US seeks to boost energy ties with India, amid geopolitical shifts
L'essentiel
- US Secretary of State Marco Rubio expressed readiness to increase oil exports to India, discussing energy cooperation during his upcoming visit.
- The move, however, has drawn criticism and raised concerns about US dominance and the future of the petrodollar system.
Résumé généré par IA
Author, रजनीश कुमार
पदनाम, बीबीसी संवाददाता
प्रकाशित 4 मिनट पहले
पढ़ने का समय: 9 मिनट
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने गुरुवार को कहा कि अमेरिका भारत के साथ ऊर्जा सहयोग बढ़ाने को लेकर बातचीत कर रहा है.
उन्होंने कहा कि यह मुद्दा उनकी नई दिल्ली यात्रा के दौरान चर्चा का अहम हिस्सा होगा.
मियामी में पत्रकारों से बात करते हुए रुबियो ने कहा, "भारत हमसे जितना तेल ख़रीदना चाहता है, उतना हम देने के लिए तैयार हैं. अमेरिका इस समय रिकॉर्ड स्तर पर तेल उत्पादन और निर्यात कर रहा है."
रुबियो 23 से 26 मई तक भारत के दौरे पर रहेंगे. इस दौरान वह कोलकाता, आगरा, जयपुर और नई दिल्ली का दौरा करेंगे. रुबियो क्वॉड गुट के विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल होने नई दिल्ली आ रहे हैं. क्वॉड में अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया हैं.
अमेरिका से तेल आयात को लेकर रुबियो ने कहा, "हम चाहते हैं कि अमेरिकी ऊर्जा भारत के ऊर्जा पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा बने. हमें यह भी लगता है कि वेनेज़ुएला के तेल को लेकर भी अवसर मौजूद हैं.
वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज अगले हफ़्ते भारत आने वाली हैं. वेनेज़ुएला और भारत के पास आपस में काम करने के कई अवसर मौजूद हैं.''
रुबियो की इस टिप्पणी पर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं.
जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा, ''अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने एक बार फिर सबसे पहले यह घोषणा कर दी कि वेनेज़ुएला की राष्ट्रपति अगले सप्ताह भारत आने वाली हैं. दिलचस्प बात यह है कि भारत और वेनेजुएला दोनों में से किसी ने भी इस यात्रा का संकेत या आधिकारिक पुष्टि नहीं की थी. अब सवाल यह है कि अमेरिकी विदेश मंत्री के पास भारतीय विदेश नीति के बारे में और कौन-कौन सी जानकारियां पहले से मौजूद हैं और आगे वह क्या-क्या सार्वजनिक करने वाले हैं?''
छोड़कर सबसे अधिक पढ़ी गईं आगे बढ़ें
सबसे अधिक पढ़ी गईं
समाप्त
अमेरिकी वर्चस्व
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
दिनभर: पूरा दिन,पूरी ख़बर (Dinbhar)
वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.
एपिसोड
समाप्त
इसी साल जनवरी में अमेरिका ने वेनेज़ुएला में निकोलस मादुरो के क़रीब 13 सालों के शासन को ख़त्म किया था. इसके बाद से वेनेजु़एला की कमान डेल्सी रोड्रिगेज की पास है.
वेनेज़ुएला में अभी अमेरिका का प्रभाव काफ़ी है. ऐसे में मार्को रुबियो की इस घोषणा से कई लोगों को हैरानी नहीं हुई होगी.
मार्को रुबियो ने जो दूसरी बात कही कि भारत उससे जितना तेल ख़रीदना चाहता है, ख़रीद सकता है, इसे लेकर भी कई एक्सपर्ट चिंता जता रहा हैं.
इसी साल फ़रवरी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि भारत रूस के बदले अमेरिका और वेनेज़ुएला से तेल ख़रीदेगा.
साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंध के प्रोफ़ेसर धनंजय त्रिपाठी कहते हैं, अमेरिका दुनिया भर में तेल की आपूर्ति पर अपना नियंत्रण चाहता है और इसकी शुरुआत उसने वेनेज़ुएला में निकोलस मादुरो का तख़्तालट कर दी थी.
प्रोफ़ेसर धनंजय त्रिपाठी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, ''अमेरिका तेल के कारोबार पर अपना वर्चस्व चाहता है. इसका पैटर्न हमें साफ़ दिख रहा है. पहले रूस से तेल आयात पर सख़्ती, वेनेज़ुएला में सत्ता परिवर्तन और फिर ईरान पर हमला. भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, ऐसे में अमेरिका पर पूरी तरह से निर्भर होना रणनीतिक रूप बहुत बड़ी ग़लती होगी. ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत ने महसूस कर लिया है कि अमेरिका के भरोसे रहना ख़तरे से ख़ाली नहीं है.''
प्रोफ़ेसर त्रिपाठी कहते हैं, ''ईरान के पास गैस का बहुत बड़ा भंडार है. उस पर किसका नियंत्रण होगा, युद्ध इसके लिए भी था. भारत को तो फूँक फूँक कर क़दम रखना होगा. अगले एक साल में पश्चिम एशिया में पेट्रोडॉलर पर सवाल उठेगा. अमेरिकी अधिनायकवाद का सबसे बड़ा सोर्स डॉलर का प्रभुत्व है. तेल डॉलर के ज़रिए ही ख़रीदा जाता है. इसीलिए पूरी दुनिया को डॉलर की ज़रूरत है. अगर तेल का बिज़नेस किसी और मुद्रा में शुरू होता है तो अमेरिकी वर्चस्व और उसकी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका होगा.''
अमेरिका के लिए भारत की कम होती अहमियत
थिंक टैंक क्विंस इंस्टिट्यूट में ग्लोबल साउथ के निदेशक सारंग शिडोर ने अमेरिकी मैगज़ीन फॉरन पॉलिसी में 22 मई को एक लेख लिखा है.
इसमें उन्होंने तर्क दिया है कि क्वॉड अब धीरे-धीरे कमज़ोर हो रहा है और एक नया चार-देशीय समूह, जिसे स्क्वाड कहा जा रहा है, जिसमें भारत की जगह फिलीपींस है. चीन से निपटने के लिए अमेरिका का यह अधिक प्रभावी मंच बन गया है.
सारंग शिडोर ने बताया है कि भारत को क्यों कमतर आंका जा रहा है. शिडोर ने लिखा है, ''क्वॉड की लड़खड़ाहट का तात्कालिक कारण ट्रंप प्रशासन की नीतिगत अस्थिरता है, लेकिन इसकी जड़ें गहरी संरचनात्मक खामियों में हैं. क्वॉड में भारत ही एकमात्र ग़ैर-अमेरिकी सहयोगी देश है और वह अनावश्यक रूप से चीन को उकसाने से हिचकिचाता है, क्योंकि 2017 और 2020 में दोनों देशों के बीच गंभीर सैन्य टकराव हो चुके हैं.''
सारंग शिडोर कहते हैं, ''भारत ही वह अड़ंगा रहा है, जिसने क्वॉड के संयुक्त बयानों में चीन का नाम लेने से रोका है.''
''भारत की सुरक्षा का भूगोल अलग है. ताइवान और दक्षिण चीन सागर दिल्ली के लिए बहुत मायने नहीं रखते हैं जबकि उसका असली ध्यान चीन के साथ अपनी ज़मीनी सीमा और चीन–पाकिस्तान धुरी पर है. इस वजह से क्वॉड के सैन्य अभ्यासों की वास्तविक युद्ध स्थितियों में उपयोगिता संदिग्ध है और चीन की ओर से इन्हें ग़लत समझे जाने का जोखिम भी है.''
''दूसरी तरफ़ 2023 से फिलीपींस अमेरिका का केंद्रीय सुरक्षा साझेदार बनकर उभरा है, जहाँ अमेरिकी सैन्य अड्डों और संयुक्त अभ्यासों का विस्तार हुआ है. वह स्क्वाड का केंद्र है. एक नया चार-देशीय गठबंधन जिसमें भारत की जगह फिलीपींस है और इसे क्वॉड से अधिक सशक्त यूनिट के रूप में आकार लेता हुआ बताया गया है.टट
पेट्रोडॉलर व्यवस्था को बचाए रखने की चिंता
कई एक्सपर्ट रूस से तेल ख़रीदने पर सख़्ती, वेनेज़ुएला में सत्ता परिवर्तन और ईरान पर हमले के पीछे पेट्रोडॉलर व्यवस्था को बचाए रखने की चिंता के रूप में देखते हैं. दरअसल, दशकों तक तेल का व्यापार मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर में होता रहा और यही व्यवस्था डॉलर की वैश्विक प्रभुत्व की सबसे बड़ी नींव बनी.
लेकिन 2014 में क्राइमिया संकट के बाद रूस पर लगे प्रतिबंधों और विशेष रूप से 2022 के यूक्रेन युद्ध के बाद चीन और भारत जैसे बड़े खरीदारों ने डॉलर से बाहर वैकल्पिक भुगतान व्यवस्थाओं को तेज़ी से बढ़ाया. भारत ने 2022 के बाद भारी मात्रा में रूसी तेल ख़रीदा. युद्ध के दौरान रूस के कुल कच्चे तेल निर्यात का 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सा भारत में आया. चीन की ख़रीद इससे भी ज़्यादा रही.
चीन ने ऊर्जा आयात में युआन के इस्तेमाल को बढ़ाकर अपनी मुद्रा के अंतरराष्ट्रीयकरण को आगे बढ़ाया है. भारत की ओर से भी कुछ रूसी तेल ख़रीद का भुगतान युआन में किए जाने की ख़बरें आईं. इसे पेट्रोडॉलर को चुनौती देने के रूप में देखा गया.
इसी दौरान वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था भी बदल रही है. इलेक्ट्रिक गाड़ियों की तेज़ी से बिक्री बढ़ रही है. इसका नेतृत्व भी चीन कर रहा है. ऐसे में तेल की मांग में भी बदलाव हो सकता है.
इसके अलावा ब्रिक्स के भीतर अपनी मुद्रा में व्यापार पर चर्चा की ख़बरें आईं. भारत ब्रिक्स का संस्थापक सदस्य है. ट्रंप ने डॉलर को कमज़ोर करने की संभावित कोशिश को लेकर ब्रिक्स को धमकी भी दी थी. ज़ाहिर है कि ट्रंप को डॉलर की बादशाहत को चुनौती मिलने की चिंता रही है.
प्रोफ़ेसर त्रिपाठी कहते हैं, ''अमेरिका तेल की आपूर्ति पर अपना नियंत्रण चाहता है और इसके लिए पेट्रोडॉलर का होना अनिवार्य है. यानी तेल की ख़रीदारी डॉलर में होता रहे. लेकिन मुझे लगता है कि ईरान पर हमले के बाद सऊदी, क़तर, यूएई, बहरीन और कुवैत जैसे देशों को अहसास हो गया है कि अमेरिका उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता है. ऐसे में ये देश भी अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भरता कम करेंगे और यह भी अमेरिकी दबदबे वाली व्यवस्था के लिए चुनौती होगी.''
पेट्रोडॉलर की ज़रूरत को लेकर ईरान की इस्फ़हान यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के असोसिएट प्रोफ़ेसर अली उमिदी ने 19 मई को मिडल ईस्ट मॉनिटर की वेबसाइट पर लिखा था, ''अमेरिका ने एक ऐसी वैश्विक वित्तीय संरचना बनाई, जिसके ज़रिए वह युद्ध की लागत दूसरे देशों पर डालते हुए लगातार सैन्य हस्तक्षेप करता रहा. बिना इस डर के कि उसे लंबे समय तक चलने वाली महंगाई या विनाशकारी बजट घाटे का सामना करना पड़ेगा.''
डॉलर की बादशाहत
अली उमिदी ने लिखा है, ''दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1944 में हुए ब्रेटन वुड्स सम्मेलन से डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व की शुरुआत हुई. इस समझौते के तहत दुनिया की अधिकांश मुद्राओं को डॉलर से जोड़ा गया और अमेरिका ने वादा किया कि वह 35 डॉलर के बदले एक औंस सोना देगा. इस व्यवस्था के बाद डॉलर वैश्विक व्यापार और विदेशी मुद्रा भंडार की मुख्य मुद्रा बन गया. देशों ने सोने की जगह डॉलर जमा करना शुरू किया.''
भारत ने पिछले वित्त वर्ष में ऊर्जा आयात पर 174 अरब डॉलर ख़र्च किए थे. भारत के लिए ज़रूरी है कि वह पर्याप्त डॉलर अपने पास रखे ताकि ऊर्जा की कमी पूरी की जा सके. अगर तेल निर्यातक देश राज़ी हो जाएं कि वे डॉलर की बजाय अन्य मुद्राओं में भी तेल देंगे तो अमेरिकी डॉलर की प्रासंगिकता कमज़ोर होगी. ऐसे में अमेरिका के लिए ज़रूरी हो जाता है कि वह अपने दबदबे के लिए डॉलर का प्रभुत्व बनाए रखे.
भारत दुनिया का तीसरा बड़ा तेल आयातक देश है. पिछले साल तक अमेरिका और भारत के द्विपक्षीय व्यापार में भारत का ट्रेड सरप्लस रहा है.
ऐसे में अमेरिका चाहता है कि भारत ऊर्जा आयात यहाँ शिफ्ट करे. भारत के जाने-माने ऊर्जा विश्लेषक नरेंद्र तनेजा भी मानते हैं कि अमेरिका भारत की ऊर्जा आपूर्ति अपने यहाँ से ज़्यादा चाहता है.
नरेंद्र तनेजा कहते हैं, ''मार्को रुबियो का बयान यही बताता है कि वह भारत पर दबाव बनाना चाहते हैं. लेकिन भारत ऊर्जा ज़रूरतें पूरी करने के लिए पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर नहीं हो सकता है. अमेरिका ने भारत के ख़िलाफ़ 50 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाकर बता दिया है कि उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता है.''
नरेंद्र तनेजा कहते हैं, ''ईरान युद्ध का एक एजेंडा यह भी था कि तेल पर ओपेक के दबदबे को कमज़ोर किया जाए. अमेरिका ऐसा करने में सफल भी होता दिख रहा है. यूएई का ओपेक से बाहर होना बताता है कि अमेरिका तेल आपूर्ति को अपने नियंत्रण में लेने जा रहा है. संभव है कि आने वाले वक़्त में माइनस गल्फ़ तेल निर्यातकों का अलग संगठन बन जाए और उसका मुखिया अमेरिका रहे. इसमें अमेरिका, कनाडा, ब्राज़ील, मेक्सिको और अन्य देश शामिल हो सकते हैं.''
ओपेक का कमज़ोर होना
लेकिन यह भारत के लिए कैसा रहेगा? तनेजा कहते हैं, ''अमेरिका भारत के लिए गल्फ़ का विकल्प नहीं बन सकता है और भारत ऐसा चाहेगा भी नहीं. भारत अभी क़रीब 42 देशों से तेल आयात कर रहा है और यही वजह है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बाधित होने के बावजूद उस तरह से ऊर्जा संकट देखने को नहीं मिला. अमेरिका से तेल आयात गल्फ़ की तुलना में महंगा भी होगा क्योंकि शिपिंग कॉस्ट बढ़ जाएगी.''
नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि ओपेक का दबदबा कम होगा तो यह अमेरिका के हक़ में होगा. हालांकि ओपेक का प्रभाव दशकों से लगातार घट रहा है. एक समय वैश्विक तेल निर्यात में उसकी हिस्सेदारी आधे से भी अधिक थी लेकिन अब यह घटकर लगभग 40 प्रतिशत रह गई है.
2010 के दशक के मध्य से अमेरिकी तेल निर्यात में भारी वृद्धि हुई है और ईरान युद्ध उसे और गति मिली है. इसी दौरान इसराइल के प्राकृतिक गैस निर्यात में भारी बढ़ोतरी हुई है. 2021 से 2025 के बीच इसमें 86 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.

