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क्या पाकिस्तान, सऊदी अरब और क़तर इसराइल को मान्यता देंगे? ट्रंप की अपील पर चर्चा
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BBC हिंदी25.05.2026Monde5 dk okumaIndia

क्या पाकिस्तान, सऊदी अरब और क़तर इसराइल को मान्यता देंगे? ट्रंप की अपील पर चर्चा

L'essentiel

डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान, सऊदी अरब और क़तर से इसराइल को मान्यता देने का आग्रह किया है। सीनेटर ग्राहम ने चेतावनी दी है कि इनकार करने पर संबंधों पर असर पड़ सकता है, जिससे सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं हुई हैं।

Résumé généré par IA

Pourquoi c'est important

Former US President Donald Trump has initiated discussions with leaders of several Middle Eastern countries, including Pakistan, Saudi Arabia, and Qatar, regarding potential normalization of relations with Israel. This initiative is linked to ongoing positive developments in talks with Iran.

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क्या पाकिस्तान, सऊदी अरब और क़तर इसराइल को मान्यता देंगे? ट्रंप की अपील पर चर्चा

प्रकाशित 15 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 8 मिनट

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान के साथ बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है. उन्होंने मध्य पूर्व के देशों का शुक्रिया करते हुए उम्मीद जताई कि वे भी इसराइल को मान्यता देने वाले ऐतिहासिक अब्राहम समझौते में शामिल हो सकते हैं.

ट्रंप के ट्रुथ सोशल पर दिए गए इस बयान की ख़ासी चर्चा है.

ट्रंप के बयान के बाद अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर इसका समर्थन करते हुए लिखा, ''अगर बातचीत के ज़रिये ईरान-अमेरिका संघर्ष का मामला सुलझ जाता है और क्षेत्र के अरब और मुस्लिम सहयोगी अब्राहम समझौते में शामिल हो जाते हैं तो यह मध्य पूर्व के इतिहास में सबसे असरदार समझौता होगा.''

हालांकि ट्रंप ने अपने संदेश में किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन ग्राहम ने इस सिलसिले में सऊदी अरब, क़तर और पाकिस्तान का ज़िक्र किया.

ग्राहम ने चेतावनी दी कि अगर ये देश ऐसा नहीं करते हैं, तो "हमारे भविष्य में हमारे संबंधों पर गंभीर असर पड़ सकता है.''

इस चेतावनी के बाद यह मुद्दा सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है.

पाकिस्तान, सऊदी अरब और क़तर के यूजर्स ने सोशल मीडिया पर इस पर काफ़ी प्रतिक्रिया दी है.

कई लोगों ने ग्राहम की आलोचना की है कि वो इन देशों पर इसराइल को मान्यता देने के लिए दबाव कैसे डाल सकते हैं.

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मुस्लिम देशों के नेताओं ने ट्रंप के साथ फ़ोन पर क्या चर्चा की?

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गौरतलब है कि रविवार को ट्रंप ने पाकिस्तान, सऊदी अरब, तुर्की, क़तर, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन के नेताओं से फ़ोन पर बातचीत की थी.

इनमें पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान भी शामिल थे.

ट्रंप ने कहा था कि ईरान के साथ बातचीत में हुई प्रगति के बारे में इसराइल को बता दिया गया है. ट्रंप के मुताबिक़ समझौते को अंतिम रूप दिया जा रहा है और जल्द ही इसकी घोषणा की जा सकती है.

अरब और मुस्लिम देशों के नेताओं के साथ ट्रंप की हुई चर्चाओं का पूरा ब्योरा तो उपलब्ध नहीं है. लेकिन ट्रंप के मुताबिक़ बैठक के दौरान ईरान के साथ शांति के लिए सहमति पत्र के सभी पहलुओं पर चर्चा हुई.

ट्रंप ने कहा कि समझौते में कई पहलू शामिल हैं. इनमें होर्मुज़ स्ट्रेट से समुद्री यातायात की बहाली भी शामिल है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने शांति स्थापित करने के लिए ट्रंप की "असाधारण कोशिश" के लिए उन्हें धन्यवाद दिया है.

उन्होंने कहा, "फ़ील्ड मार्शल सैयद आसिम मुनीर ने टेलीफोन पर बातचीत में पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व किया और मैं इस पूरी प्रक्रिया में उनके अथक प्रयासों की सराहना करता हूं. "

शाहबाज़ शरीफ़ ने एक्स पर लिखा, इससे "क्षेत्र में शांति प्रयासों को आगे बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा करने का अहम मौका मिला.''

पाकिस्तानी पीएम ने उम्मीद जताई कि उनका देश जल्द ही अगले दौर की बातचीत की मेजबानी करेगा. इस बीच, सऊदी प्रेस एजेंसी (एसपीए) ने कहा कि फ़ोन पर हुई बातचीत में हाल के घटनाक्रमों पर चर्चा हुई.

इसमें ट्रंप की तारीफ़ की गई और क़तर और पाकिस्तान के मध्यस्थता की कोशिश को सराहा गया.

न्यूज़ प्लेटफ़ॉर्म एक्सियोस ने फ़ोन कॉल के बारे में जानकारी रखने वाले दो अमेरिकी अधिकारियों का हवाला देते हुए बताया कि ट्रंप ने "कई अरब और मुस्लिम देशों से कहा कि अगर ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने के लिए कोई समझौता हो जाता है तो वह चाहते हैं कि ये देश इसराइल के साथ शांति समझौते पर दस्तख़त करें.''

रिपोर्ट में एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से दावा किया गया है कि "सऊदी अरब, क़तर और पाकिस्तान के नेता, ट्रंप के अनुरोध से हैरान थे. इन तीनों का इसराइल से संबंध नहीं हैं. फोन पर सन्नाटा छा गया और ट्रंप ने मजाक में पूछा कि क्या वे (कॉल पर) मौजूद हैं या नहीं.''

अब तक इन देशों ने औपचारिक रूप से कॉल के ब्योरे साझा नहीं किए हैं और न ही ट्रंप की ओर से इस तरह की बातचीत की कोई पुष्टि हुई है.

गौरतलब है कि पिछले नवंबर में व्हाइट हाउस में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ एक बैठक के दौरान ट्रंप ने इसराइल को मान्यता देने की सलाह दी थी.

मुस्लिम देश लिंडसे ग्राहम की चेतावनी से नाराज़

रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम को ट्रंप के प्रमुख सहयोगियों में से एक माना जाता है.

उन्होंने सऊदी अरब, क़तर और पाकिस्तान का नाम लेते हुए कहा कि "इनका अब्राहम समझौते में शामिल होना इस क्षेत्र और दुनिया के लिए एक बड़ा बदलाव होगा. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ये एक असाधारण क़दम है.''

"सऊदी अरब और अन्य देशों के लिए मध्य पूर्व के नए भविष्य के लिए साहसिक कदम उठाने का समय आ गया है. राष्ट्रपति इस तरह के संकेत दे चुके हैं.''

ग्राहम को उम्मीद है कि ये देश "अब्राहम समझौते में शामिल होंगे, जिससे अरब-इसराइल संघर्ष समाप्त हो जाएगा.''

सऊदी अरब या पाकिस्तान की ओर से ग्राहम के संदेश पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है. लेकिन इस पर तीख़ी प्रतिक्रियाएं हुई हैं.

दोनों ही देश इसराइल को मान्यता नहीं देते और संयुक्त अरब अमीरात के उलट, इसराइल के साथ उनके राजनयिक संबंध भी नहीं हैं.

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए पाकिस्तानी पत्रकार हामिद मीर ने एक्स पर लिखा, "कुछ दिन पहले ग्राहम पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जहर उगल रहे थे. अचानक वो पाकिस्तान की तारीफ़ कर रहे हैं. वे कोई खेल खेल रहे हैं.''

वहीं पत्रकार असमां शिराज़ी ने कहा कि ग्राहम 'सपने देख रहे हैं'.

सऊदी अरब के एक यूजर अब्दुलसलाम सालेह ने लिखा कि सऊदी अरब ने 22 मई, 2026 को दो राष्ट्र के समाधान के लिए एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाया है.

उन्होंने ग्राहम से पूछा, "आपको अब्राहम समझौते में शामिल होने का सुझाव देने के लिए किसने प्रेरित किया? क्या आप हम पर कोई एहसान कर रहे हैं या हमारे फ़ैसलों को दिशा दे रहे हैं ?''

"फ़लस्तीन के मुद्दे पर हमारा रुख़ किसी भी सौदेबाजी का हिस्सा नहीं है. और न ही धमकियों या प्रलोभनों से दबाव डाला जा सकता है.''

उन्होंने लिखा, "पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर एक स्वतंत्र फ़लीस्तीनी राज्य की स्थापना के बिना शांति संभव नहीं है. यही वह स्थिति है जिसके बारे में हमने दुनिया को बताया है.इसे 165 देशों का समर्थन हासिल है.''

एक सऊदी यूजर ने लिखा कि 'सऊदी अरब अपने हितों के हिसाब फ़ैसला लेगा न कि लिंडसे ग्राहम के मध्यपूर्व के नज़रिये आधार पर.'

क्या यह प्रस्ताव लागू होगा?

मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ दानी सित्रिनोविच के मुताबिक़ इसराइल और सऊदी अरब के बीच राजनयिक संबंधों की बहाली की उम्मीदें बेबुनियाद हैं.

उन्होंने कहा कि इस संदर्भ में, "फ़लीस्तीनी मुद्दे को पूरी तरह से नजरअंदाज करना संभव नहीं है. इस अपेक्षा को बार-बार दोहराने से मध्य पूर्व की रणनीतिक वास्तविकता नहीं बदलेगी.''

उनका मानना ​​है कि 'किसी न किसी मोड़ पर, इसराइली नीति निर्माताओं और जनता दोनों को एक बुनियादी हकीकत का सामना करना पड़ेगा'

अरब जगत, ख़ासकर सऊदी अरब के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के लिए फ़लस्तीनी मुद्दे पर सार्थक प्रगति की जरूरत होगी. केवल प्रतीकात्मक कदम से काम नहीं चलेगा. ठोस राजनीतिक तरक्की की जरूरत होगी.

थिंक टैंक कार्नेगी एंडोमेंट के इरविन डेविड मिलर ने कहा , "इससे कमजोर तर्क शायद ही कोई हो. खाड़ी देशों का ध्यान सुरक्षा और स्थिरता पर केंद्रित होगा.''

"यह कदम संयुक्त अरब अमीरात ने अकेले उठाया है और कुछ ही देश इसका अनुसरण करेंगे. इसराइल की मौजूदा सरकार को देखते हुए यह मानना ​​अविश्वसनीय लगता है कि अब संबंध सामान्य हो सकेंगे.''

इस बीच पाकिस्तानी पत्रकार जफ़र नकवी चाहते हैं कि पाकिस्तान इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया दे क्योंकि 'ये बहुत ख़तरनाक संकेत हैं.'

गौरतलब है कि पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ़ ने अप्रैल में इसराइल की आलोचना करते हुए इसे 'कैंसर करार दिया था.

उन्होंने आरोप लगाया था कि "इसराइली अभियानों में निर्दोष नागरिक मारे जा रहे हैं. पहले ग़जा में फिर ईरान में और अब लेबनान में रक्तपात का एक अनियंत्रित प्रवाह दिख रहा है.''

इसराइली प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस बयान की निंदा करते हुए कहा था, "पाकिस्तान के रक्षा मंत्री की ओर से इसराइल को ख़त्म करने की अपील बेहद भड़काऊ है.यह एक ऐसा बयान है जिसे कोई भी सरकार मंजूर नहीं कर सकती. ख़ासकर ऐसी सरकार जो खुद को शांति के लिए निष्पक्ष मध्यस्थ होने का दावा करती है.''

सितंबर 2025 में इसराइल और कतर में हमास के ख़िलाफ़ ड्रोन हमला किया था.

2020 में क़तर के विदेश मंत्री ने एक इंटरव्यू में कहा था इसराइल साथ शांति समझौते के लिए पहले एक ऐसे फ़लीस्तीनी देश की स्थापना जरूरी है. ऐसा देश जो फ़लस्तीनियों को मंजूर हो.

À surveiller

Perspective IA — des possibilités, pas des certitudes

  • Pakistan, Saudi Arabia, and Qatar will likely face increased diplomatic pressure from the US to normalize relations with Israel.

    Probable · En quelques semaines

  • The Palestinian issue will remain a significant obstacle to normalization for Saudi Arabia and Qatar.

    Très probable · En quelques mois

  • The current Israeli government's policies will make normalization with key Arab nations difficult without substantial progress on the Palestinian front.

    Probable · En quelques mois

Questions ouvertes

  • Will Saudi Arabia, Qatar, and Pakistan agree to recognize Israel?
  • What are the specific terms of the potential Iran-US agreement?
  • How will the Palestinian issue be addressed in any normalization deal?
  • What will be the concrete impact on US relations if these countries refuse?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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