मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट: पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के नए सुरक्षा समझौते के मायने
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हाल ही में हुए मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट से मध्य-पूर्व में कूटनीतिक हलचल तेज़ हो गई है।
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पाकिस्तान ने सऊदी अरब और तुर्की के साथ 'मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट' पर हस्ताक्षर किए हैं, जिससे मध्य-पूर्व में उसकी रणनीतिक स्थिति मज़बूत होने की चर्चा है, हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि साझा दुश्मन के अभाव में इसके सैन्य असर सीमित हो सकते हैं।
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पाकिस्तान ने सऊदी अरब और तुर्की के साथ मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए हैं।
पाकिस्तान ने पिछले हफ़्ते सऊदी अरब और तुर्की के साथ एक नए सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसे मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट नाम दिया गया है.
कहा जा रहा है कि यह समझौता मध्य-पूर्व की उभरती नई सुरक्षा व्यवस्था में पाकिस्तान की स्थिति को मज़बूत करता है और क्षेत्र में उसके हितों को आगे बढ़ाने में मदद करेगा.
मक्का समझौता पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच आपसी रक्षा समझौता होने के एक साल से भी कम समय में हुआ है. कहा जा रहा है कि भविष्य में और भी कुछ देश इस डिफेंस पैक्ट में शामिल हो सकते हैं.
भारत के पूर्व विदेश सचिव और दिग्गज डिप्लोमैट श्याम सरन ने द वायर के लिए वरिष्ठ पत्रकार करण थापर से 12 अगस्त को एक इंटरव्यू में कहा कि मक्का समझौता पाकिस्तान का मध्य-पूर्व में रणनीतिक प्रोफ़ाइल और अहमियत बढ़ाता है.
श्याम सरन से करण थापर ने पूछा कि क्या मक्का समझौते ने भारत को बैकफुट पर ला दिया है?
इसके जवाब में श्याम सरन ने कहा, ''मैं ऐसा नहीं कहूंगा, लेकिन यह निश्चित रूप से पाकिस्तान को एक लाभ देता है. पाकिस्तान इसे भारत के ख़िलाफ़ एक बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश करने की पूरी कोशिश करेगा. हालाँकि, मुझे नहीं लगता कि तुर्की और सऊदी अरब का भारत के ख़िलाफ़ किसी संयुक्त सैन्य अभियान में शामिल होने का कोई इरादा है. उन दोनों के इस समझौते में शामिल होने के अपने-अपने अलग मक़सद हैं.''
पाकिस्तान को कितना फ़ायदा
पाकिस्तान का तुर्की और सऊदी अरब के साथ क़रीबी सैन्य संबंधों का पुराना इतिहास रहा है. यह कोई नई बात नहीं है.
श्याम सरन कहते हैं, "नई बात यह है कि सऊदी अरब और तुर्की के रिश्ते अच्छे हो रहे हैं. वर्तमान में पाकिस्तान के लिए मुख्य सुरक्षा ख़तरा भारत से नहीं बल्कि अफ़ग़ानिस्तान से आ रहा है. क्या आपको लगता है कि सऊदी अरब या तुर्की अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ पाकिस्तान के साथ लड़ेंगे? बिल्कुल नहीं.''
श्याम सरन कहते हैं, ''मेरे विचार में पाकिस्तान का तुर्की के साथ संबंध उतना ख़तरनाक नहीं है जितना कि चीन के साथ उनका गठजोड़. इसके अलावा, एक और बात जिससे हमें चिंतित होना चाहिए, वह यह है कि अमेरिका ने फिर से पाकिस्तान के साथ घनिष्ठ सैन्य संबंध शुरू कर दिए हैं. पाकिस्तान को फिर से अमेरिका और चीन दोनों का संरक्षण मिलना भारत के लिए मक्का समझौते से कहीं ज़्यादा चिंता का विषय है.''
थिंक टैंक अटलांटिक काउंसिल में साउथ एशिया के सीनियर फेलो माइकल कुगलमैन का एक लेख अमेरिकी मैगज़ीन फॉरन पॉलिसी में 12 अगस्त को प्रकाशित हुआ.
माइकल कुगलमैन भी मानते हैं कि इस समझौते से मुस्लिम बहुल पाकिस्तान का मध्य-पूर्व में प्रभाव बढ़ेगा.
कुगलमैन ने लिखा है, ''यह महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तानी नेता चाहते हैं कि दुनिया उनके देश को एक प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में देखे, न कि एक जोखिम भरे साझेदार के तौर पर. मध्य-पूर्व पाकिस्तान के रणनीतिक हितों के लिए भी अहम है. यहाँ उसके कई प्रमुख सहयोगी हैं, उसके ज़्यादातर हाइड्रोकार्बन आयात इसी क्षेत्र से आते हैं और लाखों पाकिस्तानी प्रवासी यहाँ रहते हैं.''
कुगलमैन मानते हैं कि इस समझौते से भारत के मामले में उसे बहुत फ़ायदा नहीं होगा.
उन्होंने लिखा है, ''सऊदी अरब और तुर्की के साथ यह समझौता पाकिस्तान के लिए अपने क्षेत्र में उतना फ़ायदेमंद नहीं होगा. पाकिस्तान भारत के साथ कई युद्ध लड़ चुका है, जिसमें पिछले साल का संघर्ष भी शामिल है. इसके अलावा, अब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सरकार के साथ भी समय-समय पर झड़पें होती रहती हैं. लेकिन वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान के सहयोगी संभवतः उसके समर्थन में युद्ध में नहीं उतरेंगे.''
कुगलमैन ने लिखा है, ''अगर भारत पाकिस्तान पर हमला करता है तो यह मानना मुश्किल है कि सऊदी अरब भारत के ख़िलाफ़ हथियार उठाएगा, क्योंकि भारत भी उसका एक क़रीबी साझेदार है. तालिबान के मामले में भी इसके संकेत पहले से मौजूद हैं.''
''अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान हिंसा पिछले अक्तूबर में शुरू हुई थी, यानी सऊदी अरब के साथ आपसी रक्षा समझौते के अंतिम रूप लेने के कुछ ही समय बाद. लेकिन तब से सऊदी अरब ने कभी भी इस समझौते को लागू करने की धमकी नहीं दी.''
क्या मुस्लिम नेटो बनेगा?
चूंकि यह समझौता मुस्लिमों के लिए महत्व रखने वाले शहर में तीन प्रमुख मुस्लिम देशों ने किया है, इसलिए कहा जा रहा है कि यह गठबंधन दूसरे मुस्लिम देशों को भी अपने साथ जोड़कर आगे बढ़ सकता है.
ऐसे में यह भी कहा जा रहा है कि क्या यह गठबंधन मुस्लिम नेटो का रूप ले सकता है? मिडिल ईस्ट काउंसिल ऑन ग्लोबल अफेयर्स के वरिष्ठ नॉन-रेजिडेंट फेलो अली बाकिर ने निक्केई एशिया से कहा कि मिस्र, क़तर, अज़रबैजान, जॉर्डन और सीरिया भविष्य में गठबंधन के विस्तार के लिए स्वाभाविक देश हैं.
तुर्की नेटो की दूसरी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है. पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र मुस्लिम बहुल परमाणु शक्ति संपन्न देश है. सऊदी अरब एक प्रमुख तेल निर्यातक है, जिसके पास बड़ी वित्तीय ताक़त और आधुनिक पश्चिमी हथियार हैं. इन तीनों शक्तियों के एक साथ आने को अहम माना जा रहा है.
निक्केई एशिया से अटलांटिक काउंसिल के नॉन-रेजिडेंट सीनियर फेलो डैनी सिट्रिनोविच ने कहा कि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि नया गठबंधन किसी हमले के जवाब में किस तरह की कार्रवाई कर पाएगा. उन्होंने कहा, "हमने हाल के हूती हमले के ख़िलाफ़ पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब की कोई संयुक्त जवाबी कार्रवाई नहीं देखी."
शनिवार को सीएनएन तुर्क के साथ एक इंटरव्यू में तुर्की के उपराष्ट्रपति सेवडेट यिलमाज़ से पूछा गया कि क्या यह समझौता सऊदी अरब और ईरान या भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष की स्थिति में तुर्की को कार्रवाई करने के लिए बाध्य कर सकता है.
उन्होंने जवाब में कहा, "एकजुटता के कई रूप होते हैं. ऐसे समझौतों में देशों के बीच एकजुटता दिखाने के लिए किसी प्रक्रिया में तुरंत या स्वतः शामिल होना ज़रूरी नहीं होता."
इसका संकेत यह था कि गठबंधन के सदस्य देश अन्य दो सदस्यों से जुड़े सशस्त्र संघर्षों में तत्काल और सीधे तौर पर शामिल होने से बच सकते हैं.
अगर कॉमन दुश्मन नहीं है, तब क्या होगा?
दिल्ली स्थित थिंक टैंक तक्षशिला इंस्टिट्यूशन के निदेशक नितिन पाई मानते हैं कि मल्टिपोलर वर्ल्ड यानी बहुध्रुवीय दुनिया में नेटो जैसा रक्षा समझौता कोई मायने नहीं रखता है.
नितिन पाई ने एक्स पर लिखा है, ''बाइपोलर वर्ल्ड में नेटो जैसा आपसी रक्षा समझौते का मतलब समझ में आता था. लेकिन ग़ैर-ध्रुवीय या बहुध्रुवीय दुनिया में इसे लागू करना कहीं ज़्यादा मुश्किल होगा. अगर आपके सहयोगी का दुश्मन आपका दुश्मन नहीं है, तो क्या आप उसके ख़िलाफ़ युद्ध में जाएंगे?''
नितिन पाई ने लिखा है, ''इसलिए सऊदी अरब-पाकिस्तान-तुर्की का समझौता पेचीदा होगा. सऊदी अरब और पाकिस्तान ने पिछले साल भी एक आपसी रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. उसी साल ईरान ने सऊदी अरब पर हमला किया. सऊदी अरब ने उस रक्षा समझौते को लागू नहीं किया. इसके बजाय पाकिस्तान ने मध्यस्थता की कोशिश करके स्थिति को टालने की कोशिश की.''
नितिन पाई कहते हैं, ''आप सैन्य समझौतों पर हस्ताक्षर कर सकते हैं. लेकिन उन्हें लागू करना एक अलग बात है. बहुध्रुवीय दुनिया में अलग-अलग देशों के साथ रिश्ते रखने वाले देशों के बीच आपसी रक्षा समझौता जटिल होता है. इसकी क्षमता इस बात पर निर्भर करती है कि विरोधी को कितना भरोसा है कि गठबंधन के सहयोगी संघर्ष में उतरेंगे.''
अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक़्क़ानी भी यही मानते हैं कि अगर इस सैन्य गठजोड़ में शामिल देशों का कोई साझा दुश्मन नहीं है तो डिफेंस पैक्ट हो सकता है लेकिन जॉइंट डिफेंस पैक्ट नहीं है.
हुसैन हक़्क़ानी ने एक्स पर लिखा है, ''जॉइंट डिफेंस आम तौर पर किसी साझा दुश्मन के ख़िलाफ़ होता है. अगर कोई साझा दुश्मन नहीं है, तो डिफेंस कोऑपरेशन हो सकता है, लेकिन जॉइंट डिफेंस पैक्ट नहीं.पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के दुश्मन अलग-अलग हैं. इसलिए इस समझौते के बाद संसाधनों के इस्तेमाल और रक्षा उपकरणों के निर्माण में सहयोग बढ़ सकता है, लेकिन मुस्लिम नेटो नहीं बनेगा.''
हक़्क़ानी कहते हैं, ''सऊदी-तुर्की-पाकिस्तान डिफेंस पैक्ट प्रतीकात्मक ज़्यादा है. किसी साझा दुश्मन का होना आपसी रक्षा समझौते का पहला आधार होता है और यहां वह मौजूद नहीं है.''
तीनों की मज़बूती और कमज़ोरी
भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू के अंतरराष्ट्रीय संपादक स्टैनली जॉनी ने नौ अगस्त को मक्का समझौते पर लिखे एक आर्टिकल में कहा है कि इस गठबंधन के तीनों देश अपनी अलग ताक़त और कमज़ोरियां के साथ हैं.
स्टैनली जॉनी ने लिखा है, ''पाकिस्तान मुस्लिम दुनिया की एकमात्र परमाणु शक्ति है, लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था मुश्किल से संभल पा रही है. दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में से एक सऊदी अरब के पास बड़ी वित्तीय ताक़त है, लेकिन उसे ख़ासकर ईरान और हूतियों से गंभीर सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.''
''तुर्की की मिलिट्री इंडस्ट्री का आधार तेज़ी से बढ़ रहा है, जिसमें आधुनिक ड्रोन बनाने की क्षमता भी शामिल है. लेकिन वह अपने पड़ोस में इसराइल की बढ़ती सैन्य सक्रियता को लेकर चिंतित है. तीनों देशों के सामूहिक सुरक्षा प्रावधान का यह मतलब नहीं है कि पाकिस्तान ईरान या हूतियों के ख़िलाफ़ युद्ध में उतरेगा या तुर्की भविष्य में भारत-पाकिस्तान संघर्ष में शामिल होगा.''
Açık Sorular
- क्या यह समझौता भविष्य में अन्य देशों तक विस्तारित होगा?
- क्या सदस्य देश वास्तव में किसी संघर्ष की स्थिति में एक-दूसरे की मदद करेंगे?


