टीएमसी में टूट के बीच महुआ मोइत्रा ने क्यों की शुभेंदु अधिकारी की तारीफ़- ख़ास इंटरव्यू
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तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांसद महुआ मोइत्रा ने बीबीसी हिन्दी को दिए एक ख़ास इंटरव्यू में पार्टी में टूट, ममता बनर्जी के नेतृत्व और बीजेपी की राजनीति पर विस्तार से बात की। उन्होंने शुभेंदु अधिकारी की तारीफ़ की और कहा कि वे बीजेपी में जाकर सही किया।
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पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में नेताओं के पार्टी छोड़ने का सिलसिला जारी है, जिससे पार्टी के अस्तित्व पर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने बीबीसी हिन्दी को दिए एक इंटरव्यू में पार्टी की स्थिति और भविष्य पर बात की।
टीएमसी में टूट के बीच महुआ मोइत्रा ने क्यों की शुभेंदु अधिकारी की तारीफ़- ख़ास इंटरव्यू
प्रकाशित 17 मिनट पहले
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पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद वहां सालों तक सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस न सिर्फ़ पार्टी में टूट को लेकर ख़बरों में है बल्कि अब उसके अस्तित्व पर भी सवाल उठ रहा है.
एक के बाद एक नेताओं के पार्टी छोड़ देने से पार्टी के अंदर के माहौल और ममता बनर्जी के नेतृत्व पर भी सवाल उठ रहे हैं.
ममता बनर्जी का साथ छोड़ने वालों में ऐसे लोग भी हैं जो उनके बहुत क़रीबी माने जाते रहे हैं.
ऐसा क्यों हुआ और अब पार्टी के सामने क्या संभावनाएं हैं?
ऐसे सभी मुद्दों पर बीबीसी हिन्दी के असिस्टेंट एडिटर पंकज प्रियदर्शी ने तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा से ख़ास बात की.
इस संकट का अंदाज़ा था?
सवालः क्या टीएमसी लीडरशिप को अंदाज़ा था कि विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी इस तरह के संकट से गुज़रेगी?
महुआ मोइत्राः नहीं, क्योंकि देखिए 80 एमएलए कम नहीं होते. दूसरी बात कि आप अगर वोट शेयर देखेंगे तो उन्हें 45% मिला वोट और हमें 41%. उन्हें दो करोड़ 90 लाख वोट मिले, हमें मिले 2 करोड़ 60 लाख वोट. और 30 लाख वोटर तो एडजुडिकेशन में थे.
इसलिए ऐसा नहीं कि वोटर 100% बीजेपी की तरफ़ हैं, ऐसा एकदम भी नहीं है. ऐसा हो सकता है कि वोट शेयर में फ़र्क बहुत कम हो पर सीट में फ़र्क बहुत ज्यादा हो जाए क्योंकि बहुत सारी सीट जो हम जीते हैं हम ज़्यादा मार्जिन से जीते हैं और बहुत सारी सीटें ऐसी हैं कि मार्जिन बहुत कम है.
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बीजेपी बहुत अच्छी तरह जानती है और उनके आंतरिक सर्वेक्षण भी यही कहते हैं कि 2029 में उनके लिए फिर सत्ता में आना मुश्किल है. इसीलिए वे कुछ ऐसा करना चाहते हैं कि एक चुनाव और जीत जाएं. उनके पास अभी ये डीलिमिटेशन बिल है.
इससे ये हर सीट की सीमाएं ऐसे बदलेंगे कि उनकी जो जीतने वाली सीट हैं वे ज़्यादा संख्या में हो जाए और विपक्ष की ताक़त कम हो जाए, जैसा उन्होंने असम में किया है. इसके लिए वे डीलिमिटेशन बिल लाए लेकिन वह पास नहीं हो पाया.
उनको लोकसभा में दो तिहाई बहुमत लाकर इसको पास कराना है, नहीं तो ये 2029 में सत्ता में नहीं आ रहे. अब उनको चाहिए कि जैसे भी हो लोकतंत्र की धज्जियां उड़ा कर कुछ भी करके यह बिल पास कराना है. तो पहले जो चीज़ वे छिप-छिप के करते थे, अब खुल्लमखुल्ला कर रहे हैं.
इसी निराशा के चलते वे यह सब कर रहे हैं. या तो वो पैसे का लालच दिखाते हैं या धमकाते हैं. इसलिए वो लोभ और दंड दोनों का इस्तेमाल कर रहे हैं.
सवालः इस बात से तो सवाल उठता है कि क्या आपकी पार्टी के नेता इतने कमज़ोर थे कि दबाव में आ गए?
महुआ मोइत्राः बिल्कुल. हमारी ही नहीं ज़्यादातर हर रीजनल पार्टी के साथ यही होता है. रीजनल पार्टी एक किसी एक व्यक्ति के करिश्मे और ज़मीनी कार्यकर्ता के बल पर चलती हैं.
इन दोनों का कनेक्शन ठीक रहता है, तो पार्टी चलती रहती है. आज तक हमारे ये कनेक्शन ठीक है. लेकिन बीच में जो आते हैं- आया राम, गया राम - वे पार्टी को इस्तेमाल कर नेता बन जाते हैं.
62 एमएलए और 20 संसद सदस्य गए हैं.. उनमें से हरेक को बोलिए कि वह अपनी ताक़त पर जीत कर दिखाएं. कोई एक इन्डिपेंडेट जीतने की हिम्मत नहीं रखता.
ममता के नेतृत्व पर सवाल
सवालः लेकिन इससे ममता बनर्जी के नेतृत्व पर भी तो सवाल उठते हैं. क्योंकि आपकी पार्टी हमेशा से दावा करती रही कि आप लोग कुछ अलग हैं. और जिस तरह ममता बनर्जी उभरीं बंगाल की राजनीति में और 15 साल सत्ता में रहीं, उसे देखते हुए यह घटनाक्रम ममता बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल नहीं है?
महुआ मोइत्राः मैं एक ही चीज कहती हूं कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में जो एक ये उनकी ताक़त है वही उनकी कमज़ोरी भी है.
वह बहुत नरम दिल की इंसान हैं. बाहर से दिखती बहुत सख़्त हैं लेकिन दरअसल वह बहुत नरम दिल की इंसान हैं. और वह कभी किसी को काट के फेंक नहीं सकतीं या हटा नहीं सकतीं.
बीजेपी की राजनीति एकदम निर्मम है... बीजेपी के जितने भी पुराने नेता हों, जब चाहे उन्हें हटा दिया- मुरली मनोहर जोशी हैं, एक दिन में काट दिए गए. लाल कृष्ण आडवाणी हाथ जोड़कर खड़े रहे साइड में नरेंद्र मोदी सीधे चले गए. तो बीजेपी को चार बार के सांसद को हटाना है तो तुरंत हटा देते हैं.
क्योंकि ये काडर, मास बेस और हिंदुत्व की फ़िलॉसफ़ी के साथ आए हैं. ये पार्टी किसी एक व्यक्ति के ऊपर निर्भर नहीं है. आरएसएस का कहना है कि हम 10 साल सत्ता में नहीं रहेंगे, हम 100 साल बाद आएंगे लेकिन हम सब बदल देंगे.
लेकिन ममता बनर्जी सबके साथ निजी संबंध बनाकर रखती हैं. ममता बनर्जी और हमारी पार्टी की यही कमी रही है कि सबको एडजस्ट करो. तीन चार बार के सांसद को हम बदल सकते हैं लेकिन नहीं किया.
किसी को हर बार रिव्यू करना चाहिए था कि इनमें कितना दम है और ये पार्टी और सिंबल के बिना जीत के आ सकते हैं कि नहीं. लेकिन होता क्या है कि जब तक वह चल सकता है उसको और एक बार चुनाव लड़ा लेते हैं क्योंकि ममता जी नहीं चाहतीं पुराने व्यक्ति को हटा दो.
अगर हम लोग निर्मम और निष्पक्ष तरीके से ये कर सकते थे तो आज यह हालत नहीं होती क्योंकि इन लोगों ने इसे हल्के में ले लिया.
अभिषेक बनर्जी पर सवाल...
सवालः जो लोग पार्टी छोड़ के गए हैं वह सब एक नाम बार-बार ले रहे थे और वह है- अभिषेक बनर्जी का. उनकी कार्यशैली पर कल्याण बनर्जी ने भी सवाल उठाए हैं.
महुआ मोइत्राः पार्टी के अंदर किसी के नेतृत्व पर सवाल उठाने का हक़ बनता है. मैंने भी कई बार ममता दीदी के साथ, अभिषेक के साथ भी अलग नज़रिये के साथ चर्चा की है. लेकिन इन लोगों ने जो किया है वह जायज़ नहीं है.
इनके तीन चार एमपी हैं, जैसे कि आप बापी हाजरा को देख लीजिए, पार्थ भुमि को देख लीजिए.
ममता बनर्जी इन लोगों को पार्टी में नहीं लेकर आईं, ये 200% अभिषेक के लोग हैं. अगर इन्हें अभिषेक बनर्जी के साथ दिक्कत थी तो वही करना था जो शुभेंदु अधिकारी ने किया.
अभिषेक बनर्जी को ममता बनर्जी ने पार्टी में नंबर टू बना दिया तो शुभेंदु समझ गए थे कि पार्टी का कंट्रोल कभी उनके पास नहीं आएगा. उन्होंने बोला कि मेरा हक है, मेरा अधिकार है, मैं पार्टी का आदमी हूं पर अभिषेक के जीते जी यह नहीं होगा, इसलिए मैं बीजेपी जॉइन कर रहा हूं.
उन्होंने साफ़-साफ़ कह दिया और यह सही है, यह सम्मान की बात है. उन्होंने जाकर पाँच साल संघर्ष किया और वह मुख्यमंत्री बन गए.
ये लोग भी कह सकते थे कि अभिषेक ने बापी हाजरा को टिकट दिया. उनको अगर दिक्कत थी तो कहना था कि मुझे अभिषेक से समस्या है, मैं यह टिकट नहीं ले सकता.
अब पता चलता है कि शताब्दी रॉय को दिक्कत है अभिषेक से. जब उन्हें उप-नेता बनाया था तो कितनी ख़ुश थीं.
2021 के चुनाव में जब जीते तो कहा गया अभिषेक बनर्जी युवराज, अभिषेक बनर्जी जिंदाबाद, अभिषेक बनर्जी बॉस मैन...
जैसे कि मुझे अगर दिक्कत थी अभिषेक बनर्जी के साथ 2021 में तो मैंने उस पर बात की... वह दूर हुई नहीं हुई- वह एक प्रक्रिया है. इसलिए या तो पार्टी में रहकर बात करो या निकल कर सीधा-सीधा बीजेपी जॉइन करो.
सयानी घोष को लेकर हैरानी
सवालः कल्याण बनर्जी तो अभी भी पार्टी में है, वह क्यों सवाल उठा रहे हैं?
महुआ मोइत्राः कल्याण दा का अगर कोई मामला है तो वह बोल रहे हैं. उनका कोई क़ानूनी मामला था कि उनके ऊपर जाकर अभिषेक ने किसी और को बोल दिया था... वह कह रहे हैं क्योंकि वह इमोशनल आदमी हैं. पार्टी में रहकर, 100% पार्टी का आदमी होकर कोई भी बोल सकता है. इसमें क्या खराबी है?
लेकिन कल्याण दा का अभिषेक को किसी केस के लिए बोलना और 20 लोग जाकर बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर पश्चिम बंगाल के मतदाताओं से गद्दारी कर दें- यह एकदम अलग चीज़ है.
सवालः 20 लोग जो सांसद छोड़ के गए हैं, उसमें से ख़ासतौर पर किसी एक व्यक्ति के बारे में सोचकर आपको बहुत आश्चर्य हुआ?
महुआ मोइत्राः मैं अब भी बहुत इमोशनल पॉलिटीशियन हूं. मैं पार्टी को परिवार मानती हूं, आज भी मानती हूं...
जैसे आज भी शुभेंदु के साथ मेरे पर्सनल संबंध अच्छे हैं. शुभेंदु मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे और हम जब एक साथ पार्टी में थे, उन्होंने मुझे बहुत सपोर्ट किया.
मैंने जब पहले करीमपुर से चुनाव लड़ा, कोई मेरे साथ नहीं आ रहा था, तब मेरी पहली रैली में शुभेंदु आए. जब एक बार 2014 में मुझे कहीं लोकसभा से टिकट मिलने वाला था, नहीं मिला. मैं सारी पूरी रात रोई. शुभेंदु ने मुझे बोला कि न बहन- हम हैं तेरे साथ. तो ये इमोशनल कनेक्शन रहते हैं.
यह अलग बात है कि शुभेंदु बीजेपी में चले गए और अब बात नहीं होती है लेकिन इमोशनल या निजी संबंध तो कोई भूल नहीं सकता.
सवालः सायोनी घोष को लेकर थोड़ा ताज्जुब हुआ था आपको? क्योंकि आप दोनों पार्टी में बहुत मुखर मानी जाती थीं.
महुआ मोइत्राः बिल्कुल. और मैं सचमुच में मानती थी कि वह युवा ऊर्जा है और मुझे लगता था कि वह विपक्ष की राजनीति के लिए अच्छी हैं.
बाकी जो हैं सब जगह इधर-उधर गए हैं. सुदीप बंदोपाध्याय तो पार्टी छोड़े हैं, इन सबके लिए मुझे आश्चर्य नहीं हुआ लेकिन हां मुझे बहुत अचरज हुआ कि जिसको (सायोनी घोष को) पार्टी ने ने इतने कम समय में इतना कुछ दिया है- एमएलए बनाया, नेशनल यूथ प्रेसीडेंट बनाया और ममता बनर्जी की अपनी सीट जादवपुर दी. इसीलिए मुझे आश्चर्य हुआ, पर ठीक है.
कांग्रेस में विलय पर चर्चा
सवालः ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ भी काम कर चुकी हैं और बीजेपी के साथ भी. क्या लगता है कि ममता बनर्जी और आपकी पार्टी वैचारिक संकट से गुजर रही हैं?
महुआ मोइत्राः एकदम नहीं, जब आप कहते हैं कि उन्होंने बीजेपी के साथ काम किया... तो वह वाजपेयी की बीजेपी थी. आज की बीजेपी है और उसमें ज़मीन-आसमान का फ़र्क है. बीजेपी के जो अपने लोग हैं वो भी जानते हैं कि ज़मीन-आसमान का फ़र्क है. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में नैतिकता थी जो आज की बीजेपी सरकार में नहीं है.
दूसरी बात कि वैचारिक लिहाज हम हमेशा कांग्रेस के साथ हैं. ममता बनर्जी कांग्रेस की सदस्य थीं और वो एकमात्र व्यक्ति है जिन्होंने कांग्रेस से अलग होकर अपने पार्टी को ज़िंदा रख के तीन बार अकेले बहुमत के दम पर सरकार बनाई.
और कोई ऐसा नहीं कर पाया... एनसीपी कभी अकेले सरकार नहीं बना पाई.
ख़ैर हम बीजेपी विरोधी हैं, कांग्रेस भी बीजेपी विरोधी है इसलिए 2029 में हम दोनों मिलकर बीजेपी के ख़िलाफ़ खड़े होंगे.
सवालः जब इंडिया गठबंधन की बैठक थी तब विलय को लेकर बहुत चर्चा हुई...
महुआ मोइत्राः इससे क्या? ये तो बीजेपी वाले खुद ही फैलाते हैं... राहुल गांधी ने कभी कहा है विलय के बारे में? ममता बनर्जी बोली हैं विलय के बारे में? अभिषेक बनर्जी ने कुछ कहा है विलय के बारे में?
कहाँ से आया ये विलय? विलय ये लोग कर रहे हैं वह भी कोई कागज़ी (शेल) पार्टी के साथ- 20 सदस्य विलय कर रहे हैं.
विलय हम कहाँ कर रहे हैं? हम लोगों ने तो कभी नहीं कहा मर्जर. हमने कहा कि एक-एक की बराबरी पर गठबंधन हो.
सवालः फिरहाद हाकिम को लेकर भी बहुत चर्चा है. वो ममता बनर्जी के इतने वफ़ादार रहे एक तरह से कि जब अभिषेक बनर्जी उस तरह परिदृश्य में नहीं आए थे तो उनको नंबर दो भी माना जाता था. क्यों इस्तीफ़ा दे दिया उन्होंने?
महुआ मोइत्राः उनको पूछिए. एक गद्दार क्यों गद्दारी करता है, इसकी वजह सिर्फ़ गद्दार बता सकता है.
आप दो ब्रैकेट में सबको रख सकते हैं - एक लालच के लिए और एक भय के लिए.
तो वह किस ब्रैकेट में हैं, यह वही बता सकते हैं? राजनीतिक आदर्श या नीति के लिए किसी ने कुछ नहीं किया है.
ठीक है कि आप कहीं भी जा सकते हैं लेकिन चुनाव से पहले जाइए. जो दम शुभेंदु अधिकारी ने दिखाया, वह दिखाइए.
आईपैक
सवालः युसूफ़ पठान को लेकर भी बहुत सवाल उठे हैं. किसका फैसला था उनको गुजरात से लेकर पश्चिम बंगाल में चुनाव लड़ाने का?
महुआ मोइत्राः मेरा भी सवाल है. देखिए पार्टी के उम्मीदवार हम तय नहीं करते. वह नेतृत्व ने तय किया होगा और हर सिद्धांत सही- ग़लत तो निकल ही सकता है. ये ग़लत निकल गया है.
हमने यूसुफ़ पठान को गुजरात से लाकर मुर्शिदाबाद से चुनाव जितवाया और एमपी बनवाया. वह तो कमेंटेटर ही थे. तो अगर वह दो साल में ही गद्दारी करें, तो हम क्या बोल सकते हैं, वही बोल सकते हैं.
सवालः यह भी चर्चा चलती रहती है कि जो लोग बीजेपी छोड़ कर आपकी पार्टी में आए, जैसे शत्रुघ्न सिन्हा हुए, कीर्ति आज़ाद, बाबुल सुप्रियो- वह आपके साथ हैं, लेकिन आपकी पार्टी के लोग छोड़कर चले गए...
महुआ मोइत्राः क्योंकि जो वह मिठाई खा चुका है उसे पता है वो कितनी मीठी है. इसलिए वह तो दोबारा ट्राय नहीं करेंगे. जिसने यह मिठाई नहीं खाई है, वह सोचता है दिल्ली का लड्डू क्या है, हम भी चख कर देखें.
सवालः आपने कहा कि कई बार आपने कई मुद्दों पर सवाल उठाया, अगर पार्टी नेतृत्व उन सवालों पर ध्यान नहीं देगा तो फिर इंट्रा पार्टी डेमोक्रेसी कैसे आएगी?
सवालः आईपैक का मुद्दा आपने बहुत उठाया...
आईपैक के बिना भी सीट निकाल दी लेकिन अब जिस आदमी को पता नहीं है कि उनके कितने वोटर हैं. हमारे एक एमएलए को पता नहीं उनके कितने बूथ हैं, हर बूथ में कितने पुरुष-महिला वोटर हैं, उनको सभी क्षेत्रों का नाम पता नहीं तो इनके ऊपर आप चुनाव छोड़ देंगे? तो वहां पर आईपैक की ज़रूरत है...
हां आईपैक को कितना करना चाहिए था और कहां हमें रोक लगानी चाहिए थी इस पर सवाल ज़रूर उठ सकता था.
कभी बीजेपी में जा सकती हैं महुआ मोइत्रा?
सवालः जिन 20 लोगों ने पार्टी छोड़ के दूसरे दल में विलय किया है, आप पार्टी के रूप में इसे कैसे चुनौती देंगे?
महुआ मोइत्राः ये डिस्क्वालिफ़िकेशन में आता है. एंटी डिफ़ेक्शन लॉ में दो तिहाई का नियम है. ऐसे कैसे हो सकता है कि आप कोई भी आज बोल दे कि हम अलग हो गए और हो गए.
लेकिन स्पीकर ने तो उनसे मुलाक़ात की है...
स्पीकर तो सब से मुलाक़ात करते हैं. स्पीकर ने तो हमको निकाल दिया था, तब भी हमसे मुलाक़ात करते थे.
सवालः लेकिन अगर मान्यता दे दें तो?
महुआ मोइत्राः मान्यता दे दें तो हम कोर्ट जाएंगे.
सवालः क्या महुआ मोइत्रा कभी बीजेपी में जा सकती हैं?
महुआ मोइत्राः देखिए पॉलिटिक्स में आने के लिए मैंने अपना पूरा जीवन और युवावस्था समर्पित किया है. मेरा एक ही मक़सद है कि जिस देश में हम जन्मे थे, जो सेक्युलर भारत था, सब एक साथ रहते थे... सबके लिए विकास का सपना था.
लेकिन बीजेपी ने यह सांप्रदायिकता का ज़हर इस देश में फैला दिया है और जो देश का बंटवारा कर रहे हैं, हम मरते दम तक इसका हम विरोध करेंगे. हम मानते हैं कि जब तक बीजेपी इस देश में है, जिस भारत को हम जानते हैं वह फिर वैसा कभी नहीं हो पाएगा.
इसलिए जितने दिन हम ज़िंदा हैं और पॉलिटिक्स में हैं, हम यही लड़ाई लड़ते रहेंगे कि बीजेपी को हम कैसे हटा सकते हैं. हम यही लड़ाई लड़ते रहेंगे.
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2029 में बीजेपी के लिए फिर सत्ता में आना मुश्किल होगा, यदि डीलिमिटेशन बिल पास नहीं हुआ।
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टीएमसी और कांग्रेस 2029 में बीजेपी के ख़िलाफ़ मिलकर चुनाव लड़ेंगे।
Probable · En quelques mois
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- क्या टीएमसी 2029 के चुनाव में वापसी कर पाएगी?
