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महाराष्ट्र: तीन साल की बच्ची के रेप और हत्या के अभियुक्त को कोर्ट ने 50 दिन में सुनवाई पूरी करके सुनाई फांसी की सज़ा
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महाराष्ट्र: तीन साल की बच्ची के रेप और हत्या के अभियुक्त को कोर्ट ने 50 दिन में सुनवाई पूरी करके सुनाई फांसी की सज़ा

L'essentiel

पुणे की विशेष अदालत ने साढ़े तीन साल की बच्ची से बलात्कार और हत्या के 65 वर्षीय अभियुक्त भीमराव प्रभाकर कांबले को 50 दिन में सुनवाई पूरी कर फांसी की सज़ा सुनाई। अदालत ने इसे 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' मामला मानते हुए अभियुक्त के क्रूर आचरण और पश्चाताप की कमी को सज़ा का आधार बताया।

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पुणे की विशेष अदालत ने साढ़े तीन साल की बच्ची से बलात्कार और हत्या के 65 वर्षीय अभियुक्त भीमराव प्रभाकर कांबले को 50 दिन में सुनवाई पूरी कर फांसी की सज़ा सुनाई। अदालत ने अपराध की क्रूरता और अभियुक्त के पश्चाताप की कमी को देखते हुए इसे 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' मामला माना।

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पुणे ज़िले में साढ़े तीन साल की बच्ची से बलात्कार और हत्या के मामले में विशेष अदालत ने 65 वर्षीय भीमराव प्रभाकर कांबले को दोषी ठहराते हुए फांसी की सज़ा सुनाई है।

विशेष न्यायाधीश एसआर सालुंके ने यह फ़ैसला सुनाया।

इस मामले की सुनवाई 25 जून को पूरी हुई थी। उस समय अदालत ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा था कि अभियुक्त दोषी है। पुणे की विशेष अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा कि अभियुक्त ने बलात्कार और हत्या दोनों अपराध किए हैं।

यह फ़ैसला राज्य के सबसे तेज़ी से सुने और निपटाए गए मामलों में से एक बन गया है।

अदालत ने क्या कहा?

फ़ैसला पढ़ते हुए जज सालुंके ने कहा, "सज़ा के मुद्दे पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने सज़ा कम करने वाली परिस्थितियों पर विचार किया। अधिवक्ता अजय मिसर ने तर्क दिया कि इस मामले में मृत्युदंड दिया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने विभिन्न मामलों के 12 न्यायिक संदर्भ दिए।"

अदालत ने शंकर खड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का भी हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड के बजाय आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी।

अदालत ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड देते समय विचार किए जाने वाले कुछ मानदंड तय किए हैं।"

"इनमें अपराध का अत्यंत क्रूर होना, अपराध का न्यायिक चेतना को झकझोर देना, अभियुक्त का समाज के लिए स्थायी ख़तरा होना, पीड़ित का पूरी तरह असहाय होना और अपराध बिना किसी उकसावे के किया जाना शामिल है। इस मामले में ये सभी मानदंड लागू होते हैं।"

अदालत ने कहा, "अभियुक्त के पक्ष में ऐसा कोई भी तर्क नहीं है, जिसके आधार पर सज़ा में उदारता दिखाई जाए। अगर ऐसा होता तो मृत्युदंड से राहत मिल सकती थी। इस मामले की जांच 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' केस के आधार पर की जानी चाहिए।"

अदालत ने कहा, "वादी पक्ष की ओर से सरकार की सहायता कर रहे अधिवक्ता विपुल दुशिंग ने दो फ़ैसलों का हवाला दिया।"

पहला फ़ैसला 'वसंत दुपारे बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले का था। इस मामले में 47 वर्षीय व्यक्ति ने चार साल की बच्ची से बलात्कार कर उसकी हत्या की थी।

दूसरा संदर्भ 'हिम्मतराव सूर्यवंशी' मामले का दिया गया।

इस मामले में एक नाबालिग लड़के का अपहरण कर उसके साथ यौन उत्पीड़न किया गया था। इसमें अभियुक्त को मृत्युदंड सुनाया गया था।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि को बरक़रार रखते हुए मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया था।

लेकिन अदालत ने कहा कि सूर्यवंशी मामले का फ़ैसला यहाँ लागू नहीं होता, क्योंकि इस मामले में अभियुक्त को बच्ची के साथ देखा गया था और वह इसका संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सका।

मृत्युदंड देते समय अदालत ने क्या कारण बताए?

अदालत ने कहा कि पहले पेश किए गए साक्ष्यों के आधार पर इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह अपराध अकेले अभियुक्त ने ही किया।

हालांकि पॉक्सो क़ानून में 'जघन्य अपराध' की अलग परिभाषा नहीं है, लेकिन अदालत ने कहा कि जिन अपराधों में सात साल या उससे अधिक की सज़ा का प्रावधान है, उन्हें जघन्य माना जाता है।

अदालत ने कहा कि अपराध की गंभीरता इस बात से और बढ़ जाती है कि यह अपराध केवल तीन साल की बच्ची के ख़िलाफ़ किया गया।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट अपराध की क्रूरता को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। यह भी साबित करती है कि अभियुक्त पर मृत्युदंड के मानदंड लागू होते हैं।

अदालत ने कहा कि अपराध का मक़सद वासना की पूर्ति था।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और 'लास्ट सीन' के साक्ष्य अपराध की गंभीरता साबित करने के लिए पर्याप्त हैं।

चूंकि पीड़िता केवल तीन साल की थी और अभियुक्त ने उसके जीवित बचने की कोई संभावना नहीं छोड़ी, इसलिए यह मानदंड भी पूरा होता है।

अदालत ने आगे दो सवाल उठाए।

पहला, क्या इस मामले में ऐसी असाधारण परिस्थितियां हैं, जिनके कारण उम्र क़ैद अपर्याप्त मानी जाए।

इसके जवाब में अदालत ने कहा कि इस अपराध में कई असाधारण और गंभीर परिस्थितियां मौजूद हैं।

अदालत ने यह भी कहा कि अभियुक्त ने बच्ची की मौत के बाद भी उसके साथ यौन उत्पीड़न किया।

दूसरा सवाल था कि क्या मृत्युदंड के अलावा कोई दूसरा विकल्प मौजूद है।

अदालत ने कहा कि अभियुक्त के पक्ष में ऐसी कोई परिस्थिति पेश नहीं की गई, जिससे सज़ा में कमी की जा सके।

अदालत की ओर से कई अवसर दिए जाने के बावजूद अभियुक्त की ओर से कोई ऐसा साक्ष्य पेश नहीं किया गया।

अभियुक्त के परिवार के सदस्य भी उसके पक्ष में कुछ रखने के लिए सामने नहीं आए।

अदालत ने कहा कि शंकर खड़े मामले में तय अंतिम मानदंड भी इस मामले में लागू होते हैं।

यह अपराध अत्यंत क्रूर प्रकृति का है और इससे समाज में गहरा आक्रोश और घृणा पैदा हुई है।

इस अपराध ने अदालत की अंतरात्मा को भी झकझोर दिया है और अभियुक्त समाज के लिए एक ख़तरनाक व्यक्ति साबित होता है।

अदालत ने कहा कि यह अपराध बिना किसी उकसावे के किया गया।

सज़ा तय करते समय अभियुक्त के पिछले रिकॉर्ड पर भी विचार किया गया।

एक पुराने मामले में अभियोजन पक्ष की जांच में खामियों के कारण अभियुक्त बरी हो गया था।

इसके अलावा एक बुज़ुर्ग व्यक्ति ने गवाही दी थी कि 1996 में अभियुक्त ने एक बकरी के साथ यौन संबंध बनाने की कोशिश की थी।

अदालत ने यह भी नोट किया कि अभियुक्त ने अपने कृत्य पर कोई पछतावा नहीं दिखाया।

'अदालत को जनभावनाओं का सम्मान करना चाहिए, लेकिन...'

अदालत ने कहा, "निर्भया मामले के बाद यह अपेक्षा की गई थी कि ऐसे अपराधों से जुड़े मामलों का तेज़ी से निपटारा होगा। लेकिन वास्तविकता में ऐसा नहीं हुआ।"

अदालत ने कहा कि इसके बाद कठुआ और उन्नाव जैसी घटनाएं भी हुईं।

इन्हीं घटनाओं की पृष्ठभूमि में विधायिका ने 2018 में आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम लागू किया।

अदालत ने कहा, "अदालत को जनता की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। लेकिन जनभावना अदालत की निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करनी चाहिए।"

"किसी भी व्यक्ति को क़ानून की प्रक्रिया से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।"

अदालत ने कहा कि जांच में देरी या पर्याप्त सबूतों की कमी जनता के ग़ुस्से का बड़ा कारण बनती जा रही है।

अदालत ने कहा, "ज़्यादातर मामलों में चार्जशीट अदालत में दाखिल होने के बाद जांच एजेंसियां मान लेती हैं कि उनकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो गई।"

"जब तक चार्जशीट पर सुनवाई शुरू होती है, तब तक संबंधित अधिकारियों का तबादला हो चुका होता है।"

"इस बीच कुछ गवाहों की मृत्यु हो जाती है, जबकि अन्य को अपनी याददाश्त के भरोसे रहना पड़ता है।"

"लेकिन समय के साथ याददाश्त भी कमज़ोर पड़ जाती है।"

अदालत ने कहा, "अगर लोग ख़ुद क़ानून हाथ में लेना शुरू कर दें, तो यह अराजकता की शुरुआत है।"

अदालत ने कहा कि लोगों के बीच यह धारणा तेज़ी से बढ़ रही है कि क़ानून लागू करने वाली एजेंसियां अपनी जांच संबंधी ज़िम्मेदारियां प्रभावी ढंग से नहीं निभा रही हैं।

हालांकि अदालत ने कहा कि यह मामला शायद इसका अपवाद है।

अदालत ने कहा, "इस मामले में जांच एजेंसी ने चार्जशीट दाखिल की और पूरी गंभीरता के साथ मुक़दमे को आगे बढ़ाया।"

गर्मी की छुट्टियों के कारण अदालत को इस मामले पर पर्याप्त समय मिल सका।

इस वजह से ट्रायल से पहले की प्रक्रिया समय पर पूरी हो गई। ट्रायल के बाद की प्रक्रिया भी तेज़ी से पूरी की गई।

अदालत ने कहा कि मुक़दमे की शुरुआत के सिर्फ़ एक महीने के भीतर ही फ़ैसला सुना दिया गया।

अदालत ने कहा, "ऐसा हर मामले में होना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं होता।"

अभियुक्त को दोषी ठहराते हुए अदालत ने कहा कि इस मामले से स्पष्ट है कि उसका आचरण अत्यंत गंभीर प्रकृति का था।

अदालत ने कहा कि इस मामले में 'लास्ट सीन' और परिस्थितिजन्य साक्ष्य दो बेहद महत्वपूर्ण पहलू हैं।

अभियोजन पक्ष ने इन दोनों साक्ष्यों को सफलतापूर्वक साबित किया है, जो अपराध में अभियुक्त की संलिप्तता को स्पष्ट रूप से स्थापित करते हैं।

अदालत ने कहा कि अभियुक्त ने अपने पिछले आचरण या आपराधिक इतिहास से कोई सबक नहीं सीखा।

इस गंभीर अपराध की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए अदालत को सभी प्रतिकूल परिस्थितियों पर विचार करना होगा।

अदालत ने कहा, "अभियुक्त दो पुराने मामलों में बरी हो चुका है। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि उसने उनसे कोई सबक लिया है।"

"वह अब भी समाज के लिए ख़तरा बन सकता है।"

"उसमें न तो पश्चाताप के संकेत हैं और न ही सुधार की संभावना। वह सुधार की सीमा से आगे निकल चुका है।"

विशेष लोक अभियोजकों ने अपने तर्क को मज़बूत करने के लिए 12 महत्वपूर्ण न्यायिक फ़ैसलों का हवाला दिया।

अभियोजन पक्ष ने अभियुक्त के लिए मृत्युदंड की मांग की थी।

मामला क्या है?

एक मई 2026 को साढ़े तीन साल की बच्ची के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी गई थी।

इसके बाद पुणे में भी विरोध प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शनकारियों ने अभियुक्त के लिए कड़ी से कड़ी सज़ा की मांग की।

घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस ने तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी। इलाके के सीसीटीवी फुटेज में अभियुक्त बच्ची को ले जाता हुआ दिखाई दिया।

तलाश के बाद पुलिस ने डेढ़ घंटे के भीतर अभियुक्त को गिरफ़्तार कर लिया।

अभियुक्त के ख़िलाफ़ पॉक्सो क़ानून समेत कई गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया।

जांच के दौरान पता चला कि अभियुक्त के ख़िलाफ़ पहले भी इसी तरह के मामले दर्ज हुए थे, लेकिन वह बरी हो चुका था।

मीडिया में अभियुक्त के परिवार की प्रतिक्रिया भी सामने आई। परिवार ने कहा कि वे उसका चेहरा तक नहीं देखना चाहते।

यह देश के सबसे तेज़ी से सुने गए मामलों में से एक है। इससे पहले बिहार में 2021 के एक मामले में अदालत ने पूरे मामले की सुनवाई और फ़ैसला एक ही दिन में पूरा किया था।

जुलाई 2021 में एक 8 साल की बच्ची के साथ बलात्कार हुआ था। घटना के अगले दिन मामला दर्ज हुआ। अक्तूबर में अदालत ने एक ही दिन में सुनवाई पूरी कर अभियुक्त को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई।

हालांकि मामला दर्ज होने से फ़ैसले तक लगभग तीन महीने लगे थे।

वहीं वाशी के एक पॉक्सो मामले में 45 दिनों के भीतर सुनवाई पूरी कर मृत्युदंड सुनाया गया था।

इस मामले में सुनवाई की प्रक्रिया लगभग 50 दिनों में पूरी हुई।

Questions ouvertes

  • क्या इस फ़ैसले से अन्य जघन्य अपराधों के मामलों में सुनवाई की गति बढ़ेगी?
  • अभियुक्त की अपील का क्या परिणाम होगा?
  • न्यायिक प्रणाली में जांच एजेंसियों की भूमिका कैसे सुधारी जा सकती है?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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