
फुकेत से दिल्ली आ रहे एयर इंडिया विमान की ऊंचाई कम होने के बाद पायलट के कैनाबिस टेस्ट पॉज़िटिव आने की ख़बरों ने सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं।
फुकेत से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की एक उड़ान के दौरान विमान की ऊंचाई अचानक कम होने की घटना के बाद, पायलट की कैनाबिस जांच रिपोर्ट पॉज़िटिव आने की ख़बरों से एविएशन सेफ़्टी पर बहस छिड़ गई है।
एआई-जनित सारांश
4 अगस्त को फुकेत से दिल्ली आ रहे एयर इंडिया के विमान की ऊंचाई अचानक कम हो गई थी, जिसके बाद पायलटों की रूटीन ड्रग जांच की गई।
ऐसी ख़बरें कि एक एयर इंडिया पायलट की फ़्लाइट के बाद कैनाबिस (गांजे) की जांच रिपोर्ट पॉज़िटिव आई है. ये ऐसी जानकारी लगती है जिस पर एविएशन जांचकर्ताओं को तुरंत ध्यान देना चाहिए.
लेकिन इस रिपोर्ट की आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं हुई है. अगर पुष्टि हो भी जाती है, तो भी यह ज़रूरी नहीं कि यह वही पक्का सबूत हो जैसा कि लग रहा है.
4 अगस्त को फुकेत से दिल्ली आ रहे एयर इंडिया के एयरबस ए320 की ऊंचाई अचानक लगभग 91 मीटर (300 फ़ीट) कम हो गई. इससे 13 यात्री और चार क्रू सदस्य घायल हो गए. 137 यात्रियों और आठ क्रू सदस्यों वाला यह विमान दिल्ली में सुरक्षित उतर गया. इस घटना की जांच चल रही है.
भारत के एविएशन मंत्रालय ने बताया कि दोनों पायलटों की फ़्लाइट के बाद साइकोएक्टिव पदार्थों (नशीले पदार्थों) के लिए रूटीन जांच की गई.
मंत्रालय ने कहा कि कैप्टन की शुरुआती जांच का नतीजा ऐसा था जिसके लिए 'पुष्टि करने वाली जांच' की ज़रूरत थी. जांच पूरी होने तक दोनों पायलटों को फ़्लाइट ड्यूटी से हटा दिया गया है.
इस हफ़्ते की शुरुआत में कई मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से कहा गया कि बाद में लैब में हुई कन्फ़र्मेटरी टेस्ट में कैप्टन मारिजुआना (गांजे) के लिए पॉज़िटिव पाए गए.
एयर इंडिया ने इस नतीजे की पुष्टि नहीं की है. लेकिन इन रिपोर्ट्स ने भारत में पायलटों के ड्रग टेस्ट और एविएशन सेफ़्टी को लेकर बहस छेड़ दी है.
अब तक कैप्टन के कथित ड्रग-टेस्ट के नतीजे और विमान की ऊंचाई में अचानक आई कमी के बीच कोई आधिकारिक संबंध नहीं मिला है.
जांचकर्ता इस घटना की व्यापक स्तर पर जांच कर रहे हैं, जिसमें तकनीकी, ऑपरेशनल, मेडिकल और मानवीय पहलू शामिल हैं. अभी यह साफ़ नहीं है कि विमान के अचानक नीचे आने की वजह क्या थी.
ज़ाहिर सा सवाल यह है कि क्या इसमें कैनबिस (गांजे) की कोई भूमिका थी?
कम ज़ाहिर लेकिन ज़्यादा मुश्किल सवाल यह है: कैनबिस टेस्ट का पॉज़िटिव नतीजा असल में हमें पायलट की कुछ घंटे पहले की मानसिक स्थिति के बारे में क्या बताता है?
कैनबिस जटिल कामों को करने की क्षमता पर कैसे असर डालता है, इस बारे में काफ़ी जानकारी मौजूद है. लेकिन पॉज़िटिव टेस्ट के आधार पर यह कैसे तय किया जाए कि पायलट किस समय काम करने की सही हालत में नहीं था, इस बारे में बहुत कम जानकारी है.
सबसे सीधे तौर पर संबंधित कुछ सबूत एक काफ़ी अलग स्रोत से मिलते हैं- पायलटों से.
1976 के एक एक्सपेरिमेंट में 10 पायलटों ने थोड़ी मात्रा में मारिजुआना का सेवन किया और फिर एक सिम्युलेटर उड़ाया. उनकी परफ़ार्मेंस ख़राब हो गई. उनसे ऊंचाई, दिशा और रेडियो नेविगेशन में ग़लतियां हुईं. स्टडी में पाया गया कि इसके असर कम से कम दो घंटे तक दिखे और आम तौर पर चार से छह घंटे में ख़त्म हो गए.
एक दशक बाद रिसर्चर्स ने इस सवाल पर फिर से गौर किया कि जब मारिजुआना का नशा (यानी 'हाई' होने का एहसास) उतर जाता है, तो उसके बाद क्या होता है.
कैनाबिस (गांजा) पीने के 24 घंटे बाद दस अनुभवी प्राइवेट पायलटों का फ्लाइट सिम्युलेटर पर टेस्ट किया गया. कई पैमानों पर उनकी परफ़ॉर्मेंस में काफी गिरावट देखी गई, जैसे कि एलिवेटर और एलिरॉन कंट्रोल, लैंडिंग की सटीकता, और अप्रोच के दौरान वर्टिकल और लेटरल डेविएशन (ऊंचाई और दिशा से भटकाव). सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि पायलटों को खुद यह एहसास नहीं हुआ कि उनकी परफ़ॉर्मेंस खराब हो गई है.
1991 में हुई एक और स्टडी में भी इसी तरह की चेतावनी दी गई.
नौ सक्रिय पायलटों ने 20एमजी टीएचसी (टेट्राहाइड्रोकैनाबिनोल) वाली सिगरेट पीने के बाद सिम्युलेटर उड़ाया. टीएचसी कैनाबिस में पाया जाने वाला मुख्य साइकोएक्टिव कंपाउंड है और यही वह केमिकल है जो 'हाई' होने का एहसास कराता है और दिमाग व मोटर स्किल्स पर ड्रग के कई असर के लिए ज़िम्मेदार होता है.
15 मिनट, चार घंटे, आठ घंटे और 24 घंटे बाद जांच करने पर परफ़ॉर्मेंस में कमी देखी गई. स्टडी में पाया गया कि नौ में से सात पायलटों में 24 घंटे बाद कुछ कमी दिखी, लेकिन सिर्फ़ एक को ही दवा के असर के बारे में पता था.
ये स्टडीज़ छोटी और पुरानी हैं. इन्हें आधुनिक एयरलाइनर के बजाय एयरक्राफ्ट सिमुलेटर के साथ किया गया था. इनसे हमें यह पता नहीं चल सकता कि एयर इंडिया के कॉकपिट में क्या हुआ था.
लेकिन जानकारों का मानना है कि इनसे शायद कोई काम की बात पता चलती है. कैनबिस उस तरह के बारीक मोटर कंट्रोल, ध्यान और जटिल ह्यूमन-मशीन इंटरैक्शन में रुकावट डाल सकती है जिनकी ज़रूरत उड़ान भरने के लिए होती है.
ऑस्ट्रेलिया के ट्रांसपोर्ट सेफ्टी ब्यूरो के लिए एविएशन-मेडिसिन स्पेशलिस्ट डेविड न्यूमैन की एक समीक्षा भी इसी नतीजे पर पहुंची.
कैनबिस व्यवहार, सोचने-समझने की क्षमता और साइकोमोटर परफ़ॉर्मेंस पर डोज़ के हिसाब से असर डालती है. उड़ान भरने जैसे जटिल काम इसके प्रति ख़ास तौर पर संवेदनशील होते हैं. पड़ताल में 24 घंटे तक असर के सबूत भी मिले.
हालांकि, मामला अब और भी पेचीदा हो गया है क्योंकि दुनिया के कई हिस्सों में कैनबिस का इस्तेमाल बढ़ गया है और कैनबिस से बने उत्पादों की ताक़त भी बढ़ गई है.
कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी, सैन डिएगो के थॉमस मार्कोट की अगुवाई में 2022 में हुए एक रैंडमाइज़्ड क्लिनिकल ट्रायल में कैनबिस का नियमित रूप से इस्तेमाल करने वाले 191 लोगों पर टेस्ट किया गया.
जिन लोगों ने टीएचसी का सेवन किया था, उन्होंने सिम्युलेटेड ड्राइविंग टास्क में ख़राब प्रदर्शन किया. लेकिन रिसर्चर्स ने पाया कि कैनबिस में टीएचसी की मात्रा, इस्तेमाल करने वालों के पिछले अनुभव या उनके खून में टीएचसी की मात्रा से प्रदर्शन में कमी का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता था.
शुरुआत में ड्रग ने प्रदर्शन पर बुरा असर डाला. लेकिन लगभग साढ़े चार घंटे बाद, जिन लोगों ने इसका सेवन किया था, वे भी उतना ही अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे जितना कि वे लोग जिन्होंने एक्टिव ड्रग नहीं लिया था.
यह नतीजा एविएशन टेस्टिंग के लिए बहुत अहम है.
पॉज़िटिव टेस्ट से यह तो पता चल सकता है कि टीएचसी मौजूद है, लेकिन इससे यह ज़रूरी नहीं कि यह पता चले कि कैनाबिस का सेवन कब किया गया था. या उस समय व्यक्ति पर उसका कितना असर था.
जानकारों का कहना है कि यह संबंध कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे कि कितनी मात्रा में सेवन किया गया, कैसे सेवन किया गया, कितनी बार इस्तेमाल किया गया और व्यक्ति का शरीर कैसा है.
यही एक वजह है कि कैनाबिस को लेकर रेगुलेटर्स के सामने ऐसी समस्या आती है जो शराब के मामले में नहीं होती.
मार्कोट ने बीबीसी को बताया, "शराब के मामले में खून में शराब की मात्रा और उससे होने वाली अक्षमता के बीच एक मज़बूत संबंध होता है. लेकिन टीएचसी के मामले में यह संबंध बहुत जटिल है. स्मोकिंग के बाद टीएचसी तेज़ी से खून से निकल जाता है. खून में टीएचसी की मात्रा और अक्षमता के बीच बहुत कम या कोई संबंध नहीं होता है."
"जो लोग कभी-कभी भी इसका इस्तेमाल करते हैं, उनमें आखिरी बार इस्तेमाल के कई दिनों और कभी-कभी हफ़्तों बाद भी खून में टीएचसी का पता चल सकता है. खासकर उन लोगों में, जो ज़्यादा बार इसका इस्तेमाल करते हैं. यह समय उस समय के बाद का होता है जब इसका तुरंत होने वाला असर खत्म हो चुका होता है."
स्टडीज़ से पता चलता है कि कैनबिस पीने के बाद इसका असर आम तौर पर तीन से पांच घंटे तक रहता है. जब कैनबिस को किसी खाने की चीज़ में मिलाकर लिया जाए, तो इसका असर ज़्यादा देर तक रहता है. आम तौर पर छह से आठ घंटे, और कभी-कभी उससे भी ज़्यादा.
मार्कोट का कहना है कि खाने वाली चीज़ों के ज़रिए कैनबिस लेने पर, मेटाबोलाइट 11-ओएच-टीएचसी (11-हाइड्रॉक्सी-टीएचसी) का संबंध सोचने-समझने की क्षमता पर पड़ने वाले असर से ज़्यादा होता है, जबकि टीएचसी की मात्रा कम हो सकती है.
इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि कैनबिस का ऐसा कोई सर्वमान्य टेस्ट नहीं है जो यह बता सके- यह व्यक्ति अभी इतना प्रभावित है कि विमान नहीं उड़ा सकता.
कनाडा ने इस मामले में बहुत कड़ा रुख़ अपनाया है. 2018 में मनोरंजन के लिए कैनबिस के इस्तेमाल को क़ानूनी मंज़ूरी देने के बाद, ट्रांसपोर्ट कनाडा ने एक नियम लागू किया जिसके तहत फ्लाइट क्रू और फ्लाइट कंट्रोलर्स के लिए ड्यूटी से कम से कम 28 दिन पहले तक कैनबिस का सेवन करना मना है.
रेगुलेटर का कहना है कि इस नियम का मक़सद कैनबिस के असर और उसकी पहचान से जुड़ी अनिश्चितताओं को दूर करना था. और एयरलाइंस इससे भी कड़े नियम लागू कर सकती हैं.
अमेरिकी एविएशन का अनुभव भी इस बात की चेतावनी देता है कि पॉजिटिव टेस्ट के नतीजों का बहुत ज़्यादा मतलब नहीं निकालना चाहिए.
2018 और 2022 के बीच अमेरिका में सिविल एविएशन दुर्घटनाओं में मारे गए पायलटों पर अमेरिका के नेशनल ट्रांसपोर्टेशन सेफ़्टी बोर्ड (एनटीएसबी) की 2026 की एक स्टडी में पाया गया कि 52.8 फीसदी पायलटों में कम से कम एक ड्रग का पता चला. वहीं 27.7 फ़ीसदी में दो या उससे ज़्यादा ड्रग्स पाए गए.
गैर-क़ानूनी ड्रग्स मिलने में बढ़ोतरी की मुख्य वजह टीएचसी थी. लेकिन एनटीएसबी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि स्टडी ड्रग्स की मौजूदगी के बारे में थी, न कि इस बारे में कि पायलट की क्षमता पर कोई असर पड़ा था या नहीं.
साफ़ है कि किसी के शरीर में कैनबिस मिलने से ही यह साबित नहीं हो जाता कि उसी वजह से कोई घटना या दुर्घटना हुई.
लेकिन ऐसे मामले भी हैं जिनमें जांचकर्ताओं ने और गहराई से जांच की. 2011 में कनाडा में हुए एक क्रैश में, सेसना 208बी के पायलट के खून में 50.1 नैनोग्राम प्रति मिलीलीटर टीएचसी पाया गया था.
ट्रांसपोर्टेशन सेफ्टी बोर्ड ने निष्कर्ष निकाला कि साइकोएक्टिव कैनबिनोइड्स की यह मात्रा सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित करने के लिए काफ़ी थी. संभवतः इसने पायलट की प्लानिंग और फ़्लाइट के संचालन पर असर डाला था.
इसके उलट मामले भी सामने आए हैं.
2017 में न्यूज़ीलैंड में हुए एक हेलिकॉप्टर क्रैश में, पायलट के खून में टीएचसी पाया गया था. उन्होंने दो दिन पहले कैनबिस का इस्तेमाल किया था.
एक फ़ोरेंसिक टॉक्सिकोलॉजिस्ट ने नतीजा निकाला कि दुर्घटना के समय उसके नशे में होने की आशंका कम थी. जांचकर्ताओं को भी नहीं लगा कि कैनबिस की इसमें कोई भूमिका थी.
इन मामलों से यह सीख नहीं मिलती कि कैनबिस टेस्ट का पॉज़िटिव आना कोई मायने नहीं रखता. बल्कि, इसका मतलब इस बात पर निर्भर करता है कि कैनबिस की मात्रा कितनी थी, इस्तेमाल कब किया गया था, हालात क्या थे और जांचकर्ताओं के पास और क्या सबूत मौजूद हैं.
एयर इंडिया के मामले में जांचकर्ताओं को सिर्फ़ इस बात से आगे बढ़कर और भी बहुत कुछ साबित करना होगा कि कैप्टन का कन्फ़र्मेटरी टेस्ट पॉज़िटिव आया था.
उन्हें यह जानना होगा कि किस सैंपल का टेस्ट किया गया था, उसमें टीएचसी था या मेटाबोलाइट. उसकी मात्रा कितनी थी और इससे इस्तेमाल के समय के बारे में क्या पता चलता है.
इस घटना के बाद एयर इंडिया अपने सभी पायलटों का प्रतिबंधित पदार्थों के लिए तुरंत टेस्ट करने जा रही है. यह मौजूदा नियमों का विस्तार है, जिनके तहत कम से कम 10 फ़ीसदी पायलटों की रैंडम स्क्रीनिंग की जाती है.
मार्कोट के मुताबिक़, यूरिन, खून और यहां तक कि लार से भी यह पता चल सकता है कि किसी ने टीएचसी का सेवन किया है. लेकिन इनसे यह पक्के तौर पर नहीं बताया जा सकता कि इसका इस्तेमाल कब किया गया था या क्या उस व्यक्ति की हालत कुछ घंटे पहले ठीक नहीं थी.
जानकारों का मानना है कि सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि क्या पायलट मारिजुआना का इस्तेमाल कर रहा था?
इसके तीन पहलू हैं- क्या कैनबिस का सेवन किया गया था? क्या पायलट उड़ान के दौरान ठीक हालत में नहीं था? और क्या उस हालत की विमान की ऊंचाई अचानक कम होने में कोई भूमिका थी?
पहले सवाल का जवाब शायद जल्द ही मिल जाए. बाकी दो सवालों का जवाब देना काफ़ी मुश्किल है.
एआई दृष्टिकोण - संभावनाएँ, तथ्य नहीं
एयर इंडिया सभी पायलटों का प्रतिबंधित पदार्थों के लिए तुरंत टेस्ट शुरू करेगी।
बहुत सम्भावना है · सप्ताह के भीतर

थाईलैंड के फुकेट से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की उड़ान के दौरान अचानक करीब 300 फीट नीचे आने की घटना के बाद, विमान के पायलट की दूसरी ड्रग जांच पॉजिटिव आई है। इस मामले में एएआईबी जांच कर रहा है।
Legal marijuana in places like Thailand and Amsterdam complicates psychoactive substance detection for flight crews, prompting calls for increased random drug testing globally.
An Air India flight from Phuket to Delhi experienced a sudden 300-foot altitude loss during cruise, leading to injuries among passengers and crew. Both pilots underwent psychoactive substance screening, with the captain's initial test requiring confirmatory analysis. The incident is classified as serious and under investigation by the AAIB.
Air India declines to comment on reports of a pilot failing a dope test post Phuket-Delhi turbulence incident, citing unreceived test results. The DGCA investigates, while the Federation of Indian Pilots advises against premature conclusions.
The captain of an Air India flight from Phuket to Delhi reportedly tested positive in a post-flight dope test after the Airbus A320 carrying 145 people encountered severe turbulence, injuring 17 people.
An EasyJet flight from Manchester to Kos took off from the wrong runway intersection (J2 instead of cleared J1), significantly reducing available runway length, though it departed safely. The AAIB investigation highlights navigation errors due to complex layouts, low visibility, and cockpit assumptions.