Dernière minute
KR경기도, '반려마루 여주' 야외 놀이시설 콘텐츠 개선 후 11일 개방KR테라울프, 앤트로픽과 20년 데이터센터 임대 계약…초기 29조원 매출 예상CN县域经济活力迸发,中国制造转型升级步伐扎实KR호날두, 20년 월드컵 여정 스페인전서 마침표… "마지막 월드컵이었다"CN铭记七七事变:中国人民抗日战争的起点CN中国造船全产业链发展壮大(大数据观察)AUKimberley Tourism Operators Skeptical of Voucher Program Amidst Slow SeasonKR아서 페리, 윔블던 8강 진출… 114위 와일드카드의 돌풍JP能登空港、愛称を「のと里山ポケモン・ウィズ・ユー空港」に変更 - ポケモンと復興のシンボルにKR'와인25플러스' 집계… 블렌디드 위스키 비중 감소KR경기도, '반려마루 여주' 야외 놀이시설 콘텐츠 개선 후 11일 개방KR테라울프, 앤트로픽과 20년 데이터센터 임대 계약…초기 29조원 매출 예상CN县域经济活力迸发,中国制造转型升级步伐扎实KR호날두, 20년 월드컵 여정 스페인전서 마침표… "마지막 월드컵이었다"CN铭记七七事变:中国人民抗日战争的起点CN中国造船全产业链发展壮大(大数据观察)AUKimberley Tourism Operators Skeptical of Voucher Program Amidst Slow SeasonKR아서 페리, 윔블던 8강 진출… 114위 와일드카드의 돌풍JP能登空港、愛称を「のと里山ポケモン・ウィズ・ユー空港」に変更 - ポケモンと復興のシンボルにKR'와인25플러스' 집계… 블렌디드 위스키 비중 감소
Newsgather
Backनेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया: एक गुमनाम दल का राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश
नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया: एक गुमनाम दल का राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश
En développement
BBC हिंदी19.06.2026Politique6 dk okumaIndia

नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया: एक गुमनाम दल का राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश

L'essentiel

पश्चिम बंगाल के हावड़ा ज़िले में स्थित नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया (एनसीपीआई) अचानक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है, जब तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने इसमें विलय की घोषणा की। यह दल, जो पहले त्रिपुरा चुनाव में दो सीटों पर लड़ा था, अब चर्चा में है।

Résumé généré par IA

Pourquoi c'est important

पश्चिम बंगाल के हावड़ा ज़िले में स्थित एक गुमनाम दल, नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया (एनसीपीआई), अचानक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है जब तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने इसमें विलय की घोषणा की। यह घटना भारत में पंजीकृत ग़ैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों (आरयूपीपी) की भूमिका और उनके ज़रिए मनी लॉन्ड्रिंग की आशंकाओं पर प्रकाश डालती है।

Taille de police

Author, शुभांगी मिश्रा, जैस्मिन निहलानी और मयूरी सोम

पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रकाशित 6 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 7 मिनट

15 जून की तपती दोपहर को पश्चिम बंगाल के हावड़ा ज़िले के हाटगाछा गांव में एक दो-मंज़िला इमारत के बाहर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल का दस्ता, राज्य के कई पुलिस अधिकारी और कई पत्रकार पहुंचे.

कोलकाता से लगभग एक घंटे की दूरी पर स्थित यह इलाक़ा रातों-रात राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन गया था. यह इमारत नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया (एनसीपीआई) का मुख्यालय है.

एक दिन पहले तक इस पार्टी का राजनीतिक परिचय सिर्फ़ इतना था कि उसने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में दो सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे.

लेकिन 14 जून को तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को पत्र देकर इस गुमनाम दल में विलय की घोषणा कर दी.

पार्टी की अध्यक्ष शिउली कुंडू हैं, जो कलकत्ता हाई कोर्ट की वकील हैं. इसके उपाध्यक्ष उत्तिया कुंडू हैं, जो गणित के शिक्षक, स्वयंभू 'मोटिवेशनल स्पीकर' और एक स्थानीय अख़बार के संपादक हैं.

दोनों ही सोमवार को दफ़्तर में नज़र नहीं आए. हालांकि उनके नाम, योग्यता और कामकाज के ब्योरे दफ़्तर के मुख्य द्वार पर मोटे अक्षरों में लिखे हुए थे.

चुनाव आयोग के आधिकारिक दस्तावेज़ों में एनसीपीआई का उल्लेख रजिस्टर्ड अनरिकग्नाइज़्ड पॉलिटिकल पार्टीज़ (आरयूपीपी) यानि पंजीकृत ग़ैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के रूप में है.

दो दशक में दोगुने से ज़्यादा हो गए आरयूपीपी

भारत के चुनाव आयोग में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत पंजीकृत सभी राजनीतिक दल आरयूपीपी कहलाते हैं, जब तक कि वे निर्वाचन प्रतीक आदेश (1968) के तहत राज्य दल के रूप में मान्यता पाने की शर्तें पूरी न कर लें.

इन शर्तों में शामिल हैं, किसी राज्य में कम से कम 6% वैध वोट हासिल करना और साथ ही दो विधानसभा सीटें जीतना, या कुल वैध वोटों का 8% हासिल करना, आदि.

बीबीसी के विश्लेषण में पाया गया है कि पिछले दो दशकों में आरयूपीपी की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है.

राजनीतिक पर्यवेक्षक इस प्रवृत्ति को लेकर चिंतित हैं. उनका कहना है कि इन दलों का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग के लिए किया जा सकता है, क्योंकि आयकर अधिनियम (1961) की धारा 13(ए) के तहत राजनीतिक दलों को कर चुकाने से छूट मिली हुई है.

शोध यह भी दिखाता है कि इन आरयूपीपी में से बड़ी संख्या कभी चुनाव तक नहीं लड़ती.

पेरिस स्थित साइंसेज़पो यूनिवर्सिटी में शोधकर्ता जियल वर्नियर कहते हैं, "हमें यह मानना होगा कि आरयूपीपी भारत में राजनीतिक प्रतिनिधित्व का एक रूप हैं. लेकिन इनमें से कई मनी लॉन्ड्रिंग के संदिग्ध ज़रिए भी हैं."

जियल वर्नियर भारत में चुनावी राजनीति पर शोध कर रहे हैं. वह कहते हैं, "एक बार चुनाव आयोग में पंजीकृत हो जाने के बाद राजनीतिक दलों को कर चुकाने से छूट मिल जाती है. यह एक प्रोत्साहन है जिसकी वजह से इतने सारे दल बने हैं."

चुनाव आयोग के अगस्त 2025 के आँकड़ों के अनुसार, भारत में 2,520 आरयूपीपी, मान्यता प्राप्त छह राष्ट्रीय दल और 67 राज्य स्तरीय दल हैं.

आरयूपीपी को राज्य या राष्ट्रीय दलों जैसी सुविधाएँ नहीं मिलतीं - जैसे कि विशेष चुनाव-चिह्न या पार्टी कार्यालयों के लिए रियायती दर पर ज़मीन.

चुनावी निगरानी संस्था एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (एडीआर) के विश्लेषण के मुताबिक़, 2022-23 तक उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा आरयूपीपी थे, इसके बाद दिल्ली और बिहार का स्थान रहा.

ग़ौरतलब है कि भारत में आरयूपीपी की संख्या पिछले दो दशकों में दोगुनी हो गई है - 2010 में 1,112 से बढ़कर 2019 में 2,301 और 2021 में 2,858 तक.

भारत में राजनीतिक फ़ाइनेंस पर आधारित एडीआर का एक शोध-पत्र मार्च 2026 में प्रकाशित हुआ है. इसमें कहा गया है कि लोकसभा चुनाव वाले वर्षों में पंजीकृत दलों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई. बीबीसी के पास इस शोध-पत्र की प्रति मौजूद है.

इसमें लिखा है, "नए दलों की इस बाढ़ का कारण बेशक सरकार के विवादित इलेक्टोरल बॉन्ड्स, असीमित और गुमनाम कॉर्पोरेट चंदों की ओर शक की उंगली उठाता है."

मनी लॉन्ड्रिंग का ज़रिया

इन दलों के ज़रिए हज़ारों करोड़ रुपये की राजनीतिक फंडिंग हो रही है.

एडीआर के चुनाव आयोग को सौंपे गई ऑडिट रिपोर्टों के विश्लेषण के अनुसार 2022 से 2024 के बीच 3,200 से अधिक आरयूपीपी को 10,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा का राजनीतिक चंदा मिला.

एडीआर ने यह भी पाया कि वित्त वर्ष 2022-23 में केवल 739 आरयूपीपी ने चुनाव आयोग को ऑडिट रिपोर्ट सौंपी. यह पंजीकृत दलों का सिर्फ़ 26.74% है.

2,000 से अधिक ऐसे दलों की ऑडिट और योगदान रिपोर्ट सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध ही नहीं थीं.

यह एक गंभीर मामला है, क्योंकि चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार सभी गै़र-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पार्टी फंड की रिपोर्ट सौंपनी होती है.

चुनाव आयोग समय-समय पर आरयूपीपी की सूची की छंटाई भी करता है. 2025 में उसने नियमों का पालन न करने पर 334 आरयूपीपी को सूची से बाहर कर दिया.

एडीआर के विश्लेषण से पता चला कि 2022 और 2023 के बीच सबसे अमीर दस आरयूपीपी में से पाँच गुजरात में थे.

बीबीसी ने रिपोर्ट की लेखकों में से एक शैली महाजन से पूछा कि गुजरात में इतने अमीर आरयूपीपी क्यों हैं? उन्होंने कहा कि आँकड़ों से किसी ख़ास कारण की पहचान नहीं की जा सकती.

दिलचस्प बात यह है कि 2024 लोकसभा चुनावों से पहले आरयूपीपी की फंडिंग में तेज़ उछाल आया. वित्त वर्ष 2022-23, जो चुनाव वर्ष से ठीक पहले था, में इन शीर्ष 10 दलों की आय पिछले समय की तुलना में अचानक बढ़ गई.

कुछ मामलों में चंदे की राशि कुछ लाख से बढ़कर आम चुनावों के दौरान सैकड़ों करोड़ तक पहुँच गई.

दिलचस्प बात यह भी रही कि ज़्यादातर आरयूपीपी ने एक ही साल में अपनी लगभग पूरी आय ख़र्च कर दी.

एडीआर में प्रोग्राम और रिसर्च मैनेजर शैली महाजन कहती हैं, "अगर आप हमारी रिपोर्ट में दिए गए शीर्ष 10 दलों को देखें तो इनमें से 10 आरयूपीपी ने वित्त वर्ष 2022-23 में कुल 1564.817 करोड़ रुपये ख़र्च किए, जो उनकी लगभग पूरी आय है. यह दिखाता है कि वे जितना जुटाते हैं, लगभग उतना ही ख़र्च कर देते हैं."

महाजन ने यह भी बताया कि कुछ अमीर आरयूपीपी ने ऐसी आय दर्ज की जो क्षेत्रीय और यहाँ तक कि राष्ट्रीय दलों से भी ज़्यादा थी.

2022-23 में गुजरात स्थित भारतीय नेशनल जनता दल की आय, भारत की दूसरी सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, से भी ज़्यादा थी.

वह यह भी कहती हैं, "यह विश्लेषण दलों की दर्ज आय पर आधारित है, लेकिन दर्ज आय में कुछ हद तक अस्पष्टता भी हो सकती है."

रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि इन दलों को मिलने वाला चंदा उनकी वास्तविक आय से कहीं ज़्यादा है.

एडीआर के अनुसार, जहाँ राष्ट्रीय दलों ने बड़े दानदाताओं (20,000 रुपये से अधिक के चंदे) से सिर्फ़ 33% चंदा मिलना बताया है, वहीं शीर्ष 10 गैर-मान्यता प्राप्त दलों को 93% चंदा बड़े दानदाताओं से मिला.

एनसीपीआई की स्थिति

इस पृष्ठभूमि में एनसीपीआई कहाँ खड़ी है? तो यह रहा पार्टी की फ़ंडिंग का विश्लेषण.

पार्टी की 2022-23 की ऑडिट रिपोर्ट बताती है कि उसे उस वित्त वर्ष में कुल 1.13 लाख रुपये का चंदा मिला.

पार्टी ने त्रिपुरा चुनाव पर लगभग 49,400 रुपये खर्च किए. इसके अलावा पार्टी ने पेशेवर शुल्क, विज्ञापन शुल्क और अन्य पंजीकरण संबंधी ख़र्चों पर 52,000 रुपये ख़र्च किए. सभी ख़र्चों के बाद वित्त वर्ष के अंत में पार्टी के पास सिर्फ़ 75 रुपये बचे.

इन सभी आरोपों के बावजूद, जियल वर्नियर यह भी कहते हैं कि ऐसा भी नहीं है कि आरयूपीपी बुरे ही हैं.

वह कहते हैं, "हमें यह ध्यान रखना होगा कि आरयूपीपी मूल रूप से नागरिकों के चुनावों में भाग लेने के अधिकार से उपजते हैं. कुछ दलों के अनुचित व्यवहार की वजह से उन सैकड़ों दलों को दबाना ठीक नहीं होगा जो भारत के लोकतांत्रिक जीवन में योगदान देते हैं."

त्रिपुरा में उनकी शुरुआत भले ही फीकी रही, लेकिन सीधे लोकसभा के साथ वे भारतीय राजनीति में 'वाइल्ड कार्ड एंट्री' कर सकते हैं.

विडंबना यह है कि उनके 2023 के चुनावी पोस्टरों के शीर्ष पर लिखा था: "निजेर अधिकार रक्षा कोरते दोलबोदलुदेर साथ छारुन" (अपने अधिकारों की रक्षा के लिए दल-बदलुओं से दूर रहें).

Questions ouvertes

  • विलय के पीछे तृणमूल कांग्रेस के सांसदों के वास्तविक उद्देश्य क्या हैं?
  • क्या चुनाव आयोग आरयूपीपी के फंड की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए और कदम उठाएगा?
  • क्या एनसीपीआई का राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव बढ़ेगा?

Sujets liés

This article was originally published by BBC हिंदी.
Justice Varma's Impeachment Motion Futile Post-Resignation, Say Experts
En développement·2 sa önce

Justice Varma's Impeachment Motion Futile Post-Resignation, Say Experts

Constitutional experts state that the motion to remove former Allahabad HC judge Justice Yashwant Varma is pointless after his resignation on April 9, following the discovery of unaccounted money. Varma resigned before the inquiry committee's report could be tabled in Parliament. Experts argue that a resigned judge cannot be impeached, making the tabling of the report a mere formality.

Times of India
Bengal CM Adhikari Proposes Syama Prasad Mookerjee's Life in Syllabus, Singur Movement Removed
En développement·3 sa önce

Bengal CM Adhikari Proposes Syama Prasad Mookerjee's Life in Syllabus, Singur Movement Removed

West Bengal CM Suvendu Adhikari proposed including Syama Prasad Mookerjee's life in the state's syllabus and removing the Singur movement. He stated Mookerjee's vision of an undivided India and his contributions should be taught from the next academic year. The CM also announced plans to preserve Mookerjee's heritage building and establish a library in his memory.

Times of India