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जी-7 शिखर सम्मेलन में भारत ने उठाई नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा
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BBC हिंदी17/06/2026Monde7 min de lectureIndia

जी-7 शिखर सम्मेलन में भारत ने उठाई नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा

L'essentiel

जी-7 शिखर सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समुद्र में नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया, खासकर अमेरिकी सेना द्वारा जहाजों पर हमलों के संदर्भ में। ओमान के तट पर एक जहाज पर हमले में तीन भारतीयों की मौत हो गई थी।

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प्रकाशित 17 जून 2026, 16:51 IST

अपडेटेड 5 घंटे पहले

पढ़ने का समय: 8 मिनट

जी-7 शिखर सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समुद्र में नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया.

हालांकि उन्होंने अमेरिका का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया लेकिन उनका इशारा हाल में होर्मुज़ स्ट्रेट और ओमान के तट के नज़दीक से गुज़र रहे जहाज़ों पर अमेरिकी सेना के हमले की ओर था.

ओमान के तट पर 9 जून को कमर्शियल जहाज़ 'सेटेबेलो' पर अमेरिकी सेना के हमले में तीन भारतीयों की मौत हो गई थी.

'सेटेबेलो' के अलावा दो भारतीय जहाज़ों पर भी हमला हुआ था, लेकिन इसमें किसी की जान नहीं गई थी.

कमर्शियल जहाज़ों पर भारतीय क्रू मेंबरों पर अमेरिकी सेना के हमलों से भारत में काफ़ी नाराज़गी है.

'इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारतीय झंडे वाले 13 जहाज़, होर्मुज़ स्ट्रेट में लगभग 100 दिनों तक फंसे रहे. इनमें 550 से अधिक भारतीय नाविक सवार थे.

जब से खाड़ी क्षेत्र अमेरिका-इसराइल और ईरान के युद्ध के दायरे में आया है तब से18 हज़ार भारतीय नाविकों की सुरक्षा ख़तरे में पड़ गई थी.

भारत के नौवहन महानिदेशालय के मुताबिक़ देश में 7,40,000 नाविक रजिस्टर्ड हैं. इनमें से 3,23,479 सक्रिय नाविक हैं. चीन और फ़िलीपींस के बाद सबसे ज़्यादा समुद्र कर्मियों की सप्लाई भारत ही करता है.

दुनिया भर के जहाज़ों के चालक दल में भारत की हिस्सेदारी 17 फ़ीसदी है. दुनिया के हर पाँच नाविकों में से एक भारतीय है. इसलिए भारत के लिए समुद्री सुरक्षा और नाविक समेत दूसरे समुद्र कर्मियों की सुरक्षा बेहद अहम मुद्दा है.

क्या होता है मर्चेंट नेवी?

भारत में ही 12 बड़े और दो सौ छोटे बंदरगाह हैं, जहां से हर रोज़ लाखों-करोड़ों रुपये का सामान आता-जाता है.

और इसी सेक्टर की एक ऐसी नौकरी है, जो कई नौजवानों को अपनी तरफ़ खींचती है- मर्चेंट नेवी.

दुनिया भर में जितने भी मर्चेंट मरीनर्स हैं, उनमें से सात फ़ीसदी भारतीय हैं.

तो सबसे पहले इनके बीच का अंतर समझ लेते हैं.

एकेडमी ऑफ़ मैरीटाइम एजुकेशन एंड ट्रेनिंग के प्लेसमेंट डायरेक्टर कैप्टन चंद्रशेखर कहते हैं, "मर्चेंट नेवी वो शिपिंग सर्विस है, जो समुद्र के रास्ते माल ले जाने वाले कमर्शियल जहाज़ों से जुड़ी है. ये एक कॉस्ट सेंटर है, जो या तो मुनाफ़ा कमाता है या फिर नुक़सान उठाता है."

आइए जानते हैं समुद्र में जहाज़ों या मर्चेंट नेवी के क्रू मेंबरों, नाविकों और दूसरे कर्मचारियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी किसकी है. नाविकों या सीफे़रर्स की सुरक्षा से जुड़े नियम क्या हैं. समुद्री सुरक्षा का क्या मतलब है और इस बारे में अंतरराष्ट्रीय नियम क्या कहते हैं?

जहाज़ पर किसी देश के झंडे का क्या मतलब होता है?

होर्मुज़ संकट के दौरान कुछ ऐसे जहाज़ों पर हमले हुए जिन पर भारत का झंडा तो नहीं लगा था लेकिन उनमें चालक दल या जहाज़ कर्मी भारतीय थे.

जहाज़ पर लगे झंडे ये बताते हैं कि जहाज़ किस देश में रजिस्टर्ड है. ये जहाज़ के मालिक या चालक दल की राष्ट्रीयता को नहीं बताता है.

हर कमर्शियल जहाज़ को किसी देश के झंडे के तहत रजिस्ट्रेशन कराना होता है ताकि क़ानूनी राष्ट्रीयता मिल सके.

इससे यह तय होता है कि जहाज़ को किन क़ानूनों का पालन करना होगा और जहाज़ पर मौजूद चालक दल को कौन-सी क़ानूनी सुरक्षा मिलेगी.

किस पर होती है जहाज़ की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी

इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गेनाइज़ेशन के मुताबिक़ जहाज़ जिस देश के झंडे तले रजिस्ट्रेशन कराया जाएगा, अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत उसी को जहाज़ के रक्षा का अधिकार है.

किसी देश के तहत झंडे तले रजिस्ट्रेशन का नियम इसलिए है क्योंकि जहाज़ अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्रों में चलते हैं और ये किसी भी देश के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते.

अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत सभी देशों को यह तय करना होता है कि वे जहाज़ों को अपनी राष्ट्रीयता और अपना झंडा फहराने का अधिकार किन शर्तों पर देंगे.

हालांकि जहाज़ों के रजिस्ट्रेशन के लिए कोई साझा और बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था नहीं है.

'फ़्लैग स्टेट' की और क्या ज़िम्मेदारी होती है?

भारत में नौवहन महानिदेशालय जहाज़ों, उनके मालिकों और भर्ती और नियुक्ति एजेंसियों की साख की जांच के लिए ज़िम्मेदार है.

लेकिन शिपिंग क्षेत्र का आरोप है कि रेगुलेशन में ढिलाई की वजह से कई कंपनियां नाविकों को समुद्र में ही छोड़ देती हैं.

दुर्घटना में चोट लगने या मौत होने की स्थिति में चालक दल के सदस्यों को भारतीय क़ानूनों के तहत भारतीय अदालतों में मुआवज़े का दावा करने का अधिकार होता है.

देशों को अपने झंडे वाले जहाज़ों पर प्रशासनिक, तकनीकी और कुछ दूसरे मामलों में कंट्रोल और अपने अधिकार का इस्तेमाल करना होता है

जहाज़ों की सुरक्षा, प्रदूषण-नियंत्रण और चालक दल के रहने और काम करने की परिस्थितियों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करना 'फ़्लैग स्टेट' की होती है.

'इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ किसी विशेष देश के झंडे के तहत जहाज़ का रजिस्ट्रेशन कराने से उसे वहां की टैक्स छूट, सर्टिफिकेशन और सुरक्षा उपाय हासिल करने जैसे लाभ मिलते हैं.

इसे "फ्लैग ऑफ कन्वीनियंस" कहा जाता है. जहाज़ उन देशों को चुनते हैं जो सबसे अधिक लाभ देते हैं. इसलिए अधिकतर कमर्शियल जहाज़ कुछ चुनिंदा देशों में रजिस्टर्ड हैं.

2023 में शीर्ष आठ फ़्लैग स्टेट्स में पनामा, लाइबेरिया, मार्शल द्वीप, हांगकांग, सिंगापुर, चीन, माल्टा और बहामास शामिल थे.

पोर्ट स्टेट कंट्रोल क्या है?

नौवहन महानिदेशालय के मुताबिक़, जहाज़ ज़्यादातर वक़्त अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लगे रहते हैं. इसलिए कई बार किसी ख़ास अवधि में सर्टिफ़िकेट का रीन्युअल न हुआ हो या फिर रख-रखाव में कोई कमी आई तो ऐसी स्थिति में ये ज़रूरी है कि अलग-अलग बंदरगाहों पर जहाज़ों का निरीक्षण किया जाए ताकि सुरक्षा, रख-रखाव, चालक दल की उपलब्धता से जुड़े नियमों के पालन की जांच की जा सके.

बंदरगाहों पर की जाने वाली इस निगरानी को "पोर्ट स्टेट कंट्रोल" कहा जाता है.

पोर्ट स्टेट कंट्रोल का अहम मकसद लो क्वालिटी जहाज़ों को हटाना और स्वच्छ महासागर सुनिश्चित करना है.

इसके तहत किसी भी बंदरगाह पर लो क्वालिटी जहाज़ की पहचान कर उसे आगे यात्रा की अनुमति देने से पहले ज़रूरी सुधार के निर्देश दिए जाते हैं.

सीफ़ेरर एबैंडनमेंट क्या है?

सीफे़रर एबैंडनमेंट उस स्थिति को कहते हैं जब जहाज़ का मालिक अपने चालक दल को वेतन, भोजन, आवास, चिकित्सा सुविधा या घर लौटने की व्यवस्था जैसी सभी सहायता देना बंद कर देता है.

उन्हें जहाज़ पर या किसी विदेशी बंदरगाह पर असहाय छोड़ दिया जाता है. 2006 के मरीन लेबर कन्वेंशन के तहत इसे जहाज़ मालिक का अपनी मूल ज़िम्मेदारियों का पालन न करना माना गया है.

कई बार समंदर में 'शैडो फ़्लीट' का भी इस्तेमाल किया जाता है. 'शैडो फ़्लीट' उन जहाज़ों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो प्रतिबंधित चीज़ों को समुद्र के रास्ते ले जाने के लिए भ्रामक तरीक़ों का इस्तेमाल करते हैं ताकि पकड़े न जा सकें.

प्लाउ के झंडे वाले जिस जहाज़ में तीन भारतीय नाविकों की मौत हुई थी वो एक 'शैडो फ़्लीट' था जो प्रतिबंधों से बचकर ईरानी तेल ले जा रहा था.

'शैडो फ़्लीट' के टैंकर अक्सर प्रतिबंधित बंदरगाहों में प्रवेश करते समय या समुद्र में अवैध जहाज़-से-जहाज़ माल ट्रांसफ़र करते हुए ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम को बंद कर देते हैं या उसमें हेरफेर करते हैं, जिससे ये पकड़ में नहीं आते हैं.

नाविकों की सुरक्षा से जुड़े अंतरराष्ट्रीय क़ानून

नाविकों की सुरक्षा से जुड़े प्रमुख अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों मरीन लेबर कन्वेंशन, एसओएलएएस (1974) और यूएन मरीन लॉ कन्वेंशन जैसे क़ानून शामिल हैं.

इसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री क़ानून का "चौथा स्तंभ" और नाविकों का "अधिकार-पत्र" माना जाता है, जो उन्हें श्रमिक के रूप में मूल अधिकारों के साथ-साथ रहने और काम करने के न्यूनतम अंतरराष्ट्रीय मानक भी मुहैया कराता है.

अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र ऐसी जगहों को कहा जाता है कि जो किसी एक राष्ट्र के अधिकार या नियंत्रण में नहीं होते हैं.

ये क्षेत्र किसी भी देश के तट से 200 समुद्री मील (लगभग 370 कि.मी.) की दूरी से आगे शुरू होते हैं, और इन पर सभी देशों को समान रूप से नौवहन और मछली पकड़ने का अधिकार होता है.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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