पश्चिम बंगाल में टीएमसी के कांग्रेस में विलय की अटकलें, क्या बदलेगा राजनीतिक समीकरण?
L'essentiel
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के अस्तित्व के संकट के बीच, ममता बनर्जी और सोनिया गांधी की मुलाक़ात के बाद टीएमसी के कांग्रेस में विलय की अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि दोनों पार्टियों ने इससे इनकार किया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह विलय टीएमसी को राष्ट्रीय राजनीति में नई भूमिका दे सकता है, जबकि कांग्रेस को बड़ा वोट बैंक मिल सकता है।
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Pourquoi c'est important
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस 1977 से और सीपीएम 2011 से सत्ता से बाहर हैं। अब ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस भी संकट में है, जिसके कई विधायक और सांसद पार्टी से अलग हो गए हैं। इस बीच, ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी ने कांग्रेस नेताओं सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मुलाकात की है।
पश्चिम बंगाल में विपक्ष के लिए राजनीति कभी आसान नहीं रही है.
कांग्रेस सत्ता से 1977 में बाहर हुई तो आज तक लौट नहीं पाई है. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) 2011 में सत्ता से बाहर हुई और आज तक उबर नहीं पाई है.
अब तृणमूल कांग्रेस इस वर्ष सत्ता से बाहर हुई और पार्टी अस्तित्व के संकट से जूझ रही है.
ममता बनर्जी की पार्टी के कई विधायक और सांसद उनसे अलग हो गए हैं. विधानसभा में बाग़ी गुट ने अपना नेता प्रतिपक्ष बना लिया है.
दावा किया जा रहा है कि टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 बाग़ी हो गए हैं. कुछ राज्यसभा सांसदों ने भी पार्टी से और सांसदी से इस्तीफ़ा दे दिया है.
इस संकट के बीच ममता बनर्जी ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से मुलाक़ात की है.
टीएमसी महासचिव और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने भी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से मुलाक़ात की है.
इन मुलाक़ातों के हवाले से बुधवार को भारतीय मीडिया में ऐसी ख़बरें आना शुरू हो गईं कि टीएमसी का कांग्रेस में विलय हो सकता है. हालाँकि दोनों पार्टियों ने इससे इनकार किया है.
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने बुधवार को एक्स पर लिखा, ''कुछ मीडिया रिपोर्टों में सोनिया गांधी और ममता बनर्जी के बीच हुई मुलाक़ात को लेकर जो दावे किए जा रहे हैं, वे पूरी तरह से ग़लत हैं. यह मुलाक़ात बेहद सौहार्दपूर्ण माहौल में हुई थी. दोनों नेताओं के बीच लंबे समय से व्यक्तिगत और राजनीतिक संबंध रहे हैं, इसलिए बातचीत के दौरान कई निजी विषयों पर भी चर्चा हुई.''
टीएमसी सांसद कीर्ति आज़ाद ने कहा है कि विलय की ख़बर पर वह कुछ नहीं कह सकते हैं और इसके बारे में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व ही बता सकता है.
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि उन्हें किसी विलय या ऐसे किसी प्रस्ताव की जानकारी नहीं है, लेकिन उन्होंने संकेत दिया कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक झटकों के बाद तृणमूल कांग्रेस का रवैया बदला हुआ दिखाई दे रहा है.
अधीर रंजन चौधरी ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, "मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूँ. मुझे बंगाल में किसी विलय या इस तरह की किसी चर्चा की कोई जानकारी नहीं है. अगर किसी मुद्दे पर औपचारिक फ़ैसला होता है, तो निश्चित रूप से हमें विश्वास में लिया जाएगा."
तृणमूल कांग्रेस की मौजूदा स्थिति पर टिप्पणी करते हुए अधीर रंजन चौधरी ने कहा, "आप सभी देख सकते हैं कि पार्टी बिखरी हुई नज़र आ रही है. पार्टी के वरिष्ठ नेता इधर-उधर जा रहे हैं."
उन्होंने तंज़ भरे अंदाज़ में कहा, "इतने वर्षों तक उन्हें कांग्रेस नेताओं से मिलने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं हुई. लेकिन अब शायद उन्हें लग रहा है कि कांग्रेस नेताओं से मिलना चाहिए."
अधीर रंजन चौधरी का यह बयान ऐसे समय आया है जब सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की मुलाकात को लेकर राजनीतिक अटकलें तेज़ हैं और विपक्षी राजनीति में संभावित नए समीकरणों पर चर्चा हो रही है.
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक सायंतन घोष ने विलय की ख़बरों को लेकर अपनी टिप्पणी में एक्स पर लिखा है, ''दिल्ली से पश्चिम बंगाल कांग्रेस के लिए बहुत अच्छी ख़बर नहीं आ रही है. पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस में जल्द या देर से बड़े पैमाने पर दल-बदल होना तय है. कांग्रेस से टीएमसी. टीएमसी के बाद एनसीपी और अब विलय की बात हो रही है. मैं पहले भी कहता रहा हूं कि बंगाल की राजनीति जितनी दिलचस्प है, उतनी शायद ही कहीं और हो. यहाँ राजनीतिक यात्राएँ कभी सीधी रेखा में नहीं चलतीं.''
वरिष्ठ पत्रकार सबा नक़वी ने लिखा है, ''अगर कांग्रेस और टीएमसी का विलय होता है, तो इससे टीएमसी को राज्य में अव्यवस्था और गिरावट की स्थिति से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका मिल सकती है, ख़ासकर लोकतंत्र में गिरावट जैसे मुद्दों पर कांग्रेस के साथ तालमेल बिठाते हुए. यह कांग्रेस के लिए भी फ़ायदेमंद हो सकता है, क्योंकि उसे टीएमसी के बड़े वोट बैंक तक पहुँच मिल जाएगी. लेकिन यह अधीर रंजन चौधरी के लिए अच्छी ख़बर नहीं होगी, जो बंगाल में सिकुड़ चुकी कांग्रेस की राजनीति में एक बड़ी हैसियत हैं.''
सबा नक़वी ने लिखा है, ''वाम दलों को भी यह पसंद नहीं आएगा. वे लंबे समय से इस रणनीति पर काम कर रहे थे कि पहले ममता बनर्जी को कमज़ोर किया जाए और फिर बीजेपी को चुनौती दी जाए. उन्हें उम्मीद थी कि टीएमसी के कमज़ोर होने के बाद विपक्षी राजनीति की ख़ाली जगह वे भर सकेंगे.''
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक वीर सांघवी टीएमसी-कांग्रेस के विलय को एक बेकार आइडिया मानते हैं.
वीर सांघवी ने द प्रिंट में लिखा है, ''कांग्रेस को टीएमसी से कोई ख़ास लाभ नहीं मिलने वाला. ममता बनर्जी आज जितनी अलोकप्रिय हैं, शायद पहले कभी नहीं थीं.''
सांघवी ने लिखा है, ''ऐसी स्थिति में कांग्रेस एक नई शुरुआत करके बीजेपी विरोधी राजनीतिक स्पेस का हिस्सा हासिल करने की कोशिश क्यों न करे? वह ममता बनर्जी की अलोकप्रियता का बोझ अपने ऊपर क्यों ले? क्या कोई भी पार्टी ममता बनर्जी के साथ सफलतापूर्वक तालमेल बिठा सकती है? एक नेता के रूप में उनकी सबसे बड़ी ताक़त ही एक सहयोगी के रूप में उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है. वह ख़ुद एक शक्ति की केंद्र हैं और कभी किसी के प्रति जवाबदेह नहीं रही हैं.''
''जब वह कांग्रेस में थीं, तब भी लगभग सभी से उनका टकराव हुआ. जब उन्होंने बीजेपी के साथ हाथ मिलाया, तब भी वहाँ उनके विवाद रहे. जब वह दोबारा कांग्रेस के साथ गठबंधन में आईं, तब उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को टीएमसी में शामिल होने के लिए प्रेरित करके बंगाल कांग्रेस संगठन को कमज़ोर किया.''
''तीसरा, मान भी लें कि ममता बनर्जी एक ऐसी नेता होतीं जिनसे सभी आसानी से तालमेल बिठा लेते, न कि एक लड़ाकू और अप्रत्याशित राजनीतिक व्यक्तित्व. तब भी क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई ऐसी नेता, जिसने तीन कार्यकाल तक अपने राज्य में सर्वोच्च राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखा हो, वह स्वेच्छा से पार्टी अनुशासन स्वीकार करेगी और कांग्रेस अध्यक्ष की बात मानेंगी?''
''कांग्रेस में शायद केवल एक व्यक्ति हैं, जिनके प्रति ममता बनर्जी वास्तव में सम्मान रखती हैं और वह हैं सोनिया गांधी. लेकिन जब टीएमसी और कांग्रेस सहयोगी थी, तब भी सोनिया गांधी का ममता बनर्जी पर बहुत अधिक प्रभाव नहीं था. निर्णायक क्षण आने पर ममता बनर्जी किसी की नहीं सुनतीं.''
देश की आज़ादी के बाद से 1977 तक कांग्रेस पश्चिम बंगाल में सत्ता में रही लेकिन शरणार्थी संकट और नक्सलवादी आंदोलन के कारण पार्टी में दरारें बढ़ने लगी थीं.
प्रियरंजन दासमुंशी और सोमेन मित्रा जैसे नेताओं ने वाम मोर्चा के ख़िलाफ़ यूथ कांग्रेस को मज़बूत करने की ठोस कोशिश भी की थी लेकिन इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी और इससे वामदलों को निर्णायक बढ़त मिली.
कांग्रेस ने 1982 में 49 प्रतिशत वोट के साथ थोड़ी वापसी की लेकिन आंतरिक मतभेदों ने उसकी ताक़त को कमज़ोर कर दिया.
असल मोड़ 1998 में आया. यूथ कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने पार्टी के वामदलों के प्रति कथित नरम रुख़ के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी.
सीताराम केसरी के नेतृत्व वाली कांग्रेस शुरुआती यूपीए दौर में वामपंथ-समर्थक गठबंधनों की ओर झुकाव रखती थी.
1992 में सोमन मित्रा ने पश्चिम बंगाल प्रदेश अध्यक्ष का पद बहुत कम अंतर से जीता था लेकिन ममता का उभार जल्द ही उन पर भारी पड़ गया.
हालांकि मित्रा को केसरी और प्रणब मुखर्जी का समर्थन हासिल था. जनवरी 1997 में 'पार्टी-विरोधी' टिप्पणियों के कारण ममता को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया.
पिछले साल पश्चिम बंगाल कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने हिन्दु्स्तान टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा था कि ममता अपने निष्कासन से बहुत दुखी थीं और कांग्रेस उनके निष्कासन से आज तक उबर नहीं पाई.
1998 में ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की, जो वाम दलों और कांग्रेस दोनों के ख़िलाफ़ खड़ी हुई.
कांग्रेस ने 1996 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में 82 सीटों पर जीत दर्ज की थी लेकिन 2001 में सिर्फ़ 26 सीटों पर आ गई.
कांग्रेस छोड़ने के बाद ममता और आक्रामक हो गई थीं. जिस ममता बनर्जी को कांग्रेस ने पार्टी से निकाला उसी की तृणमूल कांग्रेस के साथ 2001 में गठबंधन किया और केवल 26 सीटें जीतीं.
1947 से लेकर 1990 के दशक तक, पश्चिम बंगाल की राजनीति मुख्यतः वाम और कांग्रेस के बीच संघर्ष का मैदान रही. लेकिन 2010 के दशक ने समीकरण बदल दिए.
À surveiller
Perspective IA — des possibilités, pas des certitudes
पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस में बड़े पैमाने पर दल-बदल हो सकता है।
Probable · Court terme
कांग्रेस और टीएमसी के बीच गठबंधन या विलय की संभावना बनी रहेगी।
Possible · Moyen terme
पश्चिम बंगाल की राजनीति में समीकरण बदलेंगे, जिससे बीजेपी को चुनौती मिल सकती है।
Probable · Moyen terme
Questions ouvertes
- क्या टीएमसी का कांग्रेस में विलय होगा?
- यदि विलय होता है, तो पश्चिम बंगाल की राजनीति पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
- क्या यह विलय कांग्रेस के लिए फायदेमंद होगा?
- अधीर रंजन चौधरी और वाम दलों की इस संभावित विलय पर क्या प्रतिक्रिया होगी?
