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Retourमुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन का बयान: क्या ट्रेड स्किल्स का ज़माना आ गया है?
मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन का बयान: क्या ट्रेड स्किल्स का ज़माना आ गया है?
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BBC हिंदी20/06/2026Business7 min de lectureIndia

मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन का बयान: क्या ट्रेड स्किल्स का ज़माना आ गया है?

L'essentiel

भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा है कि वैश्वीकरण के दौर ने कंप्यूटर साइंस और एमबीए जैसी डिग्रियों को बढ़त दी थी, लेकिन अब वह दौर समाप्त हो रहा है। भविष्य ट्रेड स्किल्स और सॉफ़्ट स्किल्स का है, क्योंकि प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, वेल्डर और कारपेंटर जैसे पेशों में मानवीय कौशल की ज़रूरत होती है जिसे एआई आसानी से नहीं ले सकता।

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Author, शुभ राणा

पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रकाशित 8 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 8 मिनट

भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन के एक बयान ने सोशल मीडिया पर एक बहस छेड़ दी है.

समाचार एजेंसी एएनआई को दिए इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण के दौर ने कंप्यूटर साइंस और एमबीए जैसी डिग्रियों को बढ़त दी थी, लेकिन अब वह दौर समाप्त हो रहा है.

उनके मुताबिक़, भविष्य ट्रेड स्किल्स और सॉफ़्ट स्किल्स का है, क्योंकि प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, वेल्डर और कारपेंटर जैसे पेशों में मानवीय कौशल की ज़रूरत होती है और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) आसानी से इसकी जगह नहीं ले सकता है.

उनका कहना है कि युवाओं को ऐसे स्किल्स हासिल करने चाहिए जिनकी जगह टेक्नोलॉजी आसानी से नहीं ले सके.

ट्रेड स्किल्स वे व्यावहारिक और तकनीकी कौशल होते हैं, जो किसी ख़ास काम या पेशे को करने के लिए ज़रूरी होते हैं, जैसे प्लंबिंग या इलेक्ट्रिकल काम.

उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब एआई के रोज़गार पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं और इस बात पर बहस तेज़ हो रही है कि पारंपरिक उच्च शिक्षा के रास्ते जैसे कॉलेज और यूनिवर्सिटी की पढ़ाई आज के समय में कितनी प्रासंगिक और उपयोगी हैं.

इसे समझने के लिए हमने विश्लेषकों से बात की.

नागेश्वरन ने क्या कहा?

भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी. अनंत नागेश्वरन ने समाचार एजेंसी एएनआई के एक पॉडकास्ट में शामिल हुए थे.

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इस इंटरव्यू में वी अनंत नागेश्वरन से पूछा गया, "एक 22 साल के नौजवान को आप क्या सलाह देंगे क्योंकि शिक्षा का मॉडल ऐसा है कि आप पहले बीए, एमए करें फिर एमफ़िल-पीएचडी करें और फिर यूपीएससी की सोचें. यह मॉडल रोज़गार की गारंटी नहीं देता है. आपकी क्या सलाह होगी?"

इस पर नागेश्वरन ने जवाब दिया, "ईमानदारी से कहूं, मैं अपने बच्चों और दोस्तों के बच्चों को भी सलाह देता हूं. मुझे लगता है कि स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, जापान, कोरिया या चीन जैसे देशों को लें जिन्होंने सफलतापूर्वक विकास किया है. इन देशों में ट्रेड स्किल्स को बहुत अधिक सम्मानित बनाया गया है. उनके मुक़ाबले इस देश में इन पेशों को बहुत कम इज़्ज़त दी गई है."

सीईए ने कहा, "अगर आप वेल्डर हैं, प्लम्बर हैं या फिर कोई इलेक्ट्रीशियन हैं या बढ़ई हैं...या चाहें कुछ भी, भारत में इन्हें तवज्जो नहीं दी जाती. हम इसे डिप्लोमा कह देते हैं, जबकि ये भी डिग्री जैसा ही है. हमने इन कामों को ज़्यादा स्वीकार नहीं किया है, सम्मान नहीं दिया, इन्हें फ़ैशनेबल नहीं माना. इसे बदलने की ज़रूरत है."

"मुझे लगता है कि ये वो क्षेत्र हैं जहां टेक्नोलॉजी चाहे जितनी भी एडवांस हो जाए, वो आपकी नौकरी नहीं ले सकती. ऐसे में आपको ख़ुद को ट्रेड स्किल्स में महारत हासिल करने की ज़रूरत है. और हां, वैश्वीकरण की दुनिया ने कम्यूटर साइंस या एमबीए एजुकेशन को कुछ बढ़त दी है. लेकिन वो दौर अब ख़त्म हो चुका है. अब ट्रेड स्किल्स का ज़माना है, सॉफ़्ट स्किल्स का दौर है, जिसे एआई आसानी से रीप्लेस नहीं कर सकेगा, जहां इंसानी हुनर की ज़रूरत होती है."

इसी इंटरव्यू में उन्होंने अपने एक दोस्त के बेटे का उदाहरण दिया जो शेफ़ के काम से हताश हो गया था. नागेश्वरन ने कहा, "मैंने उससे कहा कि असल में तुम सोने की खान पर बैठे हो, तुम्हारी जगह एआई नहीं ले सकता. तुम्हारे दोस्तों जैसे कई लोगों की जगह हो सकता है एआई ले ले."

"इसीलिए मेरी सलाह है कि आपको ट्रेड, सॉफ़्ट स्किल्स और प्रोफ़ेशनल स्किल्स में हुनरमंद होना होगा, क्योंकि टेक्नोलॉजी बहुत आसानी से इसकी जगह नहीं ले सकती."

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया

नागेश्वरन के बयान को लेकर सोशल मीडिया में कई तरह की प्रतिक्रियाएं आई हैं.

गिरीश मिगलानी नाम के एक एक्स यूज़र ने लिखा, "सीईए वी. अनंत नागेश्वरन ने एक धारणा को विस्तार से समझाया. लेकिन उसमें एक बुनियादी चूक कर बैठे. भविष्य को पीछे मुड़कर नहीं देखा जा सकता."

उन्होंने लिखा है, "भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने भविष्य में ज़रूरी कौशलों पर अपनी बात रखी. लेकिन स्किलिंग नीति की जिस सोच को आधार बनाया जा रहा है, वह चिंता की वजह बन सकती है."

खुद को गांधीवादी पॉलिटिकल एनालिस्ट और स्ट्रेटेजिस्ट बताने वाले एक एक्स यूज़र दुष्यंत नागर ने लिखा, "पहले मोदी जी युवाओं को डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया और हाई-टेक जॉब्स का सपना दिखाते थे. इंजीनियरिंग, एआई, सॉफ्टवेयर, एमबीए को भविष्य बताया जाता था."

"आज सीईए ख़ुद कह रहे हैं कि एआई की दौड़ से भारत बाहर हो चुका है और मैन्युफ़ैक्चरिंग में रोज़गार सृजन बुरी तरह फे़ल हो गया. इसलिए अब युवाओं को खाना बनाना, प्लंबिंग, वेल्डिंग, केयरगिविंग, इलेक्ट्रीशियन जैसी ट्रेड स्किल्स की ओर जाना चाहिए."

"सॉफ्टवेयर और एमबीए का दौर खत्म! ये सलाह नहीं, बल्कि 10 साल की नीति विफलता की स्वीकारोक्ति है."

'क्या एमबीए की डिग्री नौकरी की गारंटी नहीं रही?'

आईआईटी दिल्ली से मैनेजमेंट की पढ़ाई करने वाले अभिषेक प्रद्योत एमबीए को लेकर उम्मीद से भरे दिखते हैं.

वो कहते हैं, "जब मैंने सीईए का यह बयान सुना, तो मेरा पहला रिएक्शन यह था कि पारंपरिक एमबीए मार्केट सैचुरेट हो रहा है, लेकिन खत्म नहीं हो रहा. कंपनियां अब भी एमबीए ग्रेजुएट्स को हायर कर रही हैं. हालांकि कुछ सेक्टर, जैसे आईटी, में नौकरियों पर दबाव आया है."

अभिषेक का कहना है कि उन्होंने मार्केटिंग में एमबीए करियर बनाने के लिए किया है.

उनके अनुसार, "एआई डेटा एनालिसिस और इनसाइट्स दे सकता है, लेकिन बड़े प्रबंधन फ़ैसलों में इंसान की ही ज़रूरत होगी और यही बात एमबीए ग्रेजुएट्स की भूमिका को महत्वपूर्ण बनाती है."

हालांकि अर्थशास्त्री मिताली निकोरे कहती हैं, "एक समय ऐसा था जब एमबीए की डिग्री को बेहतर नौकरी और ज़्यादा तनख़्वाह की गारंटी के तौर पर देखा जाता था, लेकिन अब परिस्थितियां बदल रही हैं."

निकोरे के मुताबिक़, "1990 और 2000 के दशक में वैश्वीकरण और कॉर्पोरेट क्षेत्र के विस्तार से प्रबंधन पेशेवरों को बड़ा लाभ मिला, लेकिन आने वाले वर्षों में केवल डिग्री के आधार पर करियर बनाना मुश्किल हो सकता है."

'सिर्फ़ डिग्री नहीं, क्रिएटिव थिंकिंग की भी होगी ज़रूरत'

एआई के रोज़गार पर प्रभाव को लेकर चिंताएं केवल भारत तक सीमित नहीं हैं.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमफ़) की साल 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में क़रीब 40 फ़ीसदी नौकरियाँ एआई से प्रभावित हो सकती हैं, हालांकि इसका असर अलग-अलग क्षेत्रों और कौशल स्तरों पर अलग होगा.

मिताली निकोरे कहती हैं, "एआई के बढ़ते इस्तेमाल से प्रशासनिक और क्लर्क जैसी कई नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं. ऐसे में क्रिएटिव थिंकिंग, समस्या-समाधान की क्षमता और तकनीक के साथ काम करने की योग्यता अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी."

उनका मानना है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था ने लंबे समय तक चीज़ों को रटने पर ज़ोर दिया है, जबकि अब स्टूडेंट्स में स्वतंत्र सोच और व्यावहारिक कौशल विकसित करने की ज़रूरत है.

'एआई सबकुछ नहीं कर सकता'

मणिकांत रॉय नोएडा के जयपुरिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट में बिज़नेस एनालिटिक्स, एआई और डेटा साइंस के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.

वो कहते हैं, "एआई ने जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया है और इसी वजह से इसे एमबीए शिक्षा में भी तेज़ी से शामिल किया जा रहा है. हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि एआई के आने से एमबीए की उपयोगिता ख़त्म हो जाएगी."

रॉय कहते हैं कि भविष्य के मैनेजर्स के लिए समस्या-समाधान, क्रिटिकल थिंकिंग और तकनीक के साथ काम करने की क्षमता बेहद अहम होगी.

रॉय के मुताबिक, "एमबीए की पढ़ाई सिर्फ़ ऑटोमेशन पर आधारित नहीं है, बल्कि यह छात्रों को बिज़नेस प्लानिंग, फाइनेंस, मार्केटिंग और डेटा एनालिसिस जैसे क्षेत्रों में मानवीय निर्णय और विवेक के साथ काम करना सिखाती है."

उनके अनुसार, "एआई कुछ हिस्सों में, ख़ासकर डेटा एनालिसिस जैसे कार्यों में, दक्षता बढ़ा सकता है, लेकिन अंतिम निर्णय में मानवीय हस्तक्षेप आवश्यक रहेगा."

रॉय बताते हैं कि एआई ने काम की गति और सटीकता दोनों को बढ़ाया है और अब कंपनियां ऐसे पेशेवरों को प्राथमिकता दे रही हैं जो एआई के साथ तेज़ और प्रभावी तरीके से काम कर सकें.

हाथ का हुनर, लेकिन समाज में कम सम्मान

सीईए वी. अनंत नागेश्वरन ने पॉडकास्ट में यह भी कहा था कि दुनिया के कई देशों जैसे जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन में ट्रेड स्किल्स जैसे वेल्डिंग, प्लंबिंग, इलेक्ट्रिकल और कारपेंट्री को अच्छा सामाजिक सम्मान मिलता है, जबकि भारत में इन्हें अपेक्षाकृत कमतर माना जाता है.

नागेश्वरन के अनुसार, इन कौशलों को अक्सर 'डिप्लोमा' कहकर उनकी अहमियत कम कर दी जाती है, जबकि ये भी उतने ही महत्वपूर्ण पेशेवर कौशल हैं.

वो कहती हैं, "भविष्य में सामान्य कौशल रखने वालों की तुलना में किसी एक क्षेत्र में गहरी विशेषज्ञता रखने वाले लोगों की मांग बढ़ सकती है. इसलिए युवाओं को उन्नत तकनीकी विषयों, इनोवेशन और उद्यमिता की दिशा में भी सोचने की ज़रूरत है."

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This article was originally published by BBC हिंदी.