहता, लेकिन दोनों धीरे-धीरे उसी दिशा में बढ़ सकते हैं. इस प्रवृत्ति के संकेत दोनों पक्षों के व्यवहार में दिखाई देते हैं."

रॉबर्ट पेप बीबीसी फ़ारसी से कहा, "इस युद्ध के बाद ईरान पहले से अधिक मजबूत होकर उभरा और क्षेत्र में शक्ति संतुलन बदल गया. ईरान समझौते के दस्तावेज में लगभग वे सभी बातें शामिल कराने में सफल रहा, जो वह चाहता था."

उनके अनुसार, "समस्या यह है कि डोनाल्ड ट्रंप अपनी रणनीतिक नाकामी को स्वीकार नहीं करना चाहते."

"होर्मुज़ का मुद्दा ईरान के लिए केवल आय का स्रोत नहीं है. वह कोई क़ीमत लेकर होर्मुज़ से पीछे नहीं हटने वाला है. ईरान के लिए होर्मुज़ स्ट्रेट युद्ध के बाद की सुरक्षा और रणनीतिक व्यवस्था का एक बुनियादी हिस्सा है."

मौजूदा स्थिति को शायद एक वाक्य में इस तरह समझा जा सकता है- 'न पूरी शांति, न पूरा युद्ध.'

अगर आज क्षेत्र का नक्शा देखा जाए, तो ऐसा लगता है कि युद्ध की आग भले ही धीमी पड़ गई हो, लेकिन जिन कारणों से यह संघर्ष शुरू हुआ था, उनमें से लगभग सभी कारक अभी भी मौजूद हैं.

यही वह स्थिति है, जिसके बारे में कई विश्लेषक पहले से चेतावनी देते रहे हैं. इससे न स्थायी शांति स्थापित हुई और न ही युद्ध पूरी तरह समाप्त हुआ.

हाल के दिनों में संघर्ष की आग फिर भड़क उठी है, जबकि दोनों पक्षों के मूल मतभेद अब भी जस के तस बने हुए हैं.

फिर दोनों पक्षों के बीच असली प्रतिस्पर्धा जंग के बाद बनने वाली नई क्षेत्रीय व्यवस्था और उस समझौते की व्याख्या को लेकर है.

À surveiller

Perspective IA — des possibilités, pas des certitudes

  • दोनों पक्षों के बीच बातचीत में और अधिक तनाव बढ़ेगा।

    Probable · En quelques semaines

  • होर्मुज़ स्ट्रेट पर संघर्ष फिर से भड़क सकता है।

    Possible · En quelques mois

Questions ouvertes

  • क्या दोनों पक्ष फिर से बातचीत करेंगे?
  • समझौते के उल्लंघन के लिए कौन जिम्मेदार है?
  • क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था का भविष्य क्या होगा?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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